Tuesday, 31 December 2019

Hindi Murli 01/01/2020

01-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - पतित से पावन बनाने वाले बाप के साथ तुम्हारा बहुत-बहुत लव होना चाहिए, सवेरे-सवेरे उठकर पहले-पहले कहो शिवबाबा गुडमार्निंग"

प्रश्न: एक्यूरेट याद के लिए कौन सी धारणायें चाहिए? एक्यूरेट याद वाले की निशानी क्या होगी?
उत्तर: एक्यूरेट याद के लिए धैर्यता, गम्भीरता और समझ चाहिए। इस धारणा के आधार से जो याद करते हैं उनकी याद, याद से मिलती है और बाप की करेन्ट आने लगती है। उस करेन्ट से आयु बढ़ेगी, हेल्दी बनते जायेंगे। दिल एकदम ठर जायेगी (शीतल हो जायेगी), आत्मा सतोप्रधान बनती जायेगी।

ओम् शान्ति। बाप कहते हैं मीठे बच्चे ततत्वम् अर्थात् तुम आत्मायें भी शान्त स्वरूप हो। तुम सर्व आत्माओं का स्वधर्म है ही शान्ति। शान्तिधाम से फिर यहाँ आकर टाकी बनते हो। यह कर्मेन्द्रियां तुमको मिलती है पार्ट बजाने के लिए। आत्मा छोटी-बड़ी नहीं होती है। शरीर छोटा बड़ा होता है। बाप कहते हैं मैं तो शरीरधारी नहीं हूँ। मुझे बच्चों से सन्मुख मिलने आना होता है। समझो जैसे बाप है, उनसे बच्चे पैदा होते हैं, तो वह बच्चा ऐसे नहीं कहेगा कि मैं परमधाम से जन्म ले मात-पिता से मिलने आया हूँ। भल कोई नई आत्मा आती है किसके भी शरीर में, वा कोई पुरानी आत्मा किसके शरीर में प्रवेश करती है तो ऐसे नहीं कहेंगे कि मात-पिता से मिलने आया हूँ। उनको आटोमेटिकली मात-पिता मिल जाते हैं। यहाँ यह है नई बात। बाप कहते हैं मैं परमधाम से आकर तुम बच्चों के सम्मुख हुआ हूँ। बच्चों को फिर से नॉलेज देता हूँ क्योंकि मैं हूँ नॉलेजफुल, ज्ञान का सागर.. मैं आता हूँ तुम बच्चों को पढ़ाने, राजयोग सिखाने। राजयोग सिखाने वाला भगवान ही है। कृष्ण की आत्मा को यह ईश्वरीय पार्ट नहीं है। हर एक का पार्ट अपना। ईश्वर का पार्ट अपना है। तो बाप समझाते हैं मीठे बच्चे अपने को आत्मा समझो। ऐसा अपने को समझना कितना मीठा लगता है। हम क्या थे! अब क्या बन रहे हैं!
यह ड्रामा कैसा वन्डरफुल बना हुआ है यह भी तुम अभी समझाते हो। यह पुरुषोत्तम संगमयुग है इतना सिर्फ याद रहे तो भी पक्का हो जाता है कि हम सतयुग में जाने वाले हैं। अभी संगम पर हैं फिर जाना है अपने घर इसलिए पावन तो जरूर बनना है। अन्दर में बहुत खुशी होनी चाहिए। ओहो! बेहद का बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों मुझे याद करो तो तुम सतोप्रधान बनेंगे। विश्व का मालिक बनेंगे। बाप कितना बच्चों को प्यार करते हैं। ऐसे नहीं कि सिर्फ टीचर के रूप में पढ़ाकर और घर चले जाते हैं। यह तो बाप भी टीचर भी है। तुमको पढ़ाते भी है। याद की यात्रा भी सिखलाते हैं।
ऐसा विश्व का मालिक बनाने वाले, पतित से पावन बनाने वाले बाप के साथ बहुत लव होना चाहिए। सवेरे-सवेरे उठने से ही पहले-पहले शिवबाबा से गुडमार्निंग करना चाहिए। गुडमार्निंग अर्थात् याद करेंगे तो बहुत खुशी में रहेंगे। बच्चों को अपने दिल से पूछना है हम सवेरे उठकर कितना बेहद के बाप को याद करते हैं? मनुष्य भक्ति भी सवेरे करते हैं ना! भक्ति कितना प्यार से करते हैं। परन्तु बाबा जानते हैं कई बच्चे दिल व जान, सिक व प्रेम से याद नहीं करते हैं। सवेरे उठ बाबा से गुडमार्निंग करें, ज्ञान के चिन्तन में रहें तो खुशी का पारा चढ़े। बाप से गुडमार्निंग नहीं करेंगे तो पापों का बोझा कैसे उतरेगा। मुख्य है ही याद, इससे भविष्य के लिए तुम्हारी बहुत भारी कमाई होती है। कल्प-कल्पान्तर यह कमाई काम आयेगी। बड़ा धैर्य, गम्भीरता, समझ से याद करना होता है। मोटे हिसाब में तो भल करके यह कह देते हैं कि हम बाबा को बहुत याद करते हैं परन्तु एक्यूरेट याद करने में मेहनत है। जो बाप को जास्ती याद करते हैं उनको करेन्ट जास्ती मिलती है क्योंकि याद से याद मिलती है। योग और ज्ञान दो चीज़े हैं। योग की सबजेक्ट अलग है, बहुत भारी सबजेक्ट है। योग से ही आत्मा सतोप्रधान बनती है। याद बिना सतोप्रधान होना, असम्भव है। अच्छी रीति प्यार से बाप को याद करेंगे तो आटोमेटिकली करेन्ट मिलेगी, हेल्दी बन जायेंगे। करेन्ट से आयु भी बढ़ती है। बच्चे याद करते हैं तो बाबा भी सर्चलाइट देते हैं। बाप कितना बड़ा भारी खजाना तुम बच्चों को देते हैं।
मीठे बच्चों को यह पक्का याद रखना है, शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। शिवबाबा पतित-पावन भी है। सद्गति दाता भी हैं। सद्गति माना स्वर्ग की राजाई देते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार से बच्चों को बैठ पढ़ाते हैं। बाप, दादा द्वारा हमको पढ़ाते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार करते हैं। कोई तकलीफ नहीं देते। सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो और चक्र को याद करो। बाप की याद में दिल एकदम ठर जानी चाहिए। एक बाप की ही याद सतानी चाहिए क्योंकि बाप से वर्सा कितना भारी मिलता है। अपने को देखना चाहिए हमारा बाप के साथ कितना लव है? कहाँ तक हमारे में दैवीगुण हैं? क्योंकि तुम बच्चे अब कांटों से फूल बन रहे हो। जितना-जितना योग में रहेंगे उतना कांटों से फूल, सतोप्रधान बनते जायेंगे। फूल बन गये फिर यहाँ रह नहीं सकेंगे। फूलों का बगीचा है ही स्वर्ग। जो बहुत कांटों को फूल बनाते हैं उन्हें ही सच्चा खुशबूदार फूल कहेंगे। कभी किसको कांटा नहीं लगायेंगे। क्रोध भी बड़ा कांटा है, बहुतों को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे कांटों की दुनिया से किनारे पर आ गये हो, तुम हो संगम पर। जैसे माली फूलों को अलग पाट (बर्तन) में निकालकर रखते हैं वैसे ही तुम फूलों को भी अब संगमयुगी पाट में अलग रखा हुआ है। फिर तुम फूल स्वर्ग में चले जायेंगे, कलियुगी कांटें भस्म हो जायेंगे।
मीठे बच्चे जानते हैं पारलौकिक बाप से हमको अविनाशी वर्सा मिलता है। जो सच्चे-सच्चे बच्चे हैं, जिनका बापदादा से पूरा लव है उनको बड़ी खुशी रहेगी। हम विश्व का मालिक बनते हैं। हाँ पुरुषार्थ से ही विश्व का मालिक बना जाता है, सिर्फ कहने से नहीं। जो अनन्य बच्चे हैं उन्हों को सदैव यह याद रहेगा कि हम अपने लिए फिर से वही सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। बाप कहते हैं मीठे बच्चे जितना तुम बहुतों का कल्याण करेंगे उतना ही तुमको उजूरा मिलेगा। बहुतों को रास्ता बतायेंगे तो बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी। ज्ञान रत्नों से झोली भरकर फिर दान करना है। ज्ञान सागर तुमको रत्नों की थालियाँ भर-भर कर देते हैं। जो फिर दान करते हैं वही सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए। सेन्सीबुल बच्चे जो होंगे वह तो कहेंगे हम बाबा से पूरा ही वर्सा लेंगे, एकदम चटक पड़ेंगे। बाप से बहुत लव रहेगा क्योंकि जानते हैं प्राण देने वाला बाप मिला है। नॉलेज का वरदान ऐसा देते हैं जिससे हम क्या से क्या बन जाते हैं। इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बन जाते हैं, इतना भण्डारा भरपूर कर देते हैं। जितना बाप को याद करेंगे उतना लव रहेगा, कशिश होगी। सुई साफ होती है तो चकमक (चुम्बक) तरफ खैच जाती है ना। बाप की याद से कट निकलती जायेगी। एक बाप के सिवाए और कोई याद न आये। जैसे स्त्री का पति के साथ कितना लव होता है। तुम्हारी भी सगाई हुई है ना। सगाई की खुशी कम होती है क्या? शिवबाबा कहते हैं मीठे बच्चे तुम्हारी हमारे साथ सगाई है, ब्रह्मा के साथ सगाई नहीं है। सगाई पक्की हो गई फिर तो उनकी ही याद सतानी चाहिए।
बाप समझाते हैं मीठे बच्चे गफलत मत करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो, लाइट हाउस बनो। स्वदर्शन चक्रधारी बनने की प्रैक्टिस अच्छी हो जायेगी तो फिर तुम जैसे ज्ञान का सागर हो जायेंगे। जैसे स्टूडेन्ट पढ़कर टीचर बन जाते हैं ना। तुम्हारा धन्धा ही यह है। सबको स्वदर्शन चक्रधारी बनाओ तब ही चक्रवर्ती राजा-रानी बनेंगे इसलिए बाबा सदैव बच्चों से पूछते हैं स्वदर्शन चक्रधारी हो बैठे हो? बाप भी स्वदर्शन चक्रधारी है ना। बाप आये हैं तुम मीठे बच्चों को वापिस ले जाने। तुम बच्चों बिगर हमको भी जैसे बेआरामी होती है। जब समय होता है तो बेआरामी हो जाती है। बस अभी हम जाऊं, बच्चे बहुत पुकारते हैं, बहुत दु:खी हैं। तरस पड़ता है। अब तुम बच्चों को चलना है घर। फिर वहाँ से तुम आपेही चले जायेंगे सुखधाम। वहाँ मैं तुम्हारा साथी नहीं बनूँगा। अपनी अवस्था अनुसार तुम्हारी आत्मा चली जायेगी।
तुम बच्चों को यह नशा रहना चाहिए हम रूहानी युनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। हम गॉडली स्टूडेन्ट हैं। हम मनुष्य से देवता अथवा विश्व का मालिक बनने के लिए पढ़ रहे हैं। इससे हम सारी मिनिस्टरी पास कर लेते हैं। हेल्थ की एज्यूकेशन भी पढ़ते हैं, कैरेक्टर सुधारने की भी नॉलेज पढ़ते हैं। हेल्थ मिनिस्टरी, फूड मिनिस्टरी, लैन्ड मिनिस्टरी, बिल्डिंग मिनिस्टरी सब इसमें आ जाती है।
मीठे-मीठे बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं जब कोई सभा में भाषण करते हो वा किसको समझाते हो तो घड़ी-घड़ी बोलो अपने को आत्मा समझ परमपिता परमात्मा को याद करो। इस याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। तुम पावन बन जायेंगे। घड़ी-घड़ी यह याद करना है। परन्तु यह भी तुम तभी कह सकेंगे जब खुद याद में होंगे। इस बात की बच्चों में बहुत कमजोरी है। अन्दरूनी तुम बच्चों को खुशी होगी, याद में रहेंगे तब दूसरों को समझाने का असर होगा। तुम्हारा बोलना जास्ती नहीं होना चाहिए। आत्म-अभिमानी हो थोड़ा भी समझायेंगे तो तीर भी लगेगा। बाप कहते हैं बच्चे बीती सो बीती। अब पहले अपने को सुधारो। खुद याद करेंगे नहीं, दूसरों को कहते रहेंगे, यह ठगी चल न सके। अन्दर दिल जरूर खाती होगी। बाप के साथ पूरा लव नहीं है तो श्रीमत पर चलते नहीं हैं। बेहद के बाप जैसी शिक्षा तो और कोई दे न सके। बाप कहते हैं मीठे बच्चे इस पुरानी दुनिया को अब भूल जाओ। पिछाड़ी में तो यह सब भूल ही जाना है। बुद्धि लग जाती है अपने शान्तिधाम और सुखधाम में। बाप को याद करते-करते बाप के पास चले जाना है। पतित आत्मा तो जा न सके। वह है ही पावन आत्माओं का घर। यह शरीर 5 तत्वों से बना हुआ है। तो 5 तत्व यहाँ रहने लिए खींचते हैं क्योंकि आत्मा ने यह जैसे प्रापटी ली हुई है, इसलिए शरीर में ममत्व हो गया है। अब इनसे ममत्व निकाल जाना है अपने घर। वहाँ तो यह 5 तत्व हैं नहीं। सतयुग में भी शरीर योगबल से बनता है। सतोप्रधान प्रकृति होती है इसलिए खींचती नहीं। दु:ख नहीं होता। यह बड़ी महीन बातें हैं समझने की। यहाँ 5 तत्वों का बल आत्मा को खींचता है इसलिए शरीर छोड़ने की दिल नहीं होती है। नहीं तो इसमें और ही खुश होना चाहिए। पावन बन शरीर ऐसे छोड़ेंगे जैसे मक्खन से बाल। तो शरीर से, सब चीज़ों से ममत्व एकदम मिटा देना है, इससे हमारा कोई कनेक्शन नहीं। बस हम जाते हैं बाबा के पास। इस दुनिया में अपना बैग बैगेज तैयार कर पहले से ही भेज दिया है। साथ में तो चल न सके। बाकी आत्माओं को जाना है। शरीर को भी यहाँ छोड़ दिया है। बाबा ने नये शरीर का साक्षात्कार करा दिया है। हीरे जवाहरों के महल मिल जायेंगे। ऐसे सुखधाम में जाने लिए कितनी मेहनत करनी चाहिए। थकना नहीं चाहिए। दिनरात बहुत कमाई करनी है इसलिए बाबा कहते हैं नींद को जीतने वाले बच्चे मामेकम् याद करो और विचार सागर मन्थन करो। ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखने से बुद्धि एकदम शीतल हो जाती है। जो महारथी बच्चे होंगे वह कब हिलेंगे नहीं। शिवबाबा को याद करेंगे तो वह सम्भाल भी करेंगे।
बाप तुम बच्चों को दु:ख से छुड़ाकर शान्ति का दान देते हैं। तुमको भी शान्ति का दान देना है। तुम्हारी यह बेहद की शान्ति अर्थात् योगबल दूसरों को भी एकदम शान्त कर देंगे। झट मालूम पड़ जायेगा, यह हमारे घर का है वा नहीं। आत्मा को झट कशिश होगी यह हमारा बाबा है। नब्ज भी देखनी होती है। बाप की याद में रह फिर देखो यह आत्मा हमारे कुल की है। अगर होगी तो एकदम शान्त हो जायेगी। जो इस कुल के होंगे उन्हों को ही इन बातों में रस बैठेगा। बच्चे याद करते हैं तो बाप भी प्यार करते हैं। आत्मा को प्यार किया जाता है। यह भी जानते हैं जिन्होंने बहुत भक्ति की है वह ही जास्ती पढ़ेंगे। उनके चेहरे से मालूम पड़ता जायेगा कि बाप में कितना लव है। आत्मा बाप को देखती है। बाप हम आत्माओं को पढ़ा रहे हैं। बाप भी समझते हैं हम इतनी छोटी बिन्दी आत्मा को पढ़ाता हूँ। आगे चल तुम्हारी यह अवस्था हो जायेगी। समझेंगे हम भाई-भाई को पढ़ाते हैं। शक्ल बहन की होते भी दृष्टि आत्मा तरफ जाए। शरीर पर दृष्टि बिल्कुल न जाये, इसमें बड़ी मेहनत है। यह बड़ी महीन बातें हैं। बड़ी ऊंच पढ़ाई है। वज़न करो तो इस पढ़ाई का तरफ बहुत भारी हो जायेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अपनी झोली ज्ञान रत्नों से भरकर फिर दान भी करना है। जो दान करते हैं वो सबको प्यारे लगते हैं, उन्हें अपार खुशी रहती है।
2) प्राणदान देने वाले बाप को बहुत प्यार से याद करते सबको शान्ति का दान देना है। स्वदर्शन चक्र फिराते ज्ञान का सागर बनना है।

वरदान: ऊंचे ते ऊंचे बाप को प्रत्यक्ष करने वाले शुभ और श्रेष्ठ कर्मधारी भव
जैसे राइट हैण्ड से सदा शुभ और श्रेष्ठ कर्म करते हैं। ऐसे आप राइट हैण्ड बच्चे सदा शुभ वा श्रेष्ठ कर्मधारी बनो, आपका हर कर्म ऊंचे ते ऊचे बाप को प्रत्यक्ष करने वाला हो क्योंकि कर्म ही संकल्प वा बोल को प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में स्पष्ट करने वाला होता है। कर्म को सभी देख सकते हैं, कर्म द्वारा अनुभव कर सकते हैं इसलिए चाहे रूहानी दृष्टि द्वारा, चाहे अपने खुशी के, रूहानियत के चेहरे द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करो-यह भी कर्म ही है।

स्लोगन: रूहानियत का अर्थ है-नयनों में पवित्रता की झलक और मुख पर पवित्रता की मुस्कराहट हो।

Monday, 30 December 2019

Hindi Murli 31/12/2019

31-12-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम्हें जो भी ज्ञान मिलता है, उस पर विचार सागर मंथन करो, ज्ञान मंथन से ही अमृत निकलेगा"

प्रश्न: 21 जन्मों के लिए मालामाल बनने का साधन क्या है?
उत्तर: ज्ञान रत्न। जितना तुम इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर ज्ञान रत्न धारण करते हो उतना मालामाल बनते हो। अभी के ज्ञान रत्न वहाँ हीरे जवाहरात बन जाते हैं। जब आत्मा ज्ञान रत्न धारण करे, मुख से ज्ञान रत्न निकाले, रत्न ही सुने और सुनाये तब उनके हर्षित चेहरे से बाप का नाम बाला हो। आसुरी गुण निकलें तब मालामाल बनें।

ओम् शान्ति। बाप बच्चों को ज्ञान और भक्ति पर समझाते हैं। यह तो बच्चे समझते हैं कि सतयुग में भक्ति नहीं होती। ज्ञान भी सतयुग में नहीं मिलता। कृष्ण न भक्ति करते हैं, न ज्ञान की मुरली बजाते हैं। मुरली माना ज्ञान देना। गायन है ना मुरली में जादू। तो जरूर कोई जादू होगा ना। सिर्फ मुरली बजाना यह कॉमन बात है। फकीर लोग भी मुरली बजाते हैं। इसमें तो ज्ञान का जादू है। अज्ञान को जादू नहीं कहेंगे। मनुष्य समझते हैं कृष्ण मुरली बजाता था, उनकी बहुत महिमा करते हैं। बाप कहते हैं कृष्ण तो देवता था। मनुष्य से देवता, देवता से मनुष्य, यह होता ही रहता है। दैवी सृष्टि भी होती है तो मनुष्य सृष्टि भी होती है। इस ज्ञान से मनुष्य से देवता बनते हैं। जब सतयुग है तो यह ज्ञान का वर्सा है। सतयुग में भक्ति होती नहीं। देवता जब मनुष्य बनते हैं तब भक्ति शुरू होती है। मनुष्य को विकारी, देवताओं को निर्विकारी कहा जाता है। देवताओं की सृष्टि को पवित्र दुनिया कहा जाता है। अभी तुम मनुष्य से देवता बन रहे हो। देवताओं में फिर यह ज्ञान होगा नहीं। देवतायें सद्गति में हैं, ज्ञान चाहिए दुर्गति वालों को। इस ज्ञान से ही दैवी गुण आते हैं। ज्ञान की धारणा वालों की चलन देवताई होती है। कम धारणा वालों की चलन मिक्स होती है। आसुरी चलन तो नहीं कहेंगे। धारणा नहीं तो हमारे बच्चे कैसे कहलायेंगे। बच्चे बाप को नहीं जानते तो बाप भी बच्चों को कैसे जानेंगे। कितनी कच्ची-कच्ची गालियाँ बाप को देते हैं। भगवान को गाली देना कितना खराब है। फिर जब वह ब्राह्मण बनते तो गाली देना बन्द हो जाता है। तो इस ज्ञान का विचार सागर मंथन करना चाहिए। स्टूडेन्ट विचार सागर मंथन कर ज्ञान को उन्नति में लाते हैं। तुमको यह ज्ञान मिलता है, उस पर अपना विचार सागर मंथन करने से अमृत निकलेगा। विचार सागर मंथन नहीं होगा तो क्या मंथन होगा? आसुरी विचार मंथन, जिससे किचड़ा ही निकलता है। अभी तुम ईश्वरीय स्टूडेन्ट हो। जानते हो मनुष्य से देवता बनने की पढ़ाई बाप पढ़ा रहे हैं। देवता तो नहीं पढ़ायेंगे। देवताओं को कभी ज्ञान का सागर नहीं कहा जाता है। बाप ही ज्ञान का सागर है। तो अपने से पूछना चाहिए हमारे में सभी दैवी गुण हैं? अगर आसुरी गुण हैं तो उसे निकाल देना चाहिए तब ही देवता बनेंगे।
अभी तुम हो पुरूषोत्तम संगमयुग पर। पुरूषोत्तम बन रहे हो तो वातावरण भी बहुत अच्छा होना चाहिए। छी-छी बातें मुख से नहीं निकलनी चाहिए। नहीं तो कहा जायेगा कम दर्जे का है। वातावरण से झट पता पड़ जाता है। मुख से वचन ही दु:ख देने वाले निकलते हैं। तुम बच्चों को बाप का नाम बाला करना है। सदैव मुखड़ा हर्षित रहना चाहिए। मुख से सदैव रत्न ही निकलें। यह लक्ष्मी-नारायण कितने हर्षितमुख हैं, इनकी आत्मा ने ज्ञान रत्न धारण किये थे। मुख से यह रत्न निकाले थे। रत्न ही सुनते सुनाते थे। कितनी खुशी रहनी चाहिए। अभी तुम जो ज्ञान रत्न लेते हो वह फिर सच्चे हीरे-जवाहरात बन जाते हैं। 9 रत्नों की माला कोई हीरे-जवाहरात की नहीं, इन चैतन्य रत्नों की माला है। मनुष्य लोग फिर वह रत्न समझ अंगूठियाँ आदि पहनते हैं। ज्ञान रत्नों की माला इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही बनती है। यह रत्न ही 21 जन्मों के लिए मालामाल बना देते हैं, जिसको कोई लूट न सके। यहाँ पहनो तो झट कोई लूट लेवे। तो अपने को बहुत-बहुत समझदार बनाना है। आसुरी गुणों को निकालना है। आसुरी गुण वाले की शक्ल ही ऐसी हो जाती है। क्रोध में तो लाल तांबा मिसल हो जाते हैं। काम विकार वाले तो एकदम काले मुँह वाले बन जाते हैं। कृष्ण को भी काला दिखाते हैं ना। विकारों के कारण ही गोरे से सांवरा बन गया। तुम बच्चों को हर एक बात का विचार सागर मंथन करना चाहिए। यह पढ़ाई है बहुत धन पाने की। तुम बच्चों का सुना हुआ है, क्वीन विक्टोरिया का वजीर पहले बहुत गरीब था। दीवा जलाकर पढ़ता था। परन्तु वह पढ़ाई कोई रत्न थोड़ेही हैं। नॉलेज पढ़कर पूरा पोजीशन पा लेते हैं। तो पढ़ाई काम आई, न कि पैसा। पढ़ाई ही धन है। वह है हद का, यह है बेहद का धन। अभी तुम समझते हो बाप हमको पढ़ाकर विश्व का मालिक बना देते हैं। वहाँ तो धन कमाने के लिए पढ़ाई नहीं पढ़ेंगे। वहाँ तो अभी के पुरूषार्थ से अकीचार (अथाह) धन मिलता है। धन अविनाशी बन जाता है। देवताओं के पास बहुत धन था फिर जब वाम मार्ग, रावण राज्य में आते हैं तो भी कितना धन था। कितने मन्दिर बनवाये। फिर बाद में मुसलमानों ने लूटा। कितने धनवान थे। आजकल की पढ़ाई से इतना धनवान नहीं बन सकते हैं। तो इस पढ़ाई से देखो मनुष्य क्या बन जाते हैं! गरीब से साहूकार। अभी भारत देखो कितना गरीब है! नाम के साहूकार भी जो हैं, उनको तो फुर्सत ही नहीं। अपने धन, पोजीशन का कितना अहंकार रहता है। इसमें अहंकार आदि मिट जाना चाहिए। हम आत्मा हैं, आत्मा के पास धन-दौलत, हीरे-जवाहरात आदि कुछ भी नहीं हैं।
बाप कहते हैं मीठे बच्चे, देह सहित देह के सभी सम्बन्ध छोड़ो। आत्मा शरीर छोड़ती है तो फिर साहूकारी आदि सब खत्म हो जाती है। फिर जब नयेसिर से पढ़े, धन कमाये तब धनवान बनें या तो दान-पुण्य अच्छा किया होगा तो साहूकार के घर में जन्म लेंगे। कहते हैं यह पास्ट कर्मों का फल है। नॉलेज का दान दिया है वा कॉलेज धर्मशाला आदि बनाई है, तो उसका फल मिलता है परन्तु अल्पकाल के लिए। यह दान-पुण्य आदि भी यहाँ किया जाता है। सतयुग में नहीं किया जाता है। सतयुग में अच्छे ही कर्म होते हैं, क्योंकि अभी का वर्सा मिला हुआ है। वहाँ कोई भी कर्म विकर्म नहीं बनेगा क्योंकि रावण ही नहीं। विकार में जाने से विकारी कर्म बन जाते हैं। विकार से विकर्म बनते हैं। स्वर्ग में विकर्म कोई होता नहीं। सारा मदार कर्मों पर है। यह माया रावण अवगुणी बनाता है। बाप आकर सर्वगुण सम्पन्न बनाते हैं। राम वंशी और रावण वंशी की युद्ध चलती है। तुम राम के बच्चे हो, कितने अच्छे-अच्छे बच्चे माया से हार खा लेते हैं। बाबा नाम नहीं बतलाते हैं, फिर भी उम्मीद रखते हैं। अधम ते अधम का उद्धार करना होता है। बाप को सारे विश्व का उद्धार करना है। रावण के राज्य में सभी अधम गति को पाये हुए हैं। बाप तो बचने और बचाने की युक्तियां रोज़-रोज़ समझाते रहते हैं फिर भी गिरते हैं तो अधम ते अधम बन जाते हैं। वह फिर इतना चढ़ नहीं सकते हैं। वह अधमपना अन्दर खाता रहेगा। जैसे कहते हो अन्तकाल जो...... उनकी बुद्धि में वह अधमपना ही याद आता रहेगा।
तो बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं - कल्प-कल्प तुम ही सुनते हो, सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, जानवर तो नहीं जानेंगे ना। तुम ही सुनते हो और समझते हो। मनुष्य तो मनुष्य ही हैं, इन लक्ष्मी-नारायण को भी नाक-कान आदि सभी हैं फिर भी मनुष्य हैं ना। परन्तु दैवीगुण हैं इसलिए उन्हें देवता कहा जाता है। यह ऐसा देवता कैसे बनते हैं फिर कैसे गिरते हैं, इस चक्र का तुम्हें ही पता है। जो विचार सागर मंथन करते रहेंगे, उनको ही धारणा होगी। जो विचार सागर मंथन नहीं करते उन्हें बुद्धू कहेंगे। मुरली चलाने वाले का विचार सागर मंथन चलता रहेगा-इस टॉपिक पर यह-यह समझाना है। उम्मींद रखी जाती है, अभी नहीं समझेंगे परन्तु आगे चलकर जरूर समझेंगे। उम्मींद रखना माना सर्विस का शौक है, थकना नहीं है। भल कोई चढ़कर फिर अधम बना है, अगर आता है तो स्नेह से बिठायेंगे ना वा कहेंगे चले जाओ! हालचाल पूछना पड़े-इतने दिन कहाँ रहे, क्यों नहीं आये? कहेंगे ना माया से हार खा लिया। समझते भी हैं ज्ञान बड़ा अच्छा है। स्मृति तो रहती है ना। भक्ति में तो हार जीत पाने की बात ही नहीं। यह नॉलेज है, इसे धारण करना है। तुम जब तक ब्राह्मण न बने तब तक देवता बन न सको। क्रिश्चियन, बौद्धी, पारसी आदि में ब्राह्मण थोड़ेही होते हैं। ब्राह्मण के बच्चे ब्राह्मण होते हैं। यह बातें अभी तुम समझते हो। तुम जानते हो अल्फ को याद करना है। अल्फ को याद करने से बे बादशाही मिलती है। जब कोई मिले तो बोलो अल्फ अल्लाह को याद करो। अल्फ को ही ऊंच कहा जाता है। अंगुली से अल्फ तरफ इशारा करते हैं। सीधा ही सीधा अल्फ है। अल्फ को एक भी कहा जाता है। एक ही भगवान है, बाकी सभी हैं बच्चे। बाप को अल्फ कहा जाता है। बाप ज्ञान भी देते हैं, अपना बच्चा भी बनाते हैं। तो तुम बच्चों को कितनी खुशी में रहना चाहिए। बाबा हमारी कितनी सेवा करते हैं, विश्व का मालिक बनाते हैं। फिर खुद उस पवित्र दुनिया में आते भी नहीं। पावन दुनिया में कोई उनको बुलाते ही नहीं। पतित दुनिया में ही बुलाते हैं। पावन दुनिया में आकर क्या करेंगे। उनका नाम ही है पतित-पावन। तो पुरानी दुनिया को पावन दुनिया बनाना उनकी ड्युटी है। बाप का नाम ही है शिव। बच्चों को सालिग्राम कहा जाता है। दोनों की पूजा होती है। परन्तु पूजा करने वालों को कुछ भी पता नहीं है, बस एक रस्म-रिवाज़ बना दी है पूजा की। देवियों के भी फर्स्टक्लास हीरे-मोतियों के महल आदि बनाते हैं, पूजा करते हैं। वह तो मिट्टी का लिंग बनाया और तोड़ा। बनाने में मेहनत नहीं लगती है। देवियों को बनाने में मेहनत लगती है, उनकी (शिवबाबा की) पूजा में मेहनत नहीं लगती। मुफ्त में मिलता है। पत्थर पानी में घिस-घिस कर गोल बन जाता है। पूरा अण्डाकार बना देते हैं। कहते भी हैं अण्डे मिसल आत्मा है, जो ब्रह्म तत्व में रहती है, इसलिए उनको ब्रह्माण्ड कहते हैं। तुम ब्रह्माण्ड के और विश्व के भी मालिक बनते हो।
तो पहले-पहले समझानी देनी है एक बाप की। शिव को बाबा कह सभी याद करते हैं। दूसरा ब्रह्मा को भी बाबा कहते हैं। प्रजापिता है तो सारी प्रजा का पिता हुआ ना। ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। यह सारा ज्ञान अभी तुम बच्चों में है। प्रजापिता ब्रह्मा तो कहते बहुत हैं परन्तु यथार्थ रीति जानते कोई नहीं। ब्रह्मा किसका बच्चा है? तुम कहेंगे परमपिता परमात्मा का। शिवबाबा ने इनको एडाप्ट किया है तो यह शरीरधारी हुआ ना। ईश्वर की सभी औलाद हैं। फिर जब शरीर मिलता है तो प्रजापिता ब्रह्मा की एडाप्शन कहते हैं। वह एडाप्शन नहीं। क्या आत्माओं को परमपिता परमात्मा ने एडाप्ट किया है? नहीं, तुमको एडाप्ट किया है। अभी तुम हो ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ। शिवबाबा एडाप्ट नहीं करते हैं। सभी आत्मायें अनादि अविनाशी हैं। सभी आत्माओं को अपना-अपना शरीर, अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है, जो बजाना ही है। यह पार्ट ही अनादि अविनाशी परम्परा से चला आता है। उनका आदि अन्त नहीं कहा जाता है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अपनी साहूकारी, पोज़ीशन आदि का अहंकार मिटा देना है। अविनाशी ज्ञान धन से स्वयं को मालामाल बनाना है। सर्विस में कभी भी थकना नहीं है।
2) वातावरण को अच्छा रखने के लिए मुख से सदैव रत्न निकालने हैं। दु:ख देने वाले बोल न निकलें यह ध्यान रखना है। हर्षितमुख रहना है।

वरदान: सदा श्रेष्ठ समय प्रमाण श्रेष्ठ कर्म करते वाह-वाह के गीत गाने वाले भाग्यवान आत्मा भव
इस श्रेष्ठ समय पर सदा श्रेष्ठ कर्म करते "वाह-वाह" के गीत मन से गाते रहो। "वाह मेरा श्रेष्ठ कर्म या वाह श्रेष्ठ कर्म सिखलाने वाले बाबा"। तो सदा वाह-वाह! के गीत गाओ। कभी गलती से भी दु:ख का नजारा देखते भी हाय शब्द नहीं निकलना चाहिए। वाह ड्रामा वाह! और वाह बाबा वाह! जो स्वप्न में भी नहीं था वह भाग्य घर बैठे मिल गया। इसी भाग्य के नशे में रहो।

स्लोगन: मन-बुद्धि को शक्तिशाली बना दो तो कोई भी हलचल में अचल अडोल रहेंगे।

Sunday, 29 December 2019

Hindi Murli 30/12/2019

30-12-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - सारा मदार याद पर है, याद से ही तुम मीठे बन जायेंगे, इस याद में ही माया की युद्ध चलती है"

प्रश्न: इस ड्रामा में कौन सा राज़ बहुत विचार करने योग्य है? जिसे तुम बच्चे ही जानते हो?
उत्तर: तुम जानते हो कि ड्रामा में एक पार्ट दो बार बज न सके। सारी दुनिया में जो भी पार्ट बजता है वह एक दो से नया। तुम विचार करते हो कि सतयुग से लेकर अब तक कैसे दिन बदल जाते हैं। सारी एक्टिविटी बदल जाती है। आत्मा में 5 हजार वर्ष की एक्टिविटी का रिकॉर्ड भरा हुआ है, जो कभी बदल नहीं सकता। यह छोटी सी बात तुम बच्चों के सिवाए और किसी की बुद्धि में नहीं आ सकती।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों से पूछते हैं-मीठे-मीठे बच्चे, तुम अपना भविष्य का पुरूषोत्तम मुख, पुरूषोत्तम चोला देखते हो? यह पुरूषोत्तम संगमयुग है ना। तुम फील करते हो कि हम फिर नई दुनिया सतयुग में इनकी वंशावली में जायेंगे, जिसको सुखधाम कहा जाता है। वहाँ के लिए ही तुम अभी पुरूषोत्तम बन रहे हो। बैठे-बैठे यह विचार आना चाहिए। स्टूडेन्ट जब पढ़ते हैं तो उनकी बुद्धि में यह जरूर रहता है-कल हम यह बनेंगे। वैसे तुम भी जब यहाँ बैठते हो तो भी जानते हो कि हम विष्णु की डिनायस्टी में जायेंगे। तुम्हारी बुद्धि अब अलौकिक है। और किसी मनुष्य की बुद्धि में यह बातें रमण नहीं करती होंगी। यह कोई कॉमन सतसंग नहीं है। यहाँ बैठे हो, समझते हो सत बाबा जिसको शिव कहते हैं हम उनके संग में बैठे हैं। शिवबाबा ही रचयिता है, वही इस रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हैं। वही यह नॉलेज देते हैं। जैसे कल की बात सुनाते हैं। यहाँ बैठे हो, यह तो याद होगा ना - हम आये हैं रिज्युवनेट होने अर्थात् यह शरीर बदल दैवी शरीर लेने। आत्मा कहती है हमारा यह तमोप्रधान पुराना शरीर है। इसको बदलकर ऐसा शरीर लेना है। कितनी सहज एम ऑब्जेक्ट है। पढ़ाने वाला टीचर जरूर पढ़ने वाले स्टुडेन्ट से होशियार होगा ना। पढ़ाते हैं, अच्छे कर्म भी सिखलाते हैं। अभी तुम समझते हो हमको ऊंच ते ऊंच भगवान पढ़ाते हैं तो जरूर देवी-देवता ही बनायेंगे। यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। और किसको नई दुनिया का ज़रा भी पता नहीं है। यह लक्ष्मी-नारायण नई दुनिया के मालिक थे। देवी-देवतायें भी तो नम्बरवार होंगे ना। सब एक जैसे तो हो भी न सकें क्योंकि राजधानी है ना। यह ख्यालात तुम्हारे चलते रहने चाहिए। हम आत्मा अभी पतित से पावन बनने के लिए पावन बाप को याद करते हैं। आत्मा याद करती है अपने स्वीट बाप को। बाप खुद कहते हैं तुम मुझे याद करेंगे तो पावन सतोप्रधान बन जायेंगे। सारा मदार याद की यात्रा पर है। बाप जरूर पूछेंगे-बच्चे, मुझे कितना समय याद करते हो? याद की यात्रा में ही माया की युद्ध चलती है। तुम युद्ध भी समझते हो। यह यात्रा नहीं परन्तु जैसेकि लड़ाई है, इसमें ही बहुत खबरदार रहना है। नॉलेज में माया के तूफान आदि की बात नहीं। बच्चे कहते भी हैं बाबा हम आपको याद करते हैं, परन्तु माया का एक ही तूफान नीचे गिरा देता है। नम्बरवन तूफान है देह-अभिमान का। फिर है काम, क्रोध, लोभ, मोह का। बच्चे कहते हैं बाबा हम बहुत कोशिश करते हैं याद में रहने की, कोई विघ्न न आये परन्तु फिर भी तूफान आ जाते हैं। आज क्रोध का, कभी लोभ का तूफान आया। बाबा आज हमारी अवस्था बहुत अच्छी रही, कोई भी तूफान सारा दिन नहीं आया। बड़ी खुशी रही। बाप को बड़े प्यार से याद किया। स्नेह के आंसू भी आते रहे। बाप की याद से ही बहुत मीठे बन जायेंगे।
यह भी समझते हैं हम माया से हार खाते-खाते कहाँ तक आकर पहुँचे हैं। यह कोई समझते थोड़ेही हैं। मनुष्य तो लाखों वर्ष कह देते हैं या परम्परा कह देते। तुम कहेंगे हम फिर से अभी मनुष्य से देवता बन रहे हैं। यह नॉलेज बाप ही आकर देते हैं। विचित्र बाप ही विचित्र नॉलेज देते हैं। विचित्र निराकार को कहा जाता है। निराकार कैसे यह नॉलेज देते हैं। बाप खुद समझाते हैं मैं कैसे इस तन में आता हूँ। फिर भी मनुष्य मूँझते हैं। क्या एक इसी तन में आयेगा! परन्तु ड्रामा में यही तन निमित्त बनता है। ज़रा भी चेन्ज हो नहीं सकती। यह बातें तुम ही समझकर और दूसरों को समझाते हो। आत्मा ही पढ़ती है। आत्मा ही सीखती-सिखलाती है। आत्मा मोस्ट वैल्युबुल है। आत्मा अविनाशी है, सिर्फ शरीर खत्म होता है। हम आत्मायें अपने परमपिता परमात्मा से रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त के 84 जन्मों की नॉलेज ले रहे हैं। नॉलेज कौन लेते हैं? हम आत्मा। तुम आत्मा ने ही नॉलेजफुल बाप से मूलवतन, सूक्ष्मवतन को जाना है। मनुष्यों को पता ही नहीं है कि हमें अपने को आत्मा समझना है। मनुष्य तो अपने को शरीर समझ उल्टे लटक पड़े हैं। गायन है आत्मा सत, चित, आनन्द स्वरूप है। परमात्मा की सबसे जास्ती महिमा है। एक बाप की कितनी महिमा है। वही दु:ख हर्ता, सुख कर्ता है। मच्छर आदि की तो इतनी महिमा नहीं करेंगे कि वह दु:ख हर्ता, सुख कर्ता, ज्ञान का सागर है। नहीं, यह है बाप की महिमा। तुम बच्चे भी मास्टर दु:ख हर्ता सुख कर्ता हो। तुम बच्चों को भी यह नॉलेज नहीं थी, जैसे बेबी बुद्धि थे। बच्चे में नॉलेज नहीं होती और कोई अवगुण भी नहीं होता है, इसलिए उसे महात्मा कहा जाता है क्योंकि पवित्र है। जितना छोटा बच्चा उतना नम्बरवन फूल। बिल्कुल ही जैसे कर्मातीत अवस्था है। कर्म-अकर्म-विकर्म को कुछ भी नहीं जानते हैं, इसलिए वह फूल है। सबको कशिश करते हैं। जैसे एक बाप सभी को कशिश करते हैं। बाप आये ही हैं सभी को कशिश कर खुशबूदार फूल बनाने। कई तो कांटे के कांटे ही रह जाते हैं। 5 विकारों के वशीभूत होने वाले को कांटा कहा जाता है। नम्बरवन कांटा है देह-अभिमान का, जिससे और कांटों का जन्म होता है। कांटों का जंगल बहुत दु:ख देता है। किस्म-किस्म के कांटे जंगल में होते हैं ना इसलिए इसको दु:खधाम कहा जाता है। नई दुनिया में कांटे नहीं होते इसलिए उसको सुखधाम कहा जाता है। शिवबाबा फूलों का बगीचा लगाते हैं, रावण कांटों का जंगल लगाता है इसलिए रावण को कांटों की झाड़ियों से जलाते हैं और बाप पर फूल चढ़ाते हैं। इन बातों को बाप जानें और बच्चे जानें और न जाने कोई।
तुम बच्चे जानते हो-ड्रामा में एक पार्ट दो बार बज न सके। बुद्धि में है सारी दुनिया में जो पार्ट बजता है वह एक-दो से नया। तुम विचार करो सतयुग से लेकर अब तक कैसे दिन बदल जाता है। सारी एक्टिविटी ही बदल जाती है। 5 हजार वर्ष की एक्टिविटी का रिकॉर्ड आत्मा में भरा हुआ है। वह कभी बदल नहीं सकता। हर आत्मा में अपना-अपना पार्ट भरा हुआ है। यह छोटी-सी बात भी कोई की बुद्धि में आ न सके। इस ड्रामा के पास्ट, प्रेजन्ट और फ्युचर को तुम जानते हो। यह स्कूल है ना। पवित्र बन बाप को याद करने की पढ़ाई बाप पढ़ाते हैं। यह बातें कभी सोची थी कि बाप आकर ऐसे पतित से पावन बनाने की पढ़ाई पढ़ायेंगे! इस पढ़ाई से ही हम विश्व के मालिक बनेंगे! भक्ति मार्ग के पुस्तक ही अलग हैं, उसको कभी पढ़ाई नहीं कहा जाता है। ज्ञान के बिना सद्गति हो भी कैसे? बाप बिना ज्ञान कहाँ से आये जिससे सद्गति हो। सद्गति में जब तुम होंगे तब भक्ति करेंगे? नहीं, वहाँ है ही अपार सुख, फिर भक्ति किसलिए करें? यह ज्ञान अभी ही तुम्हें मिलता है। सारा ज्ञान आत्मा में रहता है। आत्मा का कोई धर्म नहीं होता। आत्मा जब शरीर धारण करती है फिर कहते हैं फलाना इस-इस धर्म का है। आत्मा का धर्म क्या है? एक तो आत्मा बिन्दी मिसल है और शान्त स्वरूप है, शान्तिधाम में रहती है।
अभी बाप समझाते हैं सभी बच्चों का बाप पर हक है। बहुत बच्चे हैं जो और-और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं। वह फिर निकलकर अपने असली धर्म में आ जायेंगे। जो देवी-देवता धर्म छोड़ दूसरे धर्म में गये हैं वह सभी पत्ते लौट अपनी जगह पर आ जायेंगे। तुम्हें पहले-पहले तो बाप का परिचय देना है। इन बातों में ही सब मूँझे हुए हैं। तुम बच्चे समझते हो अभी हमें कौन पढ़ाते हैं? बेहद का बाप। कृष्ण तो देहधारी है, इनको (ब्रह्मा बाबा को) भी दादा कहेंगे। तुम सब भाई-भाई हो ना। फिर है मर्तबे के ऊपर। भाई का शरीर कैसा है, बहन का शरीर कैसा है। आत्मा तो एक छोटा सितारा है। इतनी सारी नॉलेज एक छोटे-से सितारे में है। सितारा शरीर के बिगर बात भी नहीं कर सकता। सितारे को पार्ट बजाने के लिए इतने ढेर आरगन्स मिले हुए हैं। तुम सितारों की दुनिया ही अलग है। आत्मा यहाँ आकर फिर शरीर धारण करती है। शरीर छोटा-बड़ा होता है। आत्मा ही अपने बाप को याद करती है। वह भी जब तक शरीर में है। घर में आत्मा बाप को याद करेगी? नहीं। वहाँ कुछ भी मालूम नहीं पड़ता-हम कहाँ हैं! आत्मा और परमात्मा दोनों जब शरीर में हैं तब आत्माओं और परमात्मा का मेला कहा जाता है। गायन भी है आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल..... कितना समय अलग रहे? याद आता है-कितना समय अलग रहे? सेकण्ड-सेकण्ड पास होते 5 हज़ार वर्ष बीत गये। फिर वन नम्बर से शुरू करना है, एक्यूरेट हिसाब है। अभी तुमसे कोई पूछे इसने कब जन्म लिया था? तो तुम एक्यूरेट बता सकते हो। श्रीकृष्ण ही पहले नम्बर में जन्म लेता है। शिव का तो कुछ भी मिनट सेकण्ड नहीं निकाल सकते। कृष्ण के लिए तिथि-तारीख, मिनट, सेकण्ड निकाल सकते हो। मनुष्यों की घड़ी में फ़र्क पड़ सकता है। शिवबाबा के अवतरण में तो बिल्कुल फ़र्क नहीं पड़ सकता। पता ही नहीं पड़ता कब आया? ऐसे भी नहीं, साक्षात्कार हुआ तब आया। नहीं, अन्दाज लगा सकते हैं। मिनट-सेकेण्ड का हिसाब नहीं बता सकते। उनका अवतरण भी अलौकिक है, वह आते ही हैं बेहद की रात के समय। बाकी और भी जो अवतरण आदि होते हैं, उनका पता पड़ता है। आत्मा शरीर में प्रवेश करती है। छोटा चोला पहनती है फिर धीरे-धीरे बड़ा होता है। शरीर के साथ आत्मा बाहर आती है। इन सभी बातों को विचार सागर मंथन कर फिर औरों को समझाना होता है। कितने ढेर मनुष्य हैं, एक न मिले दूसरे से। कितना बड़ा माण्डवा है। जैसे बड़ा हाल है, जिसमें बेहद का नाटक चलता है।
तुम बच्चे यहाँ आते हो नर से नारायण बनने के लिए। बाप जो नई सृष्टि रचते हैं उसमें ऊंच पद लेने के लिए। बाकी यह जो पुरानी दुनिया है वह तो विनाश होनी है। बाबा द्वारा नई दुनिया की स्थापना हो रही है। बाबा को फिर पालना भी करनी है। जरूर जब यह शरीर छोड़े तब फिर सतयुग में नया शरीर लेकर पालना करे। उसके पहले इस पुरानी दुनिया का विनाश भी होना है। भंभोर को आग लगेगी। पीछे यह भारत ही रहेगा बाकी तो खलास हो जायेंगे। भारत में भी थोड़े बचेंगे। तुम अब मेहनत कर रहे हो कि विनाश के बाद फिर सजायें न खायें। अगर विकर्म विनाश नहीं होंगे तो सजायें भी खायेंगे और पद भी नहीं मिलेगा। तुमसे जब कोई पूछते हैं तुम किसके पास जाते हो? तो बोलो, शिवबाबा के पास, जो ब्रह्मा के तन में आया हुआ है। यह ब्रह्मा कोई शिव नहीं है। जितना बाप को जानेंगे तो बाप के साथ प्यार भी रहेगा। बाबा कहते हैं बच्चे तुम और कोई को प्यार नहीं करो और संग प्यार तोड़ एक संग जोड़ो। जैसे आशिक माशूक होते हैं ना। यह भी ऐसे हैं। 108 सच्चे आशिक बनते हैं, उसमें भी 8 सच्चे-सच्चे बनते हैं। 8 की भी माला होती है ना। 9 रत्न गाये हुए हैं। 8 दानें, 9 वां बाबा। मुख्य हैं 8 देवतायें, फिर 16108 शहजादे शहजादियों का कुटुम्ब बनता है त्रेता अन्त तक। बाबा तो हथेली पर बहिश्त दिखलाते हैं। तुम बच्चों को नशा है कि हम तो सृष्टि के मालिक बनते हैं। बाबा से ऐसा सौदा करना है। कहते हैं कोई विरला व्यापारी यह सौदा करे। ऐसे कोई व्यापारी थोड़ेही हैं। तो बच्चे ऐसे उमंग में रहो हम जाते हैं बाबा के पास। ऊपर वाला बाबा। दुनिया को मालूम नहीं है, वो कहेंगे कि वह तो अन्त में आता है। अब वही कलियुग का अन्त है। वही गीता, महाभारत का समय है, वही यादव जो मूसल निकाल रहे हैं। वही कौरवों का राज्य और वही तुम पाण्डव खड़े हो।
तुम बच्चे अभी घर बैठे अपनी कमाई कर रहे हो। भगवान घर बैठे आया हुआ है इसलिए बाबा कहते हैं कि अपनी कमाई कर लो। यही हीरे जैसा जन्म अमोलक गाया हुआ है। अब इसको कौड़ी बदले खोना नहीं है। अब तुम इस सारी दुनिया को रामराज्य बनाते हो। तुमको शिव से शक्ति मिल रही है। बाकी आजकल कईयों की अकाले मृत्यु भी हो जाती है। बाबा बुद्धि का ताला खोलता है और माया बुद्धि का ताला बन्द कर देती है। अब तुम माताओं को ही ज्ञान का कलष मिला हुआ है। अबलाओं को बल देने वाला वह है। यही ज्ञान अमृत है। शास्त्रों के ज्ञान को कोई अमृत नहीं कहा जाता है। अच्छा !
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) एक बाप की कशिश में रहकर खुशबूदार फूल बनना है। अपने स्वीट बाप को याद कर देह-अभिमान के कांटे को जला देना है।
2) इस हीरे तुल्य जन्म में अविनाशी कमाई जमा करनी है, कौड़ियों के बदले इसे गंवाना नहीं है। एक बाप से सच्चा प्यार करना है, एक के संग में रहना है।

वरदान: पुराने स्वभाव-संस्कार के बोझ को समाप्त कर डबल लाइट रहने वाले फरिश्ता भव
जब बाप के बन गये तो सारा बोझ बाप को दे दो। पुराने स्वभाव संस्कार का थोड़ा बोझ भी रहा हुआ होगा तो ऊपर से नीचे ले आयेगा। उड़ती कला का अनुभव करने नहीं देगा इसलिए बाप-दादा कहते हैं सब दे दो। यह रावण की प्रापर्टी अपने पास रखेंगे तो दु:ख ही पायेंगे। फरिश्ता अर्थात् जरा भी रावण की प्रापर्टी न हो। सब पुराने खाते भस्म करो तब कहेंगे डबल लाइट फरिश्ता।

स्लोगन: निर्भय और हर्षितमुख हो बेहद के खेल को देखो तो हलचल में नहीं आयेंगे।

Saturday, 28 December 2019

Hindi Murli 29/12/2019

29-12-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 27-03-85 मधुबन

कर्मातीत अवस्था
आज बापदादा चारों ओर के बच्चों को विशेष देखने लिए चक्कर लगाने गये। जैसे भक्ति मार्ग में आप सभी ने बहुत बार परिक्रमा लगाई। तो बापदादा ने भी आज चारों ओर के सच्चे ब्राह्मणों के स्थानों की परिक्रमा लगाई। सभी बच्चों के स्थान भी देखे और स्थिति भी देखी। स्थान भिन्न-भिन्न विधिपूर्वक सजे हुए थे। कोई स्थूल साधनों से आकर्षण करने वाले थे, कोई तपस्या के वायब्रेशन से आकर्षण करने वाले थे। कोई त्याग और श्रेष्ठ भाग्य अर्थात् सादगी और श्रेष्ठता इस वायुमण्डल से आकर्षण करने वाले थे। कोई-कोई साधारण स्वरूप में भी दिखाई दिये। सभी ईश्वरीय याद के स्थान भिन्न-भिन्न रूप के देखे। स्थिति क्या देखी? इसमें भी भिन्न-भिन्न प्रकार के ब्राह्मण बच्चों की स्थिति देखी। समय प्रमाण बच्चों की तैयारी कहाँ तक है, यह देखने के लिए ब्रह्मा बाप गये थे। ब्रह्मा बाप बोले-बच्चे सर्व बंधनों से बंधनमुक्त, योगयुक्त, जीवनमुक्त एवररेडी हैं। सिर्फ समय का इन्तजार है। ऐसे तैयार हैं? इन्तजाम हो गया है सिर्फ समय का इन्तजार है? बापदादा की रूहरिहान चली। शिव बाप बोले चक्कर लगाके देखा तो बंधनमुक्त कहाँ तक बने हैं! योगयुक्त कहाँ तक बने हैं? क्योंकि बंधनमुक्त आत्मा ही जीवनमुक्त का अनुभव कर सकती है। कोई भी हद का सहारा नहीं अर्थात् बंधनों से किनारा है। अगर किसी भी प्रकार का छोटा बड़ा स्थूल वा सूक्ष्म मंसा से वा कर्म से हद का कोई भी सहारा है तो बंधनों से किनारा नहीं हो सकता। तो यह दिखाने के लिए ब्रह्मा बाप को आज विशेष सैर कराया। क्या देखा?

मैजारटी बड़े-बड़े बंधनों से मुक्त हैं। जो स्पष्ट दिखाई देने वाले बंधन हैं वा रस्सियाँ हैं उससे तो किनारा कर लिया है। लेकिन अभी कोई-कोई ऐसे अति सूक्ष्म बंधन वा रस्सियाँ रही हुई हैं जिसको महीन बुद्धि के सिवाए देख वा जान भी नहीं सकते हैं। जैसे आजकल के साइंस वाले सूक्ष्म वस्तुओं को पावरफुल ग्लास द्वारा देख सकते हैं। साधारण रीति से नहीं देख सकते। ऐसे सूक्ष्म परखने की शक्ति द्वारा उन सूक्ष्म बंधनों को देख सकते वा महीन बुद्धि द्वारा जान सकते हैं। अगर ऊपर-ऊपर के रूप से देखे तो न देखने वा जानने के कारण वह अपने को बंधनमुक्त ही समझते रहते हैं। ब्रह्मा बाप ने ऐसे सूक्ष्म सहारे चेक किये।

सबसे ज्यादा सहारा दो प्रकार का देखा, एक अति सूक्ष्म स्वरूप किसी न किसी सेवा के साथी का सूक्ष्म सहारा देखा, इसमें भी अनेक प्रकार देखे। सेवा के सहयोगी होने के कारण, सेवा में वृद्धि करने के निमित्त बने हुए होने के कारण या विशेष कोई विशेषता, विशेष गुण होने के कारण, विशेष कोई संस्कार मिलने के कारण वा समय प्रति समय कोई एकस्ट्रा मदद देने के कारण, ऐसे कारणों से, रूप सेवा का साथी है, सहयोगी है लेकिन विशेष झुकाव होने के कारण सूक्ष्म लगाव का रूप बनता जाता है। इसका परिणाम क्या होता है? यह भूल जाते हैं कि यह बाप की देन है। समझते हैं यह बहुत अच्छा सहयोगी है, अच्छा विशेषता स्वरूप है, गुणवान है। लेकिन समय प्रति समय बाप ने ऐसा अच्छा बनाया है, यह भूल जाता है। संकल्प मात्र भी किसी आत्मा के तरफ बुद्धि का झुकाव है तो वह झुकाव सहारा बन जाता है। तो साकार रूप में सहयोगी होने के कारण समय पर बाप के बदले पहले वह याद आयेगा। दो चार मिनट भी अगर स्थूल सहारा स्मृति में आया तो बाप का सहारा उस समय याद होगा? दूसरी बात अगर दो चार मिनट के लिए भी याद की यात्रा का लिंक टूट गया तो टूटने के बाद जोड़ने की फिर मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि निरन्तर में अन्तर पड़ गया ना! दिल में दिलाराम के बदले और किसी की तरफ किसी भी कारण से दिल का झुकाव होता है, इससे बात करना अच्छा लगता है, इससे बैठना अच्छा लगता है “इसी से ही'', शब्द माना दाल में काला है। “इसी से ही'' का ख्याल आना माना हीनता आई। ऐसे तो सब अच्छे लगते हैं लेकिन इससे ज्यादा अच्छा लगता है! सबसे रूहानी स्नेह रखना, बोलना या सेवा में सहयोग लेना वा देना वह दूसरी बात है। विशेषता देखो, गुण देखो लेकिन इसी का ही यह गुण बहुत अच्छा है, यह “ही'' बीच में नहीं लाओ। यह “ही'' शब्द गड़बड़ करता है, इसको ही लगाव कहा जाता है। फिर चाहे बाहर का रूप सेवा हो, ज्ञान हो, योग हो, लेकिन जब इसी से “ही'' योग करना है, इसका ही योग अच्छा है! यह “ही'' शब्द नहीं आना चाहिए। ये ही सेवा में सहयोगी हो सकता है। ये ही साथी चाहिए...तो समझा लगाव की निशानी क्या है! इसलिए यह “ही'' निकाल दो। सभी अच्छे हैं। विशेषता देखो। सहयोगी बनो भी, बनाओ भी लेकिन पहले थोड़ा होता है फिर बढ़ते-बढ़ते विकराल रूप हो जाता है। फिर खुद ही उससे निकलना चाहते तो निकल नहीं सकते क्योंकि पक्का धागा हो जाता है। पहले बहुत सूक्ष्म होता फिर पक्का हो जाता है तो टूटना मुश्किल हो जाता। सहारा एक बाप है। कोई मनुष्य आत्मा सहारा नहीं है। बाप किसको भी सहयोगी निमित्त बनाता है लेकिन बनाने वाले को नहीं भूलो। बाप ने बनाया है। बाप बीच में आने से जहाँ बाप होगा वहाँ पाप नहीं! बाप बीच से निकल जाता तो पाप होता है। तो एक बात है यह सहारे की।

दूसरी बात-कोई न कोई साकार साधनों को सहारा बनाया है। साधन हैं तो सेवा है। साधन में थोड़ा नीचे ऊपर हुआ तो सेवा भी नीचे ऊपर हुई। साधनों को कार्य में लगाना वह अलग बात है। लेकिन साधनों के वश हो सेवा करना यह है साधनों को सहारा बनाना। साधन सेवा की वृद्धि के लिए हैं इसलिए उन साधनों को उसी प्रमाण कार्य में लाओ, साधनों को आधार नहीं बनाओ। आधार एक बाप है, साधन तो विनाशी हैं। विनाशी साधनों को आधार बनाना अर्थात् जैसे साधन विनाशी हैं वैसे स्थिति भी कभी बहुत ऊंची कभी बीच की, कभी नीचे की बदलती रहेगी। अविनाशी एकरस स्थिति नहीं रहेगी। तो दूसरी बात-विनाशी साधनों को सहारा, आधार नहीं समझो। यह निमित्त मात्र है। सेवा के प्रति है। सेवा अर्थ कार्य में लगाया और न्यारे। साधनों के आकर्षण में मन आकर्षित नहीं होना चाहिए। तो यह दो प्रकार के सहारे सूक्ष्म रूप में आधार बना हुआ देखा। जब कर्मातीत अवस्था होनी है तो हर व्यक्ति, वस्तु, कर्म के बन्धन से अतीत होना, न्यारा होना इसको ही कर्मातीत अवस्था कहते हैं। कर्मातीत माना कर्म से न्यारा हो जाना नहीं। कर्म के बन्धनों से न्यारा। न्यारा बनकर कर्म करना अर्थात् कर्म से न्यारे। कर्मातीत अवस्था अर्थात् बंधनमुक्त, योग-युक्त, जीवनमुक्त अवस्था!

और विशेष बात यह देखी कि समय प्रति समय परखने की शक्ति में कई बच्चे कमजोर हो जाते हैं। परख नहीं सकते हैं इसलिए धोखा खा लेते हैं। परखने की शक्ति कमजोर होने का कारण है बुद्धि की लगन एकाग्र नहीं है। जहाँ एकाग्रता है वहाँ परखने की शक्ति स्वत: ही बढ़ती है। एकाग्रता अर्थात् एक बाप के साथ सदा लगन में मगन रहना। एकाग्रता की निशानी सदा उड़ती कला के अनुभूति की एकरस स्थिति होगी। एक-रस का अर्थ यह नहीं कि वही रफ्तार हो तो एकरस है। एकरस अर्थात् सदा उड़ती कला की महसूसता रहे, इसमें एकरस। जो कल था उससे आज परसेन्टेज में वृद्धि का अनुभव करें। इसको कहा जाता है उड़ती कला। तो स्व उन्नति के लिए, सेवा की उन्नति के लिए परखने की शक्ति बहुत आवश्यक है। परखने की शक्ति कमजोर होने के कारण अपनी कमजोरी को कमजोरी नहीं समझते हैं। और ही अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए या सिद्ध करेंगे या जिद्द करेंगे। यह दो बातें छिपाने का विशेष साधन है। अन्दर में कभी महसूस भी होगा लेकिन फिर भी पूरी परखने की शक्ति न होने के कारण अपने को सदा राइट और होशियार सिद्ध करेंगे। समझा! कर्मातीत तो बनना है ना। नम्बर तो लेना है ना इसलिए चेक करो। अच्छी तरह से योगयुक्त बन परखने की शक्ति धारण करो। एकाग्र बुद्धि बन करके फिर चेक करो। तो जो भी सूक्ष्म कमी होगी वह स्पष्ट रूप में दिखाई देगी। ऐसा न हो जो आप समझो मैं बहुत राइट, बहुत अच्छी चल रही हूँ। कर्मातीत मैं ही बनूँगी और जब समय आवे तो यह सूक्ष्म बंधन उड़ने न देवें। अपनी तरफ खींच लेवें। फिर समय पर क्या करेंगे? बंधा हुआ व्यक्ति अगर उड़ना चाहे तो उड़ेगा वा नीचे आ जोयगा! तो यह सूक्ष्म बंधन समय पर नम्बर लेने में वा साथ चलने में वा एवररेडी बनने में बंधन न बन जाएं इसलिए ब्रह्मा बाप चेक कर रहे थे। जिसको यह सहारा समझते हैं वह सहारा नहीं है लेकिन वह रॉयल धागा है। जैसे सोनी हिरण का मिसाल है ना। सीता को कहाँ ले गया! तो सोना हिरण यह बंधन है, इसको सोना समझना माना अपने श्रेष्ठ भाग्य को खोना। सोना नहीं है खोना है। राम को खोया, अशोक वाटिका को खोया।

ब्रह्मा बाप का बच्चों से विशेष प्यार है इसलिए ब्रह्मा बाप सदा बच्चों को अपने समान एवररेडी बंधनमुक्त देखने चाहते हैं। बंधनमुक्त का ही नजारा देखा ना! कितने में एवररेडी हुआ! किसी के बंधन में बंधा! कोई याद आया कि फलानी कहाँ है! फलानी सेवा की साथी है। याद आया? तो एवररेडी का पार्ट कर्मातीत स्टेज का पार्ट देखा ना! जितना ही बच्चों से अति प्यार रहा उतना ही प्यारा और न्यारा देखा ना! बुलावा आया और गया। नहीं तो सबसे ज्यादा बच्चों से प्यार ब्रह्मा का रहा ना! जितना प्यारा उतना न्यारा। किनारा करना देख लिया ना। कोई भी चीज़ अथवा भोजन जब तैयार हो जाता है तो किनारा छोड़ देता है ना! तो सम्पूर्ण होना अर्थात् किनारा छोड़ना। किनारा छोड़ना माना किनारे हो गये। सहारा एक ही अविनाशी सहारा है। न व्यक्ति को, न वैभव वा वस्तु को सहारा बनाओ। इसको ही कहते हैं-कर्मातीत। छिपाओ कभी नहीं। छिपाने से और वृद्धि को पाता जाता है। बात बड़ी नहीं होती। लेकिन जितना छिपाते हैं उतना बात को बड़ा करते हैं। जितना अपने को राइट सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं उतना बात को बढ़ाते हैं। जितना जिद्द करते हैं उतना बात बढ़ाते हैं इसलिए बात को बड़ा न कर छोटे रूप से ही समाप्त करो। तो सहज होगा और खुशी होगी। यह बात हुई, यह भी पार किया, इसमें भी विजयी बने तो यह खुशी होगी। समझा! विदेशी कर्मातीत अवस्था को पाने वाले उमंग उत्साह वाले हैं ना! तो डबल विदशी बच्चों को ब्रह्मा बाप विशेष सूक्ष्म पालना दे रहे हैं। यह प्यार की पालना है शिक्षा सावधानी नहीं। समझा! क्योंकि ब्रह्मा बाप ने आप बच्चों को विशेष आह्वान से पैदा किया। ब्रह्मा के संकल्प से आप पैदा हुए हो। कहते हैं ना - ब्रह्मा ने संकल्प से सृष्टि रची। ब्रह्मा के संकल्प से यह ब्राह्मणों की इतनी सृष्टि रच गई ना। तो ब्रह्मा के संकल्प से आह्वान से रची हुई विशेष आत्मायें हो। लाडले हो गये ना। ब्रह्मा बाप समझते हैं कि यह फास्ट पुरूषार्थ कर फर्स्ट आने के उमंग-उत्साह वाले हैं। विदेशी बच्चों की विशेषताओं से विशेष श्रृंगार करने की बातें चल रही हैं। प्रश्न भी करेंगे, फिर समझेंगे भी जल्दी, विशेष समझदार हो इसलिए बाप अपने समान सब बंधनों से न्यारे और प्यारे बनने के लिए इशारा दे रहे हैं। ऐसा नहीं कि जो सामने हैं उन्हों को बता रहे हैं, सभी बच्चों को बता रहे हैं। बाप के आगे सदा सभी ब्राह्मण बच्चे चाहे देश के चाहे विदेश के सब हैं। अच्छा-आज रूह-रूहाण कर रहे हैं। सुनाया ना-अगले वर्ष से इस वर्ष की रिजल्ट बहुत अच्छी है। इससे सिद्ध है वृद्धि को पाने वाले हैं। उड़ती कला में जाने वाली आत्मायें हो। जिसको योग्य देखा जाता है उनको सम्पूर्ण योगी बनाने का इशारा दिया जाता है। अच्छा!

सदा कर्मबंधन मुक्त, योगयुक्त आत्माओं को सदा एक बाप को सहारा बनाने वाले बच्चों को सदा सूक्ष्म कमजोरियों से भी किनारा करने वाले बच्चों को, सदा एकाग्रता द्वारा परखने के शक्तिशाली बच्चों को, सदा व्यक्ति वा वस्तु के विनाशी सहारे से किनारे करने वाले बच्चों को ऐसे बाप समान जीवनमुक्त कर्मातीत स्थिति में स्थित रहने वाले विशेष बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते!

निर्मलशान्ता दादी से:- सदा बाप के साथ रहने वाले तो हैं ही। जो आदि से बाप के संग-संग चल रहे हैं, उन्हों का सदा साथ का अनुभव कभी भी कम हो नहीं सकता। बचपन का वायदा है। तो सदा साथ हैं और सदा साथ चलेंगे। तो सदा साथ का वायदा कहो या वरदान कहो, मिला हुआ है। फिर भी जैसे बाप प्रीति की रीति निभाने अव्यक्त से व्यक्त रूप में आते हैं वैसे बच्चे भी प्रीत की रीति निभाने के लिए पहुंच जाते हैं। ऐसे है ना! संकल्प में तो क्या लेकिन स्वप्न में भी, जिसको सबकानशियस कहते हैं... उस स्थिति में भी बाप का साथ कभी छूट नहीं सकता। इतना पक्का सम्बन्ध जुटा हुआ है। कितने जन्मों का सम्बन्ध है। पूरे कल्प का है। सम्बन्ध इस जन्म के हिसाब से पूरा कल्प ही रहेगा। यह तो अन्तिम जन्म में कोई-कोई बच्चे सेवा के लिए कहाँ-कहाँ बिखर गये हैं। जैसे यह लोग विदेश में पहुंच गये, आप लोग सिन्ध में पहुंच गये। कोई कहाँ पहुंचे, कोई कहाँ पहुंचे। अगर यह विदेश में नहीं पहुंचते तो इतने सेन्टर कैसे खुलते। अच्छा सदा साथ रहने वाली, साथ का वायदा निभाने वाली परदादी हो! बापदादा बच्चों की सेवा का उमंग-उत्साह देख खुश होते हैं। वरदानी आत्मायें बनी हो। अभी से देखो भीड़ लगनी शुरू हो गई है। जब और वृद्धि होगी तो कितनी भीड़ होगी। यह वरदानी रूप की विशेषता की नींव पड़ रही है। जब भीड़ हो जाये फिर क्या करेंगे। वरदान देंगे, दृष्टि देंगे। यहाँ से ही चैतन्य मूर्तियां प्रसिद्ध होंगी। जैसे शुरू में आप लोगों को सब देवियां-देवियां कहते थे.. अन्त में भी पहचान कर देवियां-देवियां करेंगे। ‘जय देवी, जय देवी' यहाँ से ही शुरू हो जायेगा। अच्छा!

वरदान: ईश्वरीय विधान को समझ विधि से सिद्धि प्राप्त करने वाले फर्स्ट डिवीजन के अधिकारी भव
एक कदम की हिम्मत तो पदम कदमों की मदद - ड्रामा में इस विधान की विधि नूंधी हुई है। अगर यह विधि, विधान में नहीं होती तो सभी विश्व के पहले राजा बन जाते। नम्बरवार बनने का विधान इस विधि के कारण ही बनता है। तो जितना चाहे हिम्मत रखो और मदद लो। चाहे सरेन्डर हो, चाहे प्रवृत्ति वाले हो - अधिकार समान है लेकिन विधि से सिद्धि है। इस ईश्वरीय विधान को समझ अलबेलेपन की लीला को समाप्त करो तो फर्स्ट डिवीजन का अधिकार मिल जायेगा।

स्लोगन: संकल्प के खजाने के प्रति एकानामी के अवतार बनो।

Friday, 27 December 2019

Hindi Murli 28/12/2019

28-12-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - यह पढ़ाई जो बाप पढ़ाते हैं, इसमें अथाह कमाई है, इसलिए पढ़ाई अच्छी रीति पढ़ते रहो, लिंक कभी न टूटे''

प्रश्न: जो विनाशकाले विपरीत बुद्धि हैं, उन्हें तुम्हारी किस बात पर हँसी आती है?
उत्तर: तुम जब कहते हो अभी विनाश काल नज़दीक है, तो उन्हें हँसी आती है। तुम जानते हो बाप यहाँ बैठे तो नहीं रहेंगे, बाप की ड्युटी है पावन बनाना। जब पावन बन जायेंगे तो यह पुरानी दुनिया विनाश होगी, नई आयेगी। यह लड़ाई है ही विनाश के लिए। तुम देवता बनते हो तो इस कलियुगी छी-छी सृष्टि पर आ नहीं सकते।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। बच्चे समझते हैं हम बहुत बेसमझ बन गये थे। माया रावण ने बेसमझ बना दिया था। यह भी बच्चे समझते हैं कि बाप को जरूर आना ही है, जबकि नई सृष्टि स्थापन होनी है। त्रिमूर्ति का चित्र भी है - ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना, शंकर द्वारा विनाश क्योंकि करनकरावनहार तो बाप है ना। एक ही है जो करता है और कराता है। पहले किसका नाम आयेगा? जो करता है फिर जिस द्वारा कराते हैं। करनकरावनहार कहा जाता है ना। ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की स्थापना कराते हैं। यह भी बच्चे जानते हैं हमारी जो नई दुनिया है, जो हम स्थापन कर रहे हैं, इसका नाम ही है देवी-देवताओं की दुनिया। सतयुग में ही देवी-देवता होते हैं। किसी और को देवी-देवता नहीं कहा जाता। वहाँ मनुष्य होते नहीं। है ही एक देवी-देवता धर्म, दूसरा कोई धर्म ही नहीं। अभी तुम बच्चे स्मृति में आये हो कि बरोबर हम देवी-देवता थे, निशानियाँ भी हैं। इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन आदि सबकी अपनी-अपनी निशानी है। हमारा जब राज्य था तो और कोई नहीं था। अभी फिर और सभी धर्म हैं, हमारा देवता धर्म है नहीं। गीता में अक्षर बड़े अच्छे-अच्छे हैं परन्तु कोई समझ नहीं सकते। बाप कहते हैं विनाश काले विप्रीत बुद्धि और विनाश काले प्रीत बुद्धि। विनाश तो इस समय ही होना है। बाप आते भी हैं संगमयुग पर, जबकि चेंज होती है। बाप तुम बच्चों को बदले में सब कुछ नया देते हैं। वह सोनार भी है, धोबी भी है, बड़ा व्यापारी भी है। बिरला ही कोई बाप से व्यापार करे। इस व्यापार में तो अथाह फायदा है। पढ़ाई में फायदा बहुत होता है। महिमा भी की जाती है कि पढ़ाई कमाई है, वह भी जन्म-जन्मान्तर के लिए कमाई है। तो ऐसी पढ़ाई अच्छी रीति पढ़नी चाहिए ना और पढ़ाता भी बहुत सहज हूँ। सिर्फ एक हफ्ता समझकर फिर भल कहाँ भी चले जाओ, तुम्हारे पास पढ़ाई आती रहेगी अर्थात् मुरली मिलती रहेगी तो फिर कभी लिंक नहीं टूटेगी। यह है आत्माओं की परमात्मा के साथ लिंक। गीता में भी यह अक्षर हैं विनाश काले विप्रीत बुद्धि विनशन्ती, प्रीत बुद्धि विजयन्ती। तुम जानते हो इस समय मनुष्य एक-दो को काटते-मारते रहते हैं। इन जैसा क्रोध वा विकार और कोई में होता नहीं। यह भी गायन है कि द्रोपदी ने पुकारा। बाप ने समझाया है तुम सब द्रोपदियाँ हो। भगवानुवाच, बाप कहते हैं-बच्चे, अब विकार में नहीं जाओ। मैं तुमको स्वर्ग में ले चलता हूँ, तुम सिर्फ मुझ बाप को याद करो। अब विनाशकाल है ना, किसकी भी सुनते नहीं, लड़ते ही रहते हैं। कितना उनको कहते हैं शान्त रहो, परन्तु शान्त रहते नहीं। अपने बच्चों आदि से बिछुड़कर लड़ाई के मैदान में जाते हैं। कितने मनुष्य मरते ही रहते हैं। मनुष्य की कोई वैल्यु नहीं। अगर वैल्यु है, महिमा है तो इन देवी-देवताओं की। अभी तुम यह बनने का पुरूषार्थ कर रहे हो। तुम्हारी महिमा वास्तव में इन देवताओं से भी जास्ती है। तुमको अभी बाप पढ़ा रहे हैं। कितनी ऊंच पढ़ाई है। पढ़ने वाले बहुत जन्मों के अन्त में बिल्कुल ही तमोप्रधान हैं। मैं तो सदैव सतोप्रधान ही हूँ।

बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों का ओबीडियन्ट सर्वेन्ट बनकर आया हूँ। विचार करो हम कितने छी-छी बन गये हैं। बाप ही हमको वाह-वाह बनाते हैं। भगवान बैठ मनुष्यों को पढ़ाकर कितना ऊंच बनाते हैं। बाप खुद कहते हैं मैं बहुत जन्मों के अन्त में तुम सबको तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाने आया हूँ। अभी तुमको पढ़ा रहा हूँ। बाप कहते हैं मैंने तुमको स्वर्गवासी बनाया फिर तुम नर्कवासी कैसे बने, किसने बनाया? गायन भी है विनाश काले विप्रीत बुद्धि विनशन्ती। प्रीत बुद्धि विजयन्ती। फिर जितना-जितना प्रीत बुद्धि रहेंगे अर्थात् बहुत याद करेंगे, उतना तुम्हारा ही फायदा है। लड़ाई का मैदान है ना। कोई भी यह नहीं जानते हैं कि गीता में कौन-सी युद्ध बताई है। उन्होंने तो फिर कौरवों और पाण्डवों की युद्ध दिखाई है। कौरव सम्प्रदाय, पाण्डव सम्प्रदाय भी हैं परन्तु युद्ध तो कोई है नहीं। पाण्डव उनको कहा जाता है जो बाप को जानते हैं। बाप से प्रीत बुद्धि हैं। कौरव उनको कहा जाता जो बाप से विप्रीत बुद्धि हैं। अक्षर तो बहुत अच्छे-अच्छे समझने लायक हैं।

अभी है संगमयुग। तुम बच्चे जानते हो नई दुनिया की स्थापना हो रही है। बुद्धि से काम लेना है। अभी दुनिया कितनी बड़ी है। सतयुग में कितने थोड़े मनुष्य होंगे। छोटा झाड़ होगा ना। वह झाड़ फिर बड़ा होता है। मनुष्य सृष्टि रूपी यह उल्टा झाड़ कैसे है, यह भी कोई समझते नहीं हैं। इनको कल्प वृक्ष कहा जाता है। वृक्ष का नॉलेज भी चाहिए ना? और वृक्षों का नॉलेज तो बहुत-बहुत इज़ी है, झट बता देंगे। इस वृक्ष का नॉलेज भी ऐसा इज़ी है परन्तु यह है ह्युमन वृक्ष। मनुष्यों को अपने वृक्ष का पता ही नहीं पड़ता है। कहते भी हैं गॉड इज़ क्रियेटर, तो जरूर चैतन्य है ना। बाप सत है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। उनमें कौन-सा ज्ञान है, यह भी कोई नहीं समझते हैं। बाप ही बीज रूप, चैतन्य है। उनसे ही सारी रचना होती है। तो बाप बैठ समझाते हैं, मनुष्यों को अपने झाड़ का पता नहीं है, और झाड़ों को तो अच्छी रीति जानते हैं। झाड़ का बीज अगर चैतन्य होता तो बतलाता ना परन्तु वह तो है जड़। तो अब तुम बच्चे ही रचता और रचना के राज़ को जानते हो। यह सत है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। चैतन्य में तो बातचीत कर सकते हैं ना। मनुष्य का तन सबसे ऊंच अमूल्य गाया गया है। इनका मूल्य कथन नहीं कर सकते। बाप आकर आत्माओं को समझाते हैं।

तुम रूप भी हो, बसन्त भी हो। बाप है ज्ञान का सागर। उनसे तुमको रत्न मिलते हैं। यह ज्ञान रत्न हैं, जिन रत्नों से वह रत्न भी तुमको ढेर मिल जाते हैं। लक्ष्मी-नारायण के पास देखो कितने रत्न हैं। हीरे-जवाहरों के महलों में रहते हैं। नाम ही है स्वर्ग, जिसके तुम मालिक बनने वाले हो। कोई गरीब को अचानक बड़ी लॉटरी मिलती है तो पागल हो जाते हैं ना। बाप भी कहते हैं तुमको विश्व की बादशाही मिलती है तो माया कितना आपोजीशन करती है। तुमको आगे चल पता पड़ेगा कि माया कितने अच्छे-अच्छे बच्चों को भी हप कर लेती है। एकदम खा लेती है। तुमने सर्प को देखा है-मेढक को कैसे पकड़ता है, जैसे गज को ग्राह हप करते हैं। सर्प मेढक को एकदम सारे का सारा हप कर लेता है। माया भी ऐसी है, बच्चों को जीते जी पकड़कर एकदम खत्म कर देती है जो फिर कभी बाप का नाम भी नहीं लेते हैं। योगबल की ताकत तुम्हारे में बहुत कम है। सारा मदार योगबल पर है। जैसे सर्प मेढक को हप करता है, तुम बच्चे भी सारी बादशाही को हप करते हो। सारे विश्व की बादशाही तुम सेकण्ड में ले लेंगे। बाप कितना सहज युक्ति बताते हैं। कोई हथियार आदि नहीं। बाप ज्ञान-योग के अस्त्र-शस्त्र देते हैं। उन्होंने फिर स्थूल हथियार आदि दे दिये हैं।

तुम बच्चे इस समय कहते हो-हम क्या से क्या बन गये थे! जो चाहे सो कहो, हम ऐसे थे जरूर। भल थे तो मनुष्य ही परन्तु गुण और अवगुण तो होते हैं ना। देवताओं में दैवीगुण हैं इसलिए उन्हों की महिमा गाते हैं-आप सर्वगुण सम्पन्न..... हम निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। इस समय सारी दुनिया ही निर्गुण है अर्थात् एक भी देवताई गुण नहीं है। बाप जो गुण सिखलाने वाला है, उनको ही नहीं जानते इसलिए कहा जाता विनाश काले विप्रीत बुद्धि। अब विनाश तो होना ही है संगमयुग पर। जबकि पुरानी दुनिया विनाश होती है और नई दुनिया स्थापन होती है। इनको कहा जाता है विनाश काल। यह है अन्तिम विनाश फिर आधाकल्प कोई लड़ाई आदि होती ही नहीं। मनुष्यों को कुछ भी पता नहीं है। विनाश काले विप्रीत बुद्धि हैं तो जरूर पुरानी दुनिया का विनाश होगा ना। इस पुरानी दुनिया में कितनी आपदायें हैं। मरते ही रहते हैं। बाप इस समय की हालत बतलाते हैं। फ़र्क तो बहुत है ना। आज भारत का यह हाल है, कल भारत क्या होगा? आज यह है, कल तुम कहाँ होंगे? तुम जानते हो पहले नई दुनिया कितनी छोटी थी। वहाँ तो महलों में कितने हीरे-जवाहर आदि होते हैं। भक्ति मार्ग में भी तुम्हारा मन्दिर कोई कम थोड़ेही होता है। सिर्फ कोई एक सोमनाथ का मन्दिर थोड़ेही होगा। एक कोई बनायेगा तो उनको देख और भी बनायेंगे। एक सोमनाथ मन्दिर से ही कितना लूटा है। फिर बैठ अपना यादगार बनाया है। तो दीवारों में पत्थर आदि लगाते हैं। इन पत्थरों की क्या वैल्यु होगी? इतने छोटे-से हीरे का भी कितना दाम है। बाबा जौहरी था, एक रत्ती का हीरा होता था, 90 रूपया रत्ती। अभी तो उसकी कीमत हज़ारों रूपया है। मिलते भी नहीं। बहुत वैल्यु बढ़ गई है। इस समय विलायत आदि तरफ धन बहुत है, परन्तु सतयुग के आगे यह कुछ भी नहीं है।

अब बाप कहते हैं विनाश काले विप्रीत बुद्धि हैं। तुम कहते हो विनाश समीप है तो मनुष्य हँसते हैं। बाप कहते हैं मैं कितना समय बैठा रहूँगा, मुझे कोई यहाँ मजा आता है क्या? मैं तो न सुखी, न दु:खी होता हूँ। मेरे ऊपर ड्यूटी है पावन बनाने की। तुम यह थे, अब यह बन गये हो, फिर तुमको ऐसा ऊंच बनाता हूँ। तुम जानते हो हम फिर वह बनने वाले हैं। अब तुमको यह समझ आई है, हम इस दैवी घराने के भाती थे। राजाई थी। फिर ऐसे अपनी राजाई गँवाई। फिर और-और आने लगे। अब यह चक्र पूरा होता है। अभी तुम समझते हो लाखों वर्ष की तो बात ही नहीं है। यह लड़ाई है ही विनाश की, उस तरफ तो बहुत आराम से मरेंगे। कोई तकलीफ नहीं होगी। हॉस्पिटल्स आदि ही नहीं होंगे। कौन बैठ सेवा करेंगे और रोयेंगे। वहाँ तो यह रस्म ही नहीं। उन्हों की मौत सहज होती है। यहाँ तो दु:खी होकर मरते हैं क्योंकि तुमने सुख बहुत उठाया है तो दु:ख भी तुमको देखना है। खून की नदी यहाँ ही बहेगी। वह समझते हैं यह लड़ाई फिर शान्त हो जायेगी परन्तु शान्त तो होनी नहीं है। मिरूआ मौत मलूका शिकार। तुम देवता बनते हो, फिर कलियुगी छी-छी सृष्टि पर तो तुम आ नहीं सकते। गीता में भी है भगवानुवाच, विनाश भी देखो, स्थापना देखो। साक्षात्कार हुआ ना! यह साक्षात्कार सब अन्त में होंगे - फलाने-फलाने यह बनते हैं फिर उस समय रोयेंगे, बहुत पछतायेंगे, सजा खायेंगे, नसीब कूटेंगे। लेकिन कर क्या सकेंगे? यह तो 21 जन्मों की लॉटरी है। स्मृति तो आती है ना। साक्षात्कार बिगर किसको सज़ा नहीं मिल सकती है। ट्रिब्युनल बैठती है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) स्वयं में ज्ञान रत्न धारण कर रूप-बसन्त बनना है। ज्ञान रत्नों से विश्व के बादशाही की लॉटरी लेनी है।
2) इस विनाश काल में बाप से प्रीत रख एक की ही याद में रहना है। ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जो अन्त समय में पछताना पड़े या नसीब कूटना पड़े।

वरदान: अलबेलेपन वा अटेन्शन के अभिमान को छोड़ बाप की मदद के पात्र बनने वाले सहज पुरुषार्थी भव
कई बच्चे हिम्मत रखने के बजाए अलबेलेपन के कारण अभिमान में आ जाते हैं कि हम तो सदा पात्र हैं ही। बाप हमें मदद नहीं करेंगे तो किसको करेंगे! इस अभिमान के कारण हिम्मत की विधि को भूल जाते हैं। कईयों में फिर स्वयं पर अटेन्शन देने का भी अभिमान रहता जो मदद से वंचित कर देता है। समझते हैं हमने तो बहुत योग लगा लिया, ज्ञानी-योगी तू आत्मा बन गये, सेवा की राजधानी बन गई..इस प्रकार के अभिमान को छोड़ हिम्मत के आधार पर मदद के पात्र बनो तो सहज पुरुषार्थी बन जायेंगे।

स्लोगन: जो वेस्ट और निगेटिव संकल्प चलते हैं उन्हें परिवर्तन कर विश्व कल्याण के कार्य में लगाओ।

Thursday, 26 December 2019

Hindi Murli 27/12/2019

27-12-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम अभी पुरूषोत्तम संगमयुग पर हो, तुम्हें यहाँ रहते नई दुनिया को याद करना है और आत्मा को पावन बनाना है''

प्रश्न: बाप ने तुम्हें ऐसी कौन-सी समझ दी है जिससे बुद्धि का ताला खुल गया?
उत्तर: बाप ने इस बेहद अनादि ड्रामा की ऐसी समझ दी है, जिससे बुद्धि पर जो गॉडरेज का ताला लगा था वह खुल गया। पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बन गये। बाप ने समझ दी है कि इस ड्रामा में हर एक एक्टर का अपना-अपना अनादि पार्ट है, जिसने कल्प पहले जितना पढ़ा है, वह अभी भी पढ़ेंगे। पुरूषार्थ कर अपना वर्सा लेंगे।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप बैठ सिखलाते हैं। जब से बाप बना है तब से ही टीचर भी है, तब से ही फिर सतगुरू के रूप में शिक्षा दे रहे हैं। यह तो बच्चे समझते ही हैं जबकि वह बाप, टीचर, गुरू है तो छोटा बच्चा तो नहीं है ना। ऊंच ते ऊंच, बड़े ते बड़ा है। बाप जानते हैं यह सब मेरे बच्चे हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार पुकारा भी है कि आकरके हमको पावन दुनिया में ले चलो। परन्तु समझते कुछ नहीं हैं। अभी तुम समझते हो पावन दुनिया सतयुग को, पतित दुनिया कलियुग को कहा जाता है। कहते भी हैं आकरके हमको रावण की जेल से लिबरेट कर दु:खों से छुड़ाकर अपने शान्तिधाम-सुखधाम में ले चलो। नाम दोनों अच्छे हैं। मुक्ति-जीवनमुक्ति वा शान्तिधाम-सुखधाम। सिवाए तुम बच्चों के और कोई की बुद्धि में नहीं है कि शान्तिधाम कहाँ, सुखधाम कहाँ होता है? बिल्कुल ही बेसमझ हैं। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही समझदार बनने की है। बेसमझों के लिए एम ऑब्जेक्ट होती है कि ऐसा समझदार बनना है। सभी को सिखलाना है-यह है एम आब्जेक्ट, मनुष्य से देवता बनना। यह है ही मनुष्यों की सृष्टि, वह है देवताओं की सृष्टि। सतयुग में है देवताओं की सृष्टि, तो जरूर मनुष्यों की सृष्टि कलियुग में होगी। अब मनुष्य से देवता बनना है तो जरूर पुरूषोत्तम संगमयुग भी होगा। वह हैं देवतायें, यह हैं मनुष्य। देवतायें हैं समझदार। बाप ने ही ऐसा समझदार बनाया है। बाप जो विश्व का मालिक है, भल मालिक बनता नहीं है परन्तु गाया तो जाता है ना। बेहद का बाप, बेहद का सुख देने वाला है। बेहद का सुख होता ही है नई दुनिया में और बेहद का दु:ख होता है पुरानी दुनिया में। देवताओं के चित्र भी तुम्हारे सामने हैं। उन्हों का गायन भी है। आजकल तो 5 भूतों को भी पूजते रहते हैं।

अभी बाप तुमको समझाते हैं तुम हो पुरूषोत्तम संगमयुग पर। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हैं-हमारी एक टांग स्वर्ग में, एक टांग नर्क में है। रहते तो यहाँ हैं परन्तु बुद्धि नई दुनिया में है और जो नई दुनिया में ले जाते हैं उनको याद करना है। बाप की याद से ही तुम पवित्र बनते हो। यह शिवबाबा बैठ समझाते हैं। शिवजयन्ती मनाते तो जरूर हैं, परन्तु शिवबाबा कब आया, क्या आकर किया, यह कुछ भी पता नहीं है। शिवरात्रि मनाते हैं और कृष्ण की जयन्ती मनाते हैं, वही अक्षर जो कृष्ण के लिए कहते वह शिवबाबा के लिए तो नहीं कहेंगे इसलिए उनकी फिर शिवरात्रि कहते हैं। अर्थ कुछ नहीं समझते। तुम बच्चों को तो अर्थ समझाया जाता है। अथाह दु:ख हैं कलियुग के अन्त में, फिर अथाह सुख होते हैं सतयुग में। यह तुम बच्चों को अभी ज्ञान मिला है। तुम आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। जिन्होंने कल्प पहले पढ़ा है वही अब पढ़ेंगे, जिसने जो पुरूषार्थ किया होगा वही करने लगेंगे और ऐसा ही पद भी पायेंगे। तुम्हारी बुद्धि में पूरा चक्र है। तुम ही ऊंच ते ऊंच पद पाते हो फिर तुम उतरते भी ऐसे हो। बाप ने समझाया है यह जो भी मनुष्यों की आत्मायें हैं, माला है ना, सब नम्बरवार आती हैं। हर एक एक्टर को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है-किस समय किसको क्या पार्ट बजाना है। यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है जो बाप बैठ समझाते हैं। अब जो तुमको बाप समझाते हैं वह अपने भाइयों को समझाना है। तुम्हारी बुद्धि में है कि हर 5 हज़ार वर्ष बाद बाप आकर हमको समझाते हैं, हम फिर भाइयों को समझाते हैं। भाई-भाई आत्मा के सम्बन्ध में हैं। बाप कहते हैं इस समय तुम अपने को अशरीरी आत्मा समझो। आत्मा को ही अपने बाप को याद करना है - पावन बनने लिए। आत्मा पवित्र बनती है तो फिर शरीर भी पवित्र मिलता है। आत्मा अपवित्र तो जेवर भी अपवित्र। नम्बरवार तो होते ही हैं। फीचर्स, एक्टिविटी एक न मिले दूसरे से। नम्बरवार सब अपना-अपना पार्ट बजाते हैं, फ़र्क नहीं पड़ सकता। नाटक में वही सीन देखेंगे जो कल देखी होगी। वही रिपीट होगी ना। यह फिर बेहद का और कल का ड्रामा है। कल तुमको समझाया था। तुमने राजाई ली फिर राजाई गँवाई। आज फिर समझ रहे हो राजाई पाने लिए। आज भारत पुराना नर्क है, कल नया स्वर्ग होगा। तुम्हारी बुद्धि में है-अभी हम नई दुनिया में जा रहे हैं। श्रीमत पर श्रेष्ठ बन रहे हैं। श्रेष्ठ जरूर श्रेष्ठ सृष्टि पर रहेंगे। यह लक्ष्मी-नारायण श्रेष्ठ हैं तो श्रेष्ठ स्वर्ग में रहते हैं। जो भ्रष्ट हैं वो नर्क में रहते हैं। यह राज़ तुम अभी समझते हो। इस बेहद के ड्रामा को जब कोई अच्छी रीति समझे, तब बुद्धि में बैठे। शिव रात्रि भी मनाते हैं परन्तु जानते कुछ भी नहीं हैं। तो अब तुम बच्चों को रिफ्रेश करना होता है। तुम फिर औरों को भी रिफ्रेश करते हो। अभी तुमको ज्ञान मिल रहा है फिर सद्गति को पा लेंगे। बाप कहते हैं मैं स्वर्ग में नहीं आता हूँ, मेरा पार्ट ही है पतित दुनिया को बदल पावन दुनिया बनाना। वहाँ तो तुम्हारे पास कारून का खजाना होता है। यहाँ तो कंगाल हैं इसलिए बाप को बुलाते हैं आकर बेहद का वर्सा दो। कल्प-कल्प बेहद का वर्सा मिलता है फिर कंगाल भी हो जाते हैं। चित्रों पर समझाओ तब समझ सकें। पहले नम्बर में लक्ष्मी-नारायण फिर 84 जन्म लेते मनुष्य बन गये। यह ज्ञान अभी तुम बच्चों को मिला है। तुम जानते हो आज से 5 हज़ार वर्ष पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, जिसको बैकुण्ठ, पैराडाइज़, डीटी वर्ल्ड भी कहते हैं। अभी तो नहीं कहेंगे। अभी तो डेविल वर्ल्ड है। डेविल वर्ल्ड की इन्ड, डीटी वर्ल्ड की आदि का अब है संगम। यह बातें अभी तुम समझते हो, और कोई के मुख से सुन न सको। बाप ही आकर इनका मुख लेते हैं। मुख किसका लेंगे, समझते नहीं हैं। बाप की सवारी किस पर होगी? जैसे तुम्हारी आत्मा की इस शरीर पर सवारी है ना। शिवबाबा को अपनी सवारी तो है नहीं, तो उनको मुख जरूर चाहिए। नहीं तो राजयोग कैसे सिखाये? प्रेरणा से तो नहीं सीखेंगे। तो यह सब बातें दिल में नोट करनी है। परमात्मा की भी बुद्धि में सारी नॉलेज है ना। तुम्हारी भी बुद्धि में यह बैठना चाहिए। यह नॉलेज बुद्धि से धारण करनी है। कहा भी जाता है तुम्हारी बुद्धि ठीक है ना? बुद्धि आत्मा में रहती है। आत्मा ही बुद्धि से समझ रही है। तुम्हारी पत्थरबुद्धि किसने बनाई? अभी समझते हो रावण ने हमारी बुद्धि क्या बना दी है! कल तुम ड्रामा को नहीं जानते थे, बुद्धि को एकदम गॉडरेज का ताला लगा हुआ था। ‘गॉड' अक्षर तो आता है ना। बाप जो बुद्धि देते हैं वह बदलकर पत्थरबुद्धि हो जाती है। फिर बाप आकर ताला खोलते हैं। सतयुग में हैं ही पारसबुद्धि। बाप आकर सबका कल्याण करते हैं। नम्बरवार सबकी बुद्धि खुलती है। फिर एक-दो के पीछे आते रहते हैं। ऊपर में तो कोई रह न सके। पतित वहाँ रह न सकें। बाप पावन बनाकर पावन दुनिया में ले जाते हैं। वहाँ सब पावन आत्मायें रहती हैं। वह है निराकारी सृष्टि।

तुम बच्चों को अभी सब मालूम पड़ा है इसलिए अपना घर भी जैसे बहुत नज़दीक दिखाई पड़ता है। तुम्हारा घर से बहुत प्यार है। तुम्हारे जैसा प्यार तो कोई का है नहीं। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं, जिनका बाप के साथ लॅव है, उनका घर के साथ भी लॅव है। मुरब्बी बच्चे होते हैं ना। तुम समझते हो यहाँ जो अच्छी रीति पुरूषार्थ कर मुरब्बी बच्चा बनेंगे वही ऊंच पद पायेंगे। छोटे अथवा बड़े शरीर के ऊपर नहीं हैं। ज्ञान और योग में जो मस्त हैं, वह बड़े हैं। कई छोटे-छोटे बच्चे भी ज्ञान-योग में तीखे हैं तो बड़ों को पढ़ाते हैं। नहीं तो कायदा है बड़े छोटों को पढ़ाते हैं। आजकल तो मिडगेड भी हो जाते हैं। यूँ तो सब आत्मायें मिडगेड हैं। आत्मा बिन्दी है, उनका क्या वज़न करें। सितारा है। मनुष्य लोग सितारा नाम सुन ऊपर में देखेंगे। तुम सितारा नाम सुन अपने को देखते हो। धरती के सितारे तुम हो। वह हैं आसमान के जो जड़ हैं, तुम चैतन्य हो। उनमें तो फेर-बदल कुछ नहीं होता, तुम तो 84 जन्म लेते हो, कितना बड़ा पार्ट बजाते हो। पार्ट बजाते-बजाते चमक डल हो जाती है, बैटरी डिस्चार्ज हो जाती है। फिर बाप आकर भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाते हैं क्योंकि तुम्हारी आत्मा उझाई हुई है। ताकत जो भरी थी वह खलास हो गई है। अब फिर बाप द्वारा ताकत भरते हो। तुम अपनी बैटरी चार्ज कर रहे हो। इसमें माया भी बहुत विघ्न डालती है बैटरी चार्ज करने नहीं देती। तुम चैतन्य बैटरियाँ हो। जानते हो बाप के साथ योग लगाने से हम सतोप्रधान बनेंगे। अभी तमोप्रधान बने हैं। उस हद की पढ़ाई और इस बेहद की पढ़ाई में बहुत फर्क है। कैसे नम्बरवार सब आत्मायें ऊपर जाती हैं फिर अपने समय पर पार्ट बजाने आना है। सबको अपना अविनाशी पार्ट मिला हुआ है। तुमने यह 84 का पार्ट कितनी बार बजाया होगा! तुम्हारी बैटरी कितनी बार चार्ज और डिस्चार्ज हुई है! जब जानते हो हमारी बैटरी डिस्चार्ज है तो फिर चार्ज करने में देरी क्यों करनी चाहिए? परन्तु माया बैटरी चार्ज करने नहीं देती। माया बैटरी चार्ज करना तुमको भुला देती है। घड़ी-घड़ी बैटरी डिस्चार्ज करा देती है। कोशिश करते हो बाप को याद करने की परन्तु कर नहीं सकते हो। तुम्हारे में जो बैटरी चार्ज कर सतोप्रधान तक नज़दीक आते हैं, उनसे भी कभी-कभी माया ग़फलत कराए बैटरी डिस्चार्ज कर देती है। यह पिछाड़ी तक होता रहेगा। फिर जब लड़ाई का अन्त होता है तो सब खत्म हो जाते हैं फिर जिसकी जितनी बैटरी चार्ज हुई होगी उस अनुसार पद पायेंगे। सभी आत्मायें बाप के बच्चे हैं, बाप ही आकर सबकी बैटरी चार्ज कराते हैं। खेल कैसा वन्डरफुल बना हुआ है। बाप के साथ योग लगाने से घड़ी-घड़ी हट जाते हैं तो कितना नुकसान होता है। न हटें उसके लिए पुरूषार्थ कराया जाता है। पुरूषार्थ करते-करते जब समाप्ति होती है तो फिर नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार तुम्हारा पार्ट पूरा होता है। जैसे कल्प-कल्प होता है। आत्माओं की माला बनती रहती है।

तुम बच्चे जानते हो रूद्राक्ष की माला है, विष्णु की भी माला है। पहले नम्बर में तो उनकी माला रखेंगे ना। बाप दैवी दुनिया रचते हैं ना। जैसे रूद्र माला है, वैसे रूण्ड माला है। ब्राह्मणों की माला अभी नहीं बन सकेगी, बदली-सदली होती रहेगी। फाइनल तब होंगे जब रूद्र माला बनेगी। यह ब्राह्मणों की भी माला है परन्तु इस समय नहीं बन सकती। वास्तव में प्रजापिता ब्रह्मा की सब सन्तान हैं। शिवबाबा के सन्तान की भी माला है, विष्णु की भी माला कहेंगे। तुम ब्राह्मण बनते हो तो ब्रह्मा की और शिव की भी माला चाहिए। यह सारा ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में नम्बरवार हैं। सुनते तो सभी हैं परन्तु कोई का उस समय ही कानों से निकल जाता है, सुनते ही नहीं। कोई तो पढ़ते ही नहीं, उनको पता ही नहीं-भगवान पढ़ाने आये हैं। पढ़ते ही नहीं हैं, यह पढ़ाई तो कितना खुशी से पढ़नी चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) याद की यात्रा से आत्मा रूपी बैटरी को चार्ज कर सतोप्रधान तक पहुँचना है। ऐसी कोई ग़फलत नहीं करनी है, जो बैटरी डिस्चार्ज हो जाए।
2) मुरब्बी बच्चा बनने के लिए बाप के साथ-साथ घर से भी लव रखना है। ज्ञान और योग में मस्त बनना है। बाप जो समझाते हैं वह अपने भाइयों को भी समझाना है।

वरदान: सेवा में रहते सम्पूर्णता के समीपता की अनुभूति करने वाले ब्रह्मा बाप समान एक्जैम्पुल भव
जैसे ब्रह्मा बाप सेवा में रहते, समाचार सुनते एकान्तवासी बन जाते थे। एक घण्टे के समाचार को 5 मिनट में सार समझ बच्चों को खुश करके, अपनी अन्तर्मुखी, एकान्तवासी स्थिति का अनुभव करा देते थे। ऐसे फालो फादर करो। ब्रह्मा बाप ने कभी नहीं कहा कि मैं बहुत बिजी हूँ लेकिन बच्चों के आगे एक्जैम्पुल बनें। ऐसे समय प्रमाण अभी इस अभ्यास की आवश्यकता है। दिल की लगन हो तो समय निकल आयेगा और अनेकों के लिए एक्जैम्पुल बन जायेंगे।

स्लोगन: हर कर्म में - कर्म और योग का अनुभव होना ही कर्मयोग है।

Wednesday, 25 December 2019

Hindi Murli 26/12/2019

26-12-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे-बाप का मददगार बन इस आइरन एजड पहाड़ को गोल्डन एजड बनाना है, पुरूषार्थ कर नई दुनिया के लिए फर्स्टक्लास सीट रिजर्व करानी है''

प्रश्न: बाप की फर्ज़-अदाई क्या है? कौन-सा फ़र्ज पूरा करने के लिए संगम पर बाप को आना पड़ता है?
उत्तर: बीमार और दु:खी बच्चों को सुखी बनाना, माया के फँदे से निकाल घनेरे सुख देना-यह बाप की फर्ज-अदाई है, जो संगम पर ही बाप पूरी करते हैं। बाबा कहते-मैं आया हूँ तुम सबका मर्ज मिटाने, सब पर कृपा करने। अब पुरूषार्थ कर 21 जन्मों के लिए अपनी ऊंची तकदीर बना लो।

गीत:- भोलेनाथ से निराला.....
ओम् शान्ति। भोलानाथ शिव भगवानुवाच-ब्रह्मा मुख कमल से बाप कहते हैं-यह वैराइटी भिन्न-भिन्न धर्मों का मनुष्य सृष्टि झाड़ है ना। इस कल्प वृक्ष अथवा सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ बच्चों को समझा रहा हूँ। गीत में भी इनकी महिमा है। शिवबाबा का जन्म यहाँ है, बाप कहते हैं मैं आया हूँ भारत में। मनुष्य यह नहीं जानते कि शिवबाबा कब पधारे थे? क्योंकि गीता में कृष्ण का नाम डाल दिया है। द्वापर की तो बात ही नहीं। बाप समझाते हैं-बच्चे, 5 हज़ार वर्ष पहले भी मैने आकर के यह ज्ञान दिया था। इस झाड़ से सभी को मालूम पड़ जाता है। झाड़ को अच्छी रीति देखो। सतयुग में बरोबर देवी-देवताओं का राज्य था, त्रेता में राम-सीता का है। बाबा आदि-मध्य-अन्त का राज़ बतलाते हैं। बच्चे पूछते हैं-बाबा, हम माया के फँदे में कब फँसे? बाबा कहते हैं द्वापर से। नम्बरवार फिर दूसरे धर्म आते हैं। तो हिसाब लगाने से समझ सकते हैं कि इस दुनिया में हम फिर से कब आयेंगे? शिवबाबा कहते हैं मैं 5 हज़ार वर्ष बाद आया हूँ, संगम पर अपना फ़र्ज निभाने। सभी जो भी मनुष्य मात्र हैं, सभी दु:खी हैं, उनमें भी खास भारतवासी। ड्रामा अनुसार भारत को ही मैं सुखी बनाता हूँ। बाप का फ़र्ज होता है बच्चे बीमार पड़ें तो उनकी दवा दर्मल करना। यह है बहुत बड़ी बीमारी। सभी बीमारियों का मूल ये 5 विकार हैं। बच्चे पूछते हैं यह कब से शुरू हुए? द्वापर से। रावण की बात समझानी है। रावण को कोई देखा नहीं जाता। बुद्धि से समझा जाता है। बाप को भी बुद्धि से जाना जाता है। आत्मा मन-बुद्धि सहित है। आत्मा जानती है कि हमारा बाप परमात्मा है। दु:ख-सुख, लेप-छेप में आत्मा आती है। जब शरीर है तो आत्मा को दु:ख होता है। ऐसे नहीं कहते कि मुझ परमात्मा को दु:खी मत करो। बाप भी समझाते हैं कि मेरा भी पार्ट है, कल्प-कल्प संगम पर आकर मैं पार्ट बजाता हूँ। जिन बच्चों को मैंने सुख में भेजा था, वह दु:खी बन पड़े हैं इसलिए फिर ड्रामा अनुसार मुझे आना पड़ता है। बाकी कच्छ-मच्छ अवतार यह बातें हैं नहीं। कहते हैं परशुराम ने कुल्हाड़ा ले क्षत्रियों को मारा। यह सब हैं दन्त कथायें। तो अब बाप समझाते हैं मुझे याद करो।

यह है जगत अम्बा और जगत पिता। मदर और फादर कन्ट्री कहते हैं ना। भारतवासी याद भी करते हैं-तुम मात-पिता..... तुम्हारी कृपा से सुख घनेरे तो बरोबर मिल रहे हैं। फिर जो जितना पुरूषार्थ करेंगे। जैसे बाइसकोप में जाते हैं, फर्स्टक्लास का रिजर्वेशन कराते हैं ना। बाप भी कहते हैं चाहे सूर्यवंशी, चाहे चन्द्रवंशी में सीट रिजर्व कराओ, जितना जो पुरूषार्थ करे उतना पद पा सकते हैं। तो सब मर्ज मिटाने बाप आये हैं। रावण ने सबको बहुत दु:ख दिया है। कोई भी मनुष्य, मनुष्य की गति-सद्गति कर न सके। यह है ही कलियुग का अन्त। गुरू लोग शरीर छोड़ते हैं फिर यहाँ ही पुनर्जन्म लेते हैं। तो फिर वह औरों की क्या सद्गति करेंगे! क्या इतने सभी अनेक गुरू मिलकर पतित सृष्टि को पावन बनायेंगे? गोवर्धन पर्वत कहते हैं ना। यह मातायें इस आइरन एजड पहाड़ को गोल्डन एजड बनाती हैं। गोवर्धन की फिर पूजा भी करते हैं, वह है तत्व पूजा। सन्यासी भी ब्रह्म अथवा तत्व को याद करते हैं। समझते हैं वही परमात्मा है, ब्रह्म भगवान है। बाप कहते हैं यह तो भ्रम है। ब्रह्माण्ड में तो आत्मायें अण्डे मिसल रहती हैं, निराकारी झाड़ भी दिखाया गया है। हर एक का अपना-अपना सेक्सन है। इस झाड़ का फाउन्डेशन है-भारत का सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी घराना। फिर वृद्धि होती है। मुख्य हैं 4 धर्म। तो हिसाब करना चाहिए-कौन-कौन से धर्म कब आते हैं? जैसे गुरूनानक 500 वर्ष पहले आये। ऐसे तो नहीं सिक्ख लोग कोई 84 जन्म का पार्ट बजाते हैं। बाप कहते हैं 84 जन्म सिर्फ तुम आलराउन्डर ब्राह्मणों के हैं। बाबा ने समझाया है कि तुम्हारा ही आलराउन्ड पार्ट है। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तुम बनते हो। जो पहले देवी-देवता बनते हैं वही सारा चक्र लगाते हैं।

बाप कहते हैं तुमने वेद-शास्त्र तो बहुत सुने। अभी यह सुनो और जज करो कि शास्त्र राइट हैं या गुरू लोग राइट हैं या जो बाप सुनाते हैं वह राइट है? बाप को कहते ही हैं ट्रूथ। मैं सच बतलाता हूँ जिससे सतयुग बन जाता है और द्वापर से लेकर तुम झूठ सुनते आये हो तो उससे नर्क बन पड़ा है।

बाप कहते हैं-मैं तुम्हारा गुलाम हूँ, भक्ति मार्ग में तुम गाते आये हो-मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा..... अभी मैं तुम बच्चों की सेवा में आया हूँ। बाप को निराकारी, निरहंकारी गाया जाता है। तो बाप कहते हैं मेरा फ़र्ज है तुम बच्चों को सदा सुखी बनाना। गीत में भी है अगम-निगम का भेद खोले..... बाकी डमरू आदि बजाने की कोई बात नहीं है। यह तो आदि-मध्य-अन्त का सारा समाचार सुनाते हैं। बाबा कहते हैं तुम सभी बच्चे एक्टर्स हो, मैं इस समय करनकरावनहार हूँ। मैं इनसे (ब्रह्मा से) स्थापना करवाता हूँ। बाकी गीता में जो कुछ लिखा हुआ है, वह तो है नहीं। अभी तो प्रैक्टिकल बात है ना। बच्चों को यह सहज ज्ञान और सहज योग सिखलाता हूँ, योग लगवाता हूँ। कहा है ना योग लगवाने वाले, झोली भरने वाले, मर्ज़ मिटाने वाले.....। गीता का भी पूरा अर्थ समझाते हैं। योग सिखलाता हूँ और सिखलवाता भी हूँ। बच्चे योग सीखकर फिर औरों को सिखलाते हैं ना। कहते हैं योग से हमारी ज्योत जगाने वाले..... ऐसे गीत भी कोई घर में बैठकर सुने तो सारा ही ज्ञान बुद्धि में चक्र लगायेगा। बाप की याद से वर्से का भी नशा चढ़ेगा। सिर्फ परमात्मा वा भगवान कहने से मुख मीठा नहीं होता। बाबा माना ही वर्सा।

अब तुम बच्चे बाबा से आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुनकर फिर औरों को सुनाते हो, इसे ही शंखध्वनि कहा जाता है। तुमको कोई पुस्तक आदि हाथ में नहीं है। बच्चों को सिर्फ धारणा करनी होती है। तुम हो सच्चे रूहानी ब्राह्मण, रूहानी बाप के बच्चे। सच्ची गीता से भारत स्वर्ग बनता है। वह तो सिर्फ कथायें बैठ बनाई हैं। तुम सब पार्वतियाँ हो, तुमको यह अमरकथा सुना रहा हूँ। तुम सब द्रोपदियाँ हो। वहाँ कोई नंगन होते नहीं। कहते हैं तब बच्चे कैसे पैदा होंगे? अरे, हैं ही निर्विकारी तो विकार की बात कैसे हो सकती। तुम समझ नहीं सकेंगे कि योगबल से बच्चे कैसे पैदा होंगे! तुम आरग्यु करेंगे। परन्तु यह तो शास्त्रों की बातें हैं ना। वह है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। यह है विकारी दुनिया। मैं जानता हूँ ड्रामा अनुसार माया फिर तुमको दु:खी करेगी। मैं कल्प-कल्प अपना फ़र्ज पालन करने आता हूँ। जानते हैं कल्प पहले वाले सिकीलधे ही आकर अपना वर्सा लेंगे। आसार भी दिखाते हैं। यह वही महाभारत लड़ाई है। तुम्हें फिर से देवी-देवता अथवा स्वर्ग का मालिक बनने का पुरूषार्थ करना है। इसमें स्थूल लड़ाई की कोई बात नहीं है। न असुरों व देवताओं की लड़ाई ही हुई है। वहाँ तो माया ही नहीं जो लड़ाये। आधाकल्प न कोई लड़ाई, न कोई भी बीमारी, न दु:ख-अशान्ति। अरे, वहाँ तो सदैव सुख, बहार ही बहार रहती है। हॉस्पिटल होती नहीं, बाकी स्कूल में पढ़ना तो होता ही है। अब तुम हर एक यहाँ से वर्सा ले जाते हो। मनुष्य पढ़ाई से अपने पैर पर खड़े हो जाते हैं। इस पर कहानी भी है-कोई ने पूछा तुम किसका खाती हो? तो कहा हम अपनी तकदीर का खाती हैं। वह होती है हद की तकदीर। अभी तुम अपनी बेहद की तकदीर बनाते हो। तुम ऐसी तकदीर बनाते हो जो 21 जन्म फिर अपना ही राज्य भाग्य भोगते हो। यह है बेहद के सुख का वर्सा, अब तुम बच्चे कान्ट्रास्ट को अच्छी रीति जानते हो, भारत कितना सुखी था। अब क्या हाल है! जिन्होंने कल्प पहले राज्य-भाग्य लिया होगा वही अब लेंगे। ऐसे भी नहीं कि जो ड्रामा में होगा वो मिलेगा, फिर तो भूख मर जायेंगे। यह ड्रामा का राज़ पूरा समझना है। शास्त्रों में कोई ने कितनी आयु, कोई ने कितनी लिख दी है। अनेकानेक मत-मतान्तर हैं। कोई फिर कहते हैं हम तो सदा सुखी हैं ही। अरे, तुम कभी बीमार नहीं होते हो? वह तो कहते हैं रोग आदि तो शरीर को होता है, आत्मा निर्लेप है। अरे, चोट आदि लगती है तो दु:ख आत्मा को होता है ना-यह बड़ी समझने की बातें हैं। यह स्कूल है, एक ही टीचर पढ़ाते हैं। नॉलेज एक ही है। एम ऑबजेक्ट एक ही है, नर से नारायण बनने की। जो नापास होंगे वह चन्द्रवंशी में चले जायेंगे। जब देवतायें थे तो क्षत्रिय नहीं, जब क्षत्रिय थे तो वैश्य नहीं, जब वैश्य थे तो शूद्र नहीं। यह सब समझने की बातें हैं। माताओं के लिए भी अति सहज है। एक ही इम्तहान है। ऐसे भी मत समझो कि देरी से आने वाले कैसे पढ़ेंगे। लेकिन अभी तो नये तीखे जा रहे हैं। प्रैक्टिकल में है। बाकी माया रावण का कोई रूप नहीं, कहेंगे इनमें काम का भूत है, बाकी रावण का कोई बुत वा शरीर तो है नहीं।

अच्छा, सभी बातों का सैक्रीन है मन्मनाभव। कहते हैं मुझे याद करो तो इस योग अग्नि से विकर्म विनाश होंगे। बाप गाइड बनकर आते हैं। बाबा कहते-बच्चे, मैं तो सम्मुख तुम बच्चों को पढ़ा रहा हूँ। कल्प-कल्प अपनी फ़र्ज-अदाई पालन करता हूँ। पारलौकिक बाप कहते हैं मैं अपना फ़र्ज बजाने आया हूँ-तुम बच्चों की मदद से। मदद देंगे तब तो तुम भी पद पायेंगे। मैं कितना बड़ा बाप हूँ। कितना बड़ा यज्ञ रचा है। ब्रह्मा की मुख वंशावली तुम सभी ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ भाई-बहन हो। जब भाई-बहिन बनें तो स्त्री-पुरूष की दृष्टि बदल जाए। बाप कहते हैं इस ब्राह्मण कुल को कलंकित नहीं करना, पवित्र रहने की युक्तियाँ हैं। मनुष्य कहते हैं यह कैसे होगा? ऐसे हो नहीं सकता, इकट्ठे रहें और आग न लगे! बाबा कहते हैं बीच में ज्ञान तलवार होने से कभी आग नहीं लग सकती, परन्तु जबकि दोनों मन्मनाभव रहें, शिवबाबा को याद करते रहें, अपने को ब्राह्मण समझें। मनुष्य तो इन बातों को नहीं समझने कारण हंगामा मचाते हैं, यह गालियाँ भी खानी पड़ती हैं। कृष्ण को थोड़ेही कोई गाली दे सकते। कृष्ण ऐसे आ जाए तो विलायत आदि से एकदम एरोप्लेन में भाग आयें, भीड़ मच जाए। भारत में पता नहीं क्या हो जाए।

अच्छा, आज भोग है - यह है पियरघर और वह है ससुरघर। संगम पर मुलाकात होती है। कोई-कोई इनको जादू समझते हैं। बाबा ने समझाया है कि यह साक्षात्कार क्या है? भक्ति मार्ग में कैसे साक्षात्कार होते हैं, इनमें संशयबुद्धि नहीं होना है। यह रस्म-रिवाज है। शिवबाबा का भण्डारा है तो उनको याद कर भोग लगाना चाहिए। योग में रहना तो अच्छा ही है। बाबा की याद रहेगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) स्वयं को ब्रह्मा मुख वंशावली समझकर पक्का पवित्र ब्राह्मण बनना है। कभी अपने इस ब्राह्मण कुल को कलंकित नहीं करना है।
2) बाप समान निराकारी, निरहंकारी बन अपनी फ़र्ज-अदाई पूरी करनी है। रूहानी सेवा पर तत्पर रहना है।

वरदान: सेवाओं की प्रवृत्ति में रहते बीच-बीच में एकान्तवासी बनने वाले अन्तर्मुखी भव
साइलेन्स की शक्ति का प्रयोग करने के लिए अन्तर्मुखी और एकान्तवासी बनने की आवश्यकता है। कई बच्चे कहते हैं अन्तर्मुखी स्थिति का अनुभव करने वा एकान्तवासी बनने के लिए समय ही नहीं मिलता क्योंकि सेवा की प्रवृत्ति, वाणी के शक्ति की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है लेकिन इसके लिए इक्ट्ठा आधा घण्टा वा एक घण्टा निकालने के बजाए बीच-बीच में थोड़ा समय भी निकालो तो शक्तिशाली स्थिति बन जायेगी।

स्लोगन: ब्राह्मण जीवन में युद्ध करने के बजाए मौज मनाओ तो मुश्किल भी सहज हो जायेगा।