Saturday, 29 February 2020

Hindi Murli 01/03/2020

01-03-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 02-12-85 मधुबन

बन्धनों से मुक्त होने की युक्ति - रूहानी शक्ति
आज बापदादा अपने रूहानी बच्चों की रूहानियत की शक्ति देख रहे थे। हर एक रूहानी बच्चे ने रूहानी बाप से रूहानी शक्ति का सम्पूर्ण अधिकार बच्चे होने के नाते प्राप्त तो किया ही है। लेकिन प्राप्ति स्वरूप कहाँ तक बने हैं, यह देख रहे थे। सभी बच्चे हर रोज़ स्वयं को रूहानी बच्चा कह, रूहानी बाप को यादप्यार का रिटर्न मुख से या मन से यादप्यार वा नमस्ते के रूप में देते हैं। रिटर्न देते हो ना! इसका रहस्य यह हुआ कि रोज़ रूहानी बाप रूहानी बच्चे कह रूहानी शक्ति का वास्तविक स्वरूप याद दिलाते हैं क्योंकि इस ब्राह्मण जीवन की विशेषता ही है रूहानियत। इस रूहानियत की शक्ति से स्वयं को वा सर्व को परिवर्तन करते हो। मुख्य फाउन्डेशन ही यह रूहानी शक्ति है। इस शक्ति से ही अनेक प्रकार के जिस्मानी बन्धनों से मुक्ति मिलती है। बापदादा देख रहे थे कि अब तक भी कई सूक्ष्म बन्धन जो स्वयं भी अनुभव करते हैं कि इस बन्धन से मुक्ति होनी चाहिए। लेकिन मुक्ति पाने की युक्ति प्रैक्टिकल में ला नहीं सकते। कारण? रूहानी शक्ति हर कर्म में यूज़ करना नहीं आता है। एक ही समय, संकल्प, बोल और कर्म तीनों को साथ-साथ शक्तिशाली बनाना पड़े। लेकिन लूज़ किसमें हो जाते हैं? एक तरफ संकल्प को शक्तिशाली बनाते हैं तो वाणी में कुछ लूज़ हो जाते हैं। कब वाणी को शक्तिशाली बनाते हैं, तो कर्म में लूज़ हो जाते हैं। लेकिन यह तीनों ही रूहानी शक्तिशाली एक ही समय पर बनावें तो यही युक्ति है मुक्ति की। जैसे सृष्टि की रचना में तीन कार्य - स्थापना, पालना और विनाश तीनों ही आवश्यक हैं। ऐसे सर्व बन्धनों से मुक्त होने की युक्ति मन्सा, वाचा, कर्मणा तीनों में रूहानी शक्ति साथ-साथ आवश्यक है। कभी मन्सा को सम्भालते तो वाचा में कमी पड़ जाती। फिर कहते सोचा तो ऐसे नहीं था, पता नहीं यह क्यों हो गया। तीनों तरफ पूरा अटेन्शन चाहिए। क्यों? यह तीनों ही साधन सम्पन्न स्थिति को और बाप को प्रत्यक्ष करने वाले हैं। मुक्ति पाने के लिए तीनों में रूहानियत अनुभव होनी चाहिए। जो तीनों में युक्तियुक्त हैं वो ही जीवनमुक्त हैं। तो बापदादा सूक्ष्म बन्धनों को देख रहे थे। सूक्ष्म बन्धन में भी विशेष इन तीनों का कनेक्शन है। बन्धन की निशानी-
बन्धन वाला सदा ही परवश होता है। बन्धन वाला अपने को आन्तरिक खुशी वा सुख में सदा अनुभव नहीं करेगा। जैसे लौकिक दुनिया में अल्पकाल के साधन अल्पकाल की खुशी वा सुख की अनुभूति कराते हैं लेकिन आन्तरिक वा अविनाशी अनुभूति नहीं होती। ऐसे सूक्ष्म बन्धन में बंधी हुई आत्मा इस ब्राह्मण जीवन में भी थोड़े समय के लिए सेवा का साधन, संगठन की शक्ति का साधन, कोई न कोई प्राप्ति के साधन, श्रेष्ठ संग का साधन इन साधनों के आधार से चलते हैं, जब तक साधन हैं तब तक खुशी और सुख की अनुभूति करते हैं। लेकिन साधन समाप्त हुआ तो खुशी भी समाप्त। सदा एकरस नहीं रहते। कभी खुशी में ऐसा नाचता रहेगा, उस समय जैसेकि उन जैसा कोई है ही नहीं। लेकिन रूकेगा फिर ऐसा जो छोटा-सा पत्थर भी पहाड़ समान अनुभव करेगा क्योंकि ओरीज्नल शक्ति न होने के कारण साधन के आधार पर खुशी में नाचते। साधन निकल गया तो कहाँ नाचेगा? इसलिए आन्तरिक रूहानी शक्ति तीनों रूपों में सदा साथ-साथ आवश्यक है। मुख्य बन्धन है - मन्सा संकल्प की कन्ट्रोलिंग पावर नहीं। अपने ही संकल्पों के वश होने के कारण परवश का अनुभव करते हैं। जो स्वयं के संकल्पों के बन्धनों में है वह बहुत समय इसी में बिजी रहता है। जैसे आप लोग भी कहते हो ना कि हवाई किले बनाते हैं। किले बनाते और बिगाड़ते हैं। बहुत लम्बी दीवार खड़ी करते हैं। इसीलिए हवाई किला कहा जाता है। जैसे भक्ति में पूजा कर, सजा-धजा करके फिर डुबो देते हैं ना, ऐसे संकल्प के बन्धन में बंधी हुई आत्मा बहुत कुछ बनाती और बहुत कुछ बिगाड़ती है। स्वयं ही इस व्यर्थ कार्य से थक भी जाते हैं, दिलशिकस्त भी हो जाते हैं। और कभी अभिमान में आकर अपनी गलती दूसरे पर भी लगाते रहते। फिर भी समय बीतने पर अन्दर समझते हैं, सोचते हैं कि यह ठीक नहीं किया। लेकिन अभिमान के परवश होने के कारण, अपने बचाव के कारण, दूसरे का ही दोष सोचते रहते हैं। सबसे बड़ा बन्धन यह मन्सा का बन्धन है, जो बुद्धि को ताला लग जाता है इसलिए कितनी भी समझाने की कोशिश करो लेकिन उनको समझ में नहीं आयेगा। मन्सा बन्धन की विशेष निशानी है, महसूसता शक्ति समाप्त हो जाती है इसलिए इस सूक्ष्म बन्धन को समाप्त करने के बिना कभी भी आन्तरिक खुशी, सदा के लिए अतीन्द्रिय सुख अनुभव नहीं कर सकेंगे।
संगमयुग की विशेषता ही है - अतीन्द्रिय सुख में झूलना, सदा खुशी में नाचना। तो संगमयुगी बनकर अगर इस विशेषता का अनुभव नहीं किया तो क्या कहेंगे? इसलिए स्वयं को चेक करो कि किसी भी प्रकार के संकल्पों के बन्धन में तो नहीं हैं? चाहे व्यर्थ संकल्पों का बन्धन, चाहे ईर्ष्या द्वेष के संकल्प, चाहे अलबेलेपन के संकल्प, चाहे आलस्य के संकल्प, किसी भी प्रकार के संकल्प मन्सा बन्धन की निशानी हैं। तो आज बापदादा बन्धनों को देख रहे थे। मुक्त आत्मायें कितनी हैं?
मोटी-मोटी रस्सियाँ तो खत्म हो गई हैं। अभी यह महीन धागे हैं। हैं पतले लेकिन बन्धन में बांधनें में होशियार हैं। पता ही नहीं पड़ता कि हम बन्धन में बंध रहे हैं क्योंकि यह बन्धन अल्पकाल का नशा भी चढ़ाता है। जैसे विनाशी नशे वाले कभी अपने को नीचा नहीं समझते। होगा नाली में समझेगा महल में। होगा खाली हाथ, अपने को समझेगा राजा हैं। ऐसे इस नशे वाला भी कभी अपने को रांग नहीं समझेगा। सदा अपने को या तो राइट सिद्ध करेगा वा अलबेलापन दिखायेगा। यह तो होता ही है, ऐसे तो चलता ही है इसलिए आज सिर्फ मन्सा बन्धन बताया। फिर वाचा और कर्म का भी सुनायेंगे। समझा!
रूहानी शक्ति द्वारा मुक्ति प्राप्त करते चलो। संगमयुग पर जीवनमुक्ति का अनुभव करना ही भविष्य जीवनमुक्त प्रालब्ध पाना है। गोल्डन जुबली में तो जीवनमुक्त बनना है ना कि सर्फ गोल्डन जुबली मनानी है। बनना ही मनाना है। दुनिया वाले सिर्फ मनाते हैं, यहाँ बनाते हैं। अभी जल्दी-जल्दी तैयार हो तब सभी आपकी मुक्ति से मुक्त बन जायेंगे। साइन्स वाले भी अपने बनाये हुए साधनों के बन्धन में बंध गये हैं। नेतायें भी देखो बचने चाहते हैं लेकिन कितने बंधे हुए हैं। सोचते हुए भी कर नहीं पाते तो बन्धन हुआ ना। सभी आत्माओं को भिन्न-भिन्न बन्धनों से मुक्त कराने वाले स्वयं मुक्त बन सभी को मुक्त बनाओ। सभी मुक्ति, मुक्ति कह चिल्ला रहे हैं। कोई गरीबी से मुक्ति चाहते हैं। कोई गृहस्थी से मुक्ति चाहते हैं। लेकिन सभी का आवाज एक ही मुक्ति का है। तो अभी मुक्ति दाता बन मुक्ति का रास्ता बताओ वा मुक्ति का वर्सा दो। आवाज तो पहुँचता है ना कि समझते हो यह तो बाप का काम है। हमारा क्या है। प्रालब्ध आपको पानी है, बाप को नहीं पानी है। प्रजा वा भक्त भी आपको चाहिए। बाप को नहीं चाहिए। जो आपके भक्त होंगे वह बाप के स्वत: ही बन जायेंगे क्योंकि द्वापर में आप लोग ही पहले भक्त बनेंगे। पहले बाप की पूजा शुरू करेंगे। तो आप लोगों को सभी फॉलो अभी करेंगे इसलिए अभी क्या करना है? पुकार सुनो। मुक्ति दाता बनो। अच्छा!
सदा रूहानी शक्ति की युक्ति से मुक्ति प्राप्त करने वाले, सदा स्वयं को सूक्ष्म बन्धनों से मुक्त कर मुक्ति दाता बनने वाले, सदा स्वयं को आन्तरिक खुशी, अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति में आगे से आगे बढ़ाने वाले, सदा सर्व प्रति मुक्त आत्मा बनाने की शुभ भावना वाले, ऐसे रूहानी शक्तिशाली बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
पार्टियोंसे:- सुनने के साथ-साथ स्वरूप बनने में भी शक्तिशाली आत्मायें हो ना। सदैव अपने संकल्पों में हर रोज़ कोई न कोई स्व के प्रति औरों के प्रति उमंग-उत्साह का संकल्प रखो। जैसे आजकल के समय में अखबार में या कई स्थानों पर “आज का विचार” विशेष लिखते हैं ना। ऐसे रोज़ मन का संकल्प कोई न कोई उमंग-उत्साह का इमर्ज रूप में लाओ। और उसी संकल्प से स्वयं में भी स्वरूप बनाओ और दूसरों की सेवा में भी लगाओ तो क्या होगा? सदा ही नया उमंग-उत्साह रहेगा। आज यह करेंगे, आज यह करेंगे। जैसे कोई विशेष प्रोग्राम होता है तो उमंग-उत्साह क्यों आता है? प्लैन बनाते हैं ना - यह करेंगे फिर यह करेंगे। इससे विशेष उमंग-उत्साह आता है। ऐसे रोज़ अमृतवेले विशेष उमंग-उत्साह का संकल्प करो और फिर चेक भी करो तो अपनी भी सदा के लिए उत्साह वाली जीवन होगी और उत्साह दिलाने वाले भी बन जायेंगे। समझा - जैसे मनोरंजन प्रोग्राम होते हैं ऐसे यह रोज़ का मन का मनोरंजन प्रोग्राम हो। अच्छा!
2. सदा शक्तिशाली याद में आगे बढ़ने वाली आत्मायें हो ना? शक्तिशाली याद के बिना कोई भी अनुभव हो नहीं सकता। तो सदा शक्तिशाली बन आगे बढ़ते चलो। सदा अपनी शक्ति अनुसार ईश्वरीय सेवा में लग जाओ और सेवा का फल पाओ। जितनी शक्ति है, उतना सेवा में लगाते चलो। चाहे तन से, चाहे मन से, चाहे धन से। एक का पदमगुणा मिलना ही है। अपने लिए जमा करते हो। अनेक जन्मों के लिए जमा करना है। एक जन्म में जमा करने से 21 जन्म के लिए मेहनत से छूट जाते हो। इस राज़ को जानते हो ना? तो सदा अपने भविष्य को श्रेष्ठ बनाते चलो। खुशी-खुशी से अपने को सेवा में आगे बढ़ाते चलो। सदा याद द्वारा एकरस स्थिति से आगे बढ़ो।
3. याद की खुशी से अनेक आत्माओं को खुशी देने वाले सेवाधारी हो ना। सच्चे सेवाधारी अर्थात् सदा स्वयं भी लगन में मगन रहें और दूसरों को भी लगन में मगन करने वाले। हर स्थान की सेवा अपनी-अपनी है। फिर भी अगर स्वयं लक्ष्य रख आगे बढ़ते हैं तो यह आगे बढ़ना सबसे खुशी की बात है। वास्तव में यह लौकिक स्टडी आदि सब विनाशी हैं, अविनाशी प्राप्ति का साधन सिर्फ यह नॉलेज है। ऐसे अनुभव करते हो ना। देखो, आप सेवाधारियों को ड्रामा में कितना गोल्डन चान्स मिला हुआ है। इसी गोल्डन चांस को जितना आगे बढ़ाओ उतना आपके हाथ में है। ऐसा गोल्डन चांस सभी को नहीं मिलता है। कोटों में कोई को ही मिलता है। आपको तो मिल गया। इतनी खुशी रहती है? दुनिया में जो किसी के पास नहीं वह हमारे पास है। ऐसे खुशी में सदा स्वयं भी रहो और दूसरों को भी लाओ। जितना स्वयं आगे बढ़ेंगे उतना औरों को बढ़ायेंगे। सदा आगे बढ़ने वाली, यहाँ वहाँ देखकर रुकने वाली नहीं। सदा बाप और सेवा सामने हो, बस। फिर सदा उन्नति को पाती रहेंगी। सदा अपने को बाप के सिकीलधे हैं, ऐसा समझकर चलो।
नौकरी करने वाली कुमारियों से
1. सभी का लक्ष्य तो श्रेष्ठ है ना। ऐसे तो नहीं समझती हो कि दोनों तरफ चलती रहेंगी क्योंकि जब कोई बन्धन होता तो दोनों तरफ चलना दूसरी बात है। लेकिन निर्बन्धन आत्माओं का दोनों तरफ रहना अर्थात् लटकना है। कोई-कोई के सरकमस्टांस होते हैं तो बापदादा भी छुट्टी देते हैं लेकिन मन का बन्धन है तो फिर यह लटकना हुआ। एक पांव यहाँ हुआ, एक पांव वहाँ हुआ तो क्या होगा? अगर एक नांव में एक पांव रखो, दूसरी नांव में दूसरा पांव रखो तो क्या हालत होगी? परेशान होंगे ना इसलिए दोनों पांव एक नांव में। सदा अपनी हिम्मत रखो। हिम्मत रखने से सहज ही पार हो जायेंगी, सदा यह याद रखो कि मेरे साथ बाबा है। अकेले नहीं हैं, तो जो भी कार्य करने चाहो कर सकती हो।
2. कुमारियों का संगमयुग पर विशेष पार्ट है, ऐसी विशेष पार्टधारी अपने को बनाया है? या अभी तक साधारण हो? आपकी विशेषता क्या है? विशेषता है सेवाधारी बनना। जो सेवाधारी है, वह विशेष हैं। सेवाधारी नहीं हो तो साधारण हो गई। क्या लक्ष्य रखा है? संगमयुग पर ही यह चांस मिलता है। अगर अभी यह चांस नहीं लिया तो सारे कल्प में नहीं मिलेगा। संगमयुग को ही विशेष वरदान है। लौकिक पढ़ाई पढ़ते भी लगन इस पढ़ाई में हो। तो वह पढ़ाई विघ्न रूप नहीं बनेगी। तो सभी अपना भाग्य बनाते आगे बढ़ो। जितना अपने भाग्य का नशा होगा, उतना सहज माया-जीत बन जायेंगे। यह रूहानी नशा है। सदा अपने भाग्य के गीत गाती रहो तो गीत गाते-गाते अपने राज्य में पहुँच जायेंगी।

वरदान: स्वयं की सर्व कमजोरियों को दान की विधि से समाप्त करने वाले दाता, विधाता भव!
भक्ति में यह नियम होता है कि जब कोई वस्तु की कमी होती है तो कहते हैं दान करो। दान करने से देना-लेना हो जाता है। तो किसी भी कमजोरी को समाप्त करने के लिए दाता और विधाता बनो। यदि आप औरों को बाप का खजाना देने के निमित्त सहारा बनेंगे तो कमजोरियों का किनारा स्वत: हो जायेगा। अपने दाता-विधातापन के शक्तिशाली संस्कार को इमर्ज करो तो कमजोर संस्कार स्वत:समाप्त हो जायेगा।

स्लोगन: अपने श्रेष्ठ भाग्य के गुण गाते रहो-कमजोरियों के नहीं।

Friday, 28 February 2020

Hindi Murli 29/02/2020

29-02-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

"मीठे बच्चे - माया दुश्मन तुम्हारे सामने है इसलिए अपनी बहुत-बहुत सम्भाल करनी है, अगर चलते-चलते माया में फँस गये तो अपनी तकदीर को लकीर लगा देंगे''

प्रश्न: तुम राजयोगी बच्चों का मुख्य कर्तव्य क्या है?
उत्तर: पढ़ना और पढ़ाना, यही तुम्हारा मुख्य कर्तव्य है। तुम हो ईश्वरीय मत पर। तुम्हें कोई जंगल में नहीं जाना है। घर गृहस्थ में रहते शान्ति में बैठ बाप को याद करना है। अल्फ और बे, इन्हीं दो शब्दों में तुम्हारी सारी पढ़ाई आ जाती है।

ओम् शान्ति। बाप भी ब्रह्मा द्वारा कह सकते हैं कि बच्चों गुडमॉर्निंग। परन्तु फिर बच्चों को भी रेसपान्ड देना पड़े। यहाँ है ही बाप और बच्चों का कनेक्शन। नये जो हैं जब तक पक्के हो जाएं, कुछ न कुछ पूछते रहेंगे। यह तो पढ़ाई है, भगवानुवाच भी लिखा है। भगवान है निराकार। यह बाबा अच्छी रीति पक्का कराते हैं, किसको भी समझाने के लिए क्योंकि उस तरफ है माया का जोर। यहाँ तो वह बात नहीं है। बाप तो समझते हैं जिन्होंने कल्प पहले वर्सा लिया है वह आपेही आ जायेंगे। ऐसे नहीं कि फलाना चला न जाए, इनको पकड़ें। चला जाए तो चला जाए। यहाँ तो जीते जी मरने की बात है। बाप एडाप्ट करते हैं। एडाप्ट किया ही जाता है कुछ वर्सा देने के लिए। बच्चे माँ-बाप के पास आते ही हैं वर्से की लालच पर। साहूकार का बच्चा कभी गरीब के पास एडाप्ट होगा क्या! इतना धन दौलत आदि सब छोड़ कैसे जायेंगे। एडाप्ट करते हैं साहूकार। अभी तुम जानते हो बाबा हमको स्वर्ग की बादशाही देते हैं। क्यों न उनका बनेंगे। हर एक बात में लालच तो रहती है। जितना बहुत पढ़ेंगे उतनी बड़ी लालच होगी। तुम भी जानते हो बाप ने हमको एडाप्ट किया है बेहद का वर्सा देने। बाप भी कहते हैं तुम सबको हम फिर से 5 हज़ार वर्ष पहले मुआफिक एडाप्ट करते हैं। तुम भी कहते हो बाबा हम आपके हैं। 5 हज़ार वर्ष पहले भी आपके बने थे। तुम प्रैक्टिकल में कितने ब्रह्माकुमार-कुमारियां हो। प्रजापिता भी तो नामीग्रामी है। जब तक शूद्र से ब्राह्मण न बनें तो देवता बन न सकें। तुम बच्चों की बुद्धि में अब यह चक्र फिरता रहता है-हम शूद्र थे, अभी ब्राह्मण बने हैं फिर देवता बनना है। सतयुग में हम राज्य करेंगे। तो इस पुरानी दुनिया का विनाश जरूर होना है। पूरा निश्चय नहीं बैठता है तो फिर चले जाते हैं। कई कच्चे हैं जो गिर जाते हैं, यह भी ड्रामा में नूँध है। माया दुश्मन सामने खड़ी है, तो वह अपनी तरफ खींच लेती है। बाप घड़ी-घड़ी पक्का कराते हैं, माया में फँस नहीं पड़ना, नहीं तो अपनी तकदीर को लकीर लगा देंगे। बाप ही पूछ सकते हैं कि आगे कब मिले हो? और कोई को पूछने का अक्ल आयेगा ही नहीं। बाप कहते हैं मुझे भी फिर से गीता सुनाने आना पड़े। आकर रावण की जेल से छुड़ाना पड़े। बेहद का बाप बेहद की बात समझाते हैं। अभी रावण का राज्य है, पतित राज्य है जो आधाकल्प से शुरू हुआ है। रावण को 10 शीश दिखाते हैं, विष्णु को 4 भुजा दिखाते हैं। ऐसे कोई मनुष्य होता नहीं। यह तो प्रवृत्ति मार्ग दिखाया जाता है। यह है एम आब्जेक्ट, विष्णु द्वारा पालना। विष्णुपुरी को कृष्णपुरी भी कहते हैं। कृष्ण को तो 2 बाहें ही दिखायेंगे ना। मनुष्य तो कुछ भी समझते नहीं हैं। बाप हर एक बात समझाते हैं। वह सब है भक्ति मार्ग। अभी तुमको ज्ञान है, तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही है नर से नारायण बनने की। यह गीता पाठशाला है ही जीवनमुक्ति प्राप्त करने के लिए। ब्राह्मण तो जरूर चाहिए। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। शिव को रूद्र भी कहते हैं। अब बाप पूछते हैं ज्ञान यज्ञ कृष्ण का है या शिव का है? शिव को परमात्मा ही कहते हैं, शंकर को देवता कहते हैं। उन्होंने फिर शिव और शंकर को इकट्ठा कर दिया है। अब बाप कहते हैं हमने इनमें प्रवेश किया है। तुम बच्चे कहते हो बापदादा। वह कहते हैं शिवशंकर। ज्ञान सागर तो है ही एक।

अभी तुम जानते हो ब्रह्मा सो विष्णु बनते हैं ज्ञान से। चित्र भी बरोबर बनाते हैं। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। इसका अर्थ भी कोई समझ नहीं सकते। ब्रह्मा को शास्त्र हाथ में दिये हैं। अभी शास्त्रों का सार बाप बैठ सुनाते हैं या ब्रह्मा? यह भी मास्टर ज्ञान सागर बनते हैं। बाकी चित्र इतने ढेर बनाये हैं, वह कोई यथार्थ हैं नहीं। वह हैं सब भक्ति मार्ग के। मनुष्य कोई 8-10 भुजा वाले होते नहीं। यह तो सिर्फ प्रवृत्ति मार्ग दिखाया है। रावण का भी अर्थ बताया है-आधाकल्प है रावण राज्य, रात। आधाकल्प है रामराज्य, दिन। बाप हर एक बात समझाते हैं। तुम सब एक बाप के बच्चे हो। बाप ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना करते हैं और तुमको राजयोग सिखाते हैं। जरूर संगम पर ही राजयोग सिखायेंगे। द्वापर में गीता सुनाई, यह तो राँग हो जाता है। बाप सच बतलाते हैं। बहुतों को ब्रह्मा का, कृष्ण का साक्षात्कार होता है। ब्रह्मा का सफेद पोश ही देखते हैं। शिवबाबा तो है बिन्दी। बिन्दी का साक्षात्कार हो तो कुछ समझ न सकें। तुम कहते हो हम आत्मा हैं, अब आत्मा को किसने देखा है, कोई ने नहीं। वह तो बिन्दी है। समझ सकते हैं ना। जो जिस भावना से जिसकी पूजा करते हैं, उनको वही साक्षात्कार होगा। दूसरा अगर रूप देखें तो मूँझ पड़ें। हनूमान की पूजा करेगा तो उनको वही दिखाई पड़ेगा। गणेश के पुजारी को वही दिखाई पड़ेगा। बाप कहते हैं हमने तुमको इतना धनवान बनाया, हीरे जवाहरों के महल थे, तुमको अनगिनत धन था, तुमने अभी वह सब कहाँ गँवाया? अभी तुम कंगाल बन गये हो, भीख माँग रहे हो। बाप तो कह सकते हैं ना। अभी तुम बच्चे समझते हो बाप आये हैं, हम फिर से विश्व के मालिक बनते हैं। यह ड्रामा अनादि बना हुआ है। हरेक ड्रामा में अपना पार्ट बजा रहे हैं। कोई एक शरीर छोड़ जाकर दूसरा लेते हैं, इसमें रोने की क्या बात है। सतयुग में कभी रोते नहीं। अभी तुम मोहजीत बन रहे हो। मोहजीत राजायें यह लक्ष्मी-नारायण आदि हैं। वहाँ मोह होता नहीं। बाप अनेक प्रकार की बातें समझाते रहते हैं। बाप है निराकार। मनुष्य तो उसे नाम-रूप से न्यारा कह देते हैं। लेकिन नाम-रूप से न्यारी कोई चीज़ थोड़ेही होती है। हे भगवान, ओ गॉड फादर कहते हैं ना। तो नाम-रूप है ना। लिंग को शिव परमात्मा, शिवबाबा भी कहते हैं। बाबा तो है ना बरोबर। बाबा के जरूर बच्चे भी होंगे। निराकार को निराकार आत्मा ही बाबा कहती है। मन्दिर में जायेंगे तो उनको कहेंगे शिवबाबा फिर घर में आकर बाप को भी कहते हैं बाबा। अर्थ तो समझते नहीं, हम उनको शिवबाबा क्यों कहते हैं! बाप बड़े ते बड़ी पढ़ाई दो अक्षर में पढ़ाते हैं-अल्फ और बे। अल्फ को याद करो तो बे-बादशाही तुम्हारी है। यह बड़ा भारी इम्तहान है। मनुष्य बड़ा इम्तहान पास करते हैं तो पहले वाली पढ़ाई कोई याद थोड़ेही रहती है। पढ़ते-पढ़ते आखरीन तन्त (सार) बुद्धि में आ जाता है। यह भी ऐसे है। तुम पढ़ते आये हो। अन्त में फिर बाप कहते हैं मन्मनाभव, तो देह का अभिमान टूट जायेगा। यह मन्मनाभव की आदत पड़ी होगी तो पिछाड़ी में भी बाप और वर्सा याद रहेगा। मुख्य है ही यह, कितना सहज है। उस पढ़ाई में भी अभी तो पता नहीं क्या-क्या पढ़ते हैं। जैसे राजा वैसा वह अपनी रसम चलाते हैं। आगे मण, सेर, पाव का हिसाब चलता था। अभी तो किलो आदि क्या-क्या निकल पड़ा है। कितने अलग-अलग प्रान्त हो गये हैं। देहली में जो चीज़ एक रूपया सेर, बाम्बे में मिलेगी दो रूपया सेर, क्योंकि प्रान्त अलग-अलग हैं। हरेक समझते हैं हम अपने प्रान्त को भूख थोड़ेही मारेंगे। कितने झगड़े आदि होते हैं, कितना रोला है।

भारत कितना सालवेन्ट था फिर 84 का चक्र लगाते इन्सालवेन्ट बन पड़े हैं। कहा जाता है हीरे जैसा जन्म अमोलक कौड़ी बदले खोया रे.......बाप कहते हैं तुम कौड़ियों के पिछाड़ी क्यों मरते हो। अब तो बाप से वर्सा लो, पावन बनो। बुलाते भी हो-हे पतित-पावन आओ, पावन बनाओ। तो इससे सिद्ध है पावन थे, अब नहीं हैं। अभी है ही कलियुग। बाप कहते हैं मैं पावन दुनिया बनाऊंगा तो पतित दुनिया का जरूर विनाश होगा इसलिए ही यह महाभारत लड़ाई है जो इस रूद्र ज्ञान यज्ञ से प्रज्वलित हुई है। ड्रामा में तो यह विनाश होने की भी नूँध है। पहले-पहले तो बाबा को साक्षात्कार हुआ। देखा इतनी बड़ी राजाई मिलती है तो बहुत खुशी होने लगी, फिर विनाश का साक्षात्कार भी कराया। मन्मनाभव, मध्याजीभव। यह गीता के अक्षर हैं। कोई-कोई अक्षर गीता के ठीक हैं। बाप भी कहते हैं तुमको यह ज्ञान सुनाता हूँ, यह फिर प्राय: लोप हो जाता है। कोई को भी पता नहीं है कि लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो और कोई धर्म नहीं था। उस समय जनसंख्या कितनी थोड़ी होगी, अब कितनी है। तो यह चेन्ज होनी चाहिए। जरूर विनाश भी चाहिए। महाभारत लड़ाई भी है। जरूर भगवान भी होगा। शिव जयन्ती मनाते हैं तो शिवबाबा ने क्या आकर किया? वह भी नहीं जानते हैं। अब बाप समझाते हैं, गीता से कृष्ण की आत्मा को राजाई मिली। मात-पिता कहेंगे गीता को, जिससे तुम फिर देवता बनते हो इसलिए चित्र में भी दिखाया है-कृष्ण ने गीता नहीं सुनाई। कृष्ण गीता के ज्ञान से राजयोग सीख यह बना, कल फिर कृष्ण होगा। उन्होंने फिर शिवबाबा के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। तो बाप समझाते हैं, यह तो अपने अन्दर पक्का निश्चय कर लो, कोई उल्टी-सुल्टी बात सुनाकर तुम्हें गिरा न दे। बहुत बातें पूछते हैं-विकार बिगर सृष्टि कैसे चलेगी? यह कैसे होगा? अरे, तुम खुद कहते हो-वह वाइसलेस दुनिया थी। सम्पूर्ण निर्विकारी कहते हो ना फिर विकार की बात कैसे हो सकती है? अब तुम जानते हो बेहद के बाप से बेहद की बादशाही मिलती है, तो ऐसे बाप को क्यों नहीं याद करेंगे? यह है ही पतित दुनिया। कुम्भ के मेले पर कितने लाखों जाते हैं। अब कहते हैं वहाँ एक नदी गुप्त है। अब नदी गुप्त हो सकती है क्या? यहाँ भी गऊमुख बनाया है। कहते हैं गंगा यहाँ आती है। अरे, गंगा अपना रास्ता लेकर समुद्र में जायेगी कि यहाँ तुम्हारे पास पहाड़ पर आयेगी। भक्ति मार्ग में कितने धक्के हैं। ज्ञान, भक्ति फिर है वैराग्य। एक है हद का वैराग्य, दूसरा है बेहद का। सन्यासी घरबार छोड़ जंगल में रहते हैं, यहाँ तो वह बात नहीं। तुम बुद्धि से सारी पुरानी दुनिया का सन्यास करते हो। तुम राजयोगी बच्चों का मुख्य कर्तव्य है पढ़ना और पढ़ाना। अब राजयोग कोई जंगल में थोड़ेही सिखाया जाता है। यह स्कूल है। ब्रांचेज निकलती जाती हैं। तुम बच्चे राजयोग सीख रहे हो। शिवबाबा से पढ़े हुए ब्राह्मण-ब्राह्मणियां सिखाते हैं। एक शिवबाबा थोड़ेही सबको बैठ सिखायेगा। तो यह हुई पाण्डव गवर्मेन्ट। तुम हो ईश्वरीय मत पर। यहाँ तुम कितना शान्ति में बैठे हो, बाहर तो अनेक हंगामें हैं। बाप कहते हैं 5 विकारों का दान दो तो ग्रहण छूट जायेगा। मेरे बनो तो मैं तुम्हारी सब कामनायें पूरी कर दूँगा। तुम बच्चे जानते हो अभी हम सुखधाम में जाते हैं, दु:खधाम को आग लगनी है। बच्चों ने विनाश का साक्षात्कार भी किया है। अब टाइम बहुत थोड़ा है इसलिए याद की यात्रा में लग जायेंगे तो विकर्म विनाश होंगे और ऊंच पद पायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप के वर्से का पूरा अधिकार लेने के लिए जीते जी मरना है। एडाप्ट हो जाना है। कभी भी अपनी ऊंची तकदीर को लकीर नहीं लगानी है।
2) कोई भी उल्टी-सुल्टी बात सुनकर संशय में नहीं आना है। ज़रा भी निश्चय न हिले। इस दु:खधाम को आग लगने वाली है इसलिए इससे अपना बुद्धियोग निकाल लेना है।

वरदान: समस्याओं को समाधान रूप में परिवर्तित करने वाले विश्व कल्याणी भव
मैं विश्व कल्याणी हूँ-अब इस श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना के संस्कार इमर्ज करो। इस श्रेष्ठ संस्कार के आगे हद के संस्कार स्वत: समाप्त हो जायेंगे। समस्यायें समाधान के रूप में परिवर्तित हो जायेंगी। अब युद्ध में समय नहीं गंवाओ लेकिन विजयीपन के संस्कार इमर्ज करो। अब सब कुछ सेवा में लगा दो तो मेहनत से छूट जायेंगे। समस्याओं में जाने के बजाए दान दो, वरदान दो तो स्व का ग्रहण स्वत: समाप्त हो जायेगा।

स्लोगन: किसी की कमी, कमजोरियों का वर्णन करने के बजाए गुण स्वरूप बनो, गुणों का ही वर्णन करो।

Thursday, 27 February 2020

Hindi Murli 28/02/2020

28-02-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - बाप तुम्हारा मेहमान बनकर आया है तो तुम्हें आदर करना है, जैसे प्रेम से बुलाया है ऐसे आदर भी करना है, निरादर न हो”

प्रश्न: कौन-सा नशा तुम बच्चों को सदा चढ़ा रहना चाहिए? यदि नशा नहीं चढ़ता है तो क्या कहेंगे?
उत्तर: ऊंचे ते ऊंची आसामी इस पतित दुनिया में हमारा मेहमान बनकर आया है, यह नशा सदा चढ़ा रहना चाहिए। परन्तु नम्बरवार यह नशा चढ़ता है। कई तो बाप का बनकर भी संशयबुद्धि बन हाथ छोड़ जाते तो कहेंगे इनकी तकदीर।

ओम् शान्ति। ओम् शान्ति, ओम् शान्ति, दो बारी कहना पड़े। यह तो बच्चे जानते हैं कि एक है बाबा, दूसरा है दादा। दोनों इकट्ठे हैं ना। भगवान की महिमा भी कितनी ऊंची करते हैं परन्तु अक्षर कितना सिम्पुल है - गॉड फादर। सिर्फ फादर नहीं कहेंगे, गॉड फादर वह है ऊंच ते ऊंच। उनकी महिमा भी बहुत ऊंच है। उनको बुलाते भी पतित दुनिया में हैं। खुद आकर बतलाते हैं कि मुझे पतित दुनिया में ही बुलाते हैं परन्तु पतित-पावन वह कैसे है, कब आते हैं, यह किसको भी पता नहीं। आधाकल्प सतयुग-त्रेता में किसका राज्य था, कैसे हुआ, किसको यह पता नहीं है। पतित-पावन बाप आते भी जरूर हैं, उनको कोई पतित-पावन कहते, कोई लिबरेटर कहते हैं। पुकारते हैं कि स्वर्ग में ले चलो। सबसे ऊंच ते ऊंच है ना। उनको पतित दुनिया में बुलाते हैं कि आकर हम भारतवासियों को श्रेष्ठ बनाओ। उनका पोजीशन कितना बड़ा है। हाइएस्ट अथॉरिटी है। उनको बुलाते हैं, जबकि रावण राज्य है। नहीं तो इस रावण राज्य से कौन छुड़ावे? यह सब बातें तुम बच्चे सुनते हो तो नशा भी चढ़ा रहना चाहिए। परन्तु इतना नशा चढ़ता नहीं है। शराब का नशा सभी को चढ़ जाता है, यह नहीं चढ़ता है। इसमें है धारणा की बात, तकदीर की बात है। तो बाप है बहुत बड़ी आसामी। तुम्हारे में भी कोई-कोई को पूरा निश्चय रहता है। निश्चय अगर सबको होता तो संशय में आकर भागते क्यों? बाप को भूल जाते हैं। बाप के बने, फिर बाप के लिए कोई संशय बुद्धि नहीं हो सकता। परन्तु यह बाप है वन्डरफुल। गायन भी है आश्चर्यवत् बाबा को जानन्ती, बाबा कहन्ती, ज्ञान सुनन्ती, सुनावन्ती, अहो माया फिर भी संशय-बुद्धि बनावन्ती। बाप समझाते हैं इन भक्ति मार्ग के शास्त्रों में कोई सार नहीं है। बाप कहते हैं मुझे कोई भी जानते नहीं। तुम बच्चों में भी मुश्किल कोई ठहर सकते हैं। तुम भी फील करते हो कि वह याद स्थाई ठहरती नहीं है। हम आत्मा बिन्दी हैं, बाबा भी बिन्दी है, वह हमारा बाप है, उनको अपना शरीर तो है नहीं। कहते हैं मैं इस तन का आधार लेता हूँ। मेरा नाम शिव है। मुझ आत्मा का नाम कभी बदलता नहीं है। तुम्हारे शरीर के नाम बदलते हैं। शरीर पर ही नाम पड़ते हैं। शादी होती है तो नाम बदल जाता है। फिर वह नाम पक्का कर लेते हैं। तो अब बाप कहते हैं तुम यह पक्का कर लो कि हम आत्मा हैं। यह बाप ने ही परिचय दिया है कि जब-जब अत्याचार और ग्लानि होती है तब मैं आता हूँ। कोई अक्षरों को भी पकड़ना नहीं है। बाप खुद कहते हैं मुझे पत्थर भित्तर में ठोक कितनी ग्लानि करते हैं, यह भी नई बात नहीं। कल्प-कल्प ऐसे पतित बन और ग्लानि करते हैं, तब ही मैं आता हूँ। कल्प-कल्प का मेरा पार्ट है। इसमें अदली-बदली हो नहीं सकती। ड्रामा में नूँध है ना। तुमको कई कहते हैं सिर्फ भारत में ही आता है! क्या भारत ही सिर्फ स्वर्ग बनेगा? हाँ। यह तो अनादि-अविनाशी पार्ट हो गया ना। बाप कितना ऊंच ते ऊंच है। पतितों को पावन बनाने वाला बाप कहते हैं मुझे बुलाते ही इस पतित दुनिया में हैं। मैं तो सदा पावन हूँ। मुझे पावन दुनिया में बुलाना चाहिए ना! परन्तु नहीं, पावन दुनिया में बुलाने की दरकार ही नहीं। पतित दुनिया में ही बुलाते हैं कि आकर पावन बनाओ। मैं कितना बड़ा मेहमान हूँ। आधाकल्प से मुझे याद करते आये हो। यहाँ कोई बड़े आदमी को बुलायेंगे, करके एक-दो वर्ष बुलायेंगे। फलाना इस वर्ष नहीं तो दूसरे वर्ष आयेगा। इनको तो आधाकल्प से याद करते आये हो। इनके आने का पार्ट तो फिक्स हुआ पड़ा है। यह किसको भी पता नहीं है। बहुत ऊंच ते ऊंच बाप है। मनुष्य बाप को एक ओर तो प्रेम से बुलाते हैं, दूसरी ओर महिमा में दाग़ लगा देते हैं। वास्तव में यह बड़े ते बड़ा गेस्ट ऑफ ऑनर (बड़ी महिमा वाला मेहमान) है, जिसकी ऑनर (महिमा) को दाग़ लगा दिया है, कह देते हैं वह पत्थर ठिक्कर सबमें हैं। कितनी हाइएस्ट अथॉरिटी है, बुलाते भी बहुत प्रेम से हैं, परन्तु हैं बिल्कुल बुद्धू। मैं ही आकर अपना परिचय देता हूँ कि मैं तुम्हारा फादर हूँ। मुझे गॉड फादर कहते हैं। जब सब रावण की कैद में हो जाते हैं तब ही बाप को आना होता है क्योंकि सब हैं भक्तियाँ अथवा ब्राइड्स-सीतायें। बाप है ब्राइडग्रुम-राम। एक सीता की बात नहीं है, सब सीताओं को रावण की जेल से छुड़ाते हैं। यह है बेहद की बात। यह है पुरानी पतित दुनिया। इसका पुराना होना फिर नया होना एक्यूरेट है, यह शरीर आदि तो कोई जल्दी पुराने हो जाते, कोई जास्ती टाइम चलते हैं। यह ड्रामा में एक्यूरेट नूँध है। पूरे 5 हज़ार वर्ष बाद फिर मुझे आना पड़ता है। मैं ही आकर अपना परिचय देता हूँ और सृष्टि चक्र का राज़ समझाता हूँ। किसको भी न मेरी पहचान है, न ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की, न लक्ष्मी-नारायण की, न राम-सीता की पहचान है। ऊंच ते ऊंच एक्टर्स ड्रामा के अन्दर तो यही हैं। है तो मनुष्य की बात। कोई 8-10 भुजा वाले मनुष्य नहीं हैं। विष्णु को 4 भुजा क्यों दिखाते हैं? रावण के 10 शीश क्या हैं? यह किसको भी पता नहीं है। बाप ही आकर सारे वर्ल्ड के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज बताते हैं। कहते हैं मैं हूँ बड़े ते बड़ा गेस्ट, परन्तु गुप्त। यह भी सिर्फ तुम ही जानते हो। परन्तु जानते हुए भी फिर भूल जाते हो। उनका कितना रिगार्ड रखना चाहिए, उन्हें याद करना चाहिए। आत्मा भी निराकार, परमात्मा भी निराकार, इसमें फ़ोटो की भी बात नहीं। तुमको तो आत्मा निश्चय कर बाप को याद करना है, देह-अभिमान छोड़ना है। तुम्हें सदैव अविनाशी चीज़ को देखना चाहिए। तुम विनाशी देह को क्यों देखते हो! देही-अभिमानी बनो, इसमें ही मेहनत है। जितना याद में रहेंगे उतना कर्मातीत अवस्था को पाए ऊंच पद पायेंगे। बाप बहुत ही सहज योग अर्थात् याद सिखलाते हैं। योग तो अनेक प्रकार के हैं। याद अक्षर ही यथार्थ है। परमात्मा बाप को याद करने में ही मेहनत है। कोई विरला सच बताते हैं कि हम इतना समय याद में रहा। याद करते ही नहीं हैं तो सुनाने में लज्जा आती है। लिखते हैं सारे दिन में एक घण्टा याद में रहे, तो लज्जा आनी चाहिए ना। ऐसा बाप जिसको दिन-रात याद करना चाहिए और हम सिर्फ एक घण्टा याद करते हैं! इसमें बड़ी गुप्त मेहनत है। बाप को बुलाते हैं तो दूर से आने वाला गेस्ट हुआ ना। बाप कहते हैं मैं नई दुनिया का गेस्ट नहीं बनता हूँ। आता ही पुरानी दुनिया में हूँ। नई दुनिया की स्थापना आकर करता हूँ। यह पुरानी दुनिया है, यह भी कोई यथार्थ नहीं जानते हैं। नई दुनिया की आयु ही नहीं जानते। बाप कहते हैं यह नॉलेज मैं ही आकर देता हूँ फिर ड्रामा अनुसार यह नॉलेज गुम हो जाती है। फिर कल्प बाद यह पार्ट रिपीट होगा। मुझे बुलाते हैं, वर्ष-वर्ष शिव जयन्ती मनाते हैं। जो होकर जाते हैं तो उनकी वर्ष-वर्ष वर्षी मनाते हैं। शिवबाबा की भी 12 मास बाद जयन्ती मनाते हैं परन्तु कब से मनाते आये हैं, यह किसको भी पता नहीं है। सिर्फ कह देते हैं कि लाखों वर्ष हुए। कलियुग की आयु ही लाखों वर्ष लिख दी है। बाप कहते हैं-यह है 5 हज़ार वर्ष की बात। बरोबर इन देवताओं का भारत में राज्य था ना। तो बाप कहते हैं-मैं भारत का बहुत बड़ा मेहमान हूँ, मुझे आधाकल्प से बहुत निमंत्रण देते आये हो। जब बहुत दु:खी होते हैं, तो कहते हैं हे पतित-पावन आओ। मैं आया भी हूँ पतित दुनिया में। रथ तो हमको चाहिए ना। आत्मा है अकालमूर्त, उनका यह तख्त है। बाप भी अकालमूर्त है, इस तख्त पर आकर विराजमान होते हैं। यह बड़ी रमणीक बातें हैं। और कोई सुनें तो चक्रित हो जाए। अब बाप कहते हैं-बच्चे, मेरी मत पर चलो। समझो शिवबाबा मत देते हैं, शिवबाबा मुरली चलाते हैं। यह कहते हैं मैं भी उनकी मुरली सुनकर बजाऊंगा। सुनाने वाला तो वह है ना। यह नम्बरवन पूज्य सो फिर नम्बरवन पुजारी बना। अभी यह पुरूषार्थी है। बच्चों को हमेशा समझना चाहिए-हमको शिवबाबा की श्रीमत मिली है। अगर कोई उल्टी बात भी हुई तो वह सुल्टी कर देंगे। यह अटूट निश्चय है तो रेसपॉन्सिबुल शिवबाबा है। यह ड्रामा में नूँध है। विघ्न तो पड़ने ही हैं, बहुत कड़े-कड़े विघ्न पड़ते हैं। अपने बच्चों के भी विघ्न पड़ते हैं। तो हमेशा समझो कि शिवबाबा समझाते हैं, तो याद रहेगी। कई बच्चे समझते हैं यह ब्रह्मा बाबा मत देते हैं, परन्तु नहीं। शिवबाबा ही रेसपॉन्सिबुल हैं। परन्तु देह-अभिमान है तो घड़ी-घड़ी इनको ही देखते रहते हैं। शिवबाबा कितना बड़ा मेहमान है तो भी रेलवे आदि वाले थोड़ेही जानते हैं, निराकार को कैसे पहचानें वा समझें। वह तो बीमार हो न सके। तो बीमारी आदि का इनका कारण बताते हैं। वह क्या जानें इनमें कौन है? तुम बच्चे भी नम्बरवार जानते हो। वह सभी आत्माओं का बाप और यह फिर प्रजापिता मनुष्यों का बाप। तो यह दोनों (बापदादा) कितने बड़े गेस्ट हो गये।
बाप कहते हैं जो कुछ होता है ड्रामा में नूँध है, मैं भी ड्रामा के बंधन में बांधा हुआ हूँ। नूँध बिगर कुछ कर नहीं सकता हूँ। माया भी बड़ी दुश्तर है। राम और रावण दोनों का पार्ट है। ड्रामा में रावण चैतन्य होता तो कहता-मैं भी ड्रामा अनुसार आता हूँ। यह दु:ख और सुख का खेल है। सुख है नई दुनिया में, दु:ख है पुरानी दुनिया में। नई दुनिया में थोड़े मनुष्य, पुरानी दुनिया में कितने ढेर मनुष्य हैं। पतित-पावन बाप को ही बुलाते हैं कि आकर पावन दुनिया बनाओ क्योंकि पावन दुनिया में बहुत सुख था इसलिए ही कल्प-कल्प पुकारते हैं। बाप सबको सुख देकर जाते हैं। अभी फिर पार्ट रिपीट होता है। दुनिया कभी खलास नहीं होती। खलास होना इम्पॉसिबुल है। समुद्र भी दुनिया में है ना। यह थर्ड फ्लोर तो है ना। कहते हैं जलमई, पानी-पानी हो जाता है फिर भी पृथ्वी फ्लोर तो है ना। पानी भी तो है ना। पृथ्वी फ्लोर कोई विनाश नहीं हो सकता। जल भी इस फ्लोर में होता है। सेकण्ड और फर्स्ट फ्लोर, सूक्ष्मवतन और मूलवतन में तो जल होता नहीं। यह बेहद सृष्टि के 3 फ्लोर हैं, जिसको तुम बच्चों के सिवाए कोई भी नहीं जानते। यह खुशी की बात सबको खुशी से सुनानी है। जो पूरे पास होते हैं, उनका ही अतीन्द्रिय सुख गाया हुआ है। जो रात-दिन सर्विस पर तत्पर हैं, सर्विस ही करते रहते हैं उन्हें बहुत खुशी रहती है। कोई-कोई ऐसे दिन भी आते हैं जो मनुष्य रात को भी जागते हैं परन्तु आत्मा थक जाती है तो सोना होता है। आत्मा के सोने से शरीर भी सो जाता है। आत्मा न सोये तो शरीर भी न सोये। थकती आत्मा है। आज मैं थका पड़ा हूँ-किसने कहा? आत्मा ने। तुम बच्चों को आत्म-अभिमानी हो रहना है, इसमें ही मेहनत है। बाप को याद नहीं करते, देही-अभिमानी नहीं रहते, तो देह के सम्बन्धी आदि याद आ जाते हैं। बाप कहते हैं तुम नंगे आये थे फिर नंगे जाना है। यह देह के सम्बन्ध आदि भूल जाओ। इस शरीर में रहते मुझे याद करो तो सतोप्रधान बनेंगे। बाप कितनी बड़ी अथॉरिटी है। बच्चों के सिवाए कोई जानते ही नहीं। बाप कहते हैं मैं हूँ गरीब निवाज़, सभी साधारण हैं। पतित-पावन बाप आया है, यह जान लें तो पता नहीं कितनी भीड़ हो जाए। बड़े-बड़े आदमी आते हैं तो कितनी भीड़ हो जाती है। तो ड्रामा में इनका पार्ट ही गुप्त रहने का है। आगे चल आहिस्ते-आहिस्ते प्रभाव निकलेगा और विनाश हो जायेगा। सब थोड़ेही मिल सकते हैं। याद करते हैं ना तो उनको बाप का परिचय मिल जायेगा। बाकी पहुँच नहीं पायेंगे। जैसे बांधेली बच्चियां मिल नहीं पाती हैं, कितने अत्याचार सहन करती हैं। विकार को छोड़ नहीं सकते हैं। कहते हैं सृष्टि कैसे चलेगी? अरे, सृष्टि का बोझ बाप पर है कि तुम पर? बाप को जान लेवें तो फिर ऐसे प्रश्न न पूछें। बोलो, पहले बाप को तो जानो फिर तुम सब कुछ जान जायेंगे। समझाने की भी युक्ति चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सदा ही हाइएस्ट अथॉरिटी बाप की याद में रहना है। विनाशी देह को न देख देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है। याद का सच्चा-सच्चा चार्ट रखना है।
2) दिन-रात सर्विस में तत्पर रह अपार खुशी में रहना है। तीनों लोकों का राज़ सबको खुशी से समझाना है। शिवबाबा जो श्रीमत देते हैं उसमें अटूट निश्चय रखकर चलना है, कोई भी विघ्न आये तो घबराना नहीं है, रेसपॉन्सिबुल शिवबाबा है, इसलिए संशय न आये।

वरदान: समय और संकल्पों को सेवा में अर्पण करने वाले मास्टर विधाता, वरदाता भव
अभी स्व की छोटी-छोटी बातों के पीछे, तन के पीछे, मन के पीछे, साधनों के पीछे, सम्बन्ध निभाने के पीछे समय और संकल्प लगाने के बजाए इसे सेवा में अर्पण करो, यह समर्पण समारोह मनाओ। श्वांसों श्वांस सेवा की लगन हो, सेवा में मगन रहो। तो सेवा में लगने से स्व-उन्नति की गिफ्ट स्वत: प्राप्त हो जायेगी। विश्व कल्याण में स्व कल्याण समाया हुआ है इसलिए निरन्तर महादानी, मास्टर विधाता और वरदाता बनो।

स्लोगन: अपनी इच्छाओं को कम कर दो तो समस्यायें कम हो जायेंगी।

Wednesday, 26 February 2020

Hindi Murli 27/02/2020

27-02-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - बाप तुम्हें दैवी धर्म और श्रेष्ठ कर्म सिखलाते हैं इसलिए तुमसे कोई भी आसुरी कर्म नहीं होने चाहिए, बुद्धि बहुत शुद्ध चाहिए”

प्रश्न: देह-अभिमान में आने से पहला पाप कौन-सा होता है?
उत्तर: अगर देह-अभिमान है तो बाप की याद के बजाए देहधारी की याद आयेगी, कुदृष्टि जाती रहेगी, खराब ख्यालात आयेंगे। यह बहुत बड़ा पाप है। समझना चाहिए, माया वार कर रही है। फौरन सावधान हो जाना चाहिए।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझा रहे हैं। रूहानी बाप आये कहाँ से हैं? रूहानी दुनिया से। जिसको निर्वाणधाम अथवा शान्तिधाम भी कहते हैं। यह तो है गीता की बात। तुमसे पूछते हैं-यह ज्ञान कहाँ से आया? बोलो, यह तो वही गीता का ज्ञान है। गीता का पार्ट चल रहा है और बाप पढ़ाते हैं। भगवानुवाच है ना और भगवान तो एक ही है। वह है शान्ति का सागर। रहते भी हैं शान्तिधाम में, जहाँ हम भी रहते हैं। बाप समझाते हैं कि यह है पतित दुनिया, पाप आत्माओं की तमोप्रधान दुनिया। तुम भी जानते हो बरोबर हम आत्मायें इस समय तमोप्रधान हैं। 84 का चक्र खाकर सतोप्रधान से अब तमोप्रधान में आये हैं। यह पुरानी अथवा कलियुगी दुनिया है ना। यह नाम सभी इस समय के हैं। पुरानी दुनिया के बाद फिर नई दुनिया होती है। भारतवासी यह भी जानते हैं कि महाभारत लड़ाई भी तब लगी थी जबकि दुनिया बदलनी थी, तब ही बाप ने आकर राजयोग सिखलाया था। सिर्फ भूल क्या हुई है? एक तो कल्प की आयु भूल गये हैं और गीता के भगवान को भी भूले हैं। कृष्ण को तो गॉड फादर कह नहीं सकते। आत्मा कहती है गॉड फादर, तो वह निराकार हो गया। निराकार बाप आत्माओं को कहते हैं कि मुझे याद करो। मैं ही पतित-पावन हूँ, मुझे बुलाते भी हैं-हे पतित-पावन। कृष्ण तो देहधारी है ना। मुझे तो कोई शरीर है नहीं। मैं निराकार हूँ, मनुष्यों का बाप नहीं, आत्माओं का बाप हूँ। यह तो पक्का कर लेना चाहिए। घड़ी-घड़ी हम आत्मायें इस बाप से वर्सा लेती हैं। अभी 84 जन्म पूरे हुए हैं, बाप आया है। बाबा-बाबा ही करते रहना है। बाबा को बहुत याद करना है। सारा कल्प जिस्मानी बाप को याद किया। अभी बाप आये हैं और मनुष्य सृष्टि से सब आत्माओं को वापिस ले जाते हैं क्योंकि रावण राज्य में मनुष्यों की दुर्गति हो गई है इसलिए अब बाप को याद करना है। यह भी मनुष्य कोई समझते नहीं कि अभी रावण राज्य है। रावण का अर्थ ही नहीं समझते। बस एक रस्म हो गई है दशहरा मनाने की। तुम कोई अर्थ थोड़ेही समझते थे। अभी समझ मिली है औरों को समझ देने के लिए। अगर औरों को नहीं समझा सकते हो तो गोया खुद नहीं समझे हो। बाप में सृष्टि चक्र का ज्ञान है। हम उनके बच्चे हैं तो बच्चों में भी यह नॉलेज रहनी चाहिए।
तुम्हारी यह है गीता पाठशाला। उद्देश्य क्या है? यह लक्ष्मी-नारायण बनना। यह राजयोग है ना। नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने की यह नॉलेज है। वो लोग कथायें बैठ सुनाते हैं। यहाँ तो हम पढ़ते हैं, हमको बाप राजयोग सिखाते हैं। यह सिखाते ही हैं कल्प के संगमयुग पर। बाप कहते हैं मैं पुरानी दुनिया को बदल नई दुनिया बनाने आया हूँ। नई दुनिया में इन्हों का राज्य था, पुरानी में नहीं है, फिर जरूर होना चाहिए। चक्र तो जान लिया है। मुख्य धर्म हैं चार। अभी डिटीज्म है नहीं। दैवी धर्म भ्रष्ट और दैवी कर्म भ्रष्ट बन पड़े हैं। अभी फिर तुमको दैवी धर्म श्रेष्ठ और कर्म श्रेष्ठ सिखला रहे हैं। तो अपने पर ध्यान रखना है, हमसे कोई आसुरी कर्म तो नहीं होते हैं? माया के कारण कोई खराब ख्यालात तो बुद्धि में नहीं आते हैं? कुदृष्टि तो नहीं रहती है? देखें, इनकी कुदृष्टि जाती है अथवा खराब ख्यालात आते हैं तो उनको झट सावधान करना चाहिए। उनसे मिल नहीं जाना चाहिए। उनको सावधान करना चाहिए-तुम्हारे में माया की प्रवेशता के कारण यह खराब ख्यालात आते हैं। योग में बैठ बाप की याद के बदले कोई की देह तरफ ख्याल जाता है तो समझना चाहिए यह माया का वार हो रहा है, मैं पाप कर रहा हूँ। इसमें तो बुद्धि बड़ी शुद्ध होनी चाहिए। हँसी-मज़ाक से भी बहुत नुकसान होता है इसलिए तुम्हारे मुख से सदैव शुद्ध वचन निकलने चाहिए, कुवचन नहीं। हँसी मजाक आदि भी नहीं। ऐसे नहीं कि हमने तो हँसी की....... वह भी नुकसानकारक हो जाती है। हंसी भी ऐसी नहीं करनी चाहिए जिसमें विकारों की वायु हो। बहुत खबरदार रहना है। तुमको मालूम है नांगे लोग हैं उनके ख्याल विकारों की तरफ नहीं जायेंगे। रहते भी अलग हैं। परन्तु कर्मेन्द्रियों की चलायमानी सिवाए योग के कभी निकलती नहीं है। काम शत्रु ऐसा है जो किसको भी देखेंगे, योग में पूरा नहीं होंगे तो चलायमानी जरूर होगी। अपनी परीक्षा लेनी होती है। बाप की याद में ही रहो तो यह कोई भी प्रकार की बीमारी न रहे। योग में रहने से यह नहीं होता है। सतयुग में तो कोई भी प्रकार का गन्द नहीं होता है। वहाँ रावण की चंचलता ही नहीं जो चलायमानी हो। वहाँ तो योगी लाइफ रहती है। यहाँ भी अवस्था बड़ी पक्की चाहिए। योगबल से यह सब बीमारियाँ बन्द हो जाती हैं। इसमें बड़ी मेहनत है। राज्य लेना कोई मासी का घर नहीं। पुरूषार्थ तो करना है ना। ऐसे नहीं कि बस जो होगा भाग्य में सो मिलेगा। धारणा ही नहीं करते गोया पाई-पैसे के पद पाने लायक हैं। सब्जेक्ट्स तो बहुत होती हैं ना। कोई ड्राइंग में, कोई खेल में मार्क्स ले लेते हैं। वह है कॉमन सब्जेक्ट। वैसे ही यहाँ भी सब्जेक्ट्स हैं। कुछ न कुछ मिलेगा। बाकी बादशाही नहीं मिल सकेगी। वह तो सर्विस करेंगे तब बादशाही मिलेगी। उसके लिए बहुत मेहनत चाहिए। बहुतों की बुद्धि में बैठता ही नहीं है। जैसेकि खाना हजम ही नहीं होता। ऊंच पद पाने की हिम्मत नहीं, इसको भी बीमारी कहेंगे ना। तुम कोई भी बात देखते न देखो। रूहानी बाप की याद में रह औरों को रास्ता बताना है, अन्धों की लाठी बनना है। तुम तो रास्ता जानते हो। रचयिता और रचना का ज्ञान मुक्ति और जीवनमुक्ति तुम्हारी बुद्धि में फिरते रहते हैं, जो-जो महारथी हैं। बच्चों की अवस्था में भी रात-दिन का फ़र्क रहता है। कहाँ बहुत धनवान बन जाते, कहाँ बिल्कुल गरीब। राजाई पद में तो फ़र्क है ना। बाकी हाँ, वहाँ रावण न होने कारण दु:ख नहीं होता है। बाकी सम्पत्ति में तो फ़र्क है। सम्पत्ति से सुख होता है।
जितना योग में रहेंगे उतनी हेल्थ बड़ी अच्छी होगी। मेहनत करनी है। बहुतों की तो चलन ऐसी रहती है जैसे अज्ञानी मनुष्यों की होती है। वह किसका कल्याण कर नहीं सकेंगे। जब इम्तहान होता है तो मालूम पड़ जाता है कि कौन कितने मार्क्स से पास होंगे, फिर उस समय हाय-हाय करनी पड़ेगी। बापदादा दोनों ही कितना समझाते रहते हैं। बाप आये ही हैं कल्याण करने। अपना भी कल्याण करना है तो दूसरों का भी करना है। बाप को बुलाया भी है कि आकर हम पतितों को पावन होने का रास्ता बताओ। तो बाप श्रीमत देते हैं-तुम अपने को आत्मा समझ देह-अभिमान छोड़ मुझे याद करो। कितनी सहज दवाई है। बोलो, हम सिर्फ एक भगवान बाप को मानते हैं। वह कहते हैं मुझे बुलाते हो कि आकर पतितों को पावन बनाओ तो मुझे आना पड़ता है। ब्रह्मा से तुमको कुछ भी मिलना नहीं है। वह तो दादा है, बाबा भी नहीं। बाबा से तो वर्सा मिलता है। ब्रह्मा से थोड़ेही वर्सा मिलता है। निराकार बाप इन द्वारा एडाप्ट कर हम आत्माओं को पढ़ाते हैं। इनको भी पढ़ाते हैं। ब्रह्मा से तो कुछ भी मिलने का नहीं है। वर्सा बाप से ही मिलता है इन द्वारा। देने वाला एक है। उनकी ही महिमा है। वही सर्व का सद्गति दाता है। यह तो पूज्य से फिर पुजारी बनते हैं। सतयुग में थे, फिर 84 जन्म भोग अब पतित बने हैं फिर पूज्य पावन बन रहे हैं। हम बाप द्वारा सुनते हैं। कोई मनुष्य से नहीं सुनते। मनुष्यों का है ही भक्ति मार्ग। यह है रूहानी ज्ञान मार्ग। ज्ञान सिर्फ एक ज्ञान सागर के पास ही है। बाकी यह शास्त्र आदि सब भक्ति के हैं। शास्त्र आदि पढ़ना - यह सब है भक्ति मार्ग। ज्ञान सागर तो एक ही बाप है, हम ज्ञान नदियां ज्ञान सागर से निकली हैं। बाकी वह है पानी का सागर और नदियाँ। बच्चों को यह सब बातें ध्यान में रहनी चाहिए। अन्तर्मुख हो बुद्धि चलानी चाहिए। अपने आपको सुधारने के लिए अन्तर्मुख हो अपनी जांच करो। अगर मुख से कोई कुवचन निकले या कुदृष्टि जाए तो अपने को फटकारना चाहिए-हमारे मुख से कुवचन क्यों निकले, हमारी कुदृष्टि क्यों गई? अपने को चमाट भी मारनी चाहिए, घड़ी-घड़ी सावधान करना चाहिए तब ही ऊंच पद पा सकेंगे। मुख से कटुवचन न निकलें। बाप को तो सब प्रकार की शिक्षायें देनी होती हैं। किसको पागल कहना यह भी कुवचन है।
मनुष्य तो जिसके लिए भी जो आता है वह कहते रहते हैं। जानते कुछ भी नहीं कि हम किसकी महिमा गाते हैं। महिमा तो करनी चाहिए एक ही पतित-पावन बाप की। और तो कोई है नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी पतित-पावन नहीं कहा जाता है। यह तो किसको पावन नहीं बनाते हैं। पतित से पावन बनाने वाला एक ही बाप है। पावन सृष्टि है ही नई दुनिया। वो तो अभी है नहीं। प्योरिटी है ही स्वर्ग में। पवित्रता का सागर भी है। यह तो है ही रावण राज्य। बच्चों को अभी आत्म-अभिमानी बनने की बहुत मेहनत करनी चाहिए। मुख से कोई भी पत्थर वा कुवचन नहीं निकलना चाहिए। बहुत प्यार से चलना है। कुदृष्टि भी बड़ा नुकसान कर देती है। बड़ी मेहनत चाहिए। आत्म-अभिमान है अविनाशी अभिमान। देह तो विनाशी है। आत्मा को कोई भी नहीं जानते हैं। आत्मा का भी बाप तो जरूर कोई होगा ना। कहते भी हैं सब भाई-भाई हैं। फिर सबमें परमात्मा बाप विराजमान कैसे हो सकता है? सभी बाप कैसे हो सकते हैं? इतना भी अक्ल नहीं है! सबका बाप तो एक ही है, उनसे ही वर्सा मिलता है। उसका नाम है शिव। शिवरात्रि भी मनाते हैं। रूद्र रात्रि वा कृष्ण रात्रि नहीं कहते। मनुष्य तो कुछ भी नहीं समझते हैं, कहेंगे यह सब उनके रूप हैं, उनकी ही लीला है।
तुम अभी समझते हो बेहद के बाप से तो बेहद का वर्सा मिलता है तो उस बाप की श्रीमत पर चलना है। बाप कहते हैं मुझे याद करो। लेबर्स को भी शिक्षा देनी चाहिए तो उन्हों का भी कुछ कल्याण हो जाए। परन्तु खुद ही याद नहीं कर सकते तो औरों को क्या याद दिलायेंगे। रावण एकदम पतित बना देते हैं फिर बाप आकर परिस्तानी बनाते हैं। वन्डर है ना। कोई की भी बुद्धि में यह बातें नहीं हैं। यह लक्ष्मी-नारायण कितना ऊंच परिस्तानी से फिर कितना पतित बन जाते हैं इसलिए ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात गाई हुई है। शिव के मन्दिर में तुम बहुत सर्विस कर सकते हो। बाप कहते हैं तुम मुझे याद करो। दर-दर भटकना छोड़ दो। यह ज्ञान है ही शान्ति का। बाप को याद करने से तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। बस यही मंत्र देते रहो। कोई से भी पैसा नहीं लेना चाहिए, जब तक पक्का न हो जाए। बोलो प्रतिज्ञा करो कि हम पवित्र रहेंगे, तब हम तुम्हारे हाथ का खा सकते हैं, कुछ भी ले सकते हैं। भारत में मन्दिर तो बहुत ढेर हैं। फॉरेनर्स आदि जो भी आयें उनको यह सन्देश तुम दे सकते हो कि बाप को याद करो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कभी भी ऐसी हंसी-मजाक नहीं करनी है जिसमें विकारों की वायु हो। अपने को बहुत सावधान रखना है, मुख से कटुवचन नहीं निकालने हैं।
2) आत्म-अभिमानी बनने की बहुत-बहुत प्रैक्टिस करनी है। सबसे प्यार से चलना है। कुदृष्टि नहीं रखनी है। कुदृष्टि जाए तो अपने आपको आपेही सज़ा देनी है।

वरदान: मान मांगने के बजाए सबको मान देने वाले, सदा निष्काम योगी भव
आपको कोई मान दे, माने वा न माने लेकिन आप उसको मीठा भाई, मीठी बहन मानते हुए सदा स्वमान में रह, स्नेही दृष्टि से, स्नेह की वृत्ति से आत्मिक मान देते चलो। यह मान देवे तो मैं मान दूँ-यह भी रॉयल भिखारीपन है, इसमें निष्काम योगी बनो। रूहानी स्नेह की वर्षा से दुश्मन को भी दोस्त बना दो। आपके सामने कोई पत्थर भी फेकें तो भी आप उसे रत्न दो क्योंकि आप रत्नागर बाप के बच्चे हो।

स्लोगन: विश्व का नव-निर्माण करने के लिए दो शब्द याद रखो-निमित्त और निर्मान।

Tuesday, 25 February 2020

Hindi Murli 26/02/2020

26-02-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम्हें श्रीमत मिली है कि आत्म-अभिमानी बन बाप को याद करो, किसी भी बात में तुम्हें आरग्यु नहीं करना है”

प्रश्न: बुद्धियोग स्वच्छ बन बाप से लग सके, उसकी युक्ति कौन-सी रची हुई है?
उत्तर: 7 दिन की भट्ठी। कोई भी नया आता है तो उसे 7 दिन के लिए भट्ठी में बिठाओ जिससे बुद्धि का किचड़ा निकले और गुप्त बाप, गुप्त पढ़ाई और गुप्त वर्से को पहचान सके। अगर ऐसे ही बैठ गये तो मूंझ जायेंगे, समझेंगे कुछ नहीं।

गीत:- जाग सजनियां जाग......
ओम् शान्ति। बच्चों को ज्ञानी तू आत्मा बनाने के लिए ऐसे-ऐसे जो गीत हैं वह सुनाकर फिर उसका अर्थ करना चाहिए तो वाणी खुलेगी। मालूम पड़ेगा कि कहाँ तक सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान बुद्धि में है। तुम बच्चों की बुद्धि में तो ऊपर से लेकर मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन के आदि-मध्य-अन्त का सारा राज़ जैसेकि चमकता है। बाप के पास भी यह ज्ञान है जो तुमको सुनाते हैं। यह है बिल्कुल नया ज्ञान। भल शास्त्र आदि में नाम है परन्तु वह नाम लेने से अटक पड़ेंगे, डिबेट करने लग पड़ेंगे। यहाँ तो बिल्कुल सिम्पुल रीति समझाते हैं-भगवानुवाच, मुझे याद करो, मैं ही पतित-पावन हूँ। कभी भी कृष्ण को वा ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि को पतित-पावन नहीं कहेंगे। सूक्ष्मवतनवासियों को भी तुम पतित-पावन नहीं कहते हो तो स्थूल-वतन के मनुष्य पतित-पावन कैसे हो सकते? यह ज्ञान भी तुम्हारी बुद्धि में ही है। शास्त्रों के बारे में जास्ती आरग्यु करना अच्छा नहीं है। बहुत वाद-विवाद हो जाता है। एक-दो को लाठियाँ भी मारने लग पड़ते हैं। तुमको तो बहुत सहज समझाया जाता है। शास्त्रों की बातों में टू मच नहीं जाना है। मूल बात है ही आत्म-अभिमानी बनने की। अपने को आत्मा समझना है और बाप को याद करना है। यह श्रीमत है मुख्य। बाकी है डिटेल। बीज कितना छोटा है, बाकी झाड़ का विस्तार है। जैसे बीज में सारा ज्ञान समाया हुआ है वैसे यह सारा ज्ञान भी बीज में समाया हुआ है। तुम्हारी बुद्धि में बीज और झाड़ आ गया है। जिस प्रकार तुम जानते हो और कोई समझ न सके। झाड़ की आयु ही लम्बी लिख दी है। बाप बैठ बीज और झाड़ वा ड्रामा चक्र का राज़ समझाते हैं। तुम हो स्वदर्शन चक्रधारी। कोई नया आये, बाबा महिमा करे कि स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों, तो कोई समझ न सके। वह तो अपने को बच्चे ही नहीं समझते हैं। यह बाप भी गुप्त है तो नॉलेज भी गुप्त है, वर्सा भी गुप्त है। नया कोई भी सुनकर मूँझ पड़ेंगे इसलिये 7 दिन की भट्ठी में बिठाया जाता है। यह जो 7 रोज भागवत वा रामायण आदि रखते हैं, वास्तव में यह इस समय 7 दिन के लिए भट्ठी में रखा जाता है तो बुद्धि में जो भी सारा किचड़ा है वह निकालें और बाप से बुद्धियोग लग जाए। यहाँ सब हैं रोगी। सतयुग में यह रोग होते नहीं। यह आधाकल्प का रोग है, 5 विकारों का रोग बड़ा भारी है। वहाँ तो देही-अभिमानी रहते हैं, जानते हो हम आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हैं। पहले से साक्षात्कार हो जाता है। अकाले मृत्यु कभी होता नहीं। तुमको काल पर जीत पहनाई जाती है। काल-काल महाकाल कहते हैं। महाकाल का भी मन्दिर होता है। सिक्ख लोगों का फिर अकालतख्त है। वास्तव में अकाल तख्त यह भृकुटी है, जहाँ आत्मा विराजमान होती है। सभी आत्मायें इस अकालतख्त पर बैठी हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं। बाप को अपना तख्त तो है नहीं। वह आकर इनका यह तख्त लेते हैं। इस तख्त पर बैठकर तुम बच्चों को ताउसी तख्त नशीन बनाते हैं। तुम जानते हो वह ताउसी तख्त कैसा होगा जिस पर लक्ष्मी-नारायण विराजमान होते होंगे। ताउसी तख्त तो गाया हुआ है ना।
विचार करना है, उनको भोलानाथ भगवान क्यों कहा जाता है? भोलानाथ भगवान कहने से बुद्धि ऊपर चली जाती है। साधू-सन्त आदि अंगुली से इशारा भी ऐसे देते हैं ना कि उनको याद करो। यथार्थ रीति तो कोई जान नहीं सकते। अभी पतित-पावन बाप सम्मुख में आकर कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जाएं। गैरन्टी है। गीता में भी लिखा हुआ है परन्तु तुम गीता का एक मिसाल निकालेंगे तो वह 10 निकालेंगे, इसलिए दरकार नहीं है। जो शास्त्र आदि पढ़े हुए हैं वह समझेंगे हम लड़ सकेंगे। तुम बच्चे जो इन शास्त्रों आदि को जानते ही नहीं हो, तुम्हें उनका कभी नाम भी नहीं लेना चाहिए। सिर्फ बोलो भगवान कहते हैं मुझ अपने बाप को याद करो, उनको ही पतित-पावन कहा जाता है। गाते भी हैं पतित-पावन सीताराम....... सन्यासी लोग भी जहाँ-तहाँ धुन लगाते रहते हैं। ऐसे मत-मतान्तर तो बहुत हैं ना। यह गीत कितना सुन्दर है, ड्रामा प्लैन अनुसार कल्प-कल्प ऐसे गीत बनते हैं, जैसेकि तुम बच्चों के लिए ही बनाये हुए हैं। ऐसे-ऐसे अच्छे-अच्छे गीत हैं। जैसे नयनहीन को राह दिखाओ प्रभू। प्रभू कोई कृष्ण को थोड़ेही कहते हैं। प्रभू वा ईश्वर निराकार को ही कहेंगे। यहाँ तुम कहते हो बाबा, परमपिता परमात्मा है। है तो वह भी आत्मा ना। भक्ति मार्ग में बहुत टू मच चले गये हैं। यहाँ तो बिल्कुल सिम्पुल बात है। अल्फ और बे। अल्फ अल्लाह, बे बादशाही-इतनी तो सिम्पुल बात है। बाप को याद करो तो तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। बरोबर यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक, सम्पूर्ण निर्विकारी थे। तो बाप को याद करने से ही तुम ऐसा सम्पूर्ण बनेंगे। जितना जो याद करते हैं और सर्विस करते हैं उतना वह ऊंच पद पाते हैं। वह समझ में भी आता है, स्कूल में स्टूडेन्ट समझते नहीं हैं क्या कि हम कम पढ़ते हैं! जो पूरा अटेन्शन नहीं देते हैं तो पिछाड़ी में बैठे रहते हैं, तो जरूर फेल हो जायेंगे।
अपने आपको रिफ्रेश करने के लिए ज्ञान के जो अच्छे-अच्छे गीत बने हुए हैं उन्हें सुनना चाहिए। ऐसे-ऐसे गीत अपने घर में रखने चाहिए। किसको इस पर समझा भी सकेंगे। कैसे माया का फिर से परछाया पड़ता है। शास्त्रों में तो यह बातें हैं नहीं कि कल्प की आयु 5 हज़ार वर्ष है। ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात आधा-आधा है। यह गीत भी कोई ने तो बनवाये हैं। बाप बुद्धिवानों की बुद्धि है तो कोई की बुद्धि में आया है जो बैठ बनाया है। इन गीतों आदि पर भी तुम्हारे पास कितने ध्यान में जाते थे। एक दिन आयेगा जो इस ज्ञान के गीत गाने वाले भी तुम्हारे पास आयेंगे। बाप की महिमा में ऐसा गीत गायेंगे जो घायल कर देंगे। ऐसे-ऐसे आयेंगे। ट्यून पर भी मदार रहता है। गायन विद्या का भी बहुत नाम है। अभी तो ऐसा कोई है नहीं। सिर्फ एक गीत बनाया था कितना मीठा कितना प्यारा...... बाप बहुत ही मीठा बहुत ही प्यारा है तब तो सब उनको याद करते हैं। ऐसे नहीं कि देवतायें उनको याद करते हैं। चित्रों में राम के आगे भी शिव दिखाया है, राम पूजा कर रहा है। यह है रांग। देवतायें थोड़ेही किसको याद करते हैं। याद मनुष्य करते हैं। तुम भी अभी मनुष्य हो फिर देवता बनेंगे। देवता और मनुष्य में रात-दिन का फर्क है। वही देवतायें फिर मनुष्य बनते हैं। कैसे चक्र फिरता रहता है, किसको भी पता नहीं है। तुमको अभी पता पड़ा है कि हम सच-सच देवता बनते हैं। अभी हम ब्राह्मण हैं, नई दुनिया में देवता कहलायेंगे। अभी तुम वन्डर खाते हो। यह ब्रह्मा खुद ही जो इस जन्म में पहले पुजारी था, श्री नारायण की महिमा गाते थे, नारायण से बड़ा प्रेम था। अब वन्डर लगता है, हम सो बन रहे हैं। तो कितना खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। तुम हो अननोन वारियर्स, नान वायोलेन्स। सचमुच तुम डबल अहिंसक हो। न काम कटारी, न वह लड़ाई। काम अलग है, क्रोध अलग चीज़ है। तो तुम हो डबल अहिंसक। नान वायोलेन्स सेना। सेना अक्षर से उन्होंने फिर सेनायें खड़ी कर दी हैं। महाभारत लड़ाई में मेल्स के नाम दिखाये हैं। फीमेल्स नहीं हैं। वास्तव में तुम हो शिव शक्तियां। मैजारिटी तुम्हारी होने कारण शिव शक्ति सेना कहा जाता है। यह बातें बाप ही बैठ समझाते हैं।
अभी तुम बच्चे नवयुग को याद करते हो। दुनिया में कोई को भी नवयुग का मालूम नहीं है। वह तो समझते हैं नवयुग 40 हज़ार वर्ष बाद आयेगा। सतयुग नवयुग है, यह तो बड़ा क्लीयर है। तो बाबा राय देते हैं ऐसे-ऐसे अच्छे गीत भी सुनकर रिफ्रेश होंगे और किसको समझायेंगे भी। यह सब युक्तियां हैं। इनका अर्थ भी सिर्फ तुम ही समझ सकते हो। बहुत अच्छे-अच्छे गीत हैं अपने को रिफ्रेश करने के लिए। यह गीत बहुत मदद करते हैं। अर्थ करना चाहिए तो मुख भी खुल जायेगा, खुशी भी होगी। बाकी जो जास्ती धारणा नहीं कर सकते हैं उनके लिए बाप कहते हैं घर बैठे बाप को याद करते रहो। गृहस्थ व्यवहार में रहते सिर्फ यह मंत्र याद रखो-बाप को याद करो और पवित्र बनो। आगे पुरूष लोग पत्नी को कहते थे भगवान को तो घर में भी याद कर सकते हैं फिर मन्दिरों आदि में भटकने की क्या दरकार है? हम तुमको घर में मूर्ति दे देते हैं, यहाँ बैठ याद करो, धक्का खाने क्यों जाती हो? ऐसे बहुत पुरूष लोग स्त्रियों को जाने नहीं देते थे। चीज़ तो एक ही है, पूजा करना है और याद करना है। जबकि एक बार देख लिया फिर तो ऐसे भी याद कर सकते हैं। कृष्ण का चित्र तो कॉमन है-मोरमुकुटधारी। तुम बच्चों ने साक्षात्कार किया है-कैसे वहाँ जन्म होता है, वह भी साक्षात्कार किया है, परन्तु क्या तुम उसका फ़ोटो निकाल सकते हो? एक्यूरेट कोई निकाल न सके। दिव्य दृष्टि से सिर्फ देख ही सकते हैं, बना नहीं सकते, हाँ देखकर वर्णन कर सकते हो, बाकी वह पेन्ट आदि नहीं कर सकते। भल होशियार पेन्टर हो, साक्षात्कार भी करे तो भी एक्यूरेट फीचर्स निकाल न सके। तो बाबा ने समझाया, कोई से आरग्यु जास्ती नहीं करना है। बोलो, तुमको पावन बनने से काम। और शान्ति मांगते हो तो बाप को याद करो और पवित्र बनो। पवित्र आत्मा यहाँ रह न सके। वह चली जायेगी वापिस। आत्माओं को पावन बनाने की शक्ति एक बाप में है, और कोई पावन बना नहीं सकता। तुम बच्चे जानते हो यह सारी स्टेज है, इस पर नाटक होता है। इस समय सारी स्टेज पर रावण का राज्य है। सारे समुद्र पर सृष्टि खड़ी है। यह बेहद का टापू है। वह हैं हद के। यह है बेहद की बात। जिस पर आधाकल्प दैवी राज्य, आधाकल्प आसुरी राज्य होता है। यूँ खण्ड तो अलग-अलग हैं, परन्तु यह है सारी बेहद की बात। तुम जानते हो हम गंगा जमुना नदी के मीठे पानी के कण्ठे पर ही होंगे। समुद्र आदि पर जाने की दरकार नहीं रहती। यह जो द्वारिका कहते हैं, वह कोई समुद्र के बीच होती नहीं है। द्वारिका कोई दूसरी चीज़ नहीं है। तुम बच्चों ने सब साक्षात्कार किये हैं। शुरू में यह सन्देशी और गुल्जार बहुत साक्षात्कार करती थी। इन्हों ने बड़े पार्ट बजायें हैं क्योंकि भट्ठी में बच्चों को बहलाना था। तो साक्षात्कार से बहुत-बहुत बहले हैं। बाप कहते हैं फिर पिछाड़ी में बहुत बहलेंगे। वह पार्ट फिर और है। गीत भी है ना-हमने जो देखा सो तुमने नहीं देखा। तुम जल्दी-जल्दी साक्षात्कार करते रहेंगे। जैसे इम्तहान के दिन नज़दीक होते हैं तो मालूम पड़ जाता है कि हम कितने मार्क्स से पास होंगे। तुम्हारी भी यह पढ़ाई है। अभी तुम जैसे नॉलेजफुल हो बैठे हो। सभी फुल तो नहीं होते हैं। स्कूल में हमेशा नम्बरवार होते हैं। यह भी नॉलेज है-मूलवतन, सूक्ष्मवतन, तीनों लोकों का तुमको ज्ञान है। इस सृष्टि के चक्र को तुम जानते हो, यह फिरता रहता है। बाप कहते हैं तुमको जो नॉलेज दी है, यह और कोई समझा न सके। तुम्हारे पर है बेहद की दशा। कोई पर बृहस्पति की दशा, कोई पर राहू की दशा होती है तो जाकर चण्डाल आदि बनेंगे। यह है बेहद की दशा, वह होती है हद की दशा। बेहद का बाप बेहद की बातें सुनाते हैं, बेहद का वर्सा देते हैं। तुम बच्चों को कितनी न खुशी होनी चाहिए। तुमने अनेक बार बादशाही ली है और गँवाई है, यह तो बिल्कुल पक्की बात है। नथिंग न्यु, तब तुम सदैव हर्षित रह सकेंगे। नहीं तो माया घुटका खिलाती है।
तो तुम सभी आशिक हो एक माशूक के। सब आशिक उस एक माशूक को ही याद करते हैं। वह आकर सभी को सुख देते हैं। आधाकल्प उनको याद किया है, अब वह मिला है तो कितनी खुशी होनी चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सदैव हर्षित रहने के लिए नथिंगन्यु का पाठ पक्का करना है। बेहद का बाप हमें बेहद की बादशाही दे रहे हैं - इस खुशी में रहना है।
2) ज्ञान के अच्छे-अच्छे गीत सुनकर स्वयं को रिफ्रेश करना है। उनका अर्थ निकालकर दूसरों को सुनाना है।

वरदान: अनेक प्रकार की प्रवृत्ति से निवृत्त होने वाले नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप भव
स्व की प्रवृत्ति, दैवी परिवार की प्रवृत्ति, सेवा की प्रवृत्ति, हद के प्राप्तियों की प्रवृत्ति इन सभी से नष्टोमोहा अर्थात् न्यारा बनने के लिए बापदादा के स्नेह रूप को सामने रख स्मृति स्वरूप बनो। स्मृति स्वरूप बनने से नष्टोमोहा स्वत: बन जायेंगे। प्रवृत्ति से निवृत्त होना अर्थात् मैं पन को समाप्त कर नष्टोमोहा बनना। ऐसे नष्टोमोहा बनने वाले बच्चे बहुतकाल के पुरूषार्थ से बहुतकाल के प्रालब्ध की प्राप्ति के अधिकारी बनेंगे।

स्लोगन: कमल फूल समान न्यारे रहो तो प्रभू का प्यार मिलता रहेगा।

Monday, 24 February 2020

Hindi Murli 25/02/2020

25-02-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - बाप जो है, जैसा है, उसे यथार्थ रीति जानकर याद करना, यही मुख्य बात है, मनुष्यों को यह बात बहुत युक्ति से समझानी है”

प्रश्न: सारे युनिवर्स के लिए कौन-सी पढ़ाई है जो यहाँ ही तुम पढ़ते हो?
उत्तर: सारे युनिवर्स के लिए यही पढ़ाई है कि तुम सब आत्मा हो। आत्मा समझकर बाप को याद करो तो पावन बन जायेंगे। सारे युनिवर्स का जो बाप है वह एक ही बार आते हैं सबको पावन बनाने। वही रचता और रचना की नॉलेज देते हैं इसलिए वास्तव में यह एक ही युनिवर्सिटी है, यह बात बच्चों को स्पष्ट कर समझानी है।

ओम् शान्ति। भगवानुवाच - अब यह तो रूहानी बच्चे समझते हैं कि भगवान् कौन है। भारत में कोई भी यथार्थ रीति जानते नहीं। कहते भी हैं-मैं जो हूँ, जैसा हूँ मुझे यथार्थ रीति कोई नहीं जानते। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हैं। भल यहाँ रहते हैं परन्तु यथार्थ रीति से नहीं जानते। यथार्थ रीति जानकर और बाप को याद करना, यह बड़ी मुश्किलात है। भल बच्चे कहते हैं कि बहुत सहज है परन्तु मैं जो हूँ, मुझे निरन्तर बाप को याद करना है, बुद्धि में यह युक्ति रहती है। मैं आत्मा बहुत छोटा हूँ। हमारा बाबा भी बिन्दी छोटा है। आधाकल्प तो भगवान का कोई नाम भी नहीं लेते हैं। दु:ख में ही याद करते हैं-हे भगवान। अब भगवान कौन है, यह तो कोई मनुष्य समझते नहीं। अब मनुष्यों को कैसे समझायें-इस पर विचार सागर मंथन चलना चाहिए। नाम भी लिखा हुआ है-प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय। इससे भी समझते नहीं हैं कि यह रूहानी बेहद के बाप का ईश्वरीय विश्व विद्यालय है। अब क्या नाम रखें जो मनुष्य झट समझ जाएं? कैसे मनुष्यों को समझायें कि यह युनिवर्सिटी है? युनिवर्स से युनिवर्सिटी अक्षर निकला है। युनिवर्स अर्थात् सारा वर्ल्ड, उसका नाम रखा है-युनिवर्सिटी, जिसमें सब मनुष्य पढ़ सकते हैं। युनिवर्स के पढ़ने लिए युनिवर्सिटी है। अब वास्तव में युनिवर्स के लिए तो एक ही बाप आते हैं, उनकी यह एक ही युनिवर्सिटी है। एम ऑब्जेक्ट भी एक है। बाप ही आकर सारे युनिवर्स को पावन बनाते हैं, योग सिखाते हैं। यह तो सब धर्म वालों के लिए है। कहते हैं अपने को आत्मा समझो, सारे युनिवर्स का बाप है-इनकारपोरियल गॉड फादर, तो क्यों न इसका नाम स्प्रीचुअल युनिवर्सिटी ऑफ स्प्रीचुअल इनकारपोरियल गॉड फादर रखें। ख्याल किया जाता है ना। मनुष्य ऐसे हैं जो सारे वर्ल्ड में बाप को एक भी नहीं जानते हैं। रचता को जानें तो रचना को भी जानें। रचता द्वारा ही रचना को जाना जा सकता है। बाप बच्चों को सब कुछ समझा देंगे। और कोई भी जानते नहीं। ऋषि-मुनि भी नेती-नेती करते गये। तो बाप कहते हैं तुमको पहले यह रचता और रचना की नॉलेज नहीं थी। अभी रचता ने समझाया है। बाप कहते हैं मुझे सब पुकारते भी हैं कि आकर हमको सुख-शान्ति दो क्योंकि अभी दु:ख-अशान्ति है। उनका नाम ही है दु:ख हर्ता सुख कर्ता। वह कौन है? भगवान। वह कैसे दु:ख हर कर सुख देते हैं, यह कोई नहीं जानते हैं। तो ऐसा क्लीयर कर लिखें जो मनुष्य समझें निराकार गॉड फादर ही यह नॉलेज देते हैं। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करना चाहिए। बाप समझाते हैं मनुष्य सभी हैं पत्थरबुद्धि। अभी तुमको पारसबुद्धि बना रहे हैं। वास्तव में पारसबुद्धि उन्हें कहेंगे जो कम से कम 50 से अधिक मार्क्स लें। फेल होने वाले पारसबुद्धि नहीं। राम ने भी कम मार्क्स लिए तब तो क्षत्रिय दिखाया है। यह भी कोई समझते नहीं हैं कि राम को बाण क्यों दिखाये हैं? श्रीकृष्ण को स्वदर्शन चक्र दिखाया है कि उसने सबको मारा और राम को बाण दिखाये हैं। एक खास मैगजीन निकलती है, जिसमें दिखाया है-कृष्ण कैसे स्वदर्शन चक्र से अकासुर-बकासुर आदि को मारते हैं। दोनों को हिंसक बना दिया है और फिर डबल हिंसक बना दिया है। कहते हैं उन्हों को भी बच्चे पैदा हुए ना। अरे, वह हैं ही निर्विकारी देवी-देवता। वहाँ रावण राज्य है ही नहीं। इस समय रावण सम्प्रदाय कहा जाता है।
अभी तुम समझाते हो हम योगबल से विश्व की बादशाही लेते हैं तो क्या योगबल से बच्चे नहीं हो सकते। वह है ही निर्विकारी दुनिया। अभी तुम शूद्र से ब्राह्मण बने हो। ऐसा अच्छी रीति समझाना है जो मनुष्य समझें इनके पास पूरा ज्ञान है। थोड़ा भी इस बात को समझेंगे तो समझा जायेगा यह ब्राह्मण कुल का है। कोई के लिए तो झट समझ जायेंगे - यह ब्राह्मण कुल का है नहीं। आते तो अनेक प्रकार के हैं ना। तो तुम स्प्रीचुअल युनिवर्सिटी ऑफ स्प्रीचुअल इनकारपोरियल गॉड फादर लिखकर देखो, क्या होता है? विचार सागर मंथन कर अक्षर मिलाने होते हैं, इसमें बड़ी युक्ति चाहिए लिखने की। जो मनुष्य समझें यहाँ यह नॉलेज गॉड फादर समझाते हैं अथवा राजयोग सिखलाते हैं। यह अक्षर भी कॉमन है। जीवनमुक्ति डीटी सावरन्टी इन सेकण्ड। ऐसे-ऐसे अक्षर हों जो मनुष्यों की बुद्धि में बैठें। ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना होती है। मन्मनाभव का अर्थ है-बाप और वर्से को याद करो। तुम हो ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुल भूषण, स्वदर्शन चक्रधारी। अब वह तो स्वदर्शन चक्र विष्णु को दिखाते हैं। कृष्ण को भी 4 भुजायें दिखाते हैं। अब उनको 4 भुजायें हो कैसे सकती? बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। बच्चों को बड़ा विशाल बुद्धि, पारसबुद्धि बनना है। सतयुग में यथा राजा-रानी तथा प्रजा पारसबुद्धि कहेंगे ना। वह है पारस दुनिया, यह है पत्थरों की दुनिया। तुमको यह नॉलेज मिलती है-मनुष्य से देवता बनने की। तुम अपना राज्य श्रीमत पर फिर से स्थापन कर रहे हो। बाबा हमको युक्ति बतलाते हैं कि राजा-महाराजा कैसे बन सकते हो? तुम्हारी बुद्धि में यह ज्ञान भर जाता है औरों को समझाने के लिए। गोले पर समझाना भी बड़ा सहज है। इस समय जनसंख्या देखो कितनी है! सतयुग में कितने थोड़े होते हैं। संगम तो है ना। ब्राह्मण तो थोड़े होंगे ना। ब्राह्मणों का युग ही छोटा है। ब्राह्मणों के बाद हैं देवतायें, फिर वृद्धि को पाते हैं। बाजोली होती है ना। तो सीढ़ी के चित्र के साथ विराट रूप भी होगा तो समझाने में क्लीयर होगा। जो तुम्हारे कुल के होंगे उनकी बुद्धि में रचता और रचना की नॉलेज सहज ही बैठ जायेगी। उनकी शक्ल से भी मालूम पड़ जाता है कि यह हमारे कुल का है या नहीं? अगर नहीं होगा तो तवाई की तरह सुनेगा। जो समझू होगा वह ध्यान से सुनेगा। एक बार किसको पूरा तीर लगा तो फिर आते रहेंगे। कोई प्रश्न पूछेंगे और कोई अच्छा फूल होगा तो रोज़ आपेही आकर पूरा समझकर चला जायेगा। चित्रों से तो कोई भी समझ सकते हैं। यह तो बरोबर देवी-देवता धर्म की स्थापना बाप कर रहे हैं। कोई न पूछते भी आपेही समझते रहेंगे। कोई तो बहुत पूछते रहेंगे, समझेंगे कुछ भी नहीं। फिर समझाना होता है, हंगामा तो करना नहीं है। फिर कहेंगे ईश्वर तुम्हारी रक्षा भी नहीं करते हैं! अब वह रक्षा क्या करते हैं सो तो तुम जानते हो। कर्मों का हिसाब-किताब तो हर एक को अपना चुक्तू करना है। ऐसे बहुत हैं, तबियत खराब होती है तो कहते हैं रक्षा करो। बाप कहते हैं हम तो आते हैं पतितों को पावन बनाने। वह धन्धा तुम भी सीखो। बाप 5 विकारों पर जीत पहनाते हैं तो और ही जोर से वह सामना करेंगे। विकार का तूफान बहुत जोर से आता है। बाप तो कहते हैं बाप का बनने से यह सब बीमारियाँ उथल खायेंगी, तूफान जोर से आयेंगे। पूरी बॉक्सिंग है। अच्छे-अच्छे पहलवानों को भी हरा लेते हैं। कहते हैं - न चाहते भी कुदृष्टि हो जाती है, रजिस्टर खराब हो जायेगा। कुदृष्टि वाले से बात नहीं करनी चाहिए। बाबा सभी सेन्टर्स के बच्चों को समझा रहे हैं कि कुदृष्टि वाले बहुत ढेर हैं, नाम लेने से और ही ट्रेटर बन जायेंगे। अपनी सत्यानाश करने वाले उल्टे काम करने लग पड़ते हैं। काम विकार नाक से पकड़ लेता है। माया छोड़ती नहीं है, कुकर्म, कुदृष्टि, कुवचन निकल पड़ते हैं, कुचलन हो पड़ती है इसलिए बहुत-बहुत सावधान रहना है।
तुम बच्चे जब प्रदर्शनी आदि करते हो तो ऐसी युक्ति रचो जो कोई भी सहज समझ सके। यह गीता ज्ञान स्वयं बाप पढ़ा रहे हैं, इसमें कोई शास्त्र आदि की बात नहीं है। यह तो पढ़ाई है। किताब गीता तो यहाँ है नहीं। बाप पढ़ाते हैं। किताब थोड़ेही हाथ में उठाते हैं। फिर यह गीता नाम कहाँ से आया? यह सब धर्मशास्त्र बनते ही बाद में हैं। कितने अनेक मठ-पंथ हैं। सबके अपने-अपने शास्त्र हैं। टाल-डाल जो भी हैं, छोटे-छोटे मठ-पंथ, उनके भी शास्त्र आदि अपने-अपने हैं। तो वह हो गये सब बाल-बच्चे। उनसे तो मुक्ति मिल न सके। सर्वशास्त्र मई शिरोमणी गीता गाई हुई है। गीता का भी ज्ञान सुनाने वाले होंगे ना। तो यह नॉलेज बाप ही आकर देते हैं। कोई भी शास्त्र आदि हाथ में थोड़ेही हैं। मैं भी शास्त्र नहीं पढ़ा हूँ, तुमको भी नहीं पढ़ाते हैं। वह सीखते हैं, सिखलाते हैं। यहाँ शास्त्रों की बात नहीं। बाप है ही नॉलेजफुल। हम तुमको सभी वेदों-शास्त्रों का सार बतलाते हैं। मुख्य हैं ही 4 धर्मों के 4 धर्मशास्त्र। ब्राह्मण धर्म का कोई किताब है क्या? कितनी समझने की बातें हैं। यह सब बाप बैठ डिटेल में समझाते हैं। मनुष्य सब पत्थरबुद्धि हैं तब तो इतने कंगाल बने हैं। देवतायें थे गोल्डन एज में, वहाँ सोने के महल बनते थे, सोने की खानियां थी। अभी तो सच्चा सोना है नहीं। सारी कहानी भारत पर ही है। तुम देवी-देवता पारसबुद्धि थे, विश्व पर राज्य करते थे। अभी स्मृति आई है, हम स्वर्ग के मालिक थे फिर नर्क के मालिक बने हैं। अब फिर पारसबुद्धि बनते हैं। यह ज्ञान तुम बच्चों की बुद्धि में है जो फिर औरों को समझाना है। ड्रामा अनुसार पार्ट चलता रहता है, जो टाइम पास होता है सो एक्यूरेट फिर भी पुरूषार्थ तो करायेंगे ना। जिन बच्चों को नशा है कि स्वयं भगवान हमको हेविन का मालिक बनाने के लिए पुरूषार्थ कराते हैं उनकी शक्ल बड़ी फर्स्टक्लास खुशनुम: रहती है। बाप आते भी हैं बच्चों को पुरूषार्थ कराने, प्रालब्ध के लिए। यह भी तुम जानते हो, दुनिया में थोड़ेही कोई जानते हैं। हेविन का मालिक बनाने भगवान पुरूषार्थ कराते हैं तो खुशी होनी चाहिए। शक्ल बड़ी फर्स्टक्लास, खुशनुम: होनी चाहिए। बाप की याद से तुम सदैव हर्षित रहेंगे। बाप को भूलने से ही मुरझाइस आती है। बाप और वर्से को याद करने से खुशनुम: हो जाते हैं। हर एक की सर्विस से समझा जाता है। बाप को बच्चों की खुशबू तो आती है ना। सपूत बच्चों से खुशबू आती है, कपूत से बदबू आती है। बगीचे में खुशबूदार फूल को ही उठाने के लिए दिल होगी। अक को कौन उठायेंगे! बाप को यथार्थ रीति याद करने से ही विकर्म विनाश होंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) माया की बॉक्सिंग में हारना नहीं है। ध्यान रहे कभी मुख से कुवचन न निकले, कुदृष्टि, कुचलन, कुकर्म न हो जाए।
2) फर्स्टक्लास खुशबूदार फूल बनना है। नशा रहे कि स्वयं भगवान हमको पढ़ाते हैं। बाप की याद में रह सदैव हर्षित रहना है, कभी मुरझाना नहीं हैं।

वरदान: पुरूषार्थ और प्रालब्ध के हिसाब को जानकर तीव्रगति से आगे बढ़ने वाले नॉलेजफुल भव
पुरूषार्थ द्वारा बहुतकाल की प्रालब्ध बनाने का यही समय है इसलिए नॉलेजफुल बन तीव्रगति से आगे बढ़ो। इसमें यह नहीं सोचो कि आज नहीं तो कल बदल जायेंगे। इसे ही अलबेलापन कहा जाता है। अभी तक बापदादा स्नेह के सागर बन सर्व सम्बन्ध के स्नेह में बच्चों का अलबेलापन, साधारण पुरूषार्थ देखते सुनते भी एकस्ट्रा मदद से, एकस्ट्रा मार्क्स देकर आगे बढ़ा रहे हैं। तो नॉलेजफुल बन हिम्मत और मदद के विशेष वरदान का लाभ लो।

स्लोगन: प्रकृति का दास बनने वाले ही उदास होते हैं, इसलिए प्रकृतिजीत बनो।

Sunday, 23 February 2020

Hindi Murli 24/02/2020

24-02-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम बहुत बड़े जौहरी हो, तुम्हें अविनाशी ज्ञान रत्नों रूपी जवाहरात देकर सबको साहूकार बनाना है”

प्रश्न: अपने जीवन को हीरे जैसा बनाने के लिए किस बात की बहुत-बहुत सम्भाल चाहिए?
उत्तर: संग की। बच्चों को संग उनका करना चाहिए जो अच्छा बरसते हैं। जो बरसते नहीं, उनका संग रखने से फायदा ही क्या! संग का दोष बहुत लगता है, कोई किसके संग से हीरे जैसा बन जाते हैं, कोई फिर किसके संग से ठिक्कर बन जाते हैं। जो ज्ञानवान होंगे वह आपसमान जरूर बनायेंगे। संग से अपनी सम्भाल रखेंगे।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को सारी सृष्टि, सारा ड्रामा अच्छी रीति बुद्धि में याद है। कान्ट्रास्ट भी बुद्धि में है। यह सारा बुद्धि में पक्का रहना चाहिए कि सतयुग में सब श्रेष्ठाचारी, निर्विकारी, पावन, सालवेन्ट थे। अभी तो दुनिया भ्रष्टाचारी, विकारी, पतित इनसालवेन्ट है। अभी तुम बच्चे संगमयुग पर हो। तुम उस पार जा रहे हो। जैसे नदी और सागर का जहाँ मेल होता है, उनको संगम कहते हैं। एक तरफ मीठा पानी, एक तरफ खारा पानी होता है। अब यह भी है संगम। तुम जानते हो बरोबर सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था फिर ऐसे चक्र फिरा। अभी है संगम। कलियुग के अन्त में सब दु:खी हैं, इसको जंगल कहा जाता है। सतयुग को बगीचा कहा जाता। अभी तुम कांटों से फूल बन रहे हो। यह स्मृति तुम बच्चों को होनी चाहिए। हम बेहद के बाप से वर्सा ले रहे हैं। यह बुद्धि में याद रखना है। 84 जन्मों की कहानी तो बिल्कुल कॉमन है। समझते हो - अब 84 जन्म पूरे हुए। तुम्हारी बुद्धि में तरावट है कि हम अभी सतयुगी बगीचे में जा रहे हैं। अब हमारा जन्म इस मृत्युलोक में नहीं होगा। हमारा जन्म होगा अमरलोक में। शिवबाबा को अमरनाथ भी कहते हैं। वह हमको अमर कहानी सुना रहे हैं, वहाँ हम शरीर में होते भी अमर रहेंगे। अपनी खुशी से टाइम पर शरीर छोड़ेंगे, उसको मृत्युलोक नहीं कहा जाता। तुम किसको भी समझायेंगे तो समझेंगे-बरोबर इनमें तो पूरा ज्ञान है। सृष्टि का आदि और अन्त तो है ना। छोटा बच्चा भी जवान और वृद्ध होता है फिर अन्त आ जाता है, फिर बच्चा बनता है। सृष्टि भी नई बनती फिर क्वार्टर पुरानी, आधी पुरानी फिर सारी पुरानी होती है। फिर नई होगी। यह सब बातें और कोई एक-दो को सुना नहीं सकते। ऐसी चर्चा कोई कर नहीं सकते। सिवाए तुम ब्राह्मणों के और कोई को रूहानी नॉलेज मिल न सके। ब्राह्मण वर्ण में आयें तब सुनें। सिर्फ ब्राह्मण ही जानें। ब्राह्मणों में भी नम्बरवार हैं। कोई यथार्थ रीति सुना सकते हैं, कोई नहीं सुना सकते हैं तो उन्हों को कुछ मिलता नहीं है। जौहरियों में भी देखेंगे कोई के पास तो करोड़ों का माल रहता है, कोई के पास तो 10 हज़ार का भी माल नहीं होगा। तुम्हारे में भी ऐसे हैं। जैसे देखो यह जनक है, यह अच्छा जौहरी है। इनके पास वैल्युबुल जवाहरात हैं। किसको देकर अच्छा साहूकार बना सकती है। कोई छोटा जौहरी है, जास्ती दे नहीं सकते तो उनका पद भी कम हो जाता है। तुम सब जौहरी हो, यह अविनाशी ज्ञान रत्नों के जवाहरात हैं। जिसके पास अच्छे रत्न होंगे वह साहूकार बनेंगे, औरों को भी बनायेंगे। ऐसे तो नहीं, सब अच्छे जौहरी होंगे। अच्छे-अच्छे जौहरी बड़े-बड़े सेन्टर्स पर भेज देते हैं। बड़े आदमियों को अच्छी जवाहरात दी जाती है। बड़े-बड़े दुकानों पर एक्सपर्ट रहते हैं। बाबा को भी कहा जाता है-सौदागर-रत्नागर। रत्नों का सौदा करते हैं फिर जादूगर भी है क्योंकि उनके पास ही दिव्य दृष्टि की चाबी है। कोई नौधा भक्ति करते हैं तो उनको साक्षात्कार हो जाता है। यहाँ वह बात नहीं है। यहाँ तो अनायास घर बैठे भी बहुतों को साक्षात्कार होता है। दिन-प्रतिदिन सहज होता जायेगा। कइयों को ब्रह्मा का और कृष्ण का भी साक्षात्कार होता है। उनको कहते हैं ब्रह्मा के पास जाओ। जाकर उनके पास प्रिन्स बनने की पढ़ाई पढ़ो। यह पवित्र प्रिन्स-प्रिन्सेज चले आते हैं ना। प्रिन्स को पवित्र भी कह सकते हैं। पवित्रता से जन्म होता है ना। पतित को भ्रष्टाचारी कहेंगे। पतित से पावन बनना है, यह बुद्धि में रहना चाहिए। जो किसको समझा भी सको। मनुष्य समझते हैं, यह तो बड़े सेन्सीबुल हैं। बोलो-हमारे पास कोई शास्त्रों आदि की नॉलेज नहीं है। यह है रूहानी नॉलेज, जो रूहानी बाप समझाते हैं। यह है त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। यह भी रचना हैं। रचयिता एक बाप है, वह होते हैं हद के क्रियेटर, यह है बेहद का बाप, बेहद का क्रियेटर। बाप बैठकर पढ़ाते हैं, मेहनत करनी होती है। बाप गुल-गुल (फूल) बनाते हैं। तुम हो ईश्वरीय कुल के, तुमको बाप पवित्र बनाते हैं। फिर अगर अपवित्र बनते हैं तो कुल कलंकित बनते हैं। बाप तो जानते हैं ना। फिर धर्मराज द्वारा बहुत सजा दिलायेंगे। बाप के साथ धर्मराज भी है। धर्मराज की ड्युटी भी अभी पूरी होती है। सतयुग में तो होगी ही नहीं। फिर शुरू होती है द्वापर से। बाप बैठ कर्म, अकर्म, विकर्म की गति समझाते हैं। कहते हैं ना-इसने आगे जन्म में ऐसे कर्म किये हैं, जिसकी यह भोगना है। सतयुग में ऐसे नहीं कहेंगे। बुरे कर्मों का वहाँ नाम नहीं होता। यहाँ तो बुरे-अच्छे दोनों हैं। सुख-दु:ख दोनों हैं। परन्तु सुख बहुत थोड़ा है। वहाँ फिर दु:ख का नाम नहीं। सतयुग में दु:ख कहाँ से आया! तुम बाप से नई दुनिया का वर्सा लेते हो। बाप है ही दु:ख हर्ता सुख कर्ता। दु:ख कब से शुरू होता है, यह भी तुम जानते हो। शास्त्रों में तो कल्प की आयु ही लम्बी-चौड़ी लिख दी है। अभी तुम जानते हो आधाकल्प के लिए हमारे दु:ख हर जायेंगे और हम सुख पायेंगे। यह सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, इस पर समझाना बड़ा सहज है। यह सब बातें तुम्हारे सिवाए और कोई की बुद्धि में हो न सकें। लाखों वर्ष कह देने से सब बातें बुद्धि से निकल जाती हैं।
अभी तुम जानते हो -यह चक्र 5 हज़ार वर्ष का है। कल की बात है जबकि इन सूर्यवंशी-चन्द्रवंशियों का राज्य था। कहते भी हैं ब्राह्मणों का दिन, ऐसे नहीं शिवबाबा का दिन कहेंगे। ब्राह्मणों का दिन फिर ब्राह्मणों की रात। ब्राह्मण फिर भक्ति मार्ग में भी चले आते हैं। अभी है संगम। न दिन है, न रात है। तुम जानते हो हम ब्राह्मण फिर देवता बनेंगे फिर त्रेता में क्षत्रिय बनेंगे। यह तो बुद्धि में पक्का याद कर लो। इन बातों को और कोई नहीं जानते हैं। वह तो कहेंगे शास्त्रों में इतनी आयु लिखी है, तुमने फिर यह हिसाब कहाँ से लाया है? यह अनादि ड्रामा बना-बनाया है, यह कोई नहीं जानते। तुम बच्चों की बुद्धि में है, आधाकल्प है सतयुग-त्रेता फिर आधा से भक्ति शुरू होती है। वह हो जाता है त्रेता और द्वापर का संगम। द्वापर में भी यह शास्त्र आदि आहिस्ते-आहिस्ते बनते हैं। भक्ति मार्ग की सामग्री बड़ी लम्बी-चौड़ी है। जैसे झाड़ कितना लम्बा-चौड़ा है। इसका बीज है बाबा। यह उल्टा झाड़ है। पहले-पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म है। यह बातें जो बाप सुनाते हैं, यह हैं बिल्कुल नई। इस देवी-देवता धर्म के स्थापक को कोई नहीं जानते। कृष्ण तो बच्चा है। ज्ञान सुनाने वाला है बाप। तो बाप को उड़ाए बच्चे का नाम डाल दिया है। कृष्ण के ही चरित्र आदि बैठ दिखाये हैं। बाप कहते हैं लीला कोई कृष्ण की नहीं है। गाते भी हैं-हे प्रभू तेरी लीला अपरम-अपार है। लीला एक की ही होती है। शिवबाबा की महिमा बड़ी न्यारी है। वह तो है सदा पावन रहने वाला, परन्तु वह पावन शरीर में तो आ न सके। उनको बुलाते ही हैं-पतित दुनिया को आकर पावन बनाओ। तो बाप कहते हैं मुझे भी पतित दुनिया में आना पड़ता है। इनके बहुत जन्मों के अन्त में आकर प्रवेश करता हूँ। तो बाप कहते हैं मुख्य बात अल्फ को याद करो, बाकी यह सारी है रेज़गारी। वह सब तो धारण कर न सके। जो धारण कर सकते हैं, उन्हों को समझाता हूँ। बाकी तो कह देता हूँ मन्मनाभव। नम्बरवार बुद्धि तो होती है ना। बादल कोई तो खूब बरसते हैं, कोई थोड़ा बरसकर चले जाते हैं। तुम भी बादल हो ना। कोई तो बिल्कुल बरसते ही नहीं हैं। ज्ञान को खींचने की ताकत नहीं है। मम्मा-बाबा अच्छे बादल हैं ना। बच्चों को संग उनका करना चाहिए जो अच्छा बरसते हैं। जो बरसते ही नहीं उनसे संग रखने से क्या होगा? संग का दोष भी बहुत लगता है। कोई तो किसके संग से हीरे जैसा बन जाते हैं, कोई फिर किसके संग से ठिक्कर बन जाते हैं। पीठ पकड़नी चाहिए अच्छे की। जो ज्ञानवान होगा वह आपसमान फूल बनायेगा। सत् बाप से जो ज्ञानवान और योगी बने हैं उनका संग करना चाहिए। ऐसे नहीं समझना है कि हम फलाने का पूँछ पकड़कर पार हो जायेंगे। ऐसे बहुत कहते हैं। परन्तु यहाँ तो वह बात नहीं है। स्टूडेन्ट किसकी पूँछ पकड़ने से पास हो जायेंगे क्या! पढ़ना पड़े ना। बाप भी आकर नॉलेज देते हैं। इस समय वह जानते हैं हमको ज्ञान देना है। भक्ति मार्ग में उनकी बुद्धि में यह बातें नहीं रहती कि हमको जाकर ज्ञान देना है। यह सब ड्रामा में नूँध है। बाबा कुछ करते नहीं हैं। ड्रामा में दिव्य दृष्टि मिलने का पार्ट है तो साक्षात्कार हो जाता है। बाप कहते हैं ऐसे नहीं कि मैं बैठ साक्षात्कार कराता हूँ। यह ड्रामा में नूँध है। अगर कोई देवी का साक्षात्कार करना चाहते हैं, देवी तो नहीं करायेगी ना। कहते हैं-हे भगवान, हमको साक्षात्कार कराओ। बाप कहते हैं ड्रामा में नूँध होगी तो हो जायेगा। मैं भी ड्रामा में बांधा हुआ हूँ।
बाबा कहते हैं मैं इस सृष्टि में आया हुआ हूँ। इनके मुख से मैं बोल रहा हूँ, इनकी आंखों से तुमको देख रहा हूँ। अगर यह शरीर न हो तो देख कैसे सकूँगा? पतित दुनिया में ही मुझे आना पड़ता है। स्वर्ग में तो मुझे बुलाते ही नहीं हैं। मुझे बुलाते ही संगम पर हैं। जब संगमयुग पर आकर शरीर लेता हूँ तब ही देखता हूँ। निराकार रूप में तो कुछ देख नहीं सकता हूँ। आरगन्स बिगर आत्मा कुछ भी कर न सके। बाबा कहते हैं मैं देख कैसे सकता, चुरपुर कैसे कर सकता, बिगर शरीर के। यह तो अन्धश्रद्धा है, जो कहते हैं ईश्वर सब कुछ देखता है, सब कुछ वह करते हैं। देखेगा फिर कैसे? जब आरगन्स मिलें तब देखे ना। बाप कहते हैं-अच्छा वा बुरा काम ड्रामानुसार हर एक करते हैं। नूँध है। मैं थोड़ेही इतने करोड़ों मनुष्यों का बैठ हिसाब रखूँगा, मुझे शरीर है तब सब कुछ करता हूँ। करनकरावनहार भी तब कहते हैं। नहीं तो कह न सकें। मैं जब इसमें आऊं तब आकर पावन बनाऊं। ऊपर में आत्मा क्या करेगी? शरीर से ही पार्ट बजायेगी ना। मैं भी यहाँ आकर पार्ट बजाता हूँ। सतयुग में मेरा पार्ट है नहीं। पार्ट बिगर कोई कुछ कर न सके। शरीर बिगर आत्मा कुछ कर नहीं सकती। आत्मा को बुलाया जाता है, वह भी शरीर में आकर बोलेगी ना। आरगन्स बिगर कुछ कर न सके। यह है डीटेल की समझानी। मुख्य बात तो कहा जाता है बाप और वर्से को याद करो। बेहद का बाप इतना बड़ा है, उनसे वर्सा कब मिलता होगा-यह कोई जानते नहीं। कहते हैं आकर दु:ख हरो, सुख दो, परन्तु कब? यह किसको पता नहीं है। तुम बच्चे अभी नई बातें सुन रहे हो। तुम जानते हो हम अमर बन रहे हैं, अमरलोक में जा रहे हैं। तुम अमरलोक में कितना बार गये हो? अनेक बार। इसका कभी अन्त नहीं होता। बहुत कहते हैं क्या मोक्ष नहीं मिल सकता? बोलो-नहीं, यह अनादि अविनाशी ड्रामा है, यह कभी विनाश नहीं हो सकता है। यह तो अनादि चक्र फिरता ही रहता है। तुम बच्चे इस समय सच्चे साहेब को जानते हो। तुम सन्यासी हो ना। वह फ़कीर नहीं। सन्यासियों को भी फ़कीर कहा जाता है। तुम राजऋषि हो, ऋषि को सन्यासी कहा जाता है। अभी फिर तुम अमीर बनते हो। भारत कितना अमीर था, अभी कैसा फ़कीर बन गया है। बेहद का बाप आकर बेहद का वर्सा देते हैं। गीत भी है-बाबा आप जो देते हो सो कोई दे न सके। आप हमको विश्व का मालिक बनाते हो, जिसको कोई लूट न सके। ऐसे-ऐसे गीत बनाने वाले अर्थ नहीं सोचते। तुम जानते हो वहाँ पार्टीशन आदि कुछ नहीं होगी। यहाँ तो कितनी पार्टीशन हैं। वहाँ आकाश-धरती सारी तुम्हारी रहती है। तो इतनी खुशी बच्चों को रहनी चाहिए ना। हमेशा समझो शिवबाबा सुनाते हैं क्योंकि वह कभी हॉली डे नहीं लेते, कभी बीमार नहीं होते। याद शिवबाबा की ही रहनी चाहिए। इनको कहा जाता है निरहंकारी। मैं यह करता हूँ, मैं यह करता हूँ, यह अहंकार नहीं आना चाहिए। सर्विस करना तो फ़र्ज है, इसमें अहंकार नहीं आना चाहिए। अहंकार आया और गिरा। सर्विस करते रहो, यह है रूहानी सेवा। बाकी सब है जिस्मानी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप जो पढ़ाते हैं, उसका रिटर्न गुल-गुल (फूल) बनकर दिखाना है। मेहनत करनी है। कभी भी ईश्वरीय कुल का नाम बदनाम नहीं करना है, जो ज्ञानवान और योगी हैं, उनका ही संग करना है।
2) मैं-पन का त्याग कर निरहंकारी बन रूहानी सेवा करनी है, इसे अपना फ़र्ज समझना है। अहंकार में नहीं आना है।

वरदान: अपने फरिश्ते स्वरूप द्वारा सर्व को वर्से का अधिकार दिलाने वाले आकर्षण-मूर्त भव
फरिश्ते स्वरूप की ऐसी चमकीली ड्रेस धारण करो जो दूर-दूर तक आत्माओं को अपनी तरफ आकर्षित करे और सर्व को भिखारीपन से छुड़ाए वर्से का अधिकारी बना दे। इसके लिए ज्ञान मूर्त, याद मूर्त और सर्व दिव्य गुण मूर्त बन उड़ती कला में स्थित रहने का अभ्यास बढ़ाते चलो। आपकी उड़ती कला ही सर्व को चलते-फिरते फरिश्ता सो देवता स्वरूप का साक्षात्कार करायेगी। यही विधाता, वरदाता पन की स्टेज है।

स्लोगन: औरों के मन के भावों को जानने के लिए सदा मनमनाभव की स्थिति में स्थित रहो।