Thursday, 31 October 2019

Hindi Murli 01/11/2019

01-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - अपने ऊपर पूरी नज़र रखो, कोई भी बेकायदे चलन नहीं चलना, श्रीमत का उल्लंघन करने से गिर जायेंगे''

प्रश्न: पद्मापद्मपति बनने के लिए कौन-सी खबरदारी चाहिए?
उत्तर: सदैव ध्यान रहे - जैसा कर्म हम करेंगे हमें देख और भी करने लगेंगे। किसी भी बात का मिथ्या अहंकार न आये। मुरली कभी भी मिस न हो। मन्सा-वाचा-कर्मणा अपनी सम्भाल रखो। यह आंखें धोखा न दें तो पद्मों की कमाई जमा कर सकेंगे। इसके लिए अन्तर्मुखी होकर बाप को याद करो और विकर्मों से बचे रहो।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों को बाप ने समझाया है, यहाँ तुम बच्चों को इस ख्याल से जरूर बैठना होता है, यह बाबा भी है, टीचर और सतगुरू भी है। और यह भी महसूस करते हो-बाबा को याद करते-करते पवित्र बन, पवित्रधाम में जाकर पहुँचेंगे। बाप ने समझाया है कि पवित्रधाम से ही तुम नीचे उतरते हो। उसका नाम ही है पवित्रधाम। सतोप्रधान से फिर सतो, रजो, तमो..... अभी तुम समझते हो कि हम नीचे गिरे हुए हैं अर्थात् वेश्यालय में हैं। भल तुम संगमयुग पर हो, परन्तु ज्ञान से तुम जानते हो कि हमने किनारा किया हुआ है फिर भी अगर हम शिवबाबा की याद में रहते हैं तो शिवालय दूर नहीं। शिवबाबा को याद नहीं करते तो शिवालय बहुत दूर है। सजायें खानी पड़ती हैं तो बहुत दूर हो जाता है। तो बाप बच्चों को कोई जास्ती तकलीफ नहीं देते हैं। एक तो बार-बार कहते हैं मन्सा-वाचा-कर्मणा पवित्र बनना है। यह आंखें भी बड़ा धोखा देती हैं, इनसे बहुत सम्भालकर चलना होता है। बाप ने समझाया है कि ध्यान और योग बिल्कुल अलग है। योग अर्थात् याद। आंखें खुली होते भी तुम याद कर सकते हो। ध्यान को कोई योग नहीं कहा जाता। भोग भी ले जाते हैं तो डायरेक्शन अनुसार ही जाना है। इसमें माया भी बहुत आती है। माया ऐसी है जो एकदम नाक में दम कर देती है। जैसे बाप बलवान है, वैसे माया भी बड़ी बलवान है। इतनी बलवान है जो सारी दुनिया को वेश्यालय में ढकेल दिया है इसलिए इसमें बहुत खबरदारी रखनी होती है। बाप की कायदे अनुसार याद चाहिए। बेकायदे कोई काम किया तो एकदम गिरा देती है। ध्यान आदि की कभी कोई इच्छा नहीं रखनी है। इच्छा मात्रम् अविद्या..... बाप तुम्हारी सब मनोकामनायें बिगर मांगे पूरी कर देते हैं, अगर बाप की आज्ञा पर चले तो। अगर बाप की आज्ञा न मान उल्टा रास्ता लिया तो हो सकता है स्वर्ग के बदले नर्क में ही गिर जाएं। गायन भी है गज को ग्राह ने खाया। बहुतों को ज्ञान देने वाले, भोग लगाने वाले आज हैं कहाँ, क्योंकि बेकायदे चलन के कारण पूरे मायावी बन जाते हैं। डीटी बनते-बनते डेविल बन जाते हैं। बाप जानते हैं कि बहुत अच्छे पुरुषार्थी जो देवता बनने वाले थे वह असुर बन असुरों के साथ रहते हैं। ट्रेटर हो जाते हैं। बाप का बनकर फिर माया के बन जाते, उन्हें ट्रेटर कहा जाता है। अपने ऊपर नज़र रखनी होती है। श्रीमत का उल्लंघन किया तो यह गिरे। पता भी नहीं पड़ेगा। बाप तो बच्चों को सावधान करते हैं कि कोई ऐसी चलन न चलो जो रसातल में पहुँच जाओ।
कल भी बाबा ने समझाया - बहुत गोप हैं आपस में कमेटियां आदि बनाते हैं, जो कुछ करते हैं, श्रीमत के आधार बिगर करते हैं तो डिस सर्विस करते हैं। बिगर श्रीमत करेंगे तो गिरते ही जायेंगे। बाबा ने शुरू में कमेटी बनाई थी तो माताओं की बनाई थी क्योंकि कलष तो माताओं को ही मिलता है। वन्दे मातरम् गाया हुआ है ना। अगर गोप लोग कमेटी बनाते हैं तो वन्दे गोप तो गायन नहीं है। श्रीमत पर नहीं तो माया के जाल में फँस पड़ते हैं। बाबा ने माताओं की कमेटी बनाई, उन्हों के हवाले सब कुछ कर दिया। पुरुष अक्सर करके देवाला मारते हैं, स्त्रियाँ नहीं। तो बाप भी कलष माताओं पर रखते हैं। इस ज्ञान मार्ग में मातायें भी देवाला मार सकती हैं। पद्मापद्म भाग्यशाली जो बनने वाले हैं, वह माया से हार खाकर देवाला मार सकते हैं। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों देवाला मार सकते हैं और मारते भी हैं। कितने हार खाकर चले गये गोया देवाला मार दिया ना। बाप समझाते हैं भारतवासियों ने तो पूरा देवाला मारा है। माया कितनी जबरदस्त है। जो समझ नहीं सकते हैं हम क्या थे, कहाँ से एकदम नीचे आकर गिरे हैं। यहाँ भी ऊंच चढ़ते-चढ़ते फिर श्रीमत को भूल अपनी मत पर चलते हैं तो देवाला मार देते हैं। वो लोग तो देवाला मारते फिर 5-7 वर्ष बाद खड़े हो जाते हैं। यहाँ तो 84 जन्मों का देवाला मारते हैं। ऊंच पद पा न सकें। देवाला मारते ही रहते हैं। बाबा के पास फ़ोटो होता तो बतलाते। तुम कहेंगे बाबा तो बिल्कुल ठीक कहते हैं। यह कितना बड़ा महारथी था, बहुतों को उठाते थे। आज हैं नहीं। देवाले में हैं। बाबा घड़ी-घड़ी बच्चों को सावधान करते रहते हैं। अपनी मत पर कमेटियाँ आदि बनाना इसमें कुछ रखा नहीं है। आपस में मिलकर झरमुई झगमुई करना, यह ऐसा करता था, फलाना ऐसा करता था......, सारा दिन यही करते रहते हैं। बाप से बुद्धियोग लगाने से ही सतोप्रधान बनेंगे। बाप का बने और बाप से योग नहीं तो घड़ी-घड़ी गिरते रहेंगे। कनेक्शन ही टूट पड़ता है। लिंक टूट जाए तो घबराना नहीं चाहिए। माया हमें इतना तंग क्यों करती है। कोशिश कर बाप के साथ लिंक जोड़नी चाहिए। नहीं तो बैटरी चार्ज कैसे होगी। विकर्म होने से बैटरी डिस्चार्ज हो जाती है। शुरू में कितने ढेर के ढेर बाबा के आकर बने। भट्ठी में आये फिर आज कहाँ हैं। गिर पड़े क्योंकि पुरानी दुनिया याद आई। अभी बाप कहते हैं मैं तुमको बेहद का वैराग्य दिलाता हूँ, इस पुरानी दुनिया से दिल नहीं लगाओ। दिल स्वर्ग से लगानी है। अगर ऐसा लक्ष्मी-नारायण बनना है तो मेहनत करनी पड़े। बुद्धियोग एक बाप के साथ होना चाहिए। पुरानी दुनिया से वैराग्य। सुखधाम और शान्तिधाम को याद करो। जितना हो सके उठते, बैठते, चलते, फिरते बाप को याद करो। यह तो बिल्कुल ही सहज है। तुम यहाँ आये ही हो नर से नारायण बनने के लिए। सबको कहना है कि अब तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है क्योंकि रिटर्न जर्नी होती है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट माना नर्क से स्वर्ग, फिर स्वर्ग से नर्क। यह चक्र फिरता ही रहता है।
बाप ने कहा है यहाँ स्वदर्शन चक्रधारी होकर बैठो। इसी याद में रहो कि हमने कितने बार चक्र लगाया है। अभी फिर से हम देवता बन रहे हैं। दुनिया में कोई भी इस राज़ को नहीं समझते हैं। यह ज्ञान देवताओं को है नहीं। वह तो हैं ही पवित्र। उनमें ज्ञान ही नहीं जो शंख बजावें। वह पवित्र हैं, उनको यह निशानी देने की दरकार नहीं। निशानी तब होती है जब दोनों इकट्ठे होते हैं। तुमको भी निशानी नहीं क्योंकि तुम आज देवता बनते-बनते कल असुर बन जाते हो। बाप देवता बनाते, माया असुर बना देती है। बाप जब समझाते हैं तब पता पड़ता है कि सचमुच हमारी अवस्था गिरी हुई है। कितने बिचारे शिवबाबा के खजाने में जमा कराते फिर मांगकर असुर बन जाते। इसमें योग की ही सारी कमी है। योग से ही पवित्र बनना है। बुलाते भी हो बाबा आओ, हमें पतित से पावन बनाओ, जो हम स्वर्ग में जा सके। याद की यात्रा है ही पावन बन ऊंच पद पाने के लिए। जो मर जाते हैं फिर भी जो कुछ सुना है तो शिवालय में आयेंगे जरूर। पद भल कैसा भी पायें। एक बार याद किया तो स्वर्ग में आयेंगे जरूर। बाकी ऊंच पद पा न सकें। स्वर्ग का नाम सुनकर खुश होना चाहिए। फेल हो पाई-पैसे का पद पा लिया, इसमें खुश नहीं हो जाना है। फीलिंग तो आती है ना-मैं नौकर हूँ। पिछाड़ी में तुम्हें सब साक्षात्कार होंगे कि हम क्या बनेंगे, हमसे क्या विकर्म हुआ है, जो ऐसी हालत हुई है। मैं महारानी क्यों नहीं बनूँ। कदम-कदम पर खबरदारी से चलने से तुम पद्मापद्मपति बन सकते हो। मन्दिरों में देवताओं को पद्म की निशानी दिखाते हैं। दर्जे में फर्क हो जाता है। आज की राजाई का कितना दबदबा रहता है! है तो अल्पकाल का। सदाकाल के राजा तो बन न सकें। तो अभी बाप कहते हैं-तुम्हें लक्ष्मी-नारायण बनना है तो पुरुषार्थ भी ऐसा चाहिए। कितना हम औरों का कल्याण करते हैं? अन्तर्मुख हो कितना समय बाबा की याद में रहते हैं? अभी हम जा रहे हैं अपने स्वीट होम में। फिर आयेंगे सुखधाम में। यह सब ज्ञान का मन्थन अन्दर में चलता रहे। बाप में ज्ञान और योग दोनों हैं। तुम्हारे में भी होना चाहिए। जानते हो हमें शिवबाबा पढ़ाते हैं तो ज्ञान भी हुआ और याद भी हुई। ज्ञान और योग दोनों साथ-साथ चलता है। ऐसे नहीं, योग में बैठो, बाबा को याद करते रहो और नॉलेज भूल जाए। बाप योग सिखलाते हैं तो नॉलेज भूल जाते हैं क्या? सारी नॉलेज उनमें रहती है। तुम बच्चों में भी नॉलेज होनी चाहिए। पढ़ना चाहिए। जैसे कर्म मैं करुँगा मुझे देख और भी करेंगे। मैं मुरली नहीं पढूँगा तो और भी नहीं पढ़ेंगे। मिथ्या अहंकार आ जाता है तो माया झट वार कर देती है। कदम-कदम बाप से श्रीमत लेते रहना है। नहीं तो कुछ न कुछ विकर्म बन जाते हैं। बहुत बच्चे भूले करते बाप को नहीं बताते तो अपनी सत्यानाश कर लेते हैं। ग़फलत होने से माया थप्पड़ लगा देती है। वर्थ नाट ए पेनी बना देती है। अहंकार में आने से माया बहुत विकर्म कराती है। बाबा ने ऐसे थोड़ेही कहा है, ऐसी-ऐसी पुरुषों की कमेटियाँ बनाओ। कमेटी में एक-दो समझू सयानी बच्चियां जरूर होनी चाहिए। जिनकी ही राय पर काम हो। कलष तो लक्ष्मी पर रखा जाता है ना। गायन भी है, अमृत पिलाते थे फिर कहाँ यज्ञ में विघ्न डालते थे। अनेक प्रकार के विघ्न डालने वाले हैं। सारा दिन यही झरमुई झगमुई की बातें करते रहते हैं। यह बहुत खराब है। कोई भी बात हो तो बाप को रिपोर्ट करनी चाहिए। सुधारने वाला तो एक ही बाप है। तुम अपने हाथ में लॉ नहीं उठाओ। तुम बाप की याद में रहो। सभी को बाप का परिचय देते रहो तब ऐसा बन सकेंगे। माया बहुत कड़ी है। किसको नहीं छोड़ती। सदैव बाप को समाचार लिखना चाहिए। डायरेक्शन लेते रहना चाहिए। यूँ तो डायरेक्शन सदैव मिलते रहते हैं। ऐसे तो बच्चे समझते हैं बाबा ने तो आपेही इस बात पर समझा दिया, बाबा तो अन्तर्यामी है। बाबा कहते नहीं, मैं तो नॉलेज पढ़ाता हूँ। इसमें अन्तर्यामी की बात ही नहीं। हाँ, यह जानता हूँ कि यह सब मेरे बच्चे हैं। हर एक शरीर के अन्दर मेरे बच्चे हैं। बाकी ऐसे नहीं कि बाप सभी के अन्दर विराजमान है। मनुष्य तो उल्टा ही समझ लेते हैं। बाप कहते हैं मैं जानता हूँ कि सभी तख्त पर आत्मा विराजमान है। यह तो कितनी सहज बात है। सभी चैतन्य आत्मायें अपने-अपने तख्त पर बैठी हैं फिर भी परमात्मा को सर्वव्यापी कह देते हैं, यह है एकज भूल। इस कारण ही भारत इतना गिरा हुआ है। बाप कहते हैं तुमने मेरी बहुत ग्लानि की है। विश्व के मालिक बनाने वाले को तुमने गाली दी है इसलिए बाप कहते हैं यदा यदाहि......। बाहर वाले यह सर्वव्यापी का ज्ञान भारतवासियों से सीखते हैं। जैसे भारतवासी उनसे हुनर सीखते हैं वह फिर उल्टा सीखते हैं। तुम्हें तो एक बाप को याद करना है और बाप का परिचय भी सबको देना है। तुम हो अन्धों की लाठी। लाठी से राह बतलाते हैं ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप की आज्ञा अनुसार हर कार्य करना है। कभी भी श्रीमत का उल्लंघन न हो तब ही सर्व मनोकामनायें बिना मांगे पूरी होंगी। ध्यान दीदार की इच्छा नहीं रखनी है, इच्छा मात्रम् अविद्या बनना है।
2) आपस में मिलकर झरमुई झगमुई (एक दूसरे का परचिंतन) नहीं करना है। अन्तर्मुख हो अपनी जांच करनी है कि हम बाबा की याद में कितना समय रहते हैं, ज्ञान का मंथन अन्दर चलता है?

वरदान: बिन्दी रूप में स्थित रह औरों को भी ड्रामा के बिन्दी की स्मृति दिलाने वाले विघ्न-विनाशक भव
जो बच्चे किसी भी बात में क्वेश्चन मार्क नहीं करते, सदा बिन्दी रूप में स्थित रह हर कार्य में औरों को भी ड्रामा की बिन्दी स्मृति में दिलाते हैं - उन्हें ही विघ्न-विनाशक कहा जाता है। वह औरों को भी समर्थ बनाकर सफलता की मंजिल के समीप ले आते हैं। वह हद की सफलता की प्राप्ति को देख खुश नहीं होते लेकिन बेहद के सफलतामूर्त होते हैं। सदा एक-रस, एक श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहते हैं। वह अपनी सफलता की स्व-स्थिति से असफलता को भी परिवर्तन कर देते हैं।

स्लोगन: दुआयें लो, दुआयें दो तो बहुत जल्दी मायाजीत बन जायेंगे।

Wednesday, 30 October 2019

Hindi Murli 31/10/2019

31-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बाप खिवैया बन आया है तुम सबकी नईया को विषय सागर से निकाल क्षीर सागर में ले जाने, अभी तुमको इस पार से उस पार जाना है''

प्रश्न: तुम बच्चे हर एक का पार्ट देखते हुए किसकी भी निंदा नहीं कर सकते हो - क्यों?
उत्तर: क्योंकि तुम जानते हो यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है, इसमें हर एक एक्टर अपना-अपना पार्ट बजा रहे हैं। किसी का भी कोई दोष नहीं है। यह भक्ति मार्ग भी फिर से पास होना है, इसमें जरा भी चेन्ज नहीं हो सकती।

प्रश्न: किन दो शब्दों में सारे चक्र का ज्ञान समाया हुआ है?
उत्तर: आज और कल। कल हम सतयुग में थे, आज 84 जन्मों का चक्र लगाकर नर्क में पहुँचे, कल फिर स्वर्ग में जायेंगे।

ओम् शान्ति। अब बच्चे सामने बैठे हैं, जहाँ से आते हैं वहाँ अपने सेन्टर्स पर जब रहते हैं तो वहाँ ऐसे नहीं समझेंगे कि हम ऊंच ते ऊंच बाबा के सम्मुख बैठे हैं। वही हमारा टीचर भी है, वही हमारी नईया को पार लगाने वाला है, जिसको ही गुरू कहते हैं। यहाँ तुम समझते हो हम सम्मुख बैठे हैं, हमको इस विषय सागर से निकाल क्षीर सागर में ले जाते हैं। पार ले जाने वाला बाप भी सम्मुख बैठा है, वह एक ही शिव बाप की आत्मा है, जिसको ही सुप्रीम अथवा ऊंच ते ऊंच भगवान् कहा जाता है। अभी तुम बच्चे समझते हो हम ऊंच ते ऊंच भगवान् शिवबाबा के सामने बैठे हैं। वह इसमें (ब्रह्मा तन में) बैठे हैं, वह तुमको पार भी पहुँचाते हैं। उनको रथ भी जरूर चाहिए ना। नहीं तो श्रीमत कैसे दें। अभी तुम बच्चों को निश्चय है - बाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है, पार ले जाने वाला भी है। अभी हम आत्मायें अपने घर शान्तिधाम में जाने वाली हैं। वह बाबा हमको रास्ता बता रहे हैं। वहाँ सेन्टर्स पर बैठने और यहाँ सम्मुख बैठने में रात-दिन का फ़र्क है। वहाँ ऐसे नहीं समझेंगे कि हम सम्मुख बैठे हैं। यहाँ यह महसूसता आती है। अभी हम पुरूषार्थ कर रहे हैं। पुरू-षार्थ कराने वाले को खुशी रहेगी। अभी हम पावन बनकर घर जा रहे हैं। जैसे नाटक के एक्टर्स होते हैं तो समझते हैं अब नाटक पूरा हुआ। अभी बाप आये हैं हम आत्माओं को ले जाने। यह भी समझाते हैं तुम घर कैसे जा सकते हो, वह बाप भी है, नईया को पार करने वाला खिवैया भी है। वह लोग भल गाते हैं परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं कि नईया किसको कहा जाता है, क्या वह शरीर को ले जायेगा? अभी तुम बच्चे जानते हो हमारी आत्मा को पार ले जाते हैं। अभी आत्मा इस शरीर के साथ वेश्यालय में विषय वैतरणी नदी में पड़ी है। हम असल रहवासी शान्तिधाम के थे, हमको पार ले जाने वाला अर्थात् घर ले जाने वाला बाप मिला है। तुम्हारी राजधानी थी जो माया रावण ने सारी छीन ली है। वह राजधानी फिर जरूर लेनी है। बेहद का बाप कहते हैं - बच्चों, अब अपने घर को याद करो। वहाँ जाकर फिर क्षीरसागर में आना है। यहाँ है विष का सागर, वहाँ है क्षीर का सागर और मूलवतन है शान्ति का सागर। तीनों धाम हैं। यह तो है दु:खधाम।
बाप समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। कहने वाला कौन है, किस द्वारा कहते हैं? सारा दिन 'मीठे-मीठे बच्चे' कहते रहते हैं। अभी आत्मा पतित है, जिस कारण फिर शरीर भी ऐसा मिलेगा। अभी तुम समझते हो हम पक्के-पक्के सोने के जेवर थे फिर खाद पड़ते-पड़ते झूठे बन गये हैं। अब वह झूठ कैसे निकले, इसलिए यह याद के यात्रा की भट्ठी है। अग्नि में सोना पक्का होता है ना। बाप बार-बार समझाते हैं, यह समझानी जो तुमको देता हूँ, हर कल्प देता आया हूँ। हमारा पार्ट है फिर 5 हज़ार वर्ष के बाद आकर कहता हूँ कि बच्चे पावन बनो। सतयुग में भी तुम्हारी आत्मा पावन थी, शान्तिधाम में भी पावन आत्मा रहती है। वह तो है हमारा घर। कितना स्वीट घर है। जहाँ जाने के लिए मनुष्य कितना माथा मारते हैं। बाप समझाते हैं अभी सबको जाना है फिर पार्ट बजाने के लिए आना है। यह तो बच्चों ने समझा है। बच्चे जब दु:खी होते हैं तो कहते हैं - हे भगवान, हमें अपने पास बुलाओ। हमको यहाँ दु:ख में क्यों छोड़ा है। जानते हैं बाप परमधाम में रहते हैं। तो कहते हैं - हे भगवान, हमको परमधाम में बुलाओ। सतयुग में ऐसे नहीं कहेंगे। वहाँ तो सुख ही सुख है। यहाँ अनेक दु:ख हैं तब पुकारते हैं - हे भगवान! आत्मा को याद रहती है। परन्तु भगवान को जानते बिल्कुल नहीं हैं। अभी तुम बच्चों को बाप का परिचय मिला है। बाप रहते ही हैं पर-मधाम में। घर को ही याद करते हैं। ऐसे कभी नहीं कहेंगे राजधानी में बुलाओ। राजधानी के लिए कभी नहीं कहेंगे। बाप तो राजधानी में रहते भी नहीं। वह रहते ही हैं शान्तिधाम में। सब शान्ति मांगते हैं। परमधाम में भगवान के पास तो जरूर शान्ति ही होगी, जिसको मुक्तिधाम कहा जाता है। वह है आत्माओं के रहने का स्थान, जहाँ से आत्मायें आती हैं। सतयुग को घर नहीं कहेंगे, वह है राजधानी। अब तुम कहाँ-कहाँ से आये हो। यहाँ आकर सम्मुख बैठे हो। बाप 'बच्चे-बच्चे' कह बात करते हैं। बाप के रूप में बच्चे-बच्चे भी कहते हैं फिर टीचर बन सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ अथवा हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। तुम बच्चे जानते हो मूलवतन है हम आत्माओं का घर। सूक्ष्मवतन तो है ही दिव्य दृष्टि की बात। बाकी सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग तो यहाँ ही होता है। पार्ट भी तुम यहाँ बजाते हो। सूक्ष्मवतन का कोई पार्ट नहीं। यह साक्षात्कार की बात है। कल और आज, यह तो अच्छी रीति बुद्धि में होना चाहिए। कल हम सतयुग में थे फिर 84 जन्म लेते-लेते आज नर्क में आ गये हैं। बाप को बुलाते भी नर्क में हैं। सतयुग में तो अथाह सुख हैं, तो कोई बुलाते ही नहीं। यहाँ तुम शरीर में हो तब बात करते हो। बाप भी कहते हैं मैं जानी जाननहार हूँ अर्थात् सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानता हूँ। परन्तु सुनाऊं कैसे! विचार की बात है ना इस-लिए लिखा हुआ है - बाप रथ लेते हैं। कहते हैं मेरा जन्म तुम्हारे सदृश्य नहीं है। मैं इसमें प्रवेश करता हूँ। रथ का भी परिचय देते हैं। यह आत्मा भी नाम-रूप धारण करते-करते तमोप्रधान बनी है। इस समय सब छोरे हैं, क्योंकि बाप को जानते नहीं हैं। तो सब छोरे और छोरियाँ हो गये। आपस में लड़ते हैं तो कहते हैं ना - छोरे-छोरियां लड़ते क्यों हो! तो बाप कहते हैं मुझे तो सब भूल गये हैं। आत्मा ही कहती है छोरे-छोरियां। लौकिक बाप भी ऐसे कहते हैं, बेहद का बाप भी कहते हैं छोरे-छोरियां यह हाल क्यों हुआ है? कोई धनी धोणी है? तुमको बेहद का बाप जो स्वर्ग का मालिक बनाते हैं, जिसको तुम आधाकल्प से पुकारते आये हो, उनके लिए कहते हो ठिक्कर भित्तर में है। बाप अब सम्मुख बैठ समझाते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो हम बाबा के पास आये हैं। यह बाबा ही हमको पढ़ाते हैं। हमारी नईया पार करते हैं क्योंकि यह नईया बहुत पुरानी हो गई है। तो कहते हैं इनको पार लगाओ फिर हमको नई दो। पुरानी नईया ख़ौफनाक होती है। कहाँ रास्ते में टूट पड़े, एक्सीडेंट हो जाए। तो तुम कहते हो हमारी नईया पुरानी हो गई है, अब हमें नई दो। इनको वस्त्र भी कहते हैं, नईया भी कहते हैं। बच्चे कहते बाबा हमको तो ऐसे (लक्ष्मी-नारायण) वस्त्र चाहिए।
बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, स्वर्गवासी बनने चाहते हो? हर 5 हज़ार वर्ष बाद तुम्हारे यह कपड़े पुराने होते हैं फिर नया देता हूँ। यह है आसुरी चोला। आत्मा भी आसुरी है। मनुष्य गरीब होगा तो कपड़े भी गरीबी के पहनेंगे। साहूकार होगा तो कपड़े भी साहूकारी के पहनेंगे। यह बातें अभी तुम जानते हो। यहाँ तुमको नशा चढ़ता है हम किसके सामने बैठे हैं। सेन्टर्स पर बैठते हो तो वहाँ तुमको यह भासना नहीं आयेगी। यहाँ सम्मुख होने से खुशी होती है क्योंकि बाप डायरेक्ट बैठ समझाते हैं। वहाँ कोई समझायेगा तो बुद्धियोग कहाँ-कहाँ भागता रहेगा। कहते हैं ना - गोरखधन्धे में फंसे रहते हैं। फुर्सत कहाँ मिलती है। मैं तुमको समझा रहा हूँ। तुम भी समझते हो - बाबा इस मुख द्वारा हमको समझाते हैं। इस मुख की भी कितनी महिमा है। गऊमुख से अमृत पीने के लिए कहाँ-कहाँ जाकर धक्के खाते हैं। कितनी मेहनत से जाते हैं। मनुष्य समझते ही नहीं हैं कि यह गऊमुख क्या है? कितने बड़े समझदार मनुष्य वहाँ जाते हैं, इसमें फायदा क्या? और ही टाइम वेस्ट होता है। बाबा कहते हैं यह सूर्यास्त आदि क्या देखेंगे। फायदा तो इनमें कुछ नहीं। फायदा होता ही है पढ़ाई में। गीता में पढ़ाई है ना। गीता में कोई भी हठयोग आदि की बात नहीं। उसमें तो राजयोग है। तुम आते भी हो राजाई लेने के लिए। तुम जानते हो इस आसुरी दुनिया में तो कितने लड़ाई-झगड़े आदि हैं। बाबा तो हमको योगबल से पावन बनाए विश्व का मालिक बना देते हैं। देवियों को हथियार दे दिये हैं परन्तु वास्तव में इसमें हथियारों आदि की कोई बात है नहीं। काली को देखो कितना भयानक बनाया है। यह सब अपने-अपने मन की भ्रान्तियों से बैठ बनाया है। देवियां कोई ऐसी 4-8 भुजाओं वाली थोड़ेही होंगी। यह सब भक्ति मार्ग है। सो बाप समझाते हैं - यह एक बेहद का नाटक है। इसमें कोई की निंदा आदि की बात नहीं। अनादि ड्रामा बना हुआ है। इसमें फ़र्क कुछ भी पड़ता नहीं है। ज्ञान किसको कहा जाता, भक्ति किसको कहा जाता, यह बाप समझाते हैं। भक्ति मार्ग से फिर भी तुमको पास करना पड़ेगा। ऐसे ही तुम 84 का चक्र लगाते-लगाते नीचे आयेंगे। यह अनादि बना-बनाया बड़ा अच्छा नाटक है जो बाप समझाते हैं। इस ड्रामा के राज़ को सम-झने से तुम विश्व के मालिक बन जाते हो। वन्डर है ना! भक्ति कैसे चलती है, ज्ञान कैसे चलता है, यह खेल अनादि बना हुआ है। इसमें कुछ भी चेन्ज नहीं हो सकता। वह तो कह देते ब्रह्म में लीन हो गया, ज्योति ज्योत समाया, यह संकल्प की दुनिया है, जिसको जो आता है वह कहते रहते हैं। यह तो बना-बनाया खेल है। मनुष्य बाइसकोप देखकर आते हैं। क्या उसको संकल्प का खेल कहेंगे? बाप बैठ समझाते हैं - बच्चे, यह बेहद का नाटक है जो हूबहू रिपीट होगा। बाप ही आकर यह नॉलेज देते हैं क्योंकि वह नॉलेजफुल है। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, चैतन्य है, उनको ही सारी नॉलेज है। मनुष्यों ने तो लाखों वर्ष आयु दिखा दी है। बाप कहते हैं इतनी आयु थोड़ेही हो सकती है। बाइसकोप लाखों वर्ष का हो तो कोई की बुद्धि में नहीं बैठे। तुम तो सारा वर्णन करते हो। लाखों वर्ष की बात कैसे वर्णन करेंगे। तो वह सब है भक्ति मार्ग। तुमने ही भक्ति मार्ग का पार्ट बजाया। ऐसे-ऐसे दु:ख भोगते-भोगते अब अन्त में आ गये हो। सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। अब वहाँ जाना है। अपने को हल्का कर दो। इसने भी हल्का कर दिया ना। तो सब बन्धन टूट जाएं। नहीं तो बच्चे, धन, कारखाने, ग्राहक, राजे, रजवाड़े आदि याद आते रहेंगे। धन्धा ही छोड़ दिया तो फिर याद क्यों आयेंगे। यहाँ तो सब कुछ भूलना है। इनको भूल अपने घर और राजधानी को याद करना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है। शान्तिधाम से फिर हमको यहाँ आना पड़े। बाप कहते हैं मुझे याद करो, इनको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह राजयोग है ना। तुम राजऋषि हो। ऋषि पवित्र को कहा जाता है। तुम पवित्र बनते हो राजाई के लिए। बाप ही तुम्हें सब सत्य बताते हैं। तुम भी समझते हो यह नाटक है। सब एक्टर्स यहाँ जरूर होने चाहिए। फिर बाप सबको ले जायेंगे। यह ईश्वर की बरात है ना। वहाँ बाप और बच्चे रहते हैं फिर यहाँ आते हैं पार्ट बजाने। बाप तो सदैव वहाँ रहते हैं। मुझे याद ही दु:ख में करते हैं। वहाँ फिर मैं क्या करूँगा। तुमको शान्तिधाम, सुखधाम में भेजा बाकी क्या चाहिए! तुम सुखधाम में थे बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में थी फिर नम्बरवार आते गये। नाटक आकर पूरा हुआ। बाप कहते हैं - बच्चे, अब ग़फलत मत करो। पावन तो जरूर बनना है। बाप कहते हैं यह वही ड्रामा अनुसार पार्ट बज रहा है। तुम्हारे लिए ड्रामा अनुसार मैं कल्प-कल्प आता हूँ। नई दुनिया में अब चलना है ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अब यह झाड़ पुराना जड़जड़ीभूत हो गया है, आत्मा को वापस घर जाना है इसलिए अपने को सब बन्धनों से मुक्त कर हल्का बना लेना है। यहाँ का सब कुछ बुद्धि से भूल जाना है।
2) अनादि ड्रामा को बुद्धि में रख किसी भी पार्टधारी की निंदा नहीं करनी है। ड्रामा के राज़ को समझ विश्व का मालिक बनना है।

वरदान: बुद्धि के साथ और सहयोग के हाथ द्वारा मौज का अनुभव करने वाले खुशनसीब आत्मा भव
जैसे सहयोग की निशानी हाथ में हाथ दिखाते हैं। ऐसे बाप के सदा सहयोगी बनना - यह है हाथ में हाथ और सदा बुद्धि से साथ रहना अर्थात् मन की लग्न एक में हो। सदा यही स्मृति रहे कि गाडली गार्डन में हाथ में हाथ देकर साथ-साथ चल रहे हैं। इससे सदा मनोरंजन में रहेंगे, सदा खुश और सम्पन्न रहेंगे। ऐसी खुशनसीब आत्मायें सदा ही मौज का अनुभव करती रहती हैं।

स्लोगन: दुआओं का खाता जमा करने का साधन है - सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना।

Tuesday, 29 October 2019

Hindi Murli 30/10/2019

30-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - एक बाप की याद में रहना ही अव्यभिचारी याद है, इस याद से तुम्हारे पाप कट सकते हैं''

प्रश्न: बाप जो समझाते हैं उसे कोई सहज मान लेते, कोई मुश्किल समझते - इसका कारण क्या है?
उत्तर: जिन बच्चों ने बहुत समय भक्ति की है, आधाकल्प से पुराने भक्त हैं, वह बाप की हर बात को सहज मान लेते हैं क्योंकि उन्हें भक्ति का फल मिलता है। जो पुराने भक्त नहीं उन्हें हर बात समझने में मुश्किल लगता। दूसरे धर्म वाले तो इस ज्ञान को समझ भी नहीं सकते।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप बैठ समझाते हैं तुम बच्चे सब क्या कर रहे हो? तुम्हारी है अव्यभिचारी याद। एक होती है व्यभिचारी याद, दूसरी होती है अव्यभिचारी याद। तुम सबकी है अव्यभिचारी याद। किसकी याद है? एक बाप की। बाप को याद करते-करते पाप कट जायेंगे और तुम वहाँ पहुँच जायेंगे। पावन बनकर फिर नई दुनिया में जाना है। आत्माओं को जाना है। आत्मा ही इन आरगन्स द्वारा सब कर्म करती है ना। तो बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। मनुष्य तो अनेकानेक को याद करते हैं। भक्ति मार्ग में तुमको याद करना है एक को। भक्ति भी पहले-पहले तुमने ऊंच ते ऊंच शिव-बाबा की ही की थी। उनको कहा जाता है अव्यभिचारी भक्ति। वही सर्व को सद्गति देने वाला रचता बाप है। उनसे बच्चों को बेहद का वर्सा मिलता है। भाई-भाई से वर्सा नहीं मिलता। वर्सा हमेशा बाप से बच्चों को मिलता है। थोड़ा बहुत कन्याओं को मिलता है। वह तो फिर जाकर हाफ पार्टनर बनती है। यहाँ तो तुम सब आत्मायें हो। सब आत्माओं का बाप एक है। सबको बाप से वर्सा लेने का हक है। तुम हो भाई-भाई, भल शरीर स्त्री-पुरुष का है। आत्मा सब भाई-भाई हैं। वह तो सिर्फ कहने मात्र कह देते हैं हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई। अर्थ नहीं समझते। तुम अभी अर्थ समझते हो। भाई-भाई माना सब आत्मायें एक बाप के बच्चे हैं फिर प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे भाई-बहन हैं। अभी तुम जानते हो इस दुनिया से सबको वापस जाना है। जो भी मनुष्य मात्र हैं, सबका पार्ट अब पूरा होता है। फिर बाप आकर पुरानी दुनिया से नई दुनिया में ले जाते हैं, पार ले जाते हैं। गाते भी हैं - खिवैया पार लगाओ अर्थात् सुखधाम में ले चलो। यह पुरानी दुनिया बदलकर फिर नई दुनिया जरूर बननी है। मूलवतन से लेकर सारी दुनिया का नक्शा तुम्हारी बुद्धि में है। हम आत्मायें सब स्वीटधाम, शान्तिधाम की निवासी हैं। यह तो बुद्धि में याद है ना। हम जब सतयुगी नई दुनिया में हैं तो बाकी और सभी आत्मायें शान्तिधाम में रहती हैं। आत्मा तो कभी विनाश नहीं होती। आत्मा में अविनाशी पार्ट भरा हुआ है। वह कभी भी विनाश नहीं हो सकता। समझो यह इन्जीनियर है फिर 5 हज़ार वर्ष बाद हूबहू ऐसा ही इन्जीनियर बनेगा। यही नाम रूप देश काल रहेगा। यह सब बातें बाप ही आकर समझाते हैं। यह अनादि-अविनाशी ड्रामा है। इस ड्रामा की आयु 5 हज़ार वर्ष है। सेकण्ड भी कम जास्ती नहीं हो सकता। यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है। सबको पार्ट मिला हुआ है। देही-अभिमानी हो, साक्षी हो खेल को देखना है। बाप को तो देह है नहीं। वह नॉलेजफुल है, बीजरूप है। बाकी आत्मायें जो ऊपर निराकारी दुनिया में रहती हैं वह फिर आती हैं नम्बरवार पार्ट बजाने। पहले-पहले नम्बर शुरू होता है देवताओं का। पहले नम्बर की ही डिनायस्टी के चित्र हैं फिर चन्द्रवंशी डिनायस्टी के भी चित्र हैं। सबसे ऊंच है सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण का राज्य, उन्हों का राज्य कब कैसे स्थापन हुआ - कोई भी मनुष्यमात्र नहीं जानते। सतयुग की आयु ही लाखों वर्ष लिख दी है। कोई की भी जीवन कहानी को नहीं जानते। इन लक्ष्मी-नारायण की जीवन कहानी को जानना चाहिए। बिगर जाने माथा टेकना अथवा महिमा करना यह तो रांग है। बाप बैठ मुख्य-मुख्य जो हैं उनकी जीवन कहानी सुनाते हैं। अभी तुम जानते हो - कैसे इन्हों की राजधानी चलती है। सतयुग में श्रीकृष्ण था ना। अभी वह कृष्णपुरी फिर स्थापन हो रही है। कृष्ण तो है स्वर्ग का प्रिन्स। लक्ष्मी-नारायण की राजधानी कैसे स्थापन हुई - यह सब तुम समझते हो।
नम्बरवार माला भी बनाते हैं। फलाने-फलाने माला के दाने बनेंगे। परन्तु चलते-चलते फिर हार भी खा लेते हैं। माया हरा देती है। जब तक सेना में हैं, कहेंगे यह कमान्डर है, यह फलाना है। फिर मर पड़ते हैं। यहाँ मरना अर्थात् अवस्था कम होना, माया से हारना। खत्म हो जाते हैं। आश्चर्यवत् सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती..... अहो मम माया..... फारकती देवन्ती हो जाते हैं। मरजीवा बनते हैं, बाप का बनते हैं फिर राम-राज्य से रावणराज्य में चले जाते हैं। इस पर ही फिर युद्ध दिखलाई है - कौरव और पाण्डवों की। फिर असुरों और देवताओं की भी युद्ध दिखाई है। एक युद्ध दिखाओ ना। दो क्यों? बाप समझाते हैं यहाँ की ही बात है। लड़ाई तो हिंसा हो जाती, यह तो है ही अहिंसा परमो देवी-देवता धर्म। तुम अभी डबल अहिंसक बनते हो। तुम्हारी है ही योगबल की बात। हथियारों आदि से तुम कोई को कुछ करते नहीं। वह ताकत तो क्रिश्चियन में भी बहुत है। रशिया और अमेरिका दो भाई हैं। इन दोनों की है काम्पीटीशन, बॉम्ब्स आदि बनाने की। दोनों एक-दो से ताकत वाले हैं। इतनी ताकत है, अगर दोनों आपस में मिल जाएं तो सारे वर्ल्ड पर राज्य कर सकते हैं। परन्तु लॉ नहीं है जो बाहुबल से कोई विश्व पर राज्य पा सके। कहानी भी दिखाते हैं - दो बिल्ले आपस में लड़े, मक्खन बीच में तीसरा खा गया। यह सब बातें अब बाप समझाते हैं। यह थोड़ेही कुछ जानता था। यह चित्र आदि भी बाप ने ही दिव्य दृष्टि से बनवाये हैं और अब समझा रहे हैं, वह आपस में लड़ते हैं। सारे विश्व की बादशाही तुम ले लेते हो। वह दोनों हैं बहुत पॉवरफुल। जहाँ-तहाँ आपस में लड़ा देते हैं। फिर मदद देते रहते हैं क्योंकि उन्हों का भी व्यापार है जबरदस्त। सो जब दो बिल्ले आपस में लड़ें तब तो बारूद आदि काम आये। जहाँ-तहाँ दो को लड़ा देते हैं। यह हिन्दुस्तान-पाकिस्तान पहले अलग था क्या। दोनों इकट्ठे थे, यह सब ड्रामा में नूँध है। अभी तुम पुरुषार्थ कर रहे हो - योगबल से विश्व का मालिक बनें। वह आपस में लड़ते हैं, मक्खन बीच में तुम खा लेते हो। माखन अर्थात् विश्व की बादशाही तुमको मिलती है और बहुत ही सिम्पल रीति मिलती है। बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, पवित्र जरूर बनना है। पवित्र बन पवित्र दुनिया में चलना है। उनको कहा जाता है वाइसलेस वर्ल्ड, सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। हरेक चीज सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो में जरूर आती है। बाप समझाते हैं - तुम्हारे में यह बुद्धि नहीं थी क्योंकि शास्त्रों में लाखों वर्ष कह दिया है। भक्ति है ही अज्ञान अन्धियारा। यह भी पहले तुमको पता थोड़ेही था। अब समझते हो वह तो कह देते कलियुग अभी 40 हज़ार वर्ष और चलेगा। अच्छा, 40 हज़ार वर्ष पूरा हो फिर क्या होगा? किसको भी यह पता नहीं है इसलिए कहा जाता है अज्ञान नींद में सोये हुए हैं। भक्ति है अज्ञान। ज्ञान देने वाला तो एक ही बाप ज्ञान का सागर है। तुम हो ज्ञान नदियाँ। बाप आकर तुम बच्चों को अर्थात् आत्माओं को पढ़ाते हैं। वह बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। और कोई भी ऐसे नहीं कहेंगे, यह हमारा बाप, टीचर, गुरू है। यह तो है बेहद की बात। बेहद का बाप, टीचर, सतगुरू है। खुद बैठ समझाते है मैं तुम्हारा सुप्रीम बाप हूँ, तुम सब हमारे बच्चे हो। तुम भी कहते हो - बाबा, आप वही हो। बाप भी कहते हैं तुम कल्प-कल्प मिलते हो। तो वह है परम आत्मा, सुप्रीम। वह आकर बच्चों को सब बातें समझाते हैं। कलियुग की आयु 40 हज़ार वर्ष और कहना बिल्कुल गपोड़ा है। 5 हज़ार वर्ष में सब आ जाता है। बाप जो समझाते हैं तुम मानते हो, समझते हो। ऐसे नहीं कि तुम नहीं मानते। अगर नहीं मानते तो यहाँ नहीं आते। इस धर्म के नहीं हैं तो फिर मानते नहीं हैं। बाप ने समझाया है सारा मदार भक्ति पर है। जिन्होंने बहुत भक्ति की है तो भक्ति का फल भी उन्हों को मिलना चाहिए। उन्हों को ही बाप से बेहद का वर्सा मिलता है। तुम जानते हो हम सो देवता विश्व के मालिक बनते हैं। बाकी थोड़े रोज़ हैं। इस पुरानी दुनिया का विनाश तो दिखाया हुआ है, और कोई शास्त्र में ऐसी बात है नहीं। एक गीता ही है भारत का धर्म शास्त्र। हरेक को अपना धर्म शास्त्र पढ़ना चाहिए और वह धर्म जिस द्वारा स्थापन हुआ उनको भी जानना चाहिए। जैसे क्रिश्चियन, क्राइस्ट को जानते हैं, उनको ही मानते हैं, पूजते हैं। तुम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हो तो देवताओं को ही पूजते हो। परन्तु आजकल अपने को हिन्दू धर्म का कह देते हैं।
तुम बच्चे अब राजयोग सीख रहे हो। तुम राजऋषि हो। वह हैं हठयोग ऋषि। रात-दिन का फ़र्क है। उन्हों का सन्यास है कच्चा, हद का। सिर्फ घरबार छोड़ने का। तुम्हारा सन्यास वा वैराग्य है सारी पुरानी दुनिया को छोड़ने का। पहले-पहले अपने घर स्वीट होम में जाकर फिर नई दुनिया सतयुग में आयेंगे। ब्रह्मा द्वारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है। अभी तो यह पतित पुरानी दुनिया है। यह समझने की बातें हैं। बाप द्वारा पढ़ते हैं। यह तो जरूर रीयल है ना। इसमें निश्चय न होने की तो बात ही नहीं। यह नॉलेज बाप ही पढ़ाते हैं। वह बाप टीचर भी है, सच्चा सतगुरू भी है, साथ ले जाने वाला। वो गुरू लोग तो आधा पर छोड़-कर चले जाते हैं। एक गुरू गया तो दूसरा गुरू करेंगे। उनके चेले को गद्दी पर बिठायेंगे। यहाँ तो है बाप और बच्चों की बात। वह फिर है गुरू और चेले के वर्से का हक। वर्सा तो बाप का ही चाहिए ना। शिवबाबा आते ही हैं भारत में। शिवरात्रि और कृष्ण की रात्रि मनाते हैं ना। शिव की जन्मपत्री तो है नहीं। सुनाये कैसे? उनकी तिथि-तारीख तो होती नहीं। कृष्ण जो पहला नम्बर वाला है, उनकी दिखाते हैं। दीपावली मनाना तो दुनिया के मनुष्यों का काम है। तुम बच्चों के लिए थोड़ेही दीपावली है। हमारा नया वर्ष, नई दुनिया सतयुग को कहा जाता है। अभी तुम नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हो। अभी तुम हो पुरूषोत्तम संगमयुग पर। उन कुम्भ के मेलों में कितने ढेर मनुष्य जाते हैं। वह होता है पानी की नदियों पर मेला। कितने ढेर मेले लगते हैं। उन्हों की भी अन्दर बहुत पंचायत होती है। कभी-कभी तो उन्हों का आपस में ही बड़ा झगड़ा हो जाता है क्योंकि देह-अभिमानी हैं ना। यहाँ तो झगड़े आदि की बात ही नहीं। बाप सिर्फ कहते हैं - मीठे-मीठे लाडले बच्चों, मुझे याद करो। तुम्हारी आत्मा जो सतोप्रधान से तमोप्रधान बनी है, खाद पड़ी है ना, वह योग अग्नि से ही निक-लेगी। सोनार लोग जानते हैं, बाप को ही पतित-पावन कहते हैं। बाप सुप्रीम सोनार ठहरा। सबकी खाद निकाल सच्चा सोना बना देते हैं। सोना अग्नि में डाला जाता है। यह है योग अर्थात् याद की अग्नि क्योंकि याद से ही पाप भस्म होते हैं। तमोप्रधान से सतोप्रधान याद की यात्रा से ही बनना है। सब तो सतोप्रधान नहीं बनेंगे। कल्प पहले मिसल ही पुरूषार्थ करेंगे। परम आत्मा का भी ड्रामा में पार्ट नूँधा हुआ है, जो नूँध है वह होता रहता है। बदल नहीं सकता। रील फिरता ही रहता है। बाप कहते हैं आगे चल तुमको गुह्य-गुह्य बातें सुनायेंगे। पहले-पहले तो यह निश्चय करना है - वह है सब आत्माओं का बाप। उनको याद करना है। मनम-नाभव का भी अर्थ यह है। बाकी कृष्ण भगवानुवाच तो है ही नहीं। अगर कृष्ण हो फिर तो सब उनके पास चले आयें। सब पहचान लें। फिर ऐसे क्यों कहते कि मुझे कोटों में कोई जानते हैं। यह तो बाप समझाते हैं इसलिए मनुष्यों को समझने में तकल़ीफ होती है। आगे भी ऐसा हुआ था। मैंने ही आकर देवी-देवता धर्म की स्थापना की थी फिर यह शास्त्र आदि सब गुम हो जाते हैं। फिर अपने समय पर भक्ति मार्ग के शास्त्र आदि सब वही निकलेंगे। सतयुग में एक भी शास्त्र नहीं होता। भक्ति का नाम-निशान नहीं। अभी तो भक्ति का राज्य है। सबसे बड़े ते बड़े हैं श्री श्री 108 जगतगुरू कहलाने वाले। आजकल तो एक हज़ार आठ भी कह देते हैं। वास्तव में यह माला है यहाँ की। माला जब फेरते हैं तो जानते हैं फूल निराकार है फिर है मेरू। ब्रह्मा-सरस्वती युगल दाना क्योंकि प्रवृत्ति मार्ग है ना। प्रवृत्ति मार्ग वाले निवृत्ति मार्ग वालों को गुरू करेंगे तो क्या देंगे? हठयोग सीखना पड़े। वह तो अनेक प्रकार के हठयोग हैं, राजयोग है ही एक प्रकार का। याद की यात्रा है ही एक, जिसको राजयोग कहा जाता है। बाकी और सब हैं हठयोग, शरीर की तन्दुरूस्ती के लिए। यह राजयोग बाप ही सिखलाते हैं। आत्मा है फर्स्ट फिर पीछे है शरीर। तुम फिर अपने को आत्मा के बदले शरीर समझ उल्टे हो पड़े हो। अब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) इस अनादि अविनाशी बने-बनाये ड्रामा में हरेक के पार्ट को देही-अभिमानी बन, साक्षी होकर देखना है। अपने स्वीट होम और स्वीट राजधानी को याद करना है, इस पुरानी दुनिया को बुद्धि से भूल जाना है।
2) माया से हारना नहीं है। याद की अग्नि से पापों का नाश कर आत्मा को पावन बनाने का पुरू-षार्थ करना है।

वरदान: हद के नाज़-नखरों से निकल रूहानी नाज़ में रहने वाले प्रीत बुद्धि भव
कई बच्चे हद के स्वभाव, संस्कार के नाज़-नखरे बहुत करते हैं। जहाँ मेरा स्वभाव, मेरे संस्कार यह शब्द आता है वहाँ ऐसे नाज़ नखरे शुरू हो जाते हैं। यह मेरा शब्द ही फेरे में लाता है। लेकिन जो बाप से भिन्न है वह मेरा है ही नहीं। मेरा स्वभाव बाप के स्वभाव से भिन्न हो नहीं सकता, इसलिए हद के नाज़ नखरे से निकल रूहानी नाज़ में रहो। प्रीत बुद्धि बन मोहब्बत की प्रीत के नखरे भल करो।

स्लोगन: बाप से, सेवा से और परिवार से मुहब्बत है तो मेहनत से छूट जायेंगे।

Monday, 28 October 2019

Hindi Murli 29/10/2019

29-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - उठते-बैठते बुद्धि में ज्ञान उछलता रहे तो अपार खुशी में रहेंगे''

प्रश्न: तुम बच्चों को किसके संग से बहुत-बहुत सम्भाल करनी है?
उत्तर: जिनकी बुद्धि में बाप की याद नहीं ठहरती, बुद्धि इधर-उधर भटकती रहती है, उनके संग से तुम्हें सम्भाल करनी है। उनके अंग से अंग भी नहीं लगना चाहिए क्योंकि याद में न रहने वाले वायुमण्डल को खराब करते हैं।

प्रश्न: मनुष्यों को पश्चाताप् कब होगा?
उत्तर: जब उन्हें पता पड़ेगा कि इन्हें पढ़ाने वाला स्वयं भगवान है तो उनका मुँह फीका पड़ जायेगा और पश्चाताप् करेंगे कि हमने ग़फलत की, पढ़ाई नहीं पढ़ी।

ओम् शान्ति। अब रूहानी यात्रा को तो बच्चे अच्छी तरह से समझते हैं। कोई भी हठयोग की यात्रा होती नहीं। यह है याद। याद के लिए कोई भी तकलीफ की बात नहीं है। बाप को याद करना - इसमें कोई तकल़ीफ नहीं है। यह क्लास है इसलिए सिर्फ कायदेसिर बैठना होता है। तुम बाप के बच्चे बने हो, बच्चों की पालना हो रही है। कौन-सी पालना? अविनाशी ज्ञान रत्नों का खजाना मिल रहा है। बाप को याद करने में कोई तक-ल़ीफ नहीं है। सिर्फ माया बुद्धि का योग तोड़ देती है। बाकी बैठो भल कैसे भी, उनसे कोई याद का तैलुक नहीं। बहुत बच्चे हठयोग से 3-4 घण्टे बैठते हैं। सारी रात भी बैठ जाते हैं। आगे तुम्हारी तो थी भट्ठी, वह बात और थी, वहाँ तुमको धन्धाधोरी तो था नहीं इसलिए यह सिखाया जाता था। अब बाप कहते हैं तुम गृहस्थ व्यवहार में रहो। धन्धाधोरी भी भल करो। कुछ भी काम काज करते बाप को याद करना है। ऐसे भी नहीं कि अभी निरन्तर तुम याद कर सकते हो। नहीं। इस अवस्था में टाइम लगता है। अभी निरन्तर याद ठहर जाए फिर तो कर्मातीत अवस्था हो जाए। बाप समझाते हैं - बच्चे, ड्रामा के प्लैन अनुसार अब बाकी थोड़ा समय है। सारा हिसाब भी बुद्धि में रहता है। कहते हैं क्राइस्ट से 3 हज़ार वर्ष पहले भारत ही था। उनको स्वर्ग कहा जाता था। अभी उन्हों के 2 हज़ार वर्ष पूरे होते हैं, 5000 वर्ष का हिसाब हो जाता है।
देखा जाता है तुम्हारा नाम सारा विलायत से ही निकलेगा क्योंकि उन्हों की बुद्धि फिर भी भारतवासियों से तीखी है। भारत से पीस भी वह मांगते हैं। भारतवासियों ने ही लाखों वर्ष कहकर और सर्वव्यापी का ज्ञान देकर बुद्धि बिगाड़ दी है। तमोप्रधान बन गये हैं। वह इतने तमोप्रधान नहीं बने हैं, उन्हों की बुद्धि तो बड़ी तीखी है। उन्हों का जब आवाज़ निकलेगा तब भारतवासी जागेंगे क्योंकि भारतवासी एकदम घोर नींद में सोये हुए हैं। वह थोड़े सोये हुए हैं। उन्हों से आवाज़ अच्छा निकलेगा, विलायत से आये भी थे कि हमको कोई बतावे - पीस कैसे हो सकती है? क्योंकि बाप भी भारत में ही आते हैं। यह बात तो तुम बच्चे ही बता सकते हो - दुनिया में फिर से वह पीस कब और कैसे होगी? तुम बच्चे तो जानते हो बरोबर पैराडाइज़ अथवा हेविन था। नई दुनिया में भारत पैराडाइज़ था। यह और कोई भी नहीं जानते हैं। मनुष्यों की बुद्धि में यह बात ही बैठ गई है कि ईश्वर सर्वव्यापी है और कल्प की आयु लाखों वर्ष कह दी है। सबसे जास्ती पत्थरबुद्धि यह भारत-वासी ही बने हैं। यह गीता शास्त्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग के। फिर भी यह सब ऐसे ही बनेंगे। भल ड्रामा को जानते हैं फिर भी बाप तो पुरूषार्थ कराते हैं। तुम बच्चे जानते हो विनाश तो जरूर होगा। बाप आये ही हैं नई दुनिया की स्थापना करने। यह तो खुशी की बात है ना। जब कोई बड़ा इम्तहान पास करते हैं तो अन्दर में खुशी होती है ना। हम यह सब पास कर यह (देवता) जाकर बनेंगे। सारा पढ़ाई पर मदार है।
तुम बच्चे जानते हो बरोबर बाप हमको पढ़ाकर यह बनाते हैं। बरोबर पैराडाइज़ हेविन था। मनुष्य तो बिचारे बिल्कुल ही मूँझे हुए हैं। बेहद के बाप पास जो ज्ञान है वह तुम बच्चों को दे रहे हैं। बाप की तुम महिमा करते हो - बाबा नॉलेजफुल है फिर ब्लिसफुल भी है, खजाना भी उनके पास फुल है। तुमको इतना साहूकार कौन बनाता है? यहाँ तुम क्यों आये हो? वर्सा पाने। अगर कोई की तन्दुरूस्ती अच्छी है परन्तु धन नहीं है तो धन बिगर क्या होगा! वैकुण्ठ में तो तुम्हारे पास धन रहता है। यहाँ जो-जो साहूकार हैं, उनको नशा रहता है हमारे पास इतना धन है, यह-यह कारखाने आदि हैं। शरीर छोड़ा खलास। तुम तो जानते हो हमको बाबा 21 जन्मों के लिए इतना खजाना दे देते हैं। बाप खुद तो खजाने का मालिक नहीं बनते हैं। तुम बच्चों को मालिक बनाते हैं। यह भी तुम जानते हो विश्व में शान्ति तो सिवाए गॉड फादर के कोई स्थापन कर न सके। सबसे फर्स्टक्लास चित्र है - यह त्रिमूर्ति गोले का। इस चक्र में ही सारा ज्ञान भरा हुआ है। तुम्हारी ऐसी कोई वन्डरफुल चीज़ होगी तब वह समझेंगे इसमें जरूर कोई ऐसा राज़ है। बच्चे कोई-कोई छोटे-छोटे खिलौने बनाते हैं, वह बाबा को पसन्द नहीं आते। बाबा तो कहते बड़े चित्र लगाओ जो दूर से कोई पढ़कर समझ सके। मनुष्य अटेन्शन बड़ी चीज़ पर देंगे। इसमें क्लीयर दिखाया हुआ है, उस तरफ है कलियुग, इस तरफ है सतयुग। बड़े-बड़े चित्र होंगे तो मनुष्यों का अटेन्शन खीचेगा। टूरिस्ट भी देखेंगे, समझेंगे भी वह अच्छी तरह से। यह भी जानते हैं क्राइस्ट से 3 हज़ार वर्ष पहले स्वर्ग था। बाहर तो ऐसे नहीं जानते। 5 हज़ार वर्ष का हिसाब तुम क्लीयर समझाते हो तो यह इतना बड़ा बनाना चाहिए जो दूर से देख सकें और अक्षर भी पढ़ें, जिससे समझें कि दुनिया की अन्त तो बरोबर है। बॉम्ब्स तो तैयार होते रहते हैं। नैचुरल कैलेमिटीज भी होगी। तुम विनाश का नाम सुनते हो तो अन्दर में खुशी बहुत होनी चाहिए। परन्तु ज्ञान ही नहीं होगा तो खुश भी हो न सके। बाप कहते हैं देह सहित सब कुछ छोड़ अपने को आत्मा समझो, अपनी आत्मा का योग मुझ बाप के साथ लगाओ। यह है मेहनत की बात। पावन बनकर ही पावन दुनिया में आना है। तुम समझते हो हम ही बादशाही लेते हैं, फिर गॅवाते हैं। यह तो बहुत सहज है। उठते, बैठते, चलते अन्दर में टपकना चाहिए, जैसे बाबा के पास ज्ञान है ना। बाप आये ही हैं पढ़ाकर देवता बनाने। तो इतनी अथाह खुशी बच्चों को रहनी चाहिए ना। अपने से पूछो इतनी अथाह खुशी है? बाप को इतना याद करते हैं? चक्र की भी सारी नॉलेज बुद्धि में है, तो इतनी खुशी रहनी चाहिए। बाप कहते हैं मुझे याद करो और बिल्कुल खुशी में रहो। तुमको पढ़ाने वाला देखो कौन है! जब सजब उन्हें पता पड़ेगा कि इन्हें पढ़ाने वाला स्वयं भगवान है तो उनका मुँह फीका पड़ जायेगा और पश्चाताप् करेंगे कि हमने ग़फलत की, पढ़ाई नहीं पढ़ी।बको मालूम पड़ेगा तो सबका मुँह ही फीका हो जायेगा। परन्तु अभी उन्हों के समझने में थोड़ी देरी है। अभी देवता धर्म के इतने मेम्बर्स तो बने नहीं हैं। सारी राजाई स्थापन हुई नहीं है। कितने ढेर मनुष्यों को बाप का पैगाम देना है! बेहद का बाप फिर से हमको स्वर्ग की बादशाही दे रहे हैं। तुम भी उस बाप को याद करो। बेहद का बाप तो जरूर बेहद का सुख देंगे ना। बच्चों के अन्दर में तो अथाह ज्ञान की खुशी होनी चाहिए और जितना बाप को याद करते रहेंगे तो आत्मा पवित्र बनती जायेगी।
ड्रामा के प्लैन अनुसार तुम बच्चे जितना सर्विस कर प्रजा बनाते हो तो जिनका कल्याण होता है उन्हों की फिर आशीर्वाद भी मिल जाती है। गरीबों की सर्विस करते हो। निमंत्रण देते रहो। ट्रेन में भी तुम बहुत सर्विस कर सकते हो। इतने छोटे बैज में ही कितनी नॉलेज भरी हुई है। सारी पढ़ाई का तन्त इसमें है। बैजेस तो बहुत अच्छे-अच्छे ढेर बनाने चाहिए जो किसको सौगात भी दे सकें। कोई को भी समझाना तो बहुत सहज है। सिर्फ शिवबाबा को याद करो। शिवबाबा से ही वर्सा मिलता है तो बाप और बाप का वर्सा स्वर्ग की बादशाही, कृष्णपुरी को याद करो। मनुष्यों की मत तो कितनी मूँझी हुई है। कुछ भी समझते नहीं हैं। विकार के लिए कितना तंग करते हैं। काम के पिछाड़ी कितना मरते हैं। कोई बात ही समझते नहीं। सबकी बुद्धि बिल्कुल चट हो गई है, बाप को जानते ही नहीं। यह भी ड्रामा में नूँध है। सबकी मेंटल खलास हो गई है (मानसिक शक्ति खत्म हो गई है)। बाप कहते हैं - बच्चों, तुम पवित्र बनो तो ऐसे स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे, परन्तु समझते ही नहीं। आत्मा की ताकत सारी निकल गई है। कितना समझाते हैं फिर भी पुरूषार्थ करना और कराना है। पुरूषार्थ में थकना नहीं है। हार्टफेल भी नहीं होना है। इतनी मेहनत की, भाषण से एक भी नहीं निकला। लेकिन तुमने जो सुनाया, उसे जिसने भी सुना उस पर छाप तो लग गयी। पिछाड़ी में सब जानेंगे जरूर। तुम बी.के. की अथाह महिमा निकलने वाली है। परन्तु एक्टिविटी देखते हैं तो जैसे एकदम बेसमझी की। कोई रिगार्ड ही नहीं, पूरी पहचान नहीं। बुद्धि बाहर भटकती रहती है। बाप को याद करें तो मदद भी मिले। बाप को याद करते नहीं तो गोया वह पतित हैं। तुम बनते हो पावन। जो बाप को याद नहीं करते हैं तो उन्हों की बुद्धि जरूर कहाँ न कहाँ भटकती रहती है। तो उनके साथ अंग-अंग से नहीं मिलना चाहिए क्योंकि याद में न रहने के कारण वह वायुमण्डल को खराब कर देते हैं। पवित्र और अपवित्र इकट्ठे हो न सके इसलिए बाप पुरानी सृष्टि को खलास कर देते हैं। दिन-प्रतिदिन कायदे भी सख्त निकलते जायेंगे। बाप को याद नहीं करते हैं तो फायदे के बदले और ही नुकसान करते हैं। पवित्रता का सारा मदार याद पर है। एक जगह बैठने की बात नहीं है। यहाँ इकट्ठा बैठने से तो अलग-अलग पहाड़ी पर जाकर बैठें वह अच्छा है। जो याद नहीं करते हैं वह हैं पतित। उनका तो संग भी नहीं करना चाहिए। चलन से भी मालूम पड़ता है। याद बिगर पावन तो बन न सकें। हर एक के ऊपर पापों का बोझा बहुत है - जन्म-जन्मान्तर का। वह बिगर याद की यात्रा निकले कैसे। वह गोया पतित ही हैं।
बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों के लिए सारी पतित दुनिया को खलास कर देता हूँ। उनका संग भी न हो। परन्तु इतनी भी बुद्धि नहीं कि किसके साथ संग करना चाहिए। तुम्हारा प्यार पावन का पावन के साथ होना चाहिए। यह भी बुद्धि चाहिए ना। स्वीट बाप और स्वीट राजधानी के सिवाए और कोई याद न आये। इतना सब त्याग करना कोई मासी का घर नहीं है। बाप को तो बच्चों पर अथाह प्यार है। बच्चे पावन बन जाओ तो तुम पावन दुनिया के मालिक बन जायेंगे। हम तुम्हारे लिए पावन दुनिया की स्थापना कर रहे हैं। इस पतित दुनिया को बिल्कुल खलास करा देते हैं। यहाँ इस पतित दुनिया में हर चीज़ तुमको दु:ख देती है। आयु भी कमती होती जाती है, इनको कहा जाता है वर्थ नाट ए पेनी। कौड़ी और हीरे में फर्क तो होता है ना। तो तुम बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। गाया भी जाता है सच तो बिठो नच। तुम सतयुग में खुशी में डांस करते हो। यहाँ की कोई भी वस्तु से दिल नहीं लगानी है। इनको तो देखते हुए देखना नहीं है, आंखें खुली होते हुए भी जैसे कि नींद हो, परन्तु वह हिम्मत, वह अवस्था चाहिए। यह तो निश्चय है कि यह पुरानी दुनिया होगी ही नहीं। इतना खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। चुटकी काटनी चाहिए - अरे, हम शिवबाबा को याद करेंगे तो विश्व की बादशाही मिलेगी। हठयोग से भी बैठना नहीं है। खाते-पीते, काम करते बाप को याद करो। यह भी जानते हो राजधानी स्थापन हो रही है। बाप थोड़ेही कहेंगे दासी बनें। बाप तो कहेंगे पुरूषार्थ करो पावन बनने का। बाप पावन बनाने का पुरूषार्थ कराते हैं तुम फिर पतित बनते हो, कितने झूठ पाप करते हो। हमेशा शिव-बाबा को याद करो तो पाप सब स्वाहा हो जाएं। यह बाबा का यज्ञ है ना। बड़ा भारी यज्ञ है। वह लोग यज्ञ रचते हैं - लाखों रूपया खर्च करते हैं। यहाँ तो तुम जानते हो सारी दुनिया इसमें स्वाहा हो जानी है। बाहर से आवाज़ होगा, भारत में भी फैलेगा। एक तो बाप के साथ बुद्धि का योग हो तो पाप कटें और फिर ऊंच पद भी मिले। बाप का तो फर्ज है बच्चों को पुरूषार्थ कराना। लौकिक बाप तो बच्चों की सेवा करते हैं, सेवा लेते भी हैं। यह बाप तो कहते हैं मैं तुम बच्चों को 21 जन्मों का वर्सा देता हूँ, तो ऐसे बाप को याद जरूर करना है, जिससे पाप कट जाएं। बाकी पानी से थोड़ेही पाप कटते हैं। पानी तो जहाँ-तहाँ है। विलायत में भी नदियाँ हैं तो क्या यहाँ की नदियाँ पावन बनाने वाली, विलायत की नदियाँ पतित बनाने वाली हैं क्या? कुछ भी मनुष्यों में समझ नहीं है। बाप को तो तरस पड़ता है ना। बाप समझाते हैं - बच्चे, ग़फलत मत करो। बाप इतना गुल-गुल बनाते हैं तो मेहनत करनी चाहिए ना। अपने पर रहम करना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) यहाँ की कोई भी वस्तु में दिल नहीं लगानी है। देखते हुए भी नहीं देखना है। आंखें खुली होते भी जैसे नींद का नशा रहता, ऐसे खुशी का नशा चढ़ा हुआ हो।
2) सारा मदार पवित्रता पर है, इसलिए सम्भाल करनी है कि पतित के अंग से अंग न लगे। स्वीट बाप और स्वीट राजधानी के सिवाए और कोई याद न आये।

वरदान: सेवा द्वारा मेवा प्राप्त करने वाले सर्व हद की चाहना से परे सदा सम्पन्न और समान भव
सेवा का अर्थ है मेवा देने वाली। अगर कोई सेवा असन्तुष्ट बनाये तो वो सेवा, सेवा नहीं है। ऐसी सेवा भल छोड़ दो लेकिन सन्तुष्टता नहीं छोड़ो। जैसे शरीर की तृप्ति वाले सदा सन्तुष्ट रहते हैं वैसे मन की तृप्ति वाले भी सन्तुष्ट होंगे। सन्तुष्टता तृप्ति की निशानी है। तृप्त आत्मा में कोई भी हद की इच्छा, मान, शान, सैलवेशन, साधन की भूख नहीं होगी। वे हद की सर्व चाहना से परे सदा सम्पन्न और समान होंगे।

स्लोगन: सच्ची दिल से नि:स्वार्थ सेवा में आगे बढ़ना अर्थात् पुण्य का खाता जमा होना।

Sunday, 27 October 2019

Hindi Murli 28/10/2019

28-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - विश्व का राज्य बाहुबल से नहीं लिया जा सकता, उसके लिए योगबल चाहिए, यह भी एक लॉ है''

प्रश्नः- शिवबाबा स्वयं ही स्वयं पर कौन-सा वन्डर खाते हैं?
उत्तर:- बाबा कहते देखो कैसा वन्डर है - मैं तुम्हें पढ़ाता हूँ, यह मैंने किसी से कभी पढ़ा नहीं। मेरा कोई बाप नहीं, मेरा कोई टीचर नहीं, गुरू नहीं। मैं सृष्टि चक्र में पुनर्जन्म लेता नहीं फिर भी तुम्हें सभी जन्मों की कहानी सुना देता हूँ। खुद 84 के चक्र में नहीं आता लेकिन चक्र का ज्ञान बिल्कुल एक्यूरेट देता हूँ।

om shanti रूहानी बाप तुम बच्चों को स्वदर्शन चक्रधारी बनाते हैं अर्थात् तुम इस 84 के चक्र को जान जाते हो। आगे नहीं जानते थे। अभी बाप द्वारा तुमने जाना है। 84 जन्मों के चक्र में तुम आते हो जरूर। तुम बच्चों को 84 के चक्र का नॉलेज देता हूँ। मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ परन्तु प्रैक्टिकल में 84 जन्मों के चक्र में आता नहीं हूँ। तो इससे समझ जाना चाहिए शिव बाप में सारा ज्ञान है। तुम जानते हो हम ब्राह्मण अभी स्वदर्शन चक्रधारी बनते हैं। बाबा नहीं बनते हैं। फिर उनमें अनुभव कहाँ से आया? हमको तो अनुभव प्राप्त होता है। बाबा कहाँ से अनुभव लाते हैं जो तुमको सुनाते हैं? प्रैक्टिकल अनुभव होना चाहिए ना। बाप कहते हैं मुझे ज्ञान का सागर कहते हैं परन्तु मैं तो 84 जन्मों के चक्र में आता नहीं हूँ। फिर मेरे में यह ज्ञान कहाँ से आया? टीचर पढ़ाते हैं तो जरूर खुद पढ़ा हुआ है ना। यह शिवबाबा कैसे पढ़ा? इनको कैसे 84 के चक्र का मालूम पड़ा, जबकि खुद 84 जन्मों में नहीं आता है। बाप बीजरूप होने कारण जानते हैं। खुद 84 के चक्र में नहीं आते हैं। परन्तु तुमको सब समझाते हैं, यह भी कितना वन्डर है। ऐसे भी नहीं, बाप कोई शास्त्र आदि पढ़ा हुआ है। कहा जाता है ड्रामा अनुसार उसमें यह नॉलेज नूंधी हुई है जो तुमको सुनाते हैं। तो वन्डरफुल टीचर हुआ ना। वन्डर खाना चाहिए ना इसलिए इनको बड़े-बड़े नाम दिये हैं। ईश्वर, प्रभू, अन्तर्यामी आदि-आदि। तुम वन्डर खाते हो ईश्वर में कैसे सारी नॉलेज भरी हुई है। उनमें आई कहाँ से जो तुमको समझाते हैं? उनको तो कोई बाप भी नहीं, जिससे जन्म लिया हो वा समझा हो। तुम सब भाई-भाई हो। वह एक कैसे तुम्हारा बाप है, बीजरूप है। कितनी नॉलेज बैठ बच्चों को सुनाते हैं। कहते हैं 84 जन्म मैं नहीं लेता हूँ, तुम लेते हो। तो जरूर प्रश्न उठेगा ना - बाबा आपको कैसे मालूम पड़ा। बाबा कहते हैं - बच्चे, अनादि ड्रामा अनुसार मेरे में पहले से यह नॉलेज है, जो तुमको पढ़ाता हूँ इसलिए ही मुझे ऊंच ते ऊंच भगवान् कहा जाता है। खुद चक्र में नहीं आते परन्तु उनमें सारी सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज है। तो तुम बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। उनको 84 के चक्र की नॉलेज कहाँ से मिली? तुमको तो मिली बाप से। बाप में ओरीज्नली नॉलेज है। उनको कहा ही जाता है नॉलेजफुल। कोई से पढ़ा भी नहीं है। तो भी उनको ओरीज्नली मालूम है इसलिए नॉलेजफुल कहा जाता है। यह वन्डर है ना इसलिए यह ऊंच ते ऊंच पढ़ाई गाई जाती है। बच्चों को वन्डर लगता है बाप पर। उनको क्यों नॉलेजफुल कहा जाता - एक तो यह समझने की बात है, दूसरी फिर क्या बात है? यह चित्र तुम दिखाते हो तो कोई पूछेंगे कि ब्रह्मा में भी अपनी आत्मा होगी और यह जो नारायण बनते हैं उनमें भी अपनी आत्मा होगी। दो आत्मायें हैं ना। एक ब्रह्मा, एक नारायण की। परन्तु विचार करेंगे तो यह कोई दो आत्मायें नहीं हैं। आत्मा एक ही है। यह एक सैम्पुल दिखाया जाता है देवता का। यह ब्रह्मा सो विष्णु अर्थात् नारायण बनते हैं, इसको कहा जाता है गुह्य बातें। बाप बहुत गुह्य नॉलेज सुनाते हैं जो और कोई पढ़ा न सके सिवाए बाप के। तो ब्रह्मा और विष्णु की कोई दो आत्मायें नहीं हैं। वैसे ही सरस्वती और लक्ष्मी - इन दोनों की दो आत्मायें हैं या एक? आत्मा एक है, शरीर दो हैं। यह सरस्वती ही फिर लक्ष्मी बनती है इसलिए एक आत्मा गिनी जायेगी। 84 जन्म एक ही आत्मा लेती है। यह बड़ी समझ की बात है। ब्राह्मण सो देवता, देवता सो क्षत्रिय बनते हैं। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। आत्मा एक ही है, एक यह सैम्पुल दिखाया जाता है - कैसे ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। हम सो का अर्थ कितना अच्छा है। इनको कहा जाता है गुह्य-गुह्य बातें। इसमें भी पहले-पहले तो यह समझ चाहिए कि हम एक बाप के बच्चे हैं। सभी आत्मायें असुल परम-धाम में रहने वाली हैं। यहाँ पार्ट बजाने आई हैं। यह खेल है। बाप तुमको इस खेल का समाचार बैठ सुनाते हैं। बाप तो ओरीज्नली जानते ही हैं। उनको कोई ने सिखलाया नहीं है। इस 84 के चक्र को वही जानते हैं जो इस समय तुमको सुनाते हैं। फिर तुम भूल जाते हो। फिर उनका शास्त्र कैसे बन सकता। बाप तो कोई शास्त्र पढ़ा हुआ नहीं है। फिर कैसे आकर नई-नई बातें सुनाते हैं, आधाकल्प है भक्ति मार्ग। यह बात भी शास्त्रों में नहीं है। यह शास्त्र भी ड्रामा अनुसार भक्ति मार्ग में बने हैं। तुम्हारी बुद्धि में शुरू से लेकर अन्त तक इस ड्रामा की कितनी बड़ी नॉलेज है। उनको जरूर मनुष्य तन का आधार लेना पड़े। शिवबाबा इस ब्रह्मा तन में बैठ इस सृष्टि चक्र की नॉलेज सुनाते हैं। मनुष्यों ने तो गपोड़े लगाकर सृष्टि की आयु ही कितनी लम्बी कर दी है। नई दुनिया सो फिर पुरानी दुनिया बनती है। नई दुनिया को कहा जाता है स्वर्ग, पुरानी को कहा जाता है नर्क। दुनिया तो एक ही है। नई दुनिया में रहते हैं देवी-देवता। वहाँ अपार सुख हैं। सारी सृष्टि नई होती है। अभी इनको पुराना कहा जाता है। नाम ही है आइरन एजड वर्ल्ड। जैसे ओल्ड देहली और न्यु देहली कहा जाता है। बाप समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, न्यु वर्ल्ड में न्यु देहली होगी। यह तो ओल्ड वर्ल्ड में ही कह देते हैं न्यु देहली। इनको न्यु कैसे कहेंगे! बाप समझाते हैं नई दुनिया में नई दिल्ली होगी। उनमें यह लक्ष्मी-नारा-यण राज्य करेंगे। उसको कहा जायेगा सतयुग। तुम इस सारे भारत में राज्य करेंगे। तुम्हारी गद्दी जमुना किनारे पर होगी। पिछाड़ी में रावण राज्य की गद्दी भी यहाँ ही है। राम राज्य की गद्दी भी यहाँ होगी। नाम देहली नहीं होगा। उसको परिस्तान कहा जाता है। फिर जो जैसा राजा होता है वह अपनी गद्दी का ऐसा नाम रखते हैं। इस समय तुम सब पुरानी दुनिया में हो। नई दुनिया में जाने के लिए तुम पढ़ रहे हो। फिर से मनुष्य से देवता बन रहे हो। पढ़ाने वाला है बाप।

तुम जानते हो ऊंचे ते ऊंचे बाप ने नीचे आकर राजयोग सिखाया है। अभी तुम हो संगम पर जबकि कलियुगी पुरानी दुनिया खत्म होनी है। बाप ने इनका हिसाब भी बताया है, मैं आता हूँ ब्रह्मा तन में। मनुष्यों को तो पता ही नहीं है कि ब्रह्मा कौन-सा? सुना है प्रजापिता ब्रह्मा। तुम प्रजा हो ना ब्रह्मा की इसलिए अपने को बी.के. कहलाते हो। वास्तव में शिवबाबा के बच्चे शिववंशी हो जब निराकार आत्मायें हो, फिर साकार में प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे भाई-बहन हो और कोई भी सम्बन्ध नहीं है। इस समय तुम उस कलियुगी सम्बन्ध को भूलते हो क्योंकि उनमें बन्धन है। तुम जाते हो नई दुनिया में। ब्राह्मणों की चोटी होती है। चोटी ब्राह्मणों की निशानी है। तुम ब्राह्मणों का यह कुल है। वह हैं कलियुगी ब्राह्मण। ब्राह्मण अक्सर करके पण्डे होते हैं। एक धामा खाते हैं, दूसरे ब्राह्मण गीता सुनाते हैं। अभी तुम ब्राह्मण यह गीता सुनाते हो, वह भी गीता सुनाते हैं, तुम भी गीता सुनाते हो। फर्क देखो कितना है! तुम कहते हो कृष्ण को भगवान नहीं कह सकते। कृष्ण को तो देवता कहा जाता है। उनमें दैवीगुण हैं। उनको तो इन आंखों से देखा जा सकता है। शिव के मन्दिर में देखेंगे शिव को अपना शरीर है नहीं। वह है परम आत्मा अर्थात् परमात्मा। ईश्वर, प्रभू, भगवान आदि अक्षर का कोई अर्थ नहीं निकलता। परमात्मा ही सुप्रीम आत्मा है। तुम नान सुप्रीम हो। फर्क देखो कितना है, तुम्हारी आत्मा और उस आत्मा में। तुम आत्मायें अभी परमात्मा से सीख रही हो। वह कोई से सीखा नहीं है। यह तो फादर है ना। उस परमपिता परमात्मा को तुम फादर भी कहते, टीचर भी कहते और गुरू भी कहते। है एक ही। और कोई भी आत्मा बाप टीचर गुरू नहीं बन सकती है। एक ही परम आत्मा है उनको कहा जाता है सुप्रीम। हर एक को पहले फादर चाहिए, फिर टीचर चाहिए फिर पिछाड़ी में चाहिए गुरू। बाप भी कहते हैं - मैं तुम्हारा बाप भी बनता हूँ फिर टीचर बनता हूँ और फिर मैं ही तुम्हारा सद्गति दाता सतगुरू भी बनता हूँ। सद्गति देने वाला गुरू है ही एक। बाकी तो गुरू अनेक हैं। बाप कहते हैं मैं तुम सबको सद्गति देता हूँ, तुम सब सतयुग में जायेंगे बाकी सब चले जायेंगे शान्तिधाम, जिसको परमधाम कहते हैं। सतयुग में आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। बाकी कोई धर्म है नहीं और सभी आत्मायें चली जाती है मुक्तिधाम। सद्गति कहा जाता है सतयुग को, पार्ट बजाते-बजाते फिर दुर्गति में आ जाते हैं। तुम ही सद्गति से फिर दुर्गति में आते हो। तुम ही पूरे 84 जन्म लेते हो। यथा राजा-रानी तथा प्रजा जो उस समय होंगे। 9 लाख तो पहले आयेंगे। 84 जन्म 9 लाख तो लेंगे ना फिर दूसरे आते रहेंगे - यह हिसाब किया जाता है। जो बाप समझाते हैं। सब 84 जन्म नहीं लेते हैं, पहले-पहले आने वाले ही 84 जन्म लेते हैं फिर कम-कम लेते आते हैं। मैक्सीमम हैं 84, यह जो बातें हैं और कोई मनुष्य नहीं जानते। बाप ही बैठ समझाते हैं। गीता में है भगवानुवाच। अभी तुम समझ गये हो - आदि सनातन देवी-देवता धर्म कोई कृष्ण ने नहीं रचा। यह तो बाप ही स्थापन करते हैं। कृष्ण की आत्मा ने 84 जन्मों के अन्त में यह ज्ञान सुना है जो पहले नम्बर में आया। यह बातें समझने की हैं। रोज़ पढ़ना है, तुम स्टूडेन्ट हो भगवान के। भगवानुवाच है ना। मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। यह है पुरानी दुनिया, नई दुनिया माना सतयुग। अभी है कलियुग। बाप आकर कलियुगी पतित से सतयुगी पावन देवता बनाते हैं इसलिए कलियुगी मनुष्य पुकारते हैं - बाबा आकर हमको पावन बनाओ। कलियुगी पतित से सतयुगी पावन बनाओ। फ़र्क देखो कितना है। कलियुग में हैं अपार दु:ख। बच्चा जन्मा सुख हुआ, कल मर गया - दु:खी हो जायेगा। सारी आयु कितना दु:ख होता है। यह है ही दु:ख की दुनिया। अभी बाप सुख की दुनिया स्थापन कर रहे हैं। तुमको स्वर्गवासी देवता बनाते हैं। अभी तुम पुरूषोत्तम संगमयुग पर हो। उत्तम ते उत्तम पुरूष वा नारी बनते हो। तुम आते ही हो यह लक्ष्मी-नारायण बनने के लिए। स्टूडेन्ट टीचर से योग रखते हैं क्योंकि समझते हैं इन द्वारा हम पढ़कर फलाना बनेंगे। यहाँ तुम योग लगाते हो परमपिता परमात्मा शिव से, जो तुम्हें देवता बनाते हैं। कहते हैं मुझ अपने बाप को याद करो, जिसके तुम सालिग्राम बच्चे हो। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो वही नॉलेजफुल है। बाप तुम्हें सच्ची गीता सुनाते हैं परन्तु खुद पढ़ा हुआ नहीं है। कहते हैं मैं किसका बच्चा नहीं, कोई से पढ़ा हुआ नहीं हूँ। मेरा कोई गुरू नहीं। मैं फिर तुम बच्चों का बाप, टीचर, गुरू हूँ। उनको कहा जाता है परम आत्मा। इस सारे सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जानते हैं, जब तक वह न सुनावें, तब तक तुम आदि, मध्य, अन्त को समझ न सको। इस चक्र को जानने से तुम चक्रवर्ती राजा बनते हो। तुमको यह बाबा नहीं पढ़ाते हैं, इसमें शिवबाबा प्रवेश कर आत्माओं को पढ़ाते हैं। यह नई बात है ना। यह होते ही हैं संगम पर। पुरानी दुनिया खत्म हो जायेगी, किसकी दबी रही धूल में, किसकी राजा खाए.......। बच्चों को कहते हैं बहुतों का कल्याण करने लिए, फिर से देवता बनाने के लिए यह पाठशाला म्युज़ियम खोलो। जहाँ बहुत आकर सुख का वर्सा पायेंगे। अभी रावण राज्य है ना। राम राज्य में था सुख, रावण राज्य में है दु:ख क्योंकि सब विकारी बन गये हैं। वह है ही निर्विकारी दुनिया। बच्चे तो इन लक्ष्मी-नारायण आदि को भी हैं ना। परन्तु वहाँ है योगबल। बाप तुमको योगबल सिखलाते हैं। योगबल से तुम विश्व के मालिक बनते हो, बाहुबल से कोई विश्व का मालिक बन न सके। लॉ नहीं कहता। तुम बच्चे याद के बल से सारे विश्व की बादशाही ले रहे हो। कितनी ऊंची पढ़ाई है। बाप कहते हैं - पहले-पहले पवित्रता की प्रतिज्ञा करो। पवित्र बनने से ही फिर तुम पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कलियुगी सम्बन्ध जो कि इस समय बन्धन है, उन्हें भूल स्वयं को संगमयुगी ब्राह्मण समझना है। सच्ची गीता सुननी और सुनानी है।
2) पुरानी दुनिया खत्म होनी है इसलिए अपना सब कुछ सफल करना है। बहुतों के कल्याण लिए, मनुष्यों को देवता बनाने के लिए यह पाठशाला वा म्युज़ियम खोलने हैं।

वरदान:- दृढ़ संकल्प की तीली से आत्मिक बाम्ब की आतिशबाजी जलाने वाले सदा विजयी भव
आजकल आतिशबाजी में बाम्ब बनाते हैं लेकिन आप दृढ़ संकल्प की तीली से आत्मिक बाम्ब की आतिशबाजी जलाओ जिससे पुराना सब समाप्त हो जाए। वह लोग तो आतिशबाजी में पैसा गंवाते और आप कमाई जमा करते हो। वह आतिशबाजी है और आपकी उड़ती कला की बाजी है। इसमें आप विजयी बन जाते हो। तो डबल फायदा लो, जलाओ भी, कमाओ भी - यह विधि अपनाओ।

slogan:- किसी विशेष कार्य में मददगार बनना ही दुआओं की लिफ्ट लेना है।

Saturday, 26 October 2019

Hindi Murli 27/10/2019

27-10-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 27-02-85 मधुबन

शिव शक्ति पाण्डव सेना की विशेषतायें
आज बापदादा अमृतवेले से विशेष सम्मुख आये हुए दूरदेश में रहने वाले, दिल से समीप रहने वाले डबल विदेशी बच्चों को देख रहे थे। बाप और दादा की आपस में आज मीठी रूह-रूहान चल रही थी। किस बात पर? ब्रह्मा बाप विशेष डबल विदेशी बच्चों को देख हर्षित हो बोले कि कमाल है बच्चों की जो इतना दूर देशवासी होते हुए भी सदा स्नेह से एक ही लगन में रहते कि सभी को किस भी रीति से बापदादा का सन्देश जरूर पहुँ-चायें। उसके लिए कई बच्चे डबल कार्य करते हुए लौकिक और अलौ-किक में डबल बिजी होते भी अपने आराम को भी न देखते हुए रात दिन उसी लगन में लगे हुए हैं। अपने खाने-पीने की भी परवाह न करके सेवा की धुन में लगे रहते हैं। जिस प्युरिटी की बात को अननैचुरल जीवन समझते रहे, उसी प्युरिटी को अपनाने के लिए, इमप्युरिटी को त्याग करने के लिए हिम्मत से, दृढ़ संकल्प से, बाप के स्नेह से, याद की यात्रा द्वारा शान्ति की प्राप्ति के आधार से, पढ़ाई और परिवार के संग के आधार से अपने जीवन में धारण कर ली है। जिसको मुश्किल समझते थे वह सहज कर ली है। ब्रह्मा बाप विशेष पाण्डव सेना को देख बच्चों की महिमा गा रहे थे। किस बात की? हर एक की दिल में है कि पवित्रता ही योगी बनने का पहला साधन है। पवित्रता ही बाप के स्नेह को अनुभव करने का साधन है, पवित्रता ही सेवा में सफलता का आधार है। यह शुभ संकल्प हरेक की दिल में पक्का है। और पाण्डवों की कमाल यह है जो शक्तियों को आगे रखते हुए भी स्वयं को आगे बढ़ाने के उमंग उत्साह में चल रहे हैं। पाण्डवों के तीव्र पुरूषार्थ करने की रफ्तार, अच्छी उन्नति को पाने वाली दिखाई दे रही है। मैजारिटी इसी रफ्तार से आगे बढ़ते जा रहे हैं।

शिव बाप बोले - पाण्डवों ने अपना विशेष रिगार्ड देने का रिकार्ड अच्छा दिखाया है। साथ-साथ हंसी की बात भी बोली। बीच-बीच में संस्कारों का खेल भी खेल लेते हैं। लेकिन फिर भी उन्नति के उमंग कारण बाप से अति स्नेह होने के कारण समझते हैं स्नेह के पीछे यह परि-वर्तन ही बाप को प्यारा है इसलिए बलिहार हो जाते हैं। बाप जो कहते, जो चाहते वही करेंगे। इस संकल्प से अपने आपको परिवर्तन कर लेते हैं। मुहब्बत के पीछे मेहनत, मेहनत नहीं लगती। स्नेह के पीछे सहन करना, सहन करना नहीं लगता इसलिए फिर भी बाबा-बाबा कह करके आगे बढ़ते जा रहे हैं। इस जन्म के चोले के संस्कार पुरुषत्व अर्थात् हद के रचता पन के होते हुए फिर भी अपने को परिवर्तन अच्छा किया है। रचता बाप को सामने रखने कारण निरहंकारी और नम्रता भाव इस धारणा का लक्ष्य और लक्षण अच्छे धारण किये हैं और कर रहे हैं। दुनिया के वातावरण के बीच सम्पर्क में आते हुए फिर भी याद की लगन की छत्रछाया होने के कारण सेफ रहने का सबूत अच्छा दे रहे हैं। सुना-पाण्डवों की बातें। बापदादा आज माशूक के बजाए आशिक हो गये हैं इसलिए देख-देख हर्षित हो रहे हैं। दोनों का बच्चों से विशेष स्नेह तो है ना। तो आज अमृतवेले से बच्चों के विशेषताओं की वा गुणों की माला सिमरण की। आप लोगों ने 63 जन्मों में मालायें सिमरण की और बाप रिटर्न में अभी माला सिमरण कर रेसपान्ड दे देते हैं।

अच्छा शक्तियों की क्या माला सिमरण की? शक्ति सेना की सबसे ज्यादा विशेषता यह है-स्नेह के पीछे हर समय एक बाप में लवलीन रहने की, सर्व सम्बन्धों के अनुभवों में अच्छी लगन से आगे बढ़ रही हैं। एक ऑख में बाप, दूसरी ऑख में सेवा दोनों नयनों में सदा यही समाया हुआ है। विशेष परिवर्तन यह है जो अपने अलबेलेपन, नाज़ुकपन का त्याग किया है। हिम्मत वाली शक्ति स्वरूप बनी हैं। बापदादा आज विशेष छोटी-छोटी आयु वाली शक्तियों को देख रहे थे। इस युवा अवस्था में अनेक प्रकार के अल्पकाल के आकर्षण को छोड़ एक ही बाप की आकर्षण में अच्छे उमंग-उत्साह से चल रहे हैं। संसार को असार संसार अनुभव कर बाप को संसार बना दिया है। अपने तन-मन-धन को बाप और सेवा में लगाने से प्राप्ति का अनुभव कर आगे उड़ती कला में जा रही हैं। सेवा की जिम्मेवारी का ताज धारण अच्छा किया है। थकावट को कभी-कभी महसूस करते हुए, बुद्धि पर कभी-कभी बोझ अनुभव करते हुए भी बाप को फालो करना ही है, बाप को प्रत्यक्ष करना ही है इस दृढ़ता से इन सब बातों को समाप्त कर फिर भी सफलता को पा रही हैं इस-लिए बापदादा जब बच्चों की मुहब्बत को देखते हैं तो बार-बार यही वरदान देते हैं-"हिम्मते बच्चे मददे बाप''। सफलता आपका जन्म सिद्ध अधिकार है ही है। बाप का साथ होने से हर परिस्थिति से ऐसे पार कर लेते जैसे माखन से बाल। सफलता बच्चों के गले की माला है। सफलता की माला आप बच्चों का स्वागत करने वाली है। तो बच्चों के त्याग, तपस्या और सेवा पर बापदादा भी कुर्बान जाते हैं। स्नेह के कारण कोई भी मुश्किल अनुभव नहीं करते। ऐसे है ना! जहाँ स्नेह है, स्नेह की दुनिया में वा बाप के संसार में बाप की भाषा में मुश्किल शब्द है ही नहीं। शक्ति सेना की विशेषता है मुश्किल को सहज करना। हर एक की दिल में यही उमंग है कि सबसे ज्यादा और जल्दी से जल्दी सन्देश देने के निमित बन बाप के आगे रूहानी गुलाब का गुलदस्ता लावें। जैसे बाप ने हमको बनाया है वैसे हम औरों को बनाकर बाप के आगे लावें। शक्ति सेना एक दो के सहयोग से संगठित रूप में भारत से भी कोई विशेष नवीनता विदेश में करने के शुभ उमंग में है। जहाँ संकल्प है वहाँ सफलता अवश्य है। शक्ति सेना हर एक अपने भिन्न-भिन्न स्थानों पर वृद्धि और सिद्धि को प्राप्त करने में सफल हो रही है और होती रहेगी। तो दोनों के स्नेह को देख, सेवा के उमंग को देख बापदादा हर्षित हो रहे हैं। एक-एक के गुण कितने गायन करें लेकिन वतन में एक-एक बच्चे के गुण बापदादा वर्णन कर रहे थे। देश वाले सोचते-सोचते कई रह जायेंगे लेकिन विदेश वाले पहचान कर अधिकारी बन गये हैं। वह देखते रह जायेंगे, आप बाप के साथ घर पहुँच जायेंगे। वह चिल्लायेंगे और आप वरदानों की दृष्टि से फिर भी कुछ न कुछ अंचली देते रहेंगे।

तो सुना आज विशेष बापदादा ने क्या किया? सारा संगठन देख बापदादा भाग्यवान बच्चों के भाग्य बनाने की महिमा गा रहे थे। दूर वाले नजदीक के हो गये और नजदीक आबू में रहने वाले कितने दूर हो गये हैं! पास रहते भी दूर हैं। और आप दूर रहते भी पास हैं। वह देखने वाले और आप दिल-तख्त पर सदा रहने वाले। कितने स्नेह से मधुबन आने का साधन बनाते हैं। हर मास यही गीत गाते हैं - बाप से मिलना है, जाना है। जमा करना है। तो यह लगन भी मायाजीत बनने का साधन बन जाती है। अगर सहज टिकेट मिल जाए तो इतनी लगन में विघ्न ज्यादा पड़ें। लेकिन फुरी-फुरी तलाब करते हैं इसलिए बूँद-बूँद जमा करने में बाप की याद समाई हुई होती है इसलिए यह भी ड्रामा में जो होता है, कल्याणकारी है। अगर ज्यादा पैसे मिल जाएं तो फिर माया आ जाए फिर सेवा भूल जायेगी इसलिए धनवान, बाप के अधिकारी बच्चे नहीं बनते हैं।

कमाया और जमा किया। अपनी सच्ची कमाई का जमा करना इसी में बल है। सच्ची कमाई का धन बाप के कार्य में सफल हो रहा है। अगर ऐसे ही धन आ जाए तो तन नहीं लगेगा। और तन नहीं लगेगा तो मन भी नीचे ऊपर होगा इसलिए तन-मन-धन तीनों ही लग रहे हैं इसलिए संगमयुग पर कमाया और ईश्वरीय बैंक में जमा किया, यह जीवन ही नम्बरवन जीवन है। कमाया और लौकिक विनाशी बैंकों में जमा किया तो वह सफल नहीं होता। कमाया और अविनाशी बैंक में जमा किया तो एक पदमगुणा बनता। 21 जन्मों के लिए जमा हो जाता। दिल से किया हुआ दिलाराम के पास पहुँचता है। अगर कोई दिखावा की रीति से करते तो दिखावे में ही खत्म हो जाता है। दिलाराम तक नहीं पहुँचता इसलिए आप दिल से करने वाले अच्छे हो। दिल से दो करने वाले भी पदमापदम पति बन जाते हैं और दिखावा से हजार करने वाले भी पदमापदम पति नहीं बनते। दिल की कमाई, स्नेह की कमाई सच्ची कमाई है। कमाते किसलिए हो? सेवा के लिए, ना कि अपने आराम के लिए? तो यह है सच्ची दिल की कमाई। जो एक भी पदमगुणा बन जाता है। अगर अपने आराम के लिए कमाते वा जमा करते हैं तो यहाँ भले आराम करेंगे लेकिन वहाँ औरों को आराम देने लिए निमित्त बनेंगे! दास-दासियाँ क्या करेंगे! रॉयल फैमली को आराम देने के लिए होंगे ना! यहाँ के आराम से वहाँ आराम देने के लिए निमित्त बनना पड़े इसलिए जो मुहब्बत से सच्ची दिल से कमाते हो, सेवा में लगाते हो वही सफल कर रहे हो। अनेक आत्माओं की दुआयें ले रहे हो। जिन्हों के निमित्त बनते हो वही फिर आपके भक्त बन आपकी पूजा करेंगे क्योंकि आपने उन आत्माओं के प्रति सेवा की तो सेवा का रिटर्न वह आपके जड़ चित्रों की सेवा करेंगे! पूजा करेंगे! 63 जन्म सेवा का रिटर्न आपको देते रहेंगे। बाप से तो मिलेगा ही लेकिन उन आत्माओं से भी मिलेगा। जिनको सन्देश देते हो और अधिकारी नहीं बनते हैं तो फिर वह इस रूप से रिटर्न देंगे। जो अधिकारी बनते वह तो आपके संबंध में आ जाते हैं। कोई संबंध में आ जाते। कोई भक्त बन जाते। कोई प्रजा बन जाते। वैराइटी प्रकार की रिजल्ट निकलती है। समझा! लोग भी पूछते हैं ना कि आप सेवा के पीछे क्यों पड़ गये हो। खाओ पियो मौज करो। क्या मिलता है जो इतना दिन-रात सेवा के पीछे पड़ते हो। फिर आप क्या कहते हो? जो हमको मिला है वह अनुभव करके देखो। अनुभवी ही जाने इस सुख को। यह गीत गाते हो ना! अच्छा।

सदा स्नेह में समाये हुए, सदा त्याग को भाग्य अनुभव करने वाले, सदा एक को पदमगुणा बनाने वाले, सदा बापदादा को फालो करने वाले, बाप को संसार अनुभव करने वाले ऐसे दिलतख्तनशीन बच्चों को दिलाराम बाप का यादप्यार और नमस्ते।

विदेशी भाई-बहिनों से पर्सनल मुलाकात

1) अपने को भाग्यवान आत्मायें समझते हो? इतना भाग्य तो बनाया जो भाग्यविधाता के स्थान पर पहुँच गये। समझते हो यह कौन-सा स्थान है? शान्ति के स्थान पर पहुँचना भी भाग्य है। तो यह भी भाग्य प्राप्त करने का रास्ता खुला। ड्रामा अनुसार भाग्य प्राप्त करने के स्थान पर पहुँच गये। भाग्य की रेखा यहाँ ही खींची जाती है। तो अपना श्रेष्ठ भाग्य बना लिया।

अभी सिर्फ थोड़ा समय देना। समय भी है और संग भी कर सकते हो। और कोई मुश्किल बात तो है नहीं। जो मुश्किल होता उसके लिए थोड़ा सोचा जाता है। सहज है तो करो। इससे जो भी जीवन में अल्प-काल की आशायें वा इच्छायें हैं वह सब अविनाशी प्राप्ति में पूरी हो जायेंगी। इन अल्पकाल की इच्छाओं के पीछे जाना ऐसे ही है जैसे अपनी परछाई के पीछे जाना। जितना परछाई के पीछे जायेंगे उतना वह आगे बढ़ती हैं, पा नहीं सकते। लेकिन आप आगे बढ़ते जाओ तो वह आपे ही पीछे-पीछे आयेंगी। तो ऐसे अविनाशी प्राप्ति के तरफ जाने वाले के पीछे विनाशी बातें सब पूरी हो जाती हैं। समझा! सर्व प्राप्तियों का साधन यही है। थोड़े समय का त्याग सदाकाल का भाग्य बनाता है। तो सदा इसी लक्ष्य को समझते हुए आगे बढ़ते चलो। इससे बुहत खुशी का खजाना मिलेगा। जीवन में सबसे बड़े ते बड़ा खजाना खुशी है। अगर खुशी नहीं तो जीवन नहीं। तो अविनाशी खुशी का खजाना प्राप्त कर सकते हो।

2) बापदादा बच्चों के सदा आगे बढ़ने का उमंग-उत्साह देखते हैं। बच्चों का उमंग बापदादा के पास पहुँचता है। बच्चों के अन्दर है कि विश्व के वी.वी.आई.पी. बाप के सामने ले जाऊं - यह उमंग भी साकार में आता जायेगा क्योंकि नि:स्वार्थ सेवा का फल जरूर मिलता है। सेवा ही स्व की स्टेज बना देती है इसलिए यह कभी नहीं सोचना कि सर्विस इतनी बड़ी है, मेरी स्टेज तो ऐसी है नहीं। लेकिन सर्विस आपकी स्टेज बना देगी। दूसरों की सर्विस ही स्व-उन्नति का साधन है। सर्विस आपेही शक्तिशाली अवस्था बनाती रहेगी। बाप की मदद मिलती है ना। बाप की मदद मिलते-मिलते वह शक्ति बढ़ते-बढ़ते वह स्टेज भी हो जायेगी। समझा! इसलिए यह कभी नहीं सोचो कि इतनी सर्विस मैं कैसे करूँगा/करूँगी, मेरी स्टेज ऐसी है। नहीं। करते चलो। बापदादा का वरदान है आगे बढ़ना ही है। सेवा का मीठा बंधन भी आगे बढ़ने का साधन है। जो दिल से और अनुभव की अथॉरिटी से बोलते हैं उनका आवाज दिल तक पहुँचता है। अनुभव की अथॉरिटी के बोल औरों को अनु-भव करने की प्रेरणा देते हैं। सेवा में आगे बढ़ते-बढते जो पेपर आते हैं वह भी आगे बढ़ाने का ही साधन हैं क्योंकि बुद्धि चलती है, याद में रहने का विशेष अटेन्शन रहता है। तो यह भी विशेष लिफ्ट बन जाती है। बुद्धि में सदा रहता कि हम वातावरण को कैसे शक्तिशाली बनायें। कैसा भी बड़ा रूप लेकर विघ्न आए लेकिन आप श्रेष्ठ आत्माओं का उसमें फायदा ही है। वह बड़ा रूप भी याद की शक्ति से छोटा हो जाता है। वह जैसे कागज का शेर। अच्छा!

वरदान:- दीपमाला पर यथार्थ विधि से अपने दैवी पद का आह्वान करने वाले पूज्य आत्मा भव
दीपमाला पर पहले लोग विधिपूर्वक दीपक जगाते थे, दीपक बुझे नहीं यह ध्यान रखते थे, घृत डालते थे, विधिपूर्वक आह्वान के अभ्यास में रहते थे। अभी तो दीपक के बजाए बल्ब जगा देते हैं। दीपमाला नहीं मनाते अब तो मनोरंजन हो गया है। आह्वान की विधि अथवा साधना समाप्त हो गई है। स्नेह समाप्त हो सिर्फ स्वार्थ रह गया है इसलिए यथार्थ दाता रूपधारी लक्ष्मी किसी के पास आती नहीं। लेकिन आप सभी यथार्थ विधि से अपने दैवी पद का आह्वान करते हो इस-लिए स्वयं पूज्य देवी-देवता बन जाते हो।

Slogan:- सदा बेहद की वृत्ति, दृष्टि और स्थिति हो तब विश्व कल्याण का कार्य सम्पन्न होगा।

Friday, 25 October 2019

Hindi Murli 26/10/2019

26-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बुद्धि को रिफाइन बनाना है तो एक बाप की याद में रहो, याद से ही आत्मा स्वच्छ बनती जायेगी''

प्रश्नः- वर्तमान समय मनुष्य अपना टाइम व मनी वेस्ट कैसे कर रहे हैं?
उत्तर:- जब कोई शरीर छोड़ता है तो उनके पीछे कितना पैसा आदि खर्च करते रहते हैं। जब शरीर छोड़कर चला गया तो उसकी कोई वैल्यु तो रही नहीं, इसलिए उसके पिछाड़ी जो कुछ करते हैं उसमें अपना टाइम और मनी वेस्ट करते हैं।

om shanti रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं, यह भी ऐसे कहते हैं ना, फिर बाप है या दादा है। दादा भी कहेंगे रूहानी बाप तुम बच्चों को यह नॉलेज सुनाते हैं - पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर का। वास्तव में सतयुग से लेकर त्रेता अन्त तक क्या हुआ है, यह है मुख्य बात। बाकी द्वापर-कलियुग में कौन-कौन आये, क्या हुआ, उनकी हिस्ट्री-जॉग्राफी तो बहुत है। सतयुग-त्रेता की कोई हिस्ट्री-जॉग्राफी है नहीं और तो सबकी हिस्ट्री-जॉग्राफी है, बाकी देवी-देवताओं को लाखों वर्ष पहले ले गये हैं। यह है बेहद की बेसमझी। तुम भी बेहद की बेसमझी में थे। अभी थोड़ा-थोड़ा समझ रहे हो। कोई तो अभी भी कुछ समझते नहीं हैं। बहुत कुछ समझने का है। बाप ने आबू की महिमा पर समझाया है, इस पर ख्याल करना चाहिए। तुम्हारी बुद्धि में आना चाहिए तुम यहाँ बैठे हो। तुम्हारा यादगार देलवाड़ा मन्दिर कब बना है, कितने वर्ष बाद बना है। कहते हैं 1250 वर्ष हुए हैं तो बाकी कितने वर्ष रहे? 3750 वर्ष रहे। तो उन्होंने भी अभी का यादगार और बैकुण्ठ का यादगार बनाया है। मन्दिरों की भी काम्पीटीशन होती है ना। एक-दो से अच्छा बनायेंगे। अभी तो पैसा ही कहाँ है जो बनावें। पैसा तो बहुत था, तो सोमनाथ का मन्दिर कितना बड़ा बनाया है। अभी तो बना न सकें। भल आगरे आदि में बनाते रहते हैं परन्तु वह सब है फालतू। मनुष्य तो अन्धियारे में हैं ना। जब तक बनावें तब तक विनाश भी आ जायेगा। यह बातें कोई भी नहीं जानते हैं। तोड़ते और बनाते रहते हैं। पैसे मुफ्त में आते रहते हैं। सब वेस्ट होता रहता है। वेस्ट ऑफ टाइम, वेस्ट ऑफ मनी, वेस्ट ऑफ एनर्जी। कोई मरता है तो कितना टाइम गँवाते हैं। हम कुछ भी नहीं करते। आत्मा तो चली गई, बाकी खाल क्या काम की। सर्प खाल छोड़ देता है, उनकी कोई वैल्यु है क्या। कुछ भी नहीं। भक्ति मार्ग में खाल की वैल्यु है। जड़ चित्र की कितनी पूजा करते हैं। परन्तु यह कब आये, कैसे आये। कुछ भी पता नहीं है। इनको कहा जाता है भूत पूजा। पांच तत्वों की पूजा करते हैं। समझो यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग में राज्य करते थे, अच्छा 150 वर्ष आयु पूरी हुई, शरीर छोड़ दिया, बस। शरीर तो कोई काम का न रहा। उनकी वहाँ क्या वैल्यु होगी। आत्मा चली गई, शरीर चण्डाल के हाथ दे दिया, वह रसम-रिवाज अनुसार जला देंगे। ऐसे नहीं उनकी मिट्टी लेकर उड़ायेंगे नाम करने के लिए। कुछ भी नहीं। यहाँ तो कितना करते हैं। ब्राह्मण खिलाते हैं, यह करते हैं। वहाँ यह कुछ होता नहीं। खाल तो कोई काम की नहीं रही। खाल को जला देते हैं। बाकी चित्र रहते हैं। सो भी एक्यूरेट चित्र मिल न सकें। यह आदि देव की पत्थर की मूर्ति एक्यूरेट थोड़ेही है। पूजा जब शुरू की है तब के पत्थर की है। असुल जो था वह तो जलकर खत्म हो गया ना फिर भक्ति मार्ग में यह निकला है। इन बातों पर भी सोच तो चलता है ना। आबू की महिमा को अच्छी रीति सिद्ध करना है। तुम भी यहाँ बैठे हो। यहाँ ही बाप सारे विश्व को नर्क से स्वर्ग बना रहे हैं तो यही सबसे ऊंच ते ऊंच तीर्थ ठहरा। अभी इतनी भावना नहीं है सिर्फ एक शिव में भावना है, कहाँ भी जाओ शिव का मन्दिर जरूर होगा। अमरनाथ में भी शिव का ही है। कहते हैं शंकर ने पार्वती को कथा सुनाई। वहाँ तो कथा की बात ही नहीं। मनुष्यों को कुछ भी समझ नहीं है। अभी तुमको समझ आई है, आगे पता था क्या।

अभी बाबा आबू की कितनी महिमा करते हैं। सर्व तीर्थों में यह महान् तीर्थ है। बाबा समझाते तो बहुत हैं, परन्तु जबकि अनन्य बच्चों की बुद्धि में बैठे, अभी तो देह-अभिमान बहुत है। ज्ञान तो बहुत ढेर चाहिए। रिफाइननेस बहुत आनी है। अभी तो योग बड़ा मुश्किल कोई का लगता है। योग के साथ फिर नॉलेज भी चाहिए। ऐसे नहीं सिर्फ योग में रहना है। योग में नॉलेज जरूर चाहिए। देहली में ज्ञान-विज्ञान भवन नाम रखा है परन्तु इनका अर्थ क्या है, यह समझते थोड़ेही हैं। ज्ञान-विज्ञान तो सेकण्ड का है। शान्तिधाम, सुखधाम। परन्तु मनुष्यों में जरा भी बुद्धि नहीं है। अर्थ थोड़ेही समझते हैं। चिन्मियानंद आदि कितने बड़े-बड़े सन्यासी आदि हैं, गीता सुनाते हैं, कितने उन्हों के ढेर फालोअर्स हैं। सबसे बड़ा जगत का गुरू तो एक ही बाप है। बाप और टीचर से बड़ा गुरू होता है। स्त्री कभी दूसरा पति नहीं करेगी तो गुरू भी दूसरा नहीं करना चाहिए। एक गुरू किया, उनको ही सद्गति करनी है फिर और गुरू क्यों? सतगुरू तो एक ही बेहद का बाप है। सबकी सद्गति करने वाला है। परन्तु इन बातों को बहुत हैं जो बिल्कुल समझते नहीं। बाप ने समझाया है यह राज-धानी स्थापन हो रही है, तो नम्बरवार होंगे ना। कोई तो रिंचक भी समझ नहीं सकते। ड्रामा में पार्ट ऐसा है। टीचर तो समझ सकते हैं। जिस शरीर द्वारा समझाते हैं उनको भी तो मालूम पड़ता होगा। यह तो गुड़ जाने, गुड़ की गोथरी जाने। गुड़ शिवबाबा को कहा जाता है, वह सबकी अवस्था को जानते हैं। हरेक की पढ़ाई से समझ सकते हैं - कौन कैसे पढ़ते हैं, कितनी सर्विस करते हैं। कितना बाबा की सर्विस में जीवन सफल करते हैं। ऐसे नहीं, इस ब्रह्मा ने घरबार छोड़ा है इसलिए लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। मेहनत करते हैं ना। यह नॉलेज बहुत ऊंची है। कोई अगर बाप की अवज्ञा करते हैं तो एकदम पत्थर बन पड़ते हैं। बाबा ने समझाया था - यह इन्द्रसभा है। शिवबाबा ज्ञान वर्षा करते हैं। उनकी अवज्ञा की तो शास्त्रों में लिखा हुआ है पत्थरबुद्धि हो गये इसलिए बाबा सबको लिखते रहते हैं। साथ में सम्भाल से कोई को ले आओ। ऐसे नहीं, विकारी अपवित्र यहाँ आकर बैठे। नहीं तो फिर ले आने वाली ब्राह्मणी पर दोष पड़ जाता है। ऐसे कोई को ले नहीं आना है। बड़ी रेसपॉन्सिबिलिटी है। बहुत ऊंच ते ऊंच बाप है। तुमको विश्व की बादशाही देते हैं तो उनका कितना रिगार्ड रखना चाहिए। बहुतों को मित्र-सम्बन्धी आदि याद पड़ते हैं, बाप की याद है नहीं। अन्दर ही घुटका खाते रहते हैं। बाप समझाते हैं - यह है आसुरी दुनिया। अभी दैवी दुनिया बनती है, हमारी एम ऑबजेक्ट यह है। यह लक्ष्मी-नारायण बनना है। जो भी चित्र हैं, सबकी बायोग्राफी को तुम जानते हो। मनुष्यों को समझाने के लिए कितनी मेहनत की जाती है। तुम भी समझते होंगे, यह कुछ अच्छा बुद्धिवान है। यह तो कुछ नहीं सम-झते हैं। तुम बच्चों में जिसने जितना ज्ञान उठाया है, उस अनुसार ही सर्विस कर रहे हैं। मुख्य बात है ही गीता के भगवान की। सूर्यवंशी देवी-देवताओं का यह एक ही शास्त्र है। अलग-अलग नहीं है। ब्राह्मणों का भी अलग नहीं है। यह बड़ी समझने की बातें हैं। इस ज्ञान मार्ग में भी चलते-चलते अगर विकार में गिर पड़े, तो ज्ञान बह जायेगा। बहुत अच्छे-अच्छे जाकर विकारी बने तो पत्थरबुद्धि हो गये। इसमें बड़ी समझ चाहिए। बाप जो समझाते हैं उनको उगारना चाहिए। यहाँ तो तुमको बहुत सहज है, कोई गोरखधन्धा, हंगामा आदि नहीं। बाहर में रहने से धन्धे आदि की कितनी चिंता रहती है। माया खूब त़ूफान में लाती है। यहाँ तो कोई गोरखधन्धा नहीं। एकान्त लगी पड़ी है। बाप तो फिर भी बच्चों को पुरूषार्थ कराते रहते हैं। यह बाबा भी पुरूषार्थी है। पुरूषार्थ कराने वाला तो बाप है। इसमें विचार सागर मंथन करना पड़ता है। यहाँ तो बाप बच्चों के साथ बैठे हैं। जो पूरी अंगुली देते हैं उनको ही सर्विसएबुल कहेंगे। बाकी घुटका खाने वाले तो नुकसान करते हैं और ही डिससर्विस करते हैं, विघ्न डालते हैं। यह तो जानते हो - महाराजा-महारानी बनेंगे तो उन्हों के दास-दासियां भी चाहिए। वह भी यहाँ के ही आयेंगे। सारा मदार पढ़ाई पर है। इस शरीर को भी खुशी से छोड़ना है, दु:ख की बात नहीं। पुरूषार्थ के लिए टाइम तो मिला हुआ है। ज्ञान सेकेण्ड का है, बुद्धि में है शिवबाबा से वर्सा मिलता है। थोड़ा भी ज्ञान सुना, शिवबाबा को याद किया तो भी आ सकते हैं। प्रजा तो बहुत बनने की है हमारी राजधानी सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी यहाँ स्थापन हो रही है। बाप का बनकर अगर ग्लानि करते हैं तो बहुत बोझा चढ़ता है। एकदम जैसे रसातल में चले जाते हैं। बाबा ने समझाया है जो अपनी पूजा बैठ कराते हैं वह पूज्य कैसे कहला सकते। सर्व का सद्गति दाता, कल्याण करने वाला तो एक ही बाप है। मनुष्य तो शान्ति का भी अर्थ नहीं समझते हैं। हठयोग से प्राणायाम आदि चढ़ाना, उसको ही शान्ति समझते हैं। उसमें भी बहुत मेहनत लगती है, कोई की ब्रेन खराब हो जाती है। प्राप्ति कुछ भी नहीं। वह है अल्पकाल की शान्ति। जैसे सुख को अल्पकाल काग विष्टा समान कहते हैं वैसे वह शान्ति भी काग विष्टा के समान है। वह है ही अल्पकाल के लिए। बाप तो 21 जन्मों के लिए तुमको सुख-शान्ति दोनों देते हैं। कोई तो शान्तिधाम में पिछाड़ी तक रहते होंगे। जिनका पार्ट है, वह इतना सुख थोड़ेही देख सकेंगे। वहाँ भी नम्बरवार मर्तबे तो होंगे ना। भल दास-दासियां होंगे परन्तु अन्दर थोड़ेही घुस सकेंगे। कृष्ण को भी देख न सकें। सबके अलग-अलग महल होंगे ना। कोई टाइम होगा देखने का। जैसे देखो पोप आता है तो उनका दर्शन करने के लिए कितने लोग जाते हैं। ऐसे बहुत निकलेंगे, जिनका बहुत प्रभाव होगा। लाखों मनुष्य जायेंगे दर्शन करने के लिए। यहाँ शिवबाबा का दर्शन कैसे होगा? यह तो समझने की बात है।

अब दुनिया को कैसे पता पड़े कि यह सबसे ऊंच तीर्थ है। देलवाड़ा जैसा मन्दिर शायद आसपास और भी हो, वह भी जाकर देखना चाहिए। कैसे बना हुआ है। उनको ज्ञान देने की भी दरकार नहीं। वह फिर तुमको ज्ञान देने लग जायेंगे। राय देते हैं ना - यह करना चाहिए, यह करना चाहिए। यह तो जानते नहीं कि इनको पढ़ाने वाला कौन है। एक-एक को समझाने में मेहनत लगती है। उन पर कहानियाँ भी हैं। कहते थे शेर आया, शेर आया.......। तुम भी कहते हो मौत आया कि आया तो वह विश्वास नहीं करते हैं। समझते हैं अभी तो 40 हज़ार वर्ष पड़े हैं, मौत कहाँ से आयेगा। परन्तु मौत आना तो जरूर है, सबको ले जायेंगे। वहाँ कोई भी किचड़ा होता नहीं। यहाँ की गऊ और वहाँ की गऊ में भी कितना फ़र्क है। कृष्ण थोड़ेही गऊयें चराता था। उन्हों के पास तो दूध हेलीकाप्टर में आता होगा। यह किचड़पट्टी दूर रहती होगी। सामने घर में थोड़ेही किचड़ा रहेगा। वहाँ तो अपरमअपार सुख हैं, जिसके लिए पूरा पुरूषार्थ करना है। कितने अच्छे-अच्छे बच्चे सेन्टर से आते हैं। बाबा देखकर कितना खुश होते हैं। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार फूल निकलते हैं। फूल जो हैं वह अपने को भी फूल समझते हैं। देहली में भी बच्चे कितनी सर्विस करते हैं रात-दिन। ज्ञान भी कितना ऊंच है। आगे तो कुछ नहीं जानते थे। अब कितनी मेहनत करनी पड़ती है। बाबा के पास तो सब समाचार आते हैं। कोई का सुनाते हैं, कोई का नहीं सुनाते हैं क्योंकि ट्रेटर भी बहुत होते हैं। बहुत फर्स्टक्लास भी ट्रेटर्स बन पड़ते हैं। थर्डक्लास भी ट्रेटर हैं। थोड़ा ज्ञान मिला तो समझते हैं हम शिवबाबा के भी बाबा बन गये। पहचान तो है नहीं कि कौन नॉलेज देते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) विश्व की बादशाही देने वाले बाप का बहुत-बहुत रिगार्ड रखना है। बाप की सर्विस में अपनी जीवन सफल करनी है, पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है।
2) बाप से जो ज्ञान मिलता है उस पर विचार सागर मंथन करना है। कभी भी विघ्न रूप नहीं बनना है। डिस-सर्विस नहीं करनी है। अहंकार में नहीं आना है।

वरदान:- निराकार और साकार दोनों रूपों के यादगार को विधिपूर्वक मनाने वाली श्रेष्ठ आत्मा भव
दीपमाला अविनाशी अनेक जगे हुए दीपकों का यादगार है। आप चमकती हुई आत्मायें दीपक की लौ मिसल दिखाई देती हो इसलिए चमकती हुई आत्मायें दिव्य ज्योति का यादगार स्थूल दीपक की ज्योति में दिखाया है तो एक तरफ निराकारी आत्मा के रूप का यादगार है, दूसरी तरफ आपके ही भविष्य साकार दिव्य स्वरूप लक्ष्मी के रूप में यादगार है। यही दीपमाला देव-पद प्राप्त करती है। तो आप श्रेष्ठ आत्मायें अपना यादगार स्वयं ही मना रहे हो।

Slogan:- निगेटिव को पॉजिटिव में चेंज करने के लिए अपनी भावनाओं को शुभ और बेहद की बनाओ।