Saturday, 30 November 2019

Hindi Murli 01/12/2019

01-12-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 15-03-85 मधुबन

मेहनत से छूटने का सहज साधन - निराकारी स्वरूप की स्थिति
बापदादा बच्चों के स्नेह में, वाणी से परे निर्वाण अवस्था से वाणी में आते हैं। किसलिए? बच्चों को आपसमान निर्वाण स्थिति का अनुभव कराने के लिए। निर्वाण स्वीट होम में ले जाने के लिए। निर्वाण स्थिति निर्विकल्प स्थिति है। निर्वाण स्थिति निर्विकारी स्थिति है। निर्वाण स्थिति से निराकारी सो साकार स्वरूपधारी बन वाणी में आते हैं। साकार में आते भी निराकारी स्वरूप की स्मृति, स्मृति में रहती है। मैं निराकार, साकार आधार से बोल रहा हूँ। साकार में भी निराकार स्थिति की स्मृति रहे - इसको कहते हैं निराकार सो साकार द्वारा वाणी में, कर्म में आना। असली स्वरूप निराकार है, साकार आधार है। यह डबल स्मृति निराकार सो साकार शक्तिशाली स्थिति है। साकार का आधार लेते निराकार स्वरूप को भूलो नहीं। भूलते हो इसलिए याद करने की मेहनत करनी पड़ती है। जैसे लौकिक जीवन में अपना शारीरिक स्वरूप स्वत: ही सदा याद रहता है कि मैं फलाना वा फलानी इस समय यह कार्य कर रही हूँ या कर रहा हूँ। कार्य बदलता है लेकिन मैं फलाना हूँ यह नहीं बदलता, न भूलता है। ऐसे मैं निराकार आत्मा हूँ, यह असली स्वरूप कोई भी कार्य करते स्वत: और सदा याद रहना चाहिए। जब एक बार स्मृति आ गई, परिचय भी मिल गया मैं निराकार आत्मा हूँ। परिचय अर्थात् नॉलेज। तो नॉलेज की शक्ति द्वारा स्वरूप को जान लिया। जानने के बाद फिर भूल कैसे सकते? जैसे नॉलेज की शक्ति से शरीर का भान भुलाते भी भूल नहीं सकते। तो यह आत्मिक स्वरूप भूल कैसे सकेंगे। तो यह अपने आपसे पूछो और अभ्यास करो। चलते फिरते कार्य करते चेक करो - निराकार सो साकार आधार से यह कार्य कर रहा हूँ! तो स्वत: ही निर्विकल्प स्थिति, निराकारी स्थिति, निर्विघ्न स्थिति सहज रहेगी। मेहनत से छूट जायेंगे। यह मेहनत तब लगती है जब बार-बार भूलते हो। फिर याद करने की मेहनत करते हो। भूलो ही क्यों, भूलना चाहिए? बापदादा पूछते हैं - आप हो कौन? साकार हो वा निराकार? निराकार हो ना! निराकार होते हुए भूल क्यों जाते हो! असली स्वरूप भूल जाते और आधार याद रहता? स्वयं पर ही हंसी नहीं आती कि यह क्या करते हैं! अब हंसी आती है ना? असली भूल जाते और नकली चीज़ याद आ जाती? बापदादा को कभी-कभी बच्चों पर आश्चर्य भी लगता है। अपने आपको भूल जाते और भूलकर फिर क्या करते? अपने आपको भूल हैरान होते हैं। जैसे बाप को स्नेह से निराकार से साकार में आह्वान कर ला सकते हो तो जिससे स्नेह है उस जैसे निराकार स्थिति में स्थित नहीं हो सकते हो! बापदादा बच्चों की मेहनत देख नहीं सकते हैं! मास्टर सर्वशक्तिवान और मेहनत? मास्टर सर्वशक्तिवान सर्व शक्तियों के मालिक हो। जिस शक्ति को जिस भी समय शुभ संकल्प से आह्वान करो वह शक्ति आप मालिक के आगे हाजिर है। ऐसे मालिक, जिसकी सर्व शक्तियाँ सेवाधारी हैं, वह मेहनत करेगा वा शुभ संकल्प का आर्डर करेगा? क्या करेगा, राजे हो ना कि प्रजा हो? वैसे भी जो योग्य बच्चा होता है उसको क्या कहते हैं? राजा बच्चे कहते हैं ना। तो आप कौन हो? राजा बच्चे हो कि अधीन बच्चे हो? अधिकारी आत्मायें हो ना। तो यह शक्तियाँ, यह गुण यह सब आपके सेवाधारी हैं, आह्वान करो और हाजिर। जो कमजोर होता है वह शक्तिशाली शस्त्र होते हुए भी कमजोरी के कारण हार जाते हैं। आप कमजोर हो क्या? बहादुर बच्चे हो ना! सर्व शक्तिवान के बच्चे कमजोर हों तो सब लोग क्या कहेंगे? अच्छा लगेगा? तो आह्वान करना, आर्डर करना सीखो। लेकिन सेवाधारी आर्डर किसका मानेगा? जो मालिक होगा। मालिक स्वयं सेवाधारी बन गये, मेहनत करने वाले तो सेवाधारी हो गये ना। मन की मेहनत से अब छूट गये! शरीर के मेहनत की यज्ञ सेवा अलग बात है। वह भी यज्ञ सेवा के महत्व को जानने से मेहनत नहीं लगती है। जब मधुबन में सम्पर्क वाली आत्मायें आती हैं और देखती हैं इतनी संख्या की आत्माओं का भोजन बनता है और सब कार्य होता है तो देख-देख कर समझती हैं यह इतना हार्डवर्क कैसे करते हैं! उन्हों को बड़ा आश्चर्य लगता है। इतना बड़ा कार्य कैसे हो रहा है! लेकिन करने वाले ऐसे बड़े कार्य को भी क्या समझते हैं? सेवा के महत्व के कारण यह तो खेल लगता है। मेहनत नहीं लगती। ऐसे महत्व के कारण बाप से मुहब्बत होने के कारण मेहनत का रूप बदल जाता है। ऐसे मन की मेहनत से अब छूटने का समय आ गया है। द्वापर से ढूँढ़ने की, तड़पने की, पुकारने की, मन की मेहनत करते आये हो। मन की मेहनत के कारण धन कमाने की भी मेहनत बढ़ती गई। आज किसे भी पूछो तो क्या कहते हैं? धन कमाना मासी का घर नहीं है। मन की मेहनत से धन के कमाई की भी मेहनत बढ़ा दी और तन तो बन ही गया रोगी, इसलिए तन के कार्य में भी मेहनत, मन की भी मेहनत, धन की भी मेहनत। सिर्फ इतना ही नहीं लेकिन आज परिवार में प्यार निभाने में भी मेहनत है। कभी एक रूसता है, कब दूसरा....फिर उसको मनाने की मेहनत में लगे रहते। आज तेरा है, कल तेरा नहीं फेरा आ जाता है। तो सब प्रकार की मेहनत करके थक गये थे ना। तन से, मन से, धन से, सम्बन्ध से, सबसे थक गये।
बापदादा पहले मन की मेहनत समाप्त कर देते क्योंकि बीज है मन। मन की मेहनत तन की, धन की मेहनत अनुभव कराती है। जब मन ठीक नहीं होगा तो कोई कार्य होगा तो कहेंगे आज यह होता नहीं। बीमार होगा नहीं लेकिन समझेगा मुझे 103 बुखार है। तो मन की मेहनत तन की मेहनत अनुभव कराती है। धन में भी ऐसे ही है। मन थोड़ा भी खराब होगा, कहेंगे बहुत काम करना पड़ता है। कमाना बड़ा मुश्किल है। वायुमण्डल खराब है। और जब मन खुश होगा तो कहेंगे कोई बड़ी बात नहीं। काम वही होगा लेकिन मन की मेहनत धन की मेहनत भी अनुभव कराती है। मन की कमजोरी वायुमण्डल की कमजोरी में लाती है। बापदादा बच्चों के मन की मेहनत नहीं देख सकते। 63 जन्म मेहनत की। अब एक जन्म मौजों का जन्म है, मुहब्बत का जन्म है, प्राप्तियों का जन्म है, वरदानों का जन्म है। मदद लेने का मदद मिलने का जन्म है। फिर भी इस जन्म में भी मेहनत क्यों? तो अब मेहनत को मुहब्बत में परिवर्तन करो। महत्व से खत्म करो।
आज बापदादा आपस में बहुत चिटचैट कर रहे थे, बच्चों की मेहनत पर। क्या करते हैं, बापदादा मुस्करा रहे थे कि मन की मेहनत का कारण क्या बनता है, क्या करते हैं? टेढ़े बाँके, बच्चे पैदा करते, जिसका कभी मुँह नहीं होता, कभी टांग नहीं, कभी बांह नहीं होती। ऐसे व्यर्थ की वंशावली बहुत पैदा करते हैं और फिर जो रचना की तो क्या करेंगे? उसको पालने के कारण मेहनत करनी पड़ती। ऐसी रचना रचने के कारण ज्यादा मेहनत कर थक जाते हैं और दिलशिकस्त भी हो जाते हैं। बहुत मुश्किल लगता है। है अच्छा लेकिन है बड़ा मुश्किल। छोड़ना भी नहीं चाहते और उड़ना भी नहीं चाहते। तो क्या करना पड़ेगा। चलना पड़ेगा। चलने में तो जरूर मेहनत लगेगी ना इसलिए अब कमजोर रचना बन्द करो तो मन की मेहनत से छूट जायेंगें। फिर हँसी की बात क्या कहते हैं? बाप कहते यह रचना क्यों करते, तो जैसे आजकल के लोग कहते हैं ना-क्या करें ईश्वर दे देता है। दोष सारा ईश्वर पर लगाते हैं, ऐसे यह व्यर्थ रचना पर क्या कहते? हम चाहते नहीं हैं लेकिन माया आ जाती है। हमारी चाहना नहीं है लेकिन हो जाता है इसलिए सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे मालिक बनो। राजा बनो। कमजोर अर्थात् अधीन प्रजा। मालिक अर्थात् शक्तिशाली राजा। तो आह्वान करो मालिक बन करके। स्वस्थिति के श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठो। सिंहासन पर बैठ के शक्ति रूपी सेवाधारियों का आह्वान करो। आर्डर दो। हो नहीं सकता कि आपके सेवाधारी आपके आर्डर पर न चलें। फिर ऐसे नहीं कहेंगे क्या करें सहन शक्ति न होने के कारण मेहनत करनी पड़ती है। समाने की शक्ति कम थी इसलिए ऐसा हुआ। आपके सेवाधारी समय पर कार्य में न आवें तो सेवाधारी क्या हुए? कार्य पूरा हो जाए फिर सेवाधारी आवें तो क्या होगा! जिसको स्वयं समय का महत्व है उसके सेवाधारी भी समय पर महत्व जान हाजिर होंगे। अगर कोई भी शक्ति वा गुण समय पर इमर्ज नहीं होता है तो इससे सिद्ध है कि मालिक को समय का महत्व नहीं है। क्या करना चाहिए? सिंहासन पर बैठना अच्छा या मेहनत करना अच्छा? अभी इसमें समय देने की आवश्यकता नहीं है। मेहनत करना ठीक लगता या मालिक बनना ठीक लगता? क्या अच्छा लगता है? सुनाया ना - इसके लिए सिर्फ यह एक अभ्यास सदा करते रहो - “निराकार सो साकार के आधार से यह कार्य कर रहा हूँ।'' करावनहार बन कर्मेन्द्रियों से कराओ। अपने निराकारी वास्तविक स्वरूप को स्मृति में रखेंगे तो वास्तविक स्वरूप के गुण शक्तियाँ स्वत: ही इमर्ज होंगे। जैसा स्वरूप होता है वैसे गुण और शक्तियाँ स्वत: ही कर्म में आते हैं। जैसे कन्या जब मां बन जाती है तो माँ के स्वरूप में सेवा भाव, त्याग, स्नेह, अथक सेवा आदि गुण और शक्तियाँ स्वत: ही इमर्ज होती हैं ना। तो अनादि अविनाशी स्वरूप याद रहने से स्वत: ही यह गुण और शक्तियाँ इमर्ज होंगे। स्वरूप स्मृति स्थिति को स्वत: ही बनाता है। समझा क्या करना है! मेहनत शब्द को जीवन से समाप्त कर दो। मुश्किल मेहनत के कारण लगता है। मेहनत समाप्त तो मुश्किल शब्द भी स्वत: ही समाप्त हो जायेगा। अच्छा!
सदा मुश्किल को सहज करने वाले, मेहनत को मुहब्बत में बदलने वाले, सदा स्व स्वरूप की स्मृति द्वारा श्रेष्ठ शक्तियों और गुणों को अनुभव करने वाले, सदा बाप को स्नेह का रेसपान्ड देने वाले, बाप समान बनने वाले, सदा श्रेष्ठ स्मृति के श्रेष्ठ आसन पर स्थित हो मालिक बन सेवाधारियों द्वारा कार्य कराने वाले, ऐसे राजे बच्चों को, मालिक बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
पर्सनल मुलाकात-(विदेशी भाई बहनों से)
1) सेवा बाप के साथ का अनुभव कराती है। सेवा पर जाना माना सदा बाप के साथ रहना। चाहे साकार रूप में रहें, चाहे आकार रूप में। लेकिन सेवाधारी बच्चों के साथ बाप सदा साथ है ही है। करावनहार करा रहा है, चलाने वाला चला रहा है और स्वयं क्या करते हैं? निमित्त बन खेल खेलते रहते हैं। ऐसे ही अनुभव होता है ना? ऐसे सेवाधारी सफलता के अधिकारी बन जाते हैं। सफलता जन्म सिद्ध अधिकार है, सफलता सदा ही महान पुण्यात्मा बनने का अनुभव कराती है। महान पुण्य आत्मा बनने वालों को अनेक आत्माओं के आशीर्वाद की लिफ्ट मिलती है। अच्छा-
अभी तो वह भी दिन आना ही है जब सबके मुख से “एक हैं, एक ही हैं'' यह गीत निकलेंगे। बस ड्रामा का यही पार्ट रहा हुआ है। यह हुआ और समाप्ति हुई। अब इस पार्ट को समीप लाना है। इसके लिए अनुभव कराना ही विशेष आकर्षण का साधन है। ज्ञान सुनाते जाओ और अनुभव कराते जाओ। ज्ञान सिर्फ सुनने से सन्तुष्ट नहीं होते लेकिन ज्ञान सुनाते हुए अनुभव भी कराते जाओ तो ज्ञान का भी महत्व है और प्राप्ति के कारण आगे उत्साह में भी आ जाते हैं। उन सबके भाषण तो सिर्फ नॉलेजफुल होते हैं। आप लोगों के भाषण सिर्फ नॉलेजफुल नहीं हों लेकिन अनुभव की अथॉरिटी वाले हों। और अनुभवों की अथॉरिटी से बोलते हुए अनुभव कराते जाओ। जैसे कोई-कोई जो अच्छे स्पीकर होते हैं, वह बोलते हुए रूला भी देते हैं, हँसा भी देते हैं। शान्ति में, साइलेन्स में भी ले जायेंगे। जैसी बात करेंगे वैसा वायुमण्डल हाल का बना देते हैं। वह तो हुए टैप्रेरी। जब वह कर सकते हैं तो आप मास्टर सर्वशक्तिवान क्या नहीं कर सकते। कोई “शान्ति'' बोले तो शान्ति का वातावरण हो, आनंद बोले तो आनंद का वातवरण हो। ऐसे अनुभूति कराने वाले भाषण, प्रत्यक्षता का झण्डा लहरायेंगे। कोई तो विशेषता देखेंगे ना। अच्छा - समय स्वत: ही शक्तियाँ भर रहा है। हुआ ही पड़ा है, सिर्फ रिपीट करना है। अच्छा।
विदाई के समय दादी जानकी जी से बापदादा की मुलाकात
देख-देख हर्षित होती रहती हो! सबसे ज्यादा खुशी अनन्य बच्चों को है ना! जो सदा ही खुशियों के सागर में लहराते रहते हैं। सुख के सागर में, सर्व प्राप्तियों के सागर में लहराते ही रहते हैं, वह दूसरों को भी उसी सागर में लहराते हैं। सारा दिन क्या काम करती हो? जैसे कोई को सागर में नहाना नहीं आता है तो क्या करते? हाथ पकड़कर नहलाते हैं ना! यही काम करती हो, सुख में लहराओ, खुशी में लहराओ... ऐसे करती रहती हो ना! बिज़ी रहने का कार्य अच्छा मिल गया है। कितना बिजी रहती हो? फुर्सत है? इसी में सदा बिज़ी हैं, तो दूसरे भी देख फालो करते हैं। बस, याद और सेवा के सिवाए और कुछ दिखाई नहीं देता। आटोमेटिकली बुद्धि याद और सेवा में ही जाती है और कहाँ जा नहीं सकती। चलाना नहीं पड़ता, चलती ही रहती है। इसको कहते हैं सीखे हुए सिखा रहे हैं। अच्छा काम दे दिया है ना। बाप होशियार बनाकर गये हैं ना। ढीलाढाला तो नहीं छोड़कर गये। होशियार बनाकर, जगह देकर गये हैं ना। साथ तो हैं ही लेकिन निमित्त तो बनाया ना। होशियार बनाकर सीट दिया है। यहाँ से ही सीट देने की रस्म शुरू हुई है। बाप सेवा का तख्त वा सेवा की सीट देकर आगे बढ़े, अभी साक्षी होकर देख रहे हैं, कैसे बच्चे आगे से आगे बढ़ रहे हैं। साथ का साथ भी है, साक्षी का साक्षी भी। दोनों ही पार्ट बजा रहे हैं। साकार रूप में साक्षी कहेंगे, अव्यक्त रूप में साथी कहेंगे। दोनों ही पार्ट बजा रहे हैं। अच्छा!

वरदान: श्वांसों श्वांस याद और सेवा के बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग प्राप्त करने वाले सदा प्रसन्नचित भव
जैसे अटेन्शन रखते हो कि याद का लिंक सदा जुटा रहे वैसे सेवा में भी सदा लिंक जुटा रहे। श्वांसों श्वांस याद और श्वांसों श्वांस सेवा हो - इसको कहते हैं बैलेन्स, इस बैलेन्स से सदा ब्लैसिंग का अनुभव करते रहेंगे और यही आवाज दिल से निकलेगा कि आशीर्वादों से पल रहे हैं। मेहनत से, युद्ध से छूट जायेंगे। क्या, क्यों, कैसे इन प्रश्नों से मुक्त हो सदा प्रसन्नचित रहेंगे। फिर सफलता जन्म सिद्ध अधिकार के रूप में अनुभव होगी।

स्लोगन: बाप से इनाम लेना है तो स्वयं से और साथियों से निर्विघ्न रहने का सर्टीफिकेट साथ हो।

Friday, 29 November 2019

Hindi Murli 30/11/2019

30-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - बाप आया है तुम बच्चों को भक्ति तू आत्मा से ज्ञानी तू आत्मा बनाने, पतित से पावन बनाने''

प्रश्न: ज्ञानवान बच्चे किस चिन्तन में सदा रहते हैं?
उत्तर: मैं अविनाशी आत्मा हूँ, यह शरीर विनाशी है। मैंने 84 शरीर धारण किये हैं। अब यह अन्तिम जन्म है। आत्मा कभी छोटी-बड़ी नहीं होती है। शरीर ही छोटा बड़ा होता है। यह आंखें शरीर में हैं लेकिन इनसे देखने वाली मैं आत्मा हूँ। बाबा आत्माओं को ही ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं। वह भी जब तक शरीर का आधार न लें तब तक पढ़ा नहीं सकते। ऐसा चिन्तन ज्ञानवान बच्चे सदा करते हैं।

ओम् शान्ति। यह किसने कहा? आत्मा ने। अविनाशी आत्मा ने कहा शरीर द्वारा। शरीर और आत्मा में कितना फर्क है। शरीर 5 तत्व का इतना बड़ा पुतला बन जाता है। भल छोटा भी है तो भी आत्मा से तो जरूर बड़ा है। पहले तो एकदम छोटा पिण्ड होता है, जब थोड़ा बड़ा होता है तब आत्मा प्रवेश करती है। बड़ा होते-होते फिर इतना बड़ा हो जाता है। आत्मा तो चैतन्य है ना। जब तक आत्मा प्रवेश न करे तब तक पुतला कोई काम का नहीं रहता है। कितना फर्क है। बोलने, चालने वाली भी आत्मा ही है। वह इतनी छोटी-सी बिन्दी ही है। वह कभी छोटी-बड़ी नहीं होती। विनाश को नहीं पाती। अब यह परम आत्मा बाप ने समझाया है कि मैं अविनाशी हूँ और यह शरीर विनाशी है। उनमें मैं प्रवेश कर पार्ट बजाता हूँ। यह बातें तुम अभी चिन्तन में लाते हो। आगे तो न आत्मा को जानते थे, न परमात्मा को जानते थे सिर्फ कहने मात्र कहते थे हे परमपिता परमात्मा। आत्मा भी समझते थे परन्तु फिर कोई ने कहा तुम परमात्मा हो। यह किसने बतलाया? इन भक्ति मार्ग के गुरुओं और शास्त्रों ने। सतयुग में तो कोई बतलायेंगे नहीं। अभी बाप ने समझाया है तुम मेरे बच्चे हो। आत्मा नैचुरल है शरीर अननैचुरल मिट्टी का बना हुआ है। जब आत्मा है तो बोलती चालती है। अभी तुम बच्चे जानते हो हम आत्माओं को बाप आकर समझाते हैं। निराकार शिवबाबा इस संगमयुग पर ही इस शरीर द्वारा आकर सुनाते हैं। यह आंखे तो शरीर में रहती ही हैं। अभी बाप ज्ञान चक्षु देते हैं। आत्मा में ज्ञान नहीं है तो अज्ञान चक्षु है। बाप आते हैं तो आत्मा को ज्ञान चक्षु मिलते हैं। आत्मा ही सब कुछ करती है। आत्मा कर्म करती है शरीर द्वारा। अभी तुम समझते हो बाप ने यह शरीर धारण किया है। अपना भी राज़ बताते हैं। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ भी बताते हैं। सारे नाटक का भी नॉलेज देते हैं। आगे तुमको कुछ भी पता नहीं था। हाँ, नाटक जरूर है। सृष्टि का चक्र फिरता है। परन्तु कैसे फिरता है, यह कोई नहीं जानते हैं। रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान अभी तुमको मिलता है। बाकी तो सब है भक्ति। बाप ही आकर तुमको ज्ञानी तू आत्मा बनाते हैं। आगे तुम भक्ति तू आत्मा थे। तू आत्मा भक्ति करते थे। अभी तुम आत्मा ज्ञान सुनते हो। भक्ति को कहा जाता है अन्धियारा। ऐसे नहीं कहेंगे भक्ति से भगवान मिलता है। बाप ने समझाया है भक्ति का भी पार्ट है, ज्ञान का भी पार्ट है। तुम जानते हो हम भक्ति करते थे तो कोई सुख नहीं था। भक्ति करते धक्का खाते रहते थे। बाप को ढूँढते थे। अभी समझते हो यज्ञ, तप, दान, पुण्य आदि जो कुछ करते थे, ढूँढ़ते-ढूँढ़ते धक्का खाते-खाते तंग हो जाते हैं। तमोप्रधान बन जाते हैं क्योंकि गिरना होता है ना। झूठे काम करना छी-छी होना होता है। पतित भी बन गये। ऐसे नहीं कि पावन होने के लिए भक्ति करते थे। भगवान से पावन बनने बिगर हम पावन दुनिया में जा नहीं सकेंगे। ऐसे नहीं कि पावन बनने बिगर भगवान से नहीं मिल सकते। भगवान को तो कहते हैं आकर पावन बनाओ। पतित ही भगवान से मिलते हैं पावन होने के लिए। पावन से तो भगवान मिलता नहीं। सतयुग में थोड़ेही इन लक्ष्मी-नारायण से भगवान मिलता है। भगवान आकरके तुम पतितों को पावन बनाते हैं और तुम यह शरीर छोड़ देते हो। पावन तो इस तमोप्रधान पतित सृष्टि में रह नहीं सकते। बाप तुमको पावन बनाकर गुम हो जाते हैं, उनका पार्ट ही ड्रामा में वन्डर-फुल है। जैसे आत्मा देखने में आती नहीं है। भल साक्षात्कार होता है तो भी समझ न सकें। और तो सबको समझ सकते हैं यह फलाना है, यह फलाना है। याद करते हैं। चाहते हैं फलाने का चैतन्य में साक्षात्कार हो और तो कोई मतलब नहीं। अच्छा, चैतन्य में देखते हो फिर क्या? साक्षात्कार हुआ फिर तो गुम हो जायेगा। अल्पकाल क्षण भंगुर सुख की आश पूरी होगी। उसको कहा जायेगा अल्पकाल क्षण भंगुर सुख। साक्षात्कार की चाहना थी वह मिला। बस यहाँ तो मूल बात है पतित से पावन बनने की। पावन बनेंगे तो देवता बन जायेंगे अर्थात् स्वर्ग में चले जायेंगे।
शास्त्रों में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष लिख दी है। समझते हैं कलियुग में अजुन 40 हज़ार वर्ष पड़े हैं। बाबा तो समझाते हैं सारा कल्प ही 5 हज़ार वर्ष का है। तो मनुष्य अन्धियारे में हैं ना। उसको कहा जाता है घोर अन्धियारा। ज्ञान कोई में है नहीं। वह सब है भक्ति। रावण जब से आता है तो भक्ति भी उनके साथ है और जब बाप आते हैं तो उनके साथ ज्ञान है। बाप से एक ही बार ज्ञान का वर्सा मिलता है। घड़ी-घड़ी नहीं मिल सकता। वहाँ तो तुम कोई को ज्ञान देते नहीं। दरकार ही नहीं। ज्ञान उनको मिलता है जो अज्ञान में हैं। बाप को कोई भी जानते ही नहीं। बाप को गाली देने बिगर कोई बात ही नहीं करते। यह भी तुम बच्चे अभी समझते हो। तुम कहते हो ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है, वह हम आत्माओं का बाप है और वह कहते कि नहीं परमात्मा ठिक्कर-भित्तर में है। तुम बच्चों ने अच्छी तरह समझा है - भक्ति बिल्कुल अलग चीज़ है, उनमें जरा भी ज्ञान नहीं होता। समय ही सारा बदल जाता है। भगवान का भी नाम बदल जाता है फिर मनुष्यों का भी नाम बदल जाता है। पहले कहा जाता है देवता फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। वह दैवी गुणों वाले मनुष्य हैं और यह हैं आसुरी गुणों वाले मनुष्य। बिल्कुल छी-छी हैं। गुरु नानक ने भी कहा है अशंख चोर...... मनुष्य कोई ऐसा कहे तो उनको झट कहेंगे तुम यह क्या गाली देते हो। परन्तु बाप कहते हैं यह सब आसुरी सम्प्रदाय हैं। तुमको क्लीयर कर समझाते हैं। वह रावण सम्प्रदाय, वह राम सम्प्रदाय। गांधी जी भी कहते थे हमको रामराज्य चाहिए। रामराज्य में सब निर्विकारी हैं, रावण राज्य में हैं सब विकारी। इनका नाम ही है वेश्यालय। रौरव नर्क है ना। इस समय के मनुष्य विषय वैतरणी नदी में पड़े हैं। मनुष्य, जानवर आदि सब एक समान हैं। मनुष्य की कोई भी महिमा नहीं है। 5 विकारों पर तुम बच्चे जीत पाकर मनुष्य से देवता पद पाते हो, बाकी सब खत्म हो जाते हैं। देवतायें सतयुग में रहते थे। अभी इस कलियुग में असुर रहते हैं। असुरों की निशानी क्या है? 5 विकार। देवताओं को कहा जाता है सम्पूर्ण निर्विकारी और असुरों को कहा जाता है सम्पूर्ण विकारी। वह हैं 16 कला सम्पूर्ण और यहाँ नो कला। सबकी कला काया चट हो गई है। अब यह बाप बच्चों को बैठ समझाते हैं। बाप आते भी हैं पुरानी आसुरी दुनिया को चेन्ज करने। रावण राज्य वेश्यालय को शिवालय बनाते हैं। उन्हों ने तो यहाँ ही नाम रख दिये त्रिमूर्ति हाउस, त्रिमूर्ति रोड... आगे थोड़ेही यह नाम थे। अब होना क्या चाहिए? यह सारी दुनिया किसकी है? परमात्मा की है ना। परमात्मा की दुनिया है जो आधाकल्प पवित्र, आधाकल्प अपवित्र रहती है। क्रियेटर तो बाप को कहा जाता है ना। तो उनकी ही यह दुनिया हुई ना। बाप समझाते हैं मैं ही मालिक हूँ। मैं बीजरूप, चैतन्य, ज्ञान का सागर हूँ। मेरे में सारा ज्ञान है और कोई में नहीं। तुम समझ सकते हो इस सृष्टि चक्र के आदि, मध्य, अन्त का नॉलेज बाप में ही है। बाकी तो सब हैं गपोड़े। मुख्य गपोड़ा बहुत खराब है, जिसके लिए बाप उल्हना देते हैं। तुम मुझे ठिक्कर-भित्तर कुत्ते बिल्ली में समझ बैठे हो। तुम्हारी क्या दुर्दशा हो गई है।
नई दुनिया के मनुष्यों और पुरानी दुनिया के मनुष्यों में रात दिन का फर्क है। आधाकल्प से लेकर अपवित्र मनुष्य, पवित्र देवताओं को माथा टेकते हैं। यह भी बच्चों को समझाया है पहले-पहले पूजा होती हैं शिव-बाबा की। जो शिवबाबा ही तुमको पुजारी से पूज्य बनाते हैं। रावण तुमको पूज्य से पुजारी बनाते हैं। फिर बाप ड्रामा प्लैन अनुसार तुमको पूज्य बनाते हैं। रावण आदि यह सब नाम तो हैं ना। दशहरा जब मनाते हैं तो कितने मनुष्यों को बाहर से बुलाते हैं। परन्तु अर्थ कुछ नहीं समझते। देवताओं की कितनी निंदा करते हैं। ऐसी बातें तो बिल्कुल हैं नहीं। जैसे कहते हैं ईश्वर नाम-रूप से न्यारा है अर्थात् नहीं है। वैसे यह जो कुछ खेल आदि बनाते हैं वह कुछ भी है नहीं। यह सब हैं मनुष्यों की बुद्धि। मनुष्य मत को आसुरी मत कहा जाता है। यथा राजा-रानी तथा प्रजा। सब ऐसे बन जाते हैं। इनको कहा ही जाता है डेविल वर्ल्ड। सब एक-दो को गाली देते रहते हैं। तो बाप समझाते हैं-बच्चे, जब बैठते हो तो अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। तुम अज्ञान में थे तो परमात्मा को ऊपर में समझते थे। अभी तो जानते हो बाप यहाँ आया हुआ है तो तुम ऊपर में नहीं समझते हो। तुमने बाप को यहाँ बुलाया है, इस तन में। तुम जब अपने-अपने सेन्टर्स पर बैठते हो तो समझेंगे शिवबाबा मधुबन में इनके तन में हैं। भक्ति मार्ग में तो परमात्मा को ऊपर में मानते थे। हे भगवान..... अभी तुम बाप को कहाँ याद करते हो? क्या बैठकर करते हो? तुम जानते हो ब्रह्मा के तन में है तो जरूर यहाँ याद करना पड़ेगा। ऊपर में तो है नहीं। यहाँ आया हुआ है - पुरूषोत्तम संगमयुग पर। बाप कहते हैं तुमको इतना ऊंच बनाने मैं यहाँ आया हूँ। तुम बच्चे यहाँ याद करेंगे। भक्त ऊपर में याद करेंगे। तुम भल विलायत में होंगे तो भी कहेंगे ब्रह्मा के तन में शिवबाबा है। तन तो जरूर चाहिए ना। कहाँ भी तुम बैठे होंगे तो जरूर यहाँ याद करेंगे। ब्रह्मा के तन में ही याद करना पड़े। कई बुद्धिहीन ब्रह्मा को नहीं मानते हैं। बाबा ऐसे नहीं कहते ब्रह्मा को याद न करो। ब्रह्मा बिगर शिवबाबा कैसे याद पड़ेगा। बाप कहते हैं मैं इस तन में हूँ। इसमें मुझे याद करो इसलिए तुम बाप और दादा दोनों को याद करते हो। बुद्धि में यह ज्ञान है, इनकी अपनी आत्मा है। शिवबाबा को तो अपना शरीर नहीं है। बाप ने कहा है मैं इस प्रकृति का आधार लेता हूँ। बाप बैठ सारे ब्रह्माण्ड और सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त का राज़ समझाते हैं और कोई ब्रह्माण्ड को जानते ही नहीं। ब्रह्म जिसमें हम और तुम रहते हो, सुप्रीम बाप, नानसुप्रीम आत्मायें रहने वाली उस ब्रह्म लोक शान्तिधाम की हैं। शान्तिधाम बहुत मीठा नाम है। यह सब बातें तुम्हारी बुद्धि में हैं। हम असुल के रहवासी ब्रह्म महतत्व के हैं, जिसको निर्वाणधाम, वानप्रस्थ कहा जाता है। यह बातें अभी तुम्हारी बुद्धि में हैं, जब भक्ति है तो ज्ञान का अक्षर नहीं। इनको कहा जाता है पुरुषोत्तम संगमयुग जबकि चेन्ज होती है। पुरानी दुनिया में असुर रहते हैं, नई दुनिया में देवतायें रहते हैं तो उनको चेन्ज करने लिए बाप को आना पड़ता है। सतयुग में तुमको कुछ भी पता नहीं रहेगा। अभी तुम कलियुग में हो तो भी कुछ पता नहीं है। जब नई दुनिया में होंगे तो भी इस पुरानी दुनिया का कुछ पता नहीं होगा। अभी पुरानी दुनिया में हो तो नई का मालूम नहीं है। नई दुनिया कब थी, पता नहीं। वह तो लाखों वर्ष कह देते हैं। तुम बच्चे जानते हो बाप इस संगमयुग पर ही कल्प-कल्प आते हैं, आकर इस वैराइटी झाड़ का राज़ समझाते हैं और यह चक्र कैसे फिरता है वह भी तुम बच्चों को समझाते हैं। तुम्हारा धन्धा ही है यह समझाने का। अब एक-एक को समझाने से तो बहुत टाइम लग जाए इसलिए अभी तुम बहुतों को समझाते हो। बहुत समझते हैं। यह मीठी-मीठी बातें फिर बहुतों को समझानी हैं। तुम प्रदर्शनी आदि में समझाते हो ना अब शिव जयन्ती पर और भी अच्छी रीति बहुतों को बुलाकर समझाना है। खेल की ड्युरेशन कितनी है। तुम तो एक्यूरेट बतायेंगे। यह टॉपिक्स हुई। हम भी यह समझायेंगे। तुमको बाप समझाते हैं ना-जिससे तुम देवता बन जाते हो। जैसे तुम समझकर देवता बनते हो वैसे औरों को भी बनाते हो। बाप ने हमको यह समझाया है। हम किसकी ग्लानि आदि नहीं करते हैं। हम बतलाते हैं ज्ञान को सद्गति मार्ग कहा जाता है, एक सतगुरू ही है पार करने वाला। ऐसी-ऐसी मुख्य प्वाइंट्स निकालकर समझाओ। यह सारा ज्ञान बाप के सिवाए कोई दे नहीं सकता है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) पुजारी से पूज्य बनने के लिए सम्पूर्ण निर्विकारी बनना है। ज्ञानवान बन स्वयं को स्वयं ही चेंज करना है। अल्पकाल सुख के पीछे नहीं जाना है।
2) बाप और दादा दोनों को ही याद करना है। ब्रह्मा बिगर शिवबाबा याद आ नहीं सकता। भक्ति में ऊपर याद किया, अभी ब्रह्मा तन में आया है तो दोनों ही याद आने चाहिए।

वरदान: हद की कामनाओं से मुक्त रह सर्व प्रश्नों से पार रहने वाले सदा प्रसन्नचित भव
जो बच्चे हद की कामनाओं से मुक्त रहते हैं उनके चेहरे पर प्रसन्नता की झलक दिखाई देती है। प्रसन्नचित कोई भी बात में प्रश्न-चित नहीं होते। वो सदा नि:स्वार्थी और सदा सभी को निर्दोष अनुभव करेंगे, किसी और के ऊपर दोष नहीं रखेंगे। चाहे कोई भी परिस्थिति आ जाए, चाहे कोई आत्मा हिसाब-किताब चुक्तू करने वाली सामना करने आती रहे, चाहे शरीर का कर्मभोग सामना करने आता रहे लेकिन सन्तुष्टता के कारण वे सदा प्रसन्नचित रहेंगे।

स्लोगन: व्यर्थ की चेकिंग अटेन्शन से करो, अलबेले रूप में नहीं।

Thursday, 28 November 2019

Hindi Murli 29/11/2019

29-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम यह राजयोग की पढ़ाई पढ़ते हो राजाई के लिए, यह है तुम्हारी नई पढ़ाई''

प्रश्न: इस पढ़ाई में कई बच्चे चलते-चलते फेल क्यों हो जाते हैं?
उत्तर: क्योंकि इस पढ़ाई में माया के साथ बॉक्सिंग है। माया की बॉक्सिंग में बुद्धि को बहुत कड़ी चोट लग जाती है। चोट लगने का कारण बाप से सच्चे नहीं हैं। सच्चे बच्चे सदा सेफ रहते हैं।

ओम् शान्ति। यह तो सब बच्चों को निश्चय होगा कि हम आत्माओं को परमात्मा बाप पढ़ाते हैं। 5 हजार वर्ष बाद एक ही बार बेहद का बाप आकर बेहद के बच्चों को पढ़ाते हैं। कोई नया आदमी यह बातें सुनें तो समझ न सके। रूहानी बाप, रूहानी बच्चे क्या होते हैं, यह भी समझ नहीं सकेंगे। तुम बच्चे जानते हो हम सभी ब्रदर्स हैं। वह हमारा बाप भी है, टीचर भी है, सुप्रीम गुरू भी है। तुम बच्चों को यह जरूर ऑटोमेटिकली याद रहेगा, यहाँ बैठे समझते होंगे-सभी आत्माओं का एक ही रूहानी बाप है। सभी आत्मायें उसको ही याद करती हैं। कोई भी धर्म का हो। सभी मनुष्य मात्र याद जरूर करते हैं। बाप ने समझाया है आत्मा तो सबमें है ना। अब बाप कहते हैं - देह के सब धर्म छोड़ अपने को आत्मा समझो। अभी तुम आत्मा यहाँ पार्ट बजा रही हो। कैसा पार्ट बजाती हो, वह भी समझाया गया है। बच्चे भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार ही समझते हैं। तुम राजयोगी हो ना। पढ़ने वाले सब योगी ही होते हैं। पढ़ाने वाले टीचर के साथ योग जरूर रखना पड़ता है। एम आब्जेक्ट का भी मालूम रहता है-इस पढ़ाई से हम फलाना बनेंगे। यह पढ़ाई तो एक ही है, इनको कहा जाता है राजाओं का राजा बनने की पढ़ाई। राजयोग है ना। राजाई प्राप्त करने के लिए बाप से योग। और कोई मनुष्य यह राजयोग कभी सिखला न सके। तुमको कोई मनुष्य नहीं सिखलाते हैं। परमात्मा तुम आत्माओं को सिखलाते हैं। तुम फिर औरों को सिखलाते हो। तुम भी अपने को आत्मा समझो। हम आत्माओं को बाप सिखलाते हैं। यह याद न रहने से जौहर नहीं भरता है, इसलिए बहुतों की बुद्धि में नहीं बैठता है। तो बाप हमेशा कहते हैं, योगयुक्त हो, याद की यात्रा में रहकर समझाओ। हम भाई-भाई को सिखलाते हैं। तुम भी आत्मा हो, वह सबका बाप, टीचर, गुरू है। आत्मा को देखना है। भल गायन है सेकण्ड में जीवनमुक्ति परन्तु इसमें मेहनत बहुत है। आत्म-अभिमानी न बनने से तुम्हारे वचनों में ताकत नहीं रहती है क्योंकि जिस प्रकार बाप समझाते हैं उस रीति कोई समझाते नहीं हैं। कोई-कोई तो बहुत अच्छा समझाते हैं। कौन कांटा है और कौन फूल है-मालूम तो सब पड़ता है, स्कूल में बच्चे 5-6 दर्जा पढ़कर फिर ट्रान्सफर होते हैं। अच्छे-अच्छे बच्चे जब ट्रान्सफर होते हैं तो दूसरे क्लास के टीचर को भी झट मालूम पड़ता है। यह बच्चे तीखे पुरुषार्थी हैं, इन्होंने अच्छा पढ़ा हुआ है तब ऊंच नम्बर में आये हैं। टीचर तो जरूर समझते होंगे ना। वह है लौकिक पढ़ाई, यहाँ तो वह बात नहीं। यह है पारलौकिक पढ़ाई। यहाँ तो ऐसे नहीं कहेंगे। यह पहले बहुत अच्छा पढ़कर आये हैं तब अच्छा पढ़ते हैं। नहीं। उस इम्तहान में तो ट्रान्सफर होते हैं तो टीचर समझेंगे इसने पढ़ाई में मेहनत की है, तब आगे नम्बर लिया है। यहाँ तो है ही नई पढ़ाई, जो पहले से कोई पढ़े हुए नहीं हैं। नई पढ़ाई है, नया पढ़ाने वाला है। सब नये हैं। नयों को पढ़ाते हैं। उनमें जो अच्छी रीति पढ़ते हैं तो कहेंगे यह अच्छे पुरूषार्थी हैं। यह है नई दुनिया के लिए नई नॉलेज और कोई पढ़ाने वाला तो है नहीं। जितना-जितना जो अटेन्शन देते हैं उतना ऊंच नम्बर में जाते हैं। कोई तो बहुत मीठे आज्ञाकारी होते हैं। देखने से ही पता पड़ता है, यह पढ़ाने वाला बहुत अच्छा है, इनमें कोई अवगुण नहीं है। चलन से, बात करने से मालूम पड़ जाता है। बाबा पूछते भी सबसे हैं-यह कैसा पढ़ाते हैं, इनमें कोई खामी तो नहीं है। ऐसे बहुत कहते हैं कि हमारे पूछे बिगर समाचार कभी नहीं देना। कोई अच्छा पढ़ाते हैं, कोई शुरूड़ बुद्धि नहीं होते हैं। माया का वार बहुत होता है। यह बाप जानते हैं, माया इन्हों को धोखा बहुत देती है। भल 10 वर्ष भी पढ़ाया है परन्तु माया ऐसी जबरदस्त है-देह-अहंकार आया और यह फँसा। बाप समझाते हैं जो भी पहलवान हैं, उन पर माया की चोट लगती है। माया भी बलवान से बलवान होकर लड़ती है।
तुम समझते होंगे बाबा ने जिसमें प्रवेश किया है यह नम्बरवन है। फिर नम्बरवार तो बहुत हैं ना। बाबा मिसाल करके एक-दो का देते हैं। होते तो नम्बरवार बहुत हैं। जैसे देहली में गीता बच्ची बहुत होशियार है। है बच्ची बड़ी मीठी। बाबा हमेशा कहते हैं गीता तो सच्ची गीता है। मनुष्य वह गीता पढ़ते हैं परन्तु यह नहीं समझते हैं कि भगवान ने कैसे राजयोग सिखाकर राजाओं का राजा बनाया था। बरोबर सतयुग था तो एक ही धर्म था, कल की बात है। बाप कहते हैं कल तुमको इतना साहूकार बनाकर गया। तुम पदमापदम भाग्यशाली थे, अब तुम क्या बन गये हो। तुम फील करते हो ना। उन गीता सुनाने वालों से कोई को फीलिंग आती है क्या, ज़रा भी नहीं समझते। ऊंच ते ऊंच श्रीमत भगवत गीता ही गाई जाती है। वह तो गीता किताब बैठ पढ़ते वा सुनाते हैं। बाप तो किताब नहीं पढ़ते। फ़र्क तो है ना। उनकी याद की यात्रा तो है ही नहीं। वह तो नीचे गिरते ही रहते हैं। सर्वव्यापी के ज्ञान से सब देखो कैसे बन गये हैं। तुम जानते हो कल्प-कल्प ऐसे ही होगा। बाप कहते हैं तुमको सिखलाकर विषय सागर से पार कर देते हैं। कितना फ़र्क है। शास्त्र पढ़ना तो भक्ति मार्ग हुआ ना। बाप कहते हैं यह पढ़ने से मेरे से कोई नहीं मिलते। वह समझते हैं कोई भी तरफ जाओ पहुँचना तो सबको एक ही जगह है। कभी कहते हैं भगवान किस न किस रूप में आकर पढ़ायेंगे। जब बाप को आकर पढ़ाना है तो फिर तुम क्या पढ़ाते हो? बाप समझाते हैं गीता में आटे में नमक मिसल कोई राइट अक्षर हैं, जिसमें तुम पकड़ सकते हो। सतयुग में तो कोई भी शास्त्र आदि होते ही नहीं। यह है ही भक्ति मार्ग के शास्त्र। ऐसे नहीं कहेंगे कि यह अनादि हैं। शुरू से चले आते हैं। नहीं। अनादि का अर्थ नहीं समझते। बाप समझाते हैं यह तो ड्रामा अनादि बरोबर है। तुमको बाप राजयोग सिखलाते हैं। बाप कहते हैं अभी तुमको सिखलाता हूँ फिर गुम हो जाता हूँ। तुम कहेंगे हमारा राज्य अनादि था। राज्य वही है सिर्फ पावन से बदल पतित होने से नाम बदल जाता है। देवता के बदले हिन्दू कहलाते हैं। है तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म के ना। जैसे दूसरे सतोप्रधान से सतो, रजो, तमो में आते हैं, तुम भी ऐसे उतरते हो। रजो में आते हो तो अपवित्रता के कारण देवता के बदले हिन्दू कहलाते हो। नहीं तो हिन्दू हिन्दुस्तान का नाम है। तुम असुल में तो देवी-देवता थे ना। देवतायें सदैव पावन होते हैं। अभी तो मनुष्य पतित बन गये हैं। तो नाम भी हिन्दू रख दिया है। पूछो हिन्दू धर्म कब, किसने रचा? तो बता नहीं सकेंगे। आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, जिसको पैराडाइज आदि बहुत अच्छे-अच्छे नाम देते हैं। जो पास्ट हुआ है वह फिर रिपीट होना है। इस समय तुम शुरू से लेकर अन्त तक सब जानते हो। जानते जायेंगे तो जीते रहेंगे। कई तो मर भी जाते हैं। बाप का बनते हैं तो माया की युद्ध चलती है। युद्ध होने से ट्रेटर बन पड़ते हैं। रावण के थे, राम के बने। फिर रावण, राम के बच्चों पर जीत पहन अपनी तरफ ले जाता है। कोई बीमार हो पड़ते हैं। फिर न वहाँ के रहते, न यहाँ के रहते। न खुशी है, न रंज। बीच में पड़े रहते हैं। तुम्हारे पास भी बहुत हैं जो बीच में हैं। बाप का भी पूरा नहीं बनते हैं, रावण का भी पूरा नहीं बनते।
अभी तुम हो पुरूषोत्तम संगमयुग पर। उत्तम पुरूष बनने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। यह बड़ी समझने की बाते हैं। बाबा पूछते हैं हाथ तो बहुत बच्चे उठाते हैं। परन्तु समझा जाता है-बुद्धि नहीं है। भल बाबा कहते हैं शुभ बोलो। कहते तो सब हैं-हम नर से नारायण बनेंगे। कथा ही नर से नारायण बनने की है। अज्ञान काल में भी सत्य नारायण की कथा सुनते हैं ना। वहाँ तो कोई पूछ नहीं सकते। यह तो बाप ही पूछते हैं। तुम क्या समझते हो-इतनी हिम्मत है? तुम्हें पावन भी जरूर बनना है। कोई आते हैं तो पूछा जाता है इस जन्म में कोई पाप कर्म तो नहीं किये हैं? जन्म-जन्मान्तर के पापी तो हो ही। इस जन्म के पाप बता दो तो हल्के हो जायेंगे। नहीं तो दिल अन्दर खाता रहेगा। सच बतलाने से हल्के होंगे। कई बच्चे सच नहीं बताते हैं तो माया एकदम जोर से घूँसा लगा देती है। तुम्हारी बड़ी कड़ी बॉक्सिंग हैं। उस बॉक्सिंग में तो शरीर को चोट लगती है, इसमें बुद्धि को बहुत चोट लगती है। यह बाबा भी जानते हैं। यह ब्रह्मा कहते हैं मैं बहुत जन्मों के अन्त का हूँ। सबसे पावन था, अभी सबसे पतित हूँ। फिर पावन बनता हूँ। ऐसे तो नहीं कहता हूँ कि मैं महात्मा हूँ। बाप भी खातिरी देते हैं, यह सबसे जास्ती पतित है। बाप कहते हैं मैं पराये देश, पराये शरीर में आता हूँ। इनके बहुत जन्मों के अन्त में मैं इनमें प्रवेश करता हूँ, जिसने पूरे 84 जन्म लिये हैं। अब यह भी पावन बनने का पुरूषार्थ करते हैं, खबरदार भी बहुत रहना होता है। बाप तो जानते हैं ना। यह बाबा का बच्चा बहुत नजदीक है। यह तो बाप से जुदा कभी हो नहीं सकता। ख्याल भी नहीं आ सकता कि छोड़कर जाऊं। एकदम हमारे बाजू में बैठा है। मेरा तो बाबा है ना। मेरे घर में बैठा है। बाबा जानते हैं हँसीकुड़ी भी करते हैं। बाबा आज हमको स्नान तो कराओ, भोजन तो खिलाओ। मैं छोटा बच्चा हूँ, बहुत प्रकार से बाबा को याद करता हूँ। तुम बच्चों को समझाता हूँ- ऐसे-ऐसे याद करो। बाबा आप तो बहुत मीठे हो। एकदम हमको विश्व का मालिक बना देते हो। यह बात और किसकी बुद्धि में हो न सके। बाप सबको रिफ्रेश करते रहते हैं। सब पुरूषार्थ तो करते हैं, परन्तु चलन भी ऐसी हो ना। भूल हो जाए तो झट लिखना चाहिए -बाबा, हमसे यह भूल हो जाती है। कोई-कोई लिखते भी हैं-बाबा हमसे यह भूल हुई माफ करना। हमारा बच्चा बनकर फिर भूल करने से सौ गुना वृद्धि हो जाती है। माया से हारते हैं तो फिर वही के वही बन जाते हैं। बहुत हारते हैं। यह बड़ी बॉक्सिंग है। राम और रावण की लड़ाई है। दिखाते भी हैं बन्दर सेना ली। यह सब बच्चों का खेल बना हुआ है। जैसे छोटे बच्चे बेसमझ होते हैं ना। बाप भी कहते हैं यह तो इन्हों की पाई-पैसे की बुद्धि है। कहते हैं हर एक ईश्वर का रूप है। तो हर एक ईश्वर बन क्रियेट भी करते हैं, पालना करते हैं फिर विनाश भी कर देते। अब ईश्वर कोई का विनाश थोड़ेही करते हैं। यह तो कितनी अज्ञानता है इसलिए कहा जाता है गुड़ियों की पूजा करते रहते हैं। वन्डर है। मनुष्यों की बुद्धि क्या हो जाती है। कितना खर्चा करते हैं। बाप उल्हना देते हैं - हम तुमको इतना बड़ा बनाकर गया, तुमने क्या किया! तुम भी जानते हो हम सो देवता थे फिर चक्र लगाते हैं, अभी हम ब्राह्मण बने हैं। फिर हम सो देवता..... बनेंगे। यह तो बुद्धि में बैठा हुआ है ना। यहाँ बैठते हो तो बुद्धि में यह नॉलेज रहनी चाहिए। बाप भी नॉलेजफुल है ना। रहते भल शान्तिधाम में हैं फिर भी उनको नॉलेजफुल कहा जाता है। तुम्हारी भी आत्मा में सारी नॉलेज रहती है ना। कहते हैं इस ज्ञान से तो हमारी आंख खुल गई है। बाप तुमको ज्ञान के चक्षु देते हैं। आत्मा को सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त का पता पड़ गया है। चक्र फिरता रहता है। ब्राह्मणों को ही स्वदर्शन चक्र मिलता है। देवताओं को पढ़ाने वाला कोई होता नहीं। उनको शिक्षा की दरकार नहीं। पढ़ना तो तुमको है जो फिर तुम देवता बनते हो। अब बाप बैठ यह नई-नई बातें समझाते हैं। यह नई पढ़ाई पढ़कर तुम ऊंच बनते हो। फर्स्ट सो लास्ट। लास्ट सो फर्स्ट। यह पढ़ाई है ना। अभी तुम समझते हो बाबा हर कल्प आकर पतित से पावन बनाते हैं, फिर यह नॉलेज खलास हो जायेगी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बहुत-बहुत आज्ञाकारी, मीठा होकर चलना है। देह-अहंकार में नहीं आना है। बाप का बच्चा बनकर फिर कोई भी भूल नहीं करनी है। माया की बॉक्सिंग में बहुत-बहुत खबरदार रहना है।
2) अपने वचनों (वाक्यों) में ताकत भरने के लिए आत्म-अभिमानी रहने का अभ्यास करना है। स्मृति रहे-बाप का सिखलाया हुआ हम सुना रहे हैं तो उसमें जौहर भरेगा।

वरदान: अपवित्रता का अंश - आलस्य और अलबेलेपन का त्याग करने वाले सम्पूर्ण निर्विकारी भव
दिनचर्या के कोई भी कर्म में नीचे ऊपर होना, आलस्य में आना या अलबेला होना - यह विकार का अंश है, जिसका प्रभाव पूज्यनीय बनने पर पड़ता है। यदि आप अमृतवेले स्वयं को जागृत स्थिति में अनुभव नहीं करते, मजबूरी से वा सुस्ती से बैठते हो तो पुजारी भी मजबूरी वा सुस्ती से पूजा करेंगे। तो आलस्य वा अलबेलेपन का भी त्याग कर दो तब सम्पूर्ण निर्विकारी बन सकेंगे।

स्लोगन: सेवा भले करो लेकिन व्यर्थ खर्च नहीं करो।

Wednesday, 27 November 2019

Hindi Murli 28/11/2019

28-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - शिवबाबा आया है तुम्हारे सब भण्डारे भरपूर करने, कहा भी जाता है भण्डारा भरपूर काल कंटक दूर''

प्रश्न: ज्ञानवान बच्चों की बुद्धि में किस एक बात का निश्चय पक्का होगा?
उत्तर: उन्हें दृढ़ निश्चय होगा कि हमारा जो पार्ट है वह कभी घिसता-मिटता नहीं। मुझ आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है, यही बुद्धि में ज्ञान है तो ज्ञानवान है। नहीं तो सारा ज्ञान बुद्धि से उड़ जाता है।

ओम् शान्ति। बाप आकर रूहानी बच्चों प्रति क्या कहते हैं? क्या सेवा करते हैं? इस समय बाप यह रूहानी पढ़ाई पढ़ाने की सेवा करते हैं। यह भी तुम जानते हो। बाप का भी पार्ट है, टीचर का भी पार्ट है और गुरू का भी पार्ट है। तीनों पार्ट अच्छे बजा रहे हैं। तुम जानते हो वह बाप भी है, सद्गति देने वाला गुरू भी है और सबके लिए है। छोटे, बड़े, बूढ़े, जवान सबके लिए एक ही है। सुप्रीम बाप, सुप्रीम टीचर है। बेहद की शिक्षा देते हैं। तुम कॉन्फ्रेन्स में भी समझा सकते हो कि हम सबकी बायोग्राफी को जानते हैं। परमपिता परमात्मा शिवबाबा की जीवन-कहानी को भी जानते हैं। नम्बरवार सब बुद्धि में याद होना चाहिए। सारा विराट रूप जरूर बुद्धि में रहता होगा। हम अभी ब्राह्मण बने हैं, फिर हम देवता बनेंगे फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनेंगे। यह तो बच्चों को याद है ना। सिवाए तुम बच्चों के और किसको यह बातें याद नहीं होंगी। उत्थान और पतन का सारा राज़ बुद्धि में रहे। हम उत्थान में थे फिर पतन में आये, अब बीच में हैं। शूद्र भी नहीं हैं, पूरे ब्राह्मण भी नहीं बने हैं। अगर अभी पक्के ब्राह्मण हो तो फिर शूद्रपने की एक्ट न हो। ब्राह्मणों में भी फिर शूद्रपना आ जाता है। यह भी तुम जानते हो-कब से पाप शुरू किये हैं? जब से काम चिता पर चढ़े हो, तो तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र है। ऊपर में है परमपिता परमात्मा बाप, फिर तुम हो आत्मायें। यह बातें तुम बच्चों की बुद्धि में जरूर याद रहनी चाहिए। अभी हम ब्राह्मण हैं, देवता बन रहे हैं फिर वैश्य, शूद्र डिनायस्टी में आयेंगे। बाप आकरके हमको शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं फिर हम ब्राह्मण से देवता बनेंगे। ब्राह्मण बन कर्मातीत अवस्था को प्राप्त कर फिर वापिस जायेंगे। तुम बाप को भी जानते हो। बाजोली वा 84 के चक्र को भी तुम जानते हो। बाजोली से तुमको बहुत इज़ी कर समझाते हैं। तुमको बहुत हल्का बनाते हैं ताकि अपने को बिन्दी समझ और झट भागेंगे। स्टूडेन्ट क्लास में बैठे रहते हैं तो बुद्धि में स्टडी ही याद रहती है। तुमको भी यह पढ़ाई याद रहनी चाहिए। अभी हम संगमयुग पर हैं फिर ऐसे चक्र लगायेंगे। यह चक्र सदैव बुद्धि में फिरता रहना चाहिए। यह चक्र आदि का नॉलेज तुम ब्राह्मणों के पास ही है, न कि शूद्रों के पास। देवताओं के पास भी यह ज्ञान नहीं है। अभी तुम समझते हो भक्ति मार्ग में जो चित्र बने हैं सब डिफेक्टेड हैं। तुम्हारे पास हैं एक्यूरेट क्योंकि तुम एक्यूरेट बनते हो। अभी तुमको ज्ञान मिला है तब समझते हो भक्ति किसको कहा जाता है, ज्ञान किसको कहा जाता है? ज्ञान देने वाला बाप ज्ञान का सागर अभी मिला है। स्कूल में पढ़ते हैं एम ऑबजेक्ट का मालूम तो पड़ता है ना। भक्ति मार्ग में तो एम ऑबजेक्ट होती नहीं। यह थोड़ेही तुमको मालूम था कि हम ऊंच देवी-देवता थे फिर नीचे गिरे हैं। अब जब ब्राह्मण बने हो तब पता पड़ा है। ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ जरूर आगे भी बने थे। प्रजापिता ब्रह्मा का नाम तो बाला है। प्रजापिता तो मनुष्य है ना। उनके इतने ढेर बच्चे हैं जरूर एडाप्टेड होने चाहिए। कितने एडाप्टेड हैं। आत्मा के रूप में तो सब भाई-भाई हो। अभी तुम्हारी बुद्धि कितनी दूर जाती है। तुम जानते हो जैसे ऊपर में स्टॉर्स खड़े हैं। दूर से कितने छोटे दिखाई पड़ते हैं। तुम भी बहुत छोटी-सी आत्मा हो। आत्मा कभी छोटी-बड़ी नहीं होती है। हाँ, तुम्हारा मर्तबा बहुत ऊंच है। उनको भी सूर्य देवता, चन्द्रमा देवता कहते हैं। सूर्य बाप, चन्द्रमा माँ कहेंगे। बाकी आत्मायें सब हैं नक्षत्र सितारे। तो आत्मायें सब एक जैसी छोटी हैं। यहाँ आकर पार्टधारी बनती हैं। देवतायें तो तुम ही बनते हो।
हम बहुत पावरफुल बन रहे हैं। बाप को याद करने से हम सतोप्रधान देवता बन जायेंगे। नम्बरवार थोड़ा-थोड़ा फ़र्क तो रहता है। कोई आत्मा पवित्र बन सतोप्रधान देवता बन जाती है, कोई आत्मा पूरा पवित्र नहीं बनती है। ज्ञान को ज़रा भी नहीं जानती है। बाप ने समझाया है बाप का परिचय तो जरूर सबको मिलना चाहिए। पिछाड़ी में बाप को तो जानेंगे ना। विनाश के समय सभी को पता पड़ता है बाप आया हुआ है। अभी भी कोई-कोई कहते हैं भगवान जरूर कहाँ आया हुआ है परन्तु पता नहीं पड़ता। समझते कोई भी रूप में आ जायेगा। मनुष्य मत तो बहुत है ना, तुम्हारी है एक ही ईश्वरीय मत। तुम ईश्वरीय मत से क्या बनते हो? एक है मनुष्य मत, दूसरी है ईश्वरीय मत और तीसरी है देवता मत। देवताओं को भी मत किसने दी? बाप ने। बाप की श्रीमत है ही श्रेष्ठ बनाने वाली। श्री श्री बाप को ही कहेंगे, न कि मनुष्य को। श्री श्री ही आकर श्री बनाते हैं। देवताओं को श्रेष्ठ बनाने वाला बाप ही है, उनको श्री श्री कहेंगे। बाप कहते हैं मैं तुमको ऐसा लायक बनाता हूँ। उन लोगों ने फिर अपने पर श्री श्री का टाइटिल रख दिया है। कॉन्फ्रेन्स में भी तुम समझा सकते हो। तुम ही समझाने लिए निमित्त बने हुए हो। श्री श्री तो है ही एक शिवबाबा जो ऐसा श्री देवता बनाते हैं। वो लोग शास्त्रों आदि की पढ़ाई पढ़कर टाइटिल ले आते हैं। तुमको तो श्री श्री बाप ही श्री अर्थात् श्रेष्ठ बना रहे हैं। यह है ही तमोप्रधान भ्रष्टाचारी दुनिया। भ्रष्टाचार से जन्म लेते हैं। कहाँ बाप का टाइटिल, कहाँ यह पतित मनुष्य अपने पर रखाते हैं। सच्ची-सच्ची श्रेष्ठ महान आत्मायें तो देवी-देवता हैं ना। सतोप्रधान दुनिया में कोई भी तमोप्रधान मनुष्य हो न सके। रजो में रजो मनुष्य ही रहेंगे, न कि तमो-गुणी। वर्ण भी गाये जाते हैं ना। अभी तुम समझते हो, आगे तो हम कुछ नहीं समझते थे। अब बाप कितना समझदार बनाते हैं। तुम कितना धनवान बनते हो। शिवबाबा का भण्डारा भरपूर है। शिवबाबा का भण्डारा कौन-सा है? (अविनाशी ज्ञान रत्नों का) शिवबाबा का भण्डारा भरपूर काल कंटक दूर। बाप तुम बच्चों को ज्ञान रत्न देते हैं। खुद है सागर। ज्ञान रत्नों का सागर है। बच्चों की बुद्धि बेहद में जानी चाहिए। इतनी करोड़ आत्मायें सब अपने-अपने शरीर रूपी तख्त पर विराजमान हैं। यह बेहद का नाटक है। आत्मा इस तख्त पर विराजमान होती है। तख्त एक न मिले दूसरे से। सबके फीचर्स अलग-अलग हैं, इनको कहा जाता है कुदरत। हर एक का कैसा अविनाशी पार्ट है। इतनी छोटी-सी आत्मा में 84 का रिकॉर्ड भरा हुआ रहता है। अति सूक्ष्म है। इससे सूक्ष्म वन्डर कोई हो नहीं सकता। इतनी छोटी आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है, जो यहाँ ही पार्ट बजाती है। सूक्ष्मवतन में तो कोई पार्ट बजाती नहीं है। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। बाप द्वारा तुम सब-कुछ जान जाते हो। यही नॉलेज है। ऐसे नहीं कि सबके अन्दर को जानने वाला है। यह नॉलेज जानते हैं, जो नॉलेज तुम्हारे में भी इमर्ज हो रही है। जिस नॉलेज से ही तुम इतना ऊंच पद पाते हो। यह भी समझ रहती है ना। बाप है बीजरूप। उनमें झाड़ के आदि, मध्य, अन्त की नॉलेज है। मनुष्यों ने तो लाखों वर्ष आयु दे दी है, तो ज्ञान आ न सके। अभी तुमको संगम पर यह सारा ज्ञान मिल रहा है। बाप द्वारा तुम सारे चक्र को जान जाते हो। इनके पहले तुम कुछ नहीं जानते थे। अभी तुम संगम पर हो। यह है तुम्हारा अन्त का जन्म। पुरूषार्थ करते-करते फिर तुम पूरा ब्राह्मण बन जायेंगे। अभी नहीं हो। अभी तो अच्छे-अच्छे बच्चे भी ब्राह्मण से फिर शूद्र बन जाते हैं। इसको कहा जाता है माया से हार खाना। बाबा की गोद से हारकर रावण की गोद में चले जाते हैं। कहाँ बाप की श्रेष्ठ बनने की गोद, कहाँ भ्रष्ट बनने की गोद। सेकण्ड में जीवनमुक्ति। सेकण्ड में पूरी दुर्दशा हो जाती है। ब्राह्मण बच्चे अच्छी रीति जानते हैं-कैसे दुर्दशा हो जाती है। आज बाप के बनते, कल फिर माया के पंजे में आकर रावण के बन जाते हैं। फिर तुम बचाने की कोशिश करते हो तो कोई-कोई बच भी जाते हैं। तुम देखते हो डूबते हैं तो बचाने की कोशिश करते रहो। कितनी खिटखिट होती है।
बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। यहाँ स्कूल में तुम पढ़ते हो ना। तुमको मालूम है कैसे हम यह चक्र लगाते हैं। तुम बच्चों को श्रीमत मिलती है ऐसे-ऐसे करो। भगवानुवाच तो जरूर है। उनकी श्रीमत हुई ना। मैं तुम बच्चों को अब शूद्र से देवता बनाने आया हूँ। अभी कलियुग में हैं शूद्र सम्प्रदाय। तुम जानते हो कलियुग पूरा हो रहा है। तुम संगम पर बैठे हो। यह बाप द्वारा तुमको नॉलेज मिली है। शास्त्र जो भी बनाये हैं उन सबमें है मनुष्य मत। ईश्वर तो शास्त्र बनाते नहीं। एक गीता के ऊपर ही कितने नाम रख दिये हैं। गांधी गीता, टैगोर गीता आदि-आदि। ढेर नाम हैं। गीता को मनुष्य इतना क्यों पढ़ते हैं? समझते तो कुछ भी नहीं। अध्याय वही उठाकर अर्थ अपना-अपना करते रहते हैं। वह तो सब मनुष्यों के बनाये हुए हो गये ना। तुम कह सकते हो मनुष्य मत की बनाई हुई गीता पढ़ने से आज यह हाल हुआ है। गीता ही पहला नम्बर का शास्त्र है ना। वह है देवी-देवता धर्म का शास्त्र। यह तुम्हारा ब्राह्मण कुल है। यह भी ब्राह्मण धर्म है ना। कितने धर्म हैं, जिस-जिस ने जो धर्म रचा है उनका वह नाम चलता है। जैनी लोग महावीर कहते हैं। तुम बच्चे सब महावीर-महावीरनियां हो। तुम्हारा मन्दिर में यादगार है। राजयोग है ना। नीचे योग तपस्या में बैठे हैं, ऊपर में राजाई का चित्र है। राजयोग का एक्यूरेट मन्दिर है। फिर कोई ने क्या नाम रख दिया है, कोई ने क्या। यादगार है बिल्कुल एक्यूरेट, बुद्धि से काम ले ठीक बनाया है फिर जिसने जो नाम कहा वह रख दिया है। यह मॉडल रूप में बनाया है। स्वर्ग और राजयोग संगमयुग का बनाया हुआ है। तुम आदि, मध्य, अन्त को जानते हो। आदि को भी तुमने देखा है। आदि संगमयुग को कहो या सतयुग को कहो। संगमयुग की सीन नीचे दिखाते हैं फिर राजाई ऊपर में दिखाई है। तो सतयुग है आदि फिर मध्य में है द्वापर। अन्त को तुम देखते ही हो। यह सब खत्म हो जाना है। पूरा यादगार बना हुआ है। देवी-देवता ही फिर वाम मार्ग में जाते हैं। द्वापर से वाम मार्ग शुरू होता है। यादगार पूरा एक्यूरेट है। यादगार में बहुत मन्दिर बनाये हैं। यहाँ ही सब निशानियाँ हैं। मन्दिर भी यहाँ ही बनते हैं। देवी-देवता भारतवासी ही राज्य करके गये हैं ना। फिर बाद में कितने मन्दिर बनाते हैं। सिक्ख लोग बहुत होंगे तो वह अपना मन्दिर बना देंगे। मिलेट्री वाले भी अपना मन्दिर बना देते हैं। भारतवासी अपने कृष्ण का वा लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर बनायेंगे। हनूमान, गणेश का बनायेंगे। यह सारा सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, कैसे स्थापना, विनाश, पालना होती है-यह तुम ही जानते हो। इसको कहा जाता है अन्धियारी रात। ब्रह्मा का दिन और रात ही गाई जाती है क्योंकि ब्रह्मा ही चक्र में आते हैं। अभी तुम ब्राह्मण हो फिर देवता बनेंगे। मुख्य तो ब्रह्मा हुआ ना। ब्रह्मा को रखें या विष्णु को रखें! ब्रह्मा है रात का और विष्णु है दिन का। वही रात से फिर दिन में आते हैं। दिन से फिर 84 जन्मों के बाद रात में आते हैं। कितना सहज समझानी है। यह भी पूरा याद नहीं कर सकते। पूरी रीति नहीं पढ़ते हैं तो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार पद पाते हैं। जितना याद करेंगे सतोप्रधान बनेंगे। सतोप्रधान सो भारत तमोप्रधान। बच्चों में कितना ज्ञान है। यह नॉलेज सिमरण करनी है। यह ज्ञान है ही नई दुनिया के लिए, जो बेहद का बाप आकर देते हैं। सब मनुष्य बेहद के बाप को याद करते हैं। अंग्रेज लोग भी कहते हैं ओ गॉड फादर लिब्रेटर, गाइड अर्थ तो तुम बच्चों की बुद्धि में है। बाप आकरके दु:ख की दुनिया आइरन एज से निकाल गोल्डन एज में ले जाते हैं। गोल्डन एज जरूर पास होकर गया है तब तो याद करते हैं ना। तुम बच्चों को अन्दर में बहुत खुशी रहनी चाहिए और दैवी कर्म भी करने चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप से जो अविनाशी ज्ञान रत्नों का अखुट खजाना मिल रहा है-उसे स्मृति में रख बुद्धि को बेहद में ले जाना है। इस बेहद नाटक में कैसे आत्मायें अपने-अपने तख्त पर विराजमान हैं-इस कुदरत को साक्षी हो देखना है।
2) सदा बुद्धि में याद रहे कि हम संगमयुगी ब्राह्मण हैं, हमें बाप की श्रेष्ठ गोद मिली है। हम रावण की गोद में जा नहीं सकते। हमारा कर्तव्य है-डूबने वालों को भी बचाना।

वरदान: सेवा-भाव से सेवा करते हुए आगे बढ़ने और बढ़ाने वाले निर्विघ्न सेवाधारी भव
सेवा-भाव सफलता दिलाता है, सेवा में अगर अहम् भाव आ गया तो उसको सेवा-भाव नहीं कहेंगे। किसी भी सेवा में अगर अहम्-भाव मिक्स होता है तो मेहनत भी ज्यादा, समय भी ज्यादा लगता और स्वयं की सन्तुष्टी भी नहीं होती। सेवा-भाव वाले बच्चे स्वयं भी आगे बढ़ते और दूसरों को भी आगे बढ़ाते हैं। वे सदा उड़ती कला का अनुभव करते हैं। उनका उमंग-उत्साह स्वयं को निर्विघ्न बनाता और दूसरों का कल्याण करता है।

स्लोगन: ज्ञानी तू आत्मा वह है जो महीन और आकर्षण करने वाले धागों से भी मुक्त है।

Tuesday, 26 November 2019

Hindi Murli 27/11/2019

27-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - बाबा की दृष्टि हद और बेहद से भी पार जाती है, तुम्हें भी हद (सतयुग), बेहद (कलियुग) से पार जाना है''

प्रश्न: ऊंच ते ऊंच ज्ञान रत्नों की धारणा किन बच्चों को अच्छी होती है?
उत्तर: जिनका बुद्धियोग एक बाप के साथ है, पवित्र बने हैं, उन्हें इन रत्नों की धारणा अच्छी होगी। इस ज्ञान के लिए शुद्ध बर्तन चाहिए। उल्टे-सुल्टे संकल्प भी बन्द हो जाने चाहिए। बाप के साथ योग लगाते-लगाते बर्तन सोना बने तब रत्न ठहर सकें।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप बैठ रोज़-रोज़ समझाते हैं। यह तो समझाया है बच्चों को-ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का यह सृष्टि चक्र बना हुआ है। बुद्धि में यह ज्ञान रहना चाहिए। तुम बच्चों को हद और बेहद से पार जाना है। बाप तो हद और बेहद से पार है। उनका भी अर्थ समझना चाहिए ना। रूहानी बाप बैठ समझाते हैं। वह भी टॉपिक समझानी है कि ज्ञान, भक्ति, पीछे है वैराग्य। ज्ञान को कहा जाता है दिन, जबकि नई दुनिया है। उसमें यह भक्ति अज्ञान है नहीं। वह है हद की दुनिया क्योंकि वहाँ बहुत थोड़े होते हैं। फिर आहिस्ते-आहिस्ते वृद्धि होती है। आधा समय बाद भक्ति शुरू होती है। वहाँ सन्यास धर्म होता ही नहीं। सन्यास वा त्याग होता नहीं। फिर बाद में सृष्टि की वृद्धि होती है। ऊपर से आत्मायें आती जाती हैं। यहाँ वृद्धि होती रहती। हद से शुरू होती है, बेहद में जाती है। बाप की तो हद और बेहद से पार दृष्टि जाती है। जानते हैं हद में कितने थोड़े बच्चे होते हैं फिर रावण राज्य में कितनी वृद्धि हो जाती है। अब तुमको हद और बेहद से भी पार जाना है। सतयुग में कितनी छोटी दुनिया है। वहाँ सन्यास वा वैराग्य आदि होता नहीं। बाद में द्वापर से लेकर फिर और धर्म शुरू होते हैं। सन्यास धर्म भी होता है जो घरबार का सन्यास करते हैं। सबको जानना तो चाहिए ना। उनको कहा जाता हठयोग और हद का सन्यास। सिर्फ घरबार छोड़ जंगल में जाते हैं। द्वापर से भक्ति शुरू होती है। ज्ञान तो होता ही नहीं। ज्ञान माना सतयुग-त्रेता सुख। भक्ति माना अज्ञान और दु:ख। यह अच्छी रीति समझाना होता है फिर दु:ख और सुख से पार जाना है। हद बेहद से पार। मनुष्य जांच करते हैं ना। कहाँ तक समुद्र है, आसमान है। बहुत कोशिश करते हैं परन्तु अन्त पा नहीं सकते हैं। एरोप्लेन में जाते हैं। उसमें भी इतना तेल चाहिए ना जो फिर वापिस भी लौट सकें। बहुत दूर तक जाते हैं परन्तु बेहद में जा नहीं सकते। हद तक ही जायेंगे। तुम तो हद, बेहद से पार जाते हो। अभी तुम समझ सकते हो पहले नई दुनिया में हद है। बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं। उसको सतयुग कहा जाता है। तुम बच्चों को रचना के आदि, मध्य, अन्त की नॉलेज होनी चाहिए ना। यह नॉलेज और कोई में है नहीं। तुमको समझाने वाला बाप है जो बाप हद और बेहद से पार है और कोई समझा न सके। रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं फिर कहते इससे पार जाओ। वहाँ तो कुछ भी रहता नहीं। कितना भी दूर जाते हैं, आसमान ही आसमान है। इनको कहा जाता है हद बेहद से पार। कोई अन्त नहीं पा सकते। कहेंगे बेअन्त। बेअन्त कहना तो सहज है परन्तु अन्त का अर्थ समझना चाहिए। अभी तुमको बाप समझ देते हैं। बाप कहते हैं मैं हद को भी जानता हूँ, बेहद को भी जानता हूँ। फलाने-फलाने धर्म फलाने-फलाने समय स्थापन हुए हैं! दृष्टि जाती है सतयुग की हद तरफ। फिर कलियुग के बेहद तरफ। फिर हम पार चले जायेंगे। जहाँ कुछ नहीं। सूर्य चांद के भी ऊपर हम जाते हैं, जहाँ हमारा शान्तिधाम, स्वीटहोम है। यूँ सतयुग भी स्वीट होम है। वहाँ शान्ति भी है तो राज्य-भाग्य सुख भी है-दोनों ही हैं। घर जायेंगे तो वहाँ सिर्फ शान्ति होगी। सुख का नाम नहीं लेंगे। अभी तुम शान्ति भी स्थापन कर रहे हो और सुख-शान्ति भी स्थापन कर रहे हो। वहाँ तो शान्ति भी है, सुख का राज्य भी है। मूलवतन में तो सुख की बात नहीं।
आधाकल्प तुम्हारा राज्य चलता है फिर आधाकल्प के बाद रावण का राज्य आता है। अशान्ति है ही 5 विकारों से। 2500 वर्ष तुम राज्य करते हो फिर 2500 वर्ष बाद रावण राज्य होता है। उन्हों ने तो लाखों वर्ष लिख दिया है। एकदम जैसे बुद्धू बना दिया है। पांच हज़ार वर्ष के कल्प को लाखों वर्ष कह देना बुद्धू-पना कहेंगे ना। ज़रा भी सभ्यता नहीं है। देवताओं में कितनी दैवी सभ्यता थी। वह अब असभ्यता हो पड़ी है। कुछ नहीं जानते। आसुरी गुण आ गये हैं। आगे तुम भी कुछ नहीं जानते थे। काम कटारी चलाए आदि-मध्य-अन्त दु:खी बना देते हैं इसलिए उनको कहा ही जाता है रावण सम्प्रदाय। दिखाया है राम ने बन्दर सेना ली। अब रामचन्द्र त्रेता का, वहाँ फिर बन्दर कहाँ से आये और फिर कहते राम की सीता चुराई गई। ऐसी बातें तो वहाँ होती ही नहीं। जीव जानवर आदि 84 लाख योनियां जितनी यहाँ हैं उतनी सतयुग-त्रेता में थोड़ेही होंगी। यह सारा बेहद का ड्रामा बाप बैठ समझाते हैं। बच्चों को बहुत दूरांदेशी बनना है। आगे तुमको कुछ भी पता नहीं था। मनुष्य होकर और नाटक को नहीं जानते हैं। अभी तुम समझते हो सबसे बड़ा कौन है? ऊंच ते ऊंच भगवान्। श्लोक भी गाते हैं ऊंचा तेरा नाम...... अब तुम्हारे सिवाए और कोई की बुद्धि में नहीं है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। बाप हद और बेहद का दोनों राज़ समझाते हैं। उनसे पार कुछ भी है नहीं। वह है तुम्हारे रहने का स्थान, जिसको ब्रह्माण्ड भी कहते हैं। जैसे यहाँ तुम आकाश तत्व में बैठे हो, इनमें कुछ देखने में आता है क्या? रेडियो में कहते हैं आकाशवाणी। अब यह आकाश तो बेअन्त है। अन्त पा नहीं सकते। तो आकाशवाणी कहने से मनुष्य क्या समझेंगे। यह जो मुख है यह है पोलार। मुख से वाणी (आवाज़) निकलती है। यह तो कॉमन बात है। मुख से आवाज़ निकलना जिसको आकाशवाणी कहा जाता है। बाप को भी आकाश द्वारा वाणी चलानी पड़े। तुम बच्चों को अपना भी राज़ सारा बताया है। तुमको निश्चय होता है। है बहुत सहज। जैसे हम आत्मा हैं वैसे बाप भी परम आत्मा है। ऊंच ते ऊंच आत्मा है ना। सबको अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। सबसे ऊंच ते ऊंच भगवान फिर प्रवृत्ति मार्ग का युगल मेरू। फिर नम्बरवार माला देखो कितनी थोड़ी है फिर सृष्टि बढ़ते-बढ़ते कितनी बड़ी हो जाती है। कितने करोड़ दानों अर्थात् आत्माओं की माला है। यह सब है पढ़ाई। बाप जो समझाते हैं उनको अच्छी रीति बुद्धि में धारण करो। झाड़ की डिटेल तो तुम सुनते रहते हो। बीज ऊपर में है। यह वैराइटी झाड़ है। इनकी आयु कितनी है। झाड़ वृद्धि को पाता रहता है तो सारा दिन बुद्धि में यही रहे। इस सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष की आयु बिल्कुल एक्यूरेट है। 5 हज़ार वर्ष से एक सेकण्ड का भी फर्क नहीं हो सकता। तुम बच्चों की बुद्धि में अब कितनी नॉलेज है, जो अच्छे मजबूत हैं। मजबूत तब होंगे जब पवित्र हों। इस नॉलेज की धारणा करने के लिए सोने का बर्तन चाहिए। फिर ऐसा सहज हो जायेगा जैसे बाबा के लिए सहज है। फिर तुमको भी कहेंगे मास्टर नॉलेजफुल। फिर नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार माला का दाना बन जायेंगे। ऐसी-ऐसी बातें बाबा बिगर कोई समझा न सकें। यह आत्मा भी समझा रही है। बाप भी इस तन द्वारा ही समझाते हैं, न कि देवताओं के शरीर से। बाप एक ही बार आकर गुरू बनते हैं फिर भी बाप को ही पार्ट बजाना है। 5 हजार वर्ष बाद आकर पार्ट बजायेंगे।
बाप समझाते हैं ऊंच ते ऊंच मैं हूँ। फिर है मेरू। जो आदि में महाराजा-महारानी हैं, वह फिर जाकर अन्त में आदि देव, आदि देवी बनेंगे। यह सारा ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में है। तुम कहाँ भी समझाओ तो वन्डर खायेंगे। यह तो ठीक बताते हैं। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप ही नॉलेजफुल है। उनके बिगर और कोई नॉलेज दे नहीं सकते। यह सब बातें धारण करनी हैं परन्तु बच्चों को धारणा होती नहीं है। है बहुत सिम्पुल। कोई मुश्किलात नहीं है। एक तो याद की यात्रा चाहिए इसमें, जो फिर पवित्र बर्तन में रत्न ठहरें। यह ऊंच ते ऊंच रत्न हैं। बाबा तो जवाहरी था। बहुत अच्छा हीरा माणिक आदि आता था तो चांदी की डिब्बी में कपूस आदि में अच्छी रीति रखते थे। जो कोई भी देखे तो कहेंगे यह तो बड़ी फर्स्टक्लास चीज है। यह भी ऐसे है। अच्छी चीज़ अच्छे बर्तन में शोभती है। तुम्हारे कान सुनते हैं। उनमें धारणा होती है। पवित्र होगा, बुद्धियोग बाप से होगा तो धारणा अच्छी होगी। नहीं तो सब निकल जायेगा। आत्मा भी है कितनी छोटी। उनमें कितना ज्ञान भरा हुआ है। कितना अच्छा शुद्ध बर्तन चाहिए। कोई संकल्प भी न उठे। उल्टे-सुल्टे संकल्प सब बन्द हो जाने चाहिए। सब तरफ से बुद्धियोग हटाना है। मेरे साथ योग लगाते-लगाते बर्तन सोना बना दो जो रत्न ठहर सकें। फिर दूसरों को दान करते रहेंगे। भारत को महादानी माना जाता है, वह धन दान तो बहुत करते हैं। परन्तु यह है अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान। देह सहित जो कुछ है वह सब छोड़-कर एक के साथ बुद्धि का योग रहे। हम तो बाप के हैं, इसमें ही मेहनत लगती है। एम ऑब्जेक्ट तो बाप बता देते हैं। पुरुषार्थ करना बच्चों का काम है। अब ही इतना ऊंच पद पा सकेंगे। कोई भी उल्टा-सुल्टा संकल्प वा विकल्प न आये। बाप ही नॉलेज का सागर, हद बेहद से पार है। सब बैठ समझाते हैं। तुम समझते हो बाबा हमको देखते हैं परन्तु हम तो हद-बेहद से पार ऊपर चला जाता हूँ। मैं रहने वाला भी वहाँ का हूँ। तुम भी हद बेहद से पार चले जाओ। संकल्प विकल्प कुछ भी न आये। इसमें मेहनत चाहिए। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान बनना है। हथ कार डे दिल यार डे। गृहस्थी तो बहुत हैं। गृहस्थी जितना उठाते हैं उतना घर में रहने वाले बच्चे नहीं। सेन्टर चलाने वाले, मुरली चलाने वाले भी ना पास हो जाते हैं और पढ़ने वाले ऊंच चले जाते हैं। आगे तुमको सब मालूम पड़ता जायेगा। बाबा बिल्कुल ठीक बताते हैं। हमको जो पढ़ाते थे उनको माया खा गई। महारथी को माया एकदम हप कर गई। हैं नहीं। मायावी ट्रेटर बन जाते हैं। विलायत में भी ट्रेटर बन पड़ते हैं ना। कहाँ-कहाँ जाकर शरण लेते हैं। जो पॉवरफुल होते हैं उस तरफ चले जाते हैं। इस समय तो मौत सामने है ना तो बहुत ताकत वाले पास जायेंगे। अभी तुम समझते हो बाप ही पॉवरफुल है। बाप है सर्वशक्तिमान। हमको सिखलाते-सिखलाते सारे विश्व का मालिक बना देते हैं। वहाँ सब कुछ मिल जाता है। कोई अप्राप्त वस्तु नहीं होती, जिसकी प्राप्ति के लिए हम पुरूषार्थ करें। वहाँ कोई ऐसी चीज़ होती नहीं जो तुम्हारे पास न हो। सो भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार पद पाते हैं। बाप बिगर ऐसी बातें कोई नहीं जानते। सब हैं पुजारी। भल बड़े-बड़े शंकराचार्य आदि हैं, बाबा उन्हों की महिमा भी सुनाते हैं। पहले पवित्रता की ताकत से भारत को बहुत अच्छा थमाने निमित्त बनते हैं। सो भी जब सतोप्रधान होते हैं। अभी तो तमोप्रधान हैं। उनमें क्या ताकत रखी है। अभी तुम जो पुजारी थे सो फिर पूज्य बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो। अभी तुम्हारी बुद्धि में सारा ज्ञान है। बुद्धि में धारणा रहे और तुम समझाते रहो। बाप को भी याद करो। बाप ही सारे झाड़ का राज़ समझाते हैं। बच्चों को मीठा भी ऐसा बनने का है। युद्ध है ना। माया के तूफान भी बहुत आते हैं। सब सहन करना पड़ता है। बाप की याद में रहने से तूफान सब चले जायेंगे। हातमताई का खेल बताते हैं ना। मुहलरा डालते थे, माया चली जाती थी। मुहलरा निकालने से ही माया आ जाती थी। छुईमुई होती है ना। हाथ लगाओ तो मुरझा जाते हैं। माया बड़ी तीखी है, इतना ऊंच पढ़ाई पढ़ते-पढ़ते बैठे-बैठे गिरा देती है इसलिए बाप समझाते रहते हैं अपने को भाई-भाई समझो तो फिर हद बेहद से पार चले जायेंगे। शरीर ही नहीं तो फिर दृष्टि कहाँ जायेगी। इतनी मेहनत करनी है, सुनकर फाँ नहीं हो जाना है। कल्प-कल्प तुम्हारा पुरुषार्थ चलता है और तुम अपना भाग्य पाते हो। बाप कहते हैं पढ़ा हुआ सब भूलो। बाकी जो कभी नहीं पढ़े हो वह सुनो और याद करो। उनको कहा जाता है भक्ति मार्ग। तुम राजऋषि हो ना। जटायें खुली हो और मुरली चलाओ। साधु-सन्त आदि जो सुनाते हैं वह सब है मनुष्यों की मुरली। यह है बेहद के बाप की मुरली। सतयुग-त्रेता में तो ज्ञान के मुरली की दरकार ही नहीं। वहाँ न ज्ञान की, न भक्ति की दरकार है। यह ज्ञान तुमको मिलता है इस संगमयुग पर और बाप ही देने वाला है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बुद्धि में ज्ञान रत्नों को धारण कर दान करना है। हद बेहद से पार ऐसी स्थिति में रहना है जो कभी भी उल्टा-सुल्टा संकल्प वा विकल्प न आये। हम आत्मा भाई-भाई हैं, यही स्मृति रहे।
2) माया के तूफानों से बचने के लिए मुख में बाप की याद का मुहलरा डाल लेना है। सब कुछ सहन करना है। छुईमुई नहीं बनना है। माया से हार नहीं खानी है।

वरदान: सर्व सत्ताओं को सहयोगी बनाए प्रत्यक्षता का पर्दा खोलने वाले सच्चे सेवाधारी भव
प्रत्यक्षता का पर्दा तब खुलेगा जब सब सत्ता वाले मिलकर कहेंगे कि श्रेष्ठ सत्ता, ईश्वरीय सत्ता, आध्यात्मिक सत्ता है तो यही एक परमात्म सत्ता है। सभी एक स्टेज पर इकट्ठे हो ऐसा स्नेह मिलन करें। इसके लिए सबको स्नेह के सूत्र में बांध समीप लाओ, सहयोगी बनाओ। यह स्नेह ही चुम्बक बनेगा जो सब एक साथ संगठन रूप में बाप की स्टेज पर पहुंचेंगे। तो अब अन्तिम प्रत्यक्षता के हीरो पार्ट में निमित्त बनने की सेवा करो तब कहेंगे सच्चे सेवाधारी।

स्लोगन: सेवा द्वारा सर्व की दुआयें प्राप्त करना - यह आगे बढ़ने की लिफ्ट है।

Monday, 25 November 2019

Hindi Murli 26/11/2019

26-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - ड्रामा की श्रेष्ठ नॉलेज तुम बच्चों के पास ही है, तुम जानते हो यह ड्रामा हूबहू रिपीट होता है''

प्रश्न: प्रवृत्ति वाले बाबा से कौन-सा प्रश्न पूछते हैं, बाबा उन्हें क्या राय देते हैं?
उत्तर: कई बच्चे पूछते हैं - बाबा हम धन्धा करें? बाबा कहते - बच्चे, धन्धा भल करो लेकिन रॉयल धन्धा करो। ब्राह्मण बच्चे छी-छी धन्धा शराब, सिगरेट, बीड़ी आदि का नहीं कर सकते क्योंकि इनसे और ही विकारों की खींच होती है।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझा रहे हैं। अब एक है रूहानी बाप की श्रीमत, दूसरी है रावण की आसुरी मत। आसुरी मत बाप की नहीं कहेंगे। रावण को बाप तो नहीं कहेंगे ना। वह है रावण की आसुरी मत। अभी तुम बच्चों को मिल रही है ईश्वरीय मत। कितना रात-दिन का फर्क है। बुद्धि में आता है ईश्वरीय मत से दैवी गुण धारण करते आये हैं। यह सिर्फ तुम बच्चे ही बाप द्वारा सुनते हो और कोई को मालूम नहीं पड़ता है। बाप मिलते ही हैं सम्पत्ति के लिए। रावण से तो और ही सम्पत्ति कम होती जाती है। ईश्वरीय मत कहाँ ले जाती है और आसुरी मत कहाँ ले जाती है, यह तुम ही जानते हो। आसुरी मत जबसे मिलती है, तुम नीचे गिरते ही आते हो। नई दुनिया में थोड़ा-थोड़ा ही गिरते हो। गिरना कैसे होता है, फिर चढ़ना कैसे होता है - यह भी तुम बच्चे समझ गये हो। अभी श्रीमत तुम बच्चों को मिलती है फिर से श्रेष्ठ बनने के लिए। तुम यहाँ आये ही हो श्रेष्ठ बनने के लिए। तुम जानते हो - हम फिर श्रेष्ठ मत कैसे पायेंगे। अनेक बार तुमने श्रेष्ठ मत से ऊंच पद पाया है फिर पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे गिरते आये हो। फिर एक ही बार चढ़ते हो। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार तो होते ही हैं। बाप समझाते हैं, टाइम लगता है। पुरूषोत्तम संगमयुग का भी टाइम है ना, पूरा एक्यूरेट। ड्रामा बड़ा एक्यूरेट चलता है और बहुत वन्डरफुल है। बच्चों को समझ में बड़ा सहज आता है-बाप को याद करना है और वर्सा लेना है। बस। परन्तु पुरूषार्थ करते हैं तो कइयों को डिफीकल्ट भी लगता है। इतना ऊंच ते ऊंच पद पाना कोई सहज थोड़ेही हो सकता है। बहुत सहज बाप की याद और सहज वर्सा बाप का है। सेकण्ड की बात है। फिर पुरूषार्थ करने लगते हैं तो माया के विघ्न भी पड़ते हैं। रावण पर जीत पानी होती है। सारी सृष्टि पर इस रावण का राज्य है। अभी तुम समझते हो हम योगबल से रावण पर हर कल्प जीत पाते आये हैं। अब भी पा रहे हैं। सिखलाने वाला है बेहद का बाप। भक्ति मार्ग में भी तुम बाबा-बाबा कहते आये हो। परन्तु पहले बाप को नहीं जानते थे। आत्मा को जानते थे। कहते थे चमकता है भ्रकुटी के बीच में अजब सितारा.......। आत्मा को जानते हुए भी बाप को नहीं जानते थे। कैसा विचित्र ड्रामा है। कहते भी थे-हे परमपिता परमात्मा, याद करते थे, फिर भी जानते नहीं थे। न आत्मा के आक्यूपेशन को, न परमात्मा के आक्यूपेशन को पूरा जानते थे। बाप ही खुद आकर समझाते हैं। बाप बिगर कब कोई रियलाइज़ करा न सके। कोई का पार्ट ही नहीं। गायन भी है ईश्वरीय सम्प्रदाय, आसुरी सम्प्रदाय और दैवी सम्प्रदाय। है बहुत सहज। परन्तु यह बातें याद रहें-इसमें ही माया विघ्न डालती है। भुला देती है। बाप कहते हैं नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार याद करते-करते जब ड्रामा का अन्त होगा अर्थात् पुरानी दुनिया का अन्त होगा तब नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार राजधानी स्थापन हो ही जायेगी। शास्त्रों से यह बात कोई समझ न सके। गीता आदि तो इसने भी बहुत पढ़ी है ना। अब बाप कहते हैं इसकी कोई वैल्यू नहीं। परन्तु भक्ति में कनरस बहुत मिलता है इसलिए छोड़ते नहीं।
तुम जानते हो सारा मदार पुरूषार्थ पर है। धन्धा आदि भी कोई का रॉयल होता है, कोई का छी-छी धन्धा होता है। शराब, बीड़ी, सिगरेट आदि बेचते हैं-यह धन्धा तो बहुत खराब है। शराब सब विकारों को खींचती है। किसको शराबी बनाना-यह धन्धा अच्छा नहीं। बाप राय देंगे युक्ति से यह धन्धा चेन्ज कर लो। नहीं तो ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। बाप समझाते हैं इन सब धन्धों में है नुकसान, बिगर अविनाशी ज्ञान रत्नों के धन्धे के। भल जवाहरात का धन्धा करते थे परन्तु फायदा तो नहीं हुआ ना। करके लखापति बने। इस धन्धे से क्या बनते हैं? बाबा पत्रों में भी हमेशा लिखते हैं पद्मापद्म भाग्यशाली। सो भी 21 जन्मों के लिए बनते। तुम भी समझते हो बाबा कहते बिल्कुल ठीक हैं। हम सो यह देवी-देवता थे, फिर चक्र लगाते-लगाते नीचे आते हैं। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को भी जान गये हो। नॉलेज तो बाप द्वारा मिली है परन्तु फिर दैवीगुण भी धारण करने हैं। अपनी जांच करनी है-हमारे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? यह बाबा भी जानते हैं हमने अपना यह शरीर रूपी मकान किराये पर दिया है। यह मकान है ना। इसमें आत्मा रहती है। हमको बहुत फखुर रहता है-भगवान को हमने किराये पर मकान दिया है! ड्रामा प्लेन अनुसार और कोई मकान उनको लेना ही नहीं है। कल्प-कल्प यह मकान ही लेना पड़ता है। इनको तो खुशी होती है ना। परन्तु फिर हंगामा भी कितना मचा। यह बाबा हंसी-कुड़ी में कब बाबा को कहते हैं-बाबा, आपका रथ बना तो हमको इतनी गाली खानी पड़ती है। बाप कहते हैं सबसे जास्ती गाली मुझे मिली। अब तुम्हारी बारी है। ब्रह्मा को कब गाली मिली नहीं हैं। अब बारी आयी है। रथ दिया है यह तो समझते हैं ना तो जरूर बाप से मदद भी मिलेगी। फिर भी बाबा कहते हैं बाप को निरन्तर याद करना, इसमें तुम बच्चे इनसे भी जास्ती तीखे जा सकते हो क्योंकि इनके ऊपर तो मामला बहुत हैं। भल ड्रामा कहकर छोड़ देते हैं फिर भी कुछ लैस जरूर आती है। यह बिचारे बहुत अच्छी सर्विस करते थे। यह संगदोष में खराब हो गये। कितनी डिससर्विस होती है। ऐसा-ऐसा काम करते हैं, लैस आ जाती है। उस समय यह नहीं समझते कि यह भी ड्रामा बना हुआ है। यह फिर बाद में ख्याल आता है। यह तो ड्रामा में नूँध है ना। माया अवस्था को बिगाड़ देती है तो बहुत डिस सर्विस हो जाती है। कितना अबलाओं आदि पर अत्याचार हो जाते हैं। यहाँ तो खुद के बच्चे ही कितनी डिससर्विस करते हैं। उल्टा सुल्टा बोलने लग पड़ते हैं।
अभी तुम बच्चे जानते हो बाप क्या सुनाते हैं? कोई शास्त्र आदि नहीं सुनाते हैं। अभी हम श्रीमत पर कितना श्रेष्ठ बनते हैं। आसुरी मत से कितना भ्रष्ट बने हैं। टाइम लगता है ना। माया की युद्ध चलती रहेगी। अभी तुम्हारी विजय तो जरूर होनी है। यह तुम समझते हो शान्तिधाम सुखधाम पर हमारी विजय है ही। कल्प-कल्प हम विजय पाते आये हैं। इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही स्थापना और विनाश होता है। यह सारी डीटेल तुम बच्चों की बुद्धि में है। बरोबर बाप हमारे द्वारा स्थापना करा रहे हैं। फिर हम ही राज्य करेंगे। बाबा को थैंक्स भी नहीं देंगे! बाप कहते हैं यह भी ड्रामा में नूँध हैं। मैं भी इस ड्रामा के अन्दर पार्टधारी हूँ। ड्रामा में सबका पार्ट नूँधा हुआ है। शिवबाबा का भी पार्ट है। हमारा भी पार्ट है। थैंक्स देने की बात नहीं। शिवबाबा कहते हैं मैं तुमको श्रीमत दे रास्ता बताता हूँ और कोई बता न सके। जो भी आये बोलो सतोप्रधान नई दुनिया स्वर्ग थी ना। इस पुरानी दुनिया को तमोप्रधान कहा जाता है। फिर सतोप्रधान बनने के लिए दैवीगुण धारण करने हैं। बाप को याद करना है। मंत्र ही यह है मनमनाभव, मध्याजी भव। बस यह भी बताते हैं मैं सुप्रीम गुरू हूँ।
तुम बच्चे अभी याद की यात्रा से सारी सृष्टि को सद्गति में पहुँचाते हो। जगतगुरू एक शिवबाबा है जो तुमको भी श्रीमत देते हैं। तुम जानते हो हर 5 हजार वर्ष बाद हमको यह श्रीमत मिली है। चक्र फिरता रहता है। आज पुरानी दुनिया है, कल नई दुनिया होगी। इस चक्र को समझना भी बहुत सहज है। परन्तु यह भी याद रहे जो कोई को समझा सकें। यह भी भूल जाते हैं। कोई गिरते हैं तो फिर ज्ञान आदि सारा खत्म हो जाता है। कला-काया माया ले लेती है। सब कला निकाल कला रहित कर देती है। विकार में ऐसे फँस जाते हैं, बात मत पूछो। अभी तुमको सारा चक्र याद है। तुम जन्म जन्मान्तर वेश्यालय में रहे हो, हजारों पाप करते आये हो। सबके आगे कहते हो-जन्म-जन्म के हम पापी हैं। हम ही पहले पुण्य आत्मा थे, फिर पाप आत्मा बने। अब फिर पुण्य आत्मा बनते हैं। यह तुम बच्चों को नॉलेज मिल रही है। फिर तुम औरों को दे आप समान बनाते हो। गृहस्थ व्यवहार में रहने से फ़र्क तो रहता है ना। वह इतना नहीं समझा सकते हैं जितना तुम। परन्तु सब तो नहीं छोड़ सकते हैं। बाप खुद कहते हैं-गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान बनना है। सब छोड़कर आवें तो इतने सब बैठेंगे कहाँ। बाप नॉलेजफुल है। वह कुछ भी शास्त्र आदि पढ़ते नहीं। यह शास्त्र आदि पढ़ा था। मेरे लिए तो कहते हैं गॉड फादर इज़ नॉलेजफुल। मनुष्य यह भी जानते नहीं हैं कि बाप में क्या नॉलेज है। अभी तुमको सारी सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त की नॉलेज है। तुम जानते हो यह भक्ति मार्ग के शास्त्र भी अनादि हैं। भक्ति मार्ग में यह शास्त्र भी जरूर निकलते हैं। कहते हैं पहाड़ टूट गया फिर बनेगा कैसे! परन्तु यह तो ड्रामा है ना। शास्त्र आदि यह सब खत्म हो जाते हैं, फिर अपने समय पर वही बनते हैं। हम पहले-पहले शिव की पूजा करते हैं - यह भी शास्त्रों में होगा ना। शिव की भक्ति कैसे की जाती है। कितने श्लोक आदि गाते हैं। तुम सिर्फ याद करते हो-शिवबाबा ज्ञान का सागर है। वह अभी हमको ज्ञान दे रहे हैं। बाप ने तुमको समझाया है-यह सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है। शास्त्रों में इतना लम्बा-चौड़ा गपोड़ा लगा दिया है, जो कब स्मृति में आ भी न सके। तो बच्चों को अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए-बेहद का बाप हमको पढ़ाते हैं! गाया भी जाता है स्टूडेण्ट लाइफ इज़ दी बेस्ट। भगवानुवाच-मैं तुमको यह राजाओं का राजा बनाता हूँ। और कोई शास्त्रों में यह बातें हैं नहीं। ऊंच ते ऊंच प्राप्ति है ही यह। वास्तव में गुरू तो एक ही है जो सर्व की सद्गति करते हैं। भल स्थापना करने वाले को भी गुरू कह सकते हैं, परन्तु गुरू वह जो सद्गति दे। यह तो अपने पिछाड़ी सबको पार्ट में ले आते हैं। वापिस ले जाने के लिए रास्ता तो बताते नहीं। बरात तो शिव की ही गाई हुई है, और कोई गुरू की नहीं। मनुष्यों ने फिर शिव और शंकर को मिला दिया है। कहाँ वह सूक्ष्मवतन-वासी, कहाँ वह मूलवतनवासी। दोनों एक हो कैसे सकते। यह भक्ति मार्ग में लिख दिया है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तीन बच्चे ठहरे ना। ब्रह्मा पर भी तुम समझा सकते हो। इनको एडाप्ट किया है तो यह शिवबाबा का बच्चा ठहरा ना। ऊंच ते ऊंच है बाप। बाकी यह है उनकी रचना। कितनी यह समझने की बातें हैं। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अविनाशी ज्ञान रत्नों का धन्धा कर 21 जन्मों के लिए पद्मापद्म भाग्यशाली बनना है। अपनी जांच करनी है-हमारे में कोई आसुरी गुण तो नहीं है? हम ऐसा कोई धन्धा तो नहीं करते जिससे विकारों की उत्पत्ति हो?
2) याद की यात्रा में रह सारी सृष्टि को सद्गति में पहुँचाना है। एक सतगुरू बाप की श्रीमत पर चल आप समान बनाने की सेवा करनी है। ध्यान रहे-माया कभी कला रहित न बना दे।

वरदान: शुभ भावना, शुभ कामना के सहयोग से आत्माओं को परिवर्तन करने वाले सफलता सम्पन्न भव
जब किसी भी कार्य में सर्व ब्राह्मण बच्चे संगठित रूप में अपने मन की शुभ भावनाओं और शुभ कामनाओं का सहयोग देते हैं - तो इस सहयोग से वायुमण्डल का किला बन जाता है जो आत्माओं को परिवर्तन कर लेता है। जैसे पांच अंगुलियों के सहयोग से कितना भी बड़ा कार्य सहज हो जाता है, ऐसे हर एक ब्राह्मण बच्चे का सहयोग सेवाओं में सफलता सम्पन्न बना देता है। सहयोग की रिजल्ट सफलता है।

स्लोगन: कदम-कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाला ही सबसे बड़ा धनवान है।

Sunday, 24 November 2019

Hindi Murli 25/11/2019

25-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - अपनी खामियां निकालनी हैं तो सच्चे दिल से बाप को सुनाओ, बाबा तुम्हें कमियों को निकालने की युक्ति बतायेंगे''

प्रश्न: बाप की करेन्ट किन बच्चों को मिलती है?
उत्तर: जो बच्चे ईमानदारी से सर्जन को अपनी बीमारी सुना देते हैं, बाबा उन्हें दृष्टि देता। बाबा को उन बच्चों पर बहुत तरस पड़ता है। अन्दर में आता इस बच्चे का यह भूत निकल जाये। बाबा उन्हें करेन्ट देता है।

ओम् शान्ति। बाप बच्चों से पूछते रहते हैं। हर एक बच्चे को अपने से पूछना है कि बाप से कुछ मिला? किस-किस चीज़ में कमी है? हर एक को अपने अन्दर झांकना है। जैसे नारद का मिसाल है, उनको कहा तुम अपनी शक्ल आइने में देखो - लक्ष्मी को वरने लायक है? तो बाप भी तुम बच्चों से पूछते हैं - क्या समझते हो, लक्ष्मी को वरने लायक बने हो? अगर नहीं तो क्या-क्या खामियां हैं? जिनको निकालने के लिए बच्चे पुरूषार्थ करते हैं। खामियों को निकालने का पुरूषार्थ करते वा करते ही नहीं हैं? कोई-कोई तो पुरूषार्थ करते रहते हैं। नये-नये बच्चों को यह समझाया जाता है - अपने अन्दर में देखो कोई खामी तो नहीं है? क्योंकि तुम सबको परफेक्ट बनना है। बाप आते ही हैं परफेक्ट बनाने के लिए इसलिए एम ऑब्जेक्ट का चित्र भी सामने रखा है। अपने अन्दर से पूछो हम इन जैसे परफेक्ट बने हैं? वह जिस्मानी विद्या पढ़ाने वाले टीचर आदि तो इस समय सब विकारी हैं। यह (लक्ष्मी-नारायण) सम्पूर्ण निर्विकारियों का सैम्पुल है। आधाकल्प तुमने इन्हों की महिमा की है। तो अब अपने से पूछो - हमारे में क्या-क्या खामियां हैं, जिनको निकाल हम अपनी उन्नति करें? और बाप को बतावें कि बाबा यह खामी है, जो हमसे निकलती नहीं है, कोई उपाय बताओ। बीमारी सर्जन द्वारा ही छूट सकती है। कोई-कोई नायब सर्जन भी होशियार होते हैं। डॉक्टर से कम्पाउन्डर सीखते हैं। होशियार डॉक्टर बन जाते हैं। तो ईमानदारी से अपनी जांच करो - मेरे में क्या-क्या खामियां है? जिस कारण मैं समझता हूँ - यह पद पा नहीं सकूँगा। बाप तो कहेंगे ना - तुम इन जैसा बन सकते हो। खामियां बतायें तब बाबा राय दे। बीमारियां तो बहुत हैं। बहुतों में खामियां हैं। कोई में बहुत क्रोध है, लोभ है...... उन्हें ज्ञान की धारणा नहीं हो सकती है, जो कोई को धारणा करा सकें। बाप रोज़ बहुत समझाते हैं। वास्तव में इतनी समझाने की जरूरत ही नहीं दिखती। मंत्र का अर्थ बाप समझा देते हैं। बाप तो एक ही है। बेहद के बाप को याद करना है और उनसे यह वर्सा पाकर हमको ऐसा बनना है। और स्कूलों में 5 विकारों को जीतने की बात ही नहीं होती। यह बात अभी ही होती है जो बाप आकर समझाते हैं। तुम्हारे में जो भूत हैं, जो दु:ख देते हैं, उनका वर्णन करेंगे तो उनको निकालने की बाप युक्ति बतायेंगे। बाबा यह-यह भूत हमको तंग करते हैं। भूत निकालने वाले के आगे वर्णन किया जाता है ना। तुम्हारे में कोई वह भूत नहीं। तुम जानते हो यह 5 विकारों रूपी भूत जन्म-जन्मान्तर के हैं। देखना चाहिए हमारे में क्या भूत हैं? उसको निकालने लिए फिर राय लेनी चाहिए। आंखें भी बहुत धोखा देने वाली हैं, इसलिए बाप समझाते हैं अपने को आत्मा समझ दूसरे को भी आत्मा समझने की प्रैक्टिस डालो। इस युक्ति से तुम्हारी यह बीमारी निकल जायेगी। हम सब आत्मायें तो आत्मा भाई-भाई ठहरे। शरीर तो है नहीं। यह भी जानते हो हम आत्मायें सब वापिस जाने वाली हैं। तो अपने को देखना है हम सर्वगुण सम्पन्न बने हैं? नहीं तो हमारे में क्या अवगुण हैं? तो बाप भी उस आत्मा को बैठ देखते हैं, इनमें यह खामी है तो उनको करेन्ट देंगे। इस बच्चे का यह विघ्न निकल जाए। अगर सर्जन से ही छिपाते रहेंगे तो कर ही क्या सकते? तुम अपने अवगुण बताते रहेंगे तो बाप भी राय देंगे। जैसे तुम आत्मायें बाप को याद करती हो - बाबा, आप कितने मीठे हो! हमको क्या से क्या बना देते हो! बाप को याद करते रहेंगे तो भूत भागते रहेंगे। कोई न कोई भूत है जरूर। बाप सर्जन को बताओ, बाबा हमको इनकी युक्ति बताओ। नहीं तो बहुत घाटा पड़ जायेगा, सुनाने से बाप को भी तरस पड़ेगा - यह माया के भूत इनको तंग करते हैं। भूतों को भगाने वाला तो एक ही बाप है। युक्ति से भगाते हैं। समझाया जाता है - इन 5 भूतों को भगाओ। फिर भी सब भूत नहीं भागते हैं। कोई में विशेष रहता है, कोई में कम। परन्तु है जरूर। बाप देखते हैं इनमें यह भूत है। दृष्टि देते समय अन्दर चलता है ना। यह तो बहुत अच्छा बच्चा है और तो सब इनमें अच्छे-अच्छे गुण हैं परन्तु बोलते कुछ नहीं हैं, किसको समझा नहीं सकते हैं। माया ने जैसे गला बन्द कर दिया है, इनका गला खुल जाए तो औरों की भी सर्विस करने लग पड़ें। दूसरे-दूसरे की सर्विस में अपनी सर्विस, शिवबाबा की सर्विस नहीं करते हैं। शिवबाबा खुद सर्विस करने आये हैं, कहते हैं इन जन्म-जन्मान्तर के भूतों को भगाना है।
बाप बैठ समझाते हैं यह भी जानते हो झाड़ धीरे-धीरे वृद्धि को पाता है। पत्ते झड़ते रहते हैं। माया विघ्न डाल देती है। बैठे-बैठे ख्याल बदली हो जाते हैं। जैसे सन्यासियों को घृणा आती है तो एकदम गुम हो जाते हैं। न कोई कारण, न कोई बातचीत। कनेक्शन तो सबका बाप के साथ है। बच्चे तो नम्बरवार हैं। वह भी बाप को सच बतायें तो वह खामियां निकल सकती हैं और ऊंच पद पा सकते हैं। बाप जानते हैं कई न बतलाने के कारण अपने को बहुत घाटा डालते हैं। कितना भी समझाओ परन्तु वह काम करने लग पड़ते हैं। माया पकड़ लेती है। माया रूपी अजिगर है, सबको पेट में डाल बैठी है। दुबन में गले तक फँस पड़े हैं। बाप कितना समझाते हैं। और कोई बात नहीं सिर्फ बोलो दो बाप हैं। एक लौकिक बाप तो सदैव मिलता ही है, सतयुग में भी मिलता है तो कलियुग में भी मिलता है। ऐसे नहीं कि सतयुग में फिर पारलौकिक बाप मिलता है। पारलौकिक बाप तो एक ही बार आते हैं। पारलौकिक बाप आकर नर्क को स्वर्ग बनाते हैं। उनकी भक्ति मार्ग में कितनी पूजा करते हैं। याद करते हैं। शिव के मन्दिर तो बहुत हैं। बच्चे कहते हैं सर्विस नहीं है। अरे, शिव के मन्दिर तो जहाँ तहाँ हैं, वहाँ जाकर तुम पूछ सकते हो, इनको क्यों पूजते हो? यह शरीरधारी तो है नहीं। यह हैं कौन? कहेंगे परमात्मा। इन बिगर और कोई को कहेंगे नहीं। तो बोलो यह परमात्मा बाप है ना। उनको खुदा भी कहते हैं, अल्लाह भी कहते हैं। अक्सर करके परमपिता परमात्मा कहा जाता है, उनसे क्या मिलने का है, यह कुछ पता है? भारत में शिव का नाम तो बहुत लेते हैं शिव जयन्ती त्योहार भी मनाते हैं। कोई को भी समझाना बहुत सहज है। बाप भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाते तो बहुत रहते हैं। तुम किसके पास भी जा सकते हो। परन्तु बहुत ठण्डाई से, नम्रता से बात करनी है। तुम्हारा नाम तो भारत में बहुत फैला हुआ है। थोड़ी भी बात करेंगे तो झट समझ जायेंगे - यह बी.के. हैं। गांव आदि तरफ तो बहुत इनोसेन्ट हैं। तो मन्दिरों में जाकर सर्विस करना बहुत सहज है। आओ तो हम तुमको शिवबाबा की जीवन कहानी सुनावें। तुम शिव की पूजा करते हो, उनसे क्या मांगते हो? हम तो आपको इनकी पूरी जीवन कहानी बता सकते हैं। दूसरे दिन फिर लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाओ। तुम्हारे अन्दर में खुशी रहती है। बच्चे चाहते हैं गांवड़ों में सर्विस करें। सबकी अपनी-अपनी समझ है ना। बाप कहते हैं पहले-पहले जाओ शिवबाबा के मन्दिर में। फिर लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाकर पूछो - इन्हों को यह वर्सा कैसे मिला हुआ है? आओ तो हम आपको इन देवी-देवताओं के 84 जन्मों की कहानी सुनायें। गांव वालों को भी जगाना है। तुम जाकर प्यार से समझायेंगे। तुम आत्मा हो, आत्मा ही बात करती है, यह शरीर तो खत्म हो जाने वाला है। अब हम आत्माओं को पावन बन बाप के पास जाना है। बाप कहते हैं मुझे याद करो। तो सुनने से ही उनको कशिश होगी। जितना तुम देही-अभिमानी होंगे उतना तुम्हारे में कशिश आयेगी। अभी इतना इस देह आदि से, पुरानी दुनिया से पूरा वैराग्य नहीं आया है। यह तो जानते हो यह पुराना चोला छोड़ना है, इनमें क्या ममत्व रखना है। शरीर होते शरीर में कोई ममत्व नहीं होना चाहिए। अन्दर में यही तात रहे - अब हम आत्मायें पावन बनकर अपने घर जायें। फिर यह भी दिल होती है - ऐसे बाबा को कैसे छोड़े? ऐसा बाबा तो फिर कभी मिलेगा नहीं। तो ऐसे-ऐसे ख्याल करने से बाप भी याद आयेगा, घर भी याद आयेगा। अब हम घर जाते हैं। 84 जन्म पूरे हुए। भल दिन में अपना धंधा आदि करो। गृहस्थ व्यवहार में तो रहना ही है। उसमें रहते हुए भी तुम बुद्धि में यह रखो कि यह तो सब कुछ खत्म हो जाना है। अभी हमको वापिस अपने घर जाना है। बाप ने कहा है - गृहस्थ व्यवहार में भी जरूर रहना है। नहीं तो कहाँ जायेंगे? धन्धा आदि करो, बुद्धि में यह याद रहे। यह तो सब कुछ विनाश होने का है। पहले हम घर जायेंगे फिर सुखधाम में आयेंगे। जो भी टाइम मिलें अपने से बातें करनी चाहिए। बहुत टाइम है, 8 घण्टा धन्धा आदि करो। 8 घण्टा आराम भी करो। बाकी 8 घण्टा यह बाप से रूहरिहान कर फिर जाकर रूहानी सर्विस करनी है। जितना भी समय मिले शिवबाबा के मन्दिर में, लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाकर सर्विस करो। मन्दिर तो तुमको बहुत मिलेंगे। तुम कहाँ भी जायेंगे तो शिव का मन्दिर जरूर होगा। तुम बच्चों के लिए मुख्य है याद की यात्रा। याद में अच्छी रीति रहेंगे तो तुम जो भी मांगो मिल सकता है। प्रकृति दासी बन जाती है। उनकी शक्ल आदि भी ऐसी खींचने वाली रहती है, कुछ भी मांगने की दरकार नहीं। सन्यासियों में भी कोई-कोई पक्के रहते हैं। बस ऐसे निश्चय से बैठते - हम ब्रह्म में जाकर लीन होंगे। इस निश्चय में बहुत पक्के रहते हैं। उन्हों का अभ्यास होता है, हम इस शरीर को छोड़ जाते हैं। परन्तु वह तो हैं रांग रास्ते पर। बड़ी मेहनत करते हैं ब्रह्म में लीन होने के लिए। भक्ति में दीदार के लिए कितनी मेहनत करते हैं। जीवन भी दे देते हैं। आत्मघात नहीं होता है, जीवघात होता है। आत्मा तो है ही, वह जाकर दूसरा जीवन अर्थात् शरीर लेती है।
तो तुम बच्चे सर्विस का अच्छी रीति शौक रखो तो बाप भी याद आवे। यहाँ भी मन्दिर आदि बहुत हैं। तुम योग में पूरा रहकर किसको कुछ भी कहेंगे, कोई बिचार नहीं आयेगा। योग वाले का तीर पूरा लगेगा। तुम बहुत सर्विस कर सकते हो। कोशिश करके देखो, परन्तु पहले अपने अन्दर को देखना है - हमारे में कोई माया का भूत तो नहीं है? माया के भूत वाले थोड़ेही सक्सेस हो सकते हैं। सर्विस तो बहुत है। बाबा तो नहीं जा सकते हैं ना क्योंकि बाप साथ में है। बाप को हम कहाँ किचड़े में ले जावें! किसके साथ बोलें! बाप तो बच्चों से ही बोलना चाहते हैं। तो बच्चों को सर्विस करनी है। गायन भी है सन शोज़ फादर। बाप ने तो बच्चों को होशियार बनाया ना। अच्छे-अच्छे बच्चे हैं जिनको सर्विस का शौक रहता है। कहते हैं हम गाँवड़ों में जाकर सर्विस करें। बाबा कहते हैं भल करो। सिर्फ फोल्डिंग चित्र साथ में हो। चित्रों बिगर किसको समझाना डिफीकल्ट लगता है। रात-दिन यही ख्यालात रहती हैं - औरों की जीवन कैसे बनायें? हमारे में जो खामियां हैं वह कैसे निकाल, उन्नति को पायें। तुमको खुशी भी होती है। बाबा यह 8-9 मास का बच्चा है। ऐसे बहुत निकलते हैं। जल्दी ही सर्विस लायक बन जाते हैं। हर एक को यह भी ख्याल रहता है हम अपने गांव को उठायें, हमजिन्स भाइयों की सेवा करें। चैरिटी बिगन्स एट होम। सर्विस का शौक बहुत चाहिए। एक जगह ठहरना नहीं चाहिए। चक्र लगाते रहें। टाइम तो बहुत थोड़ा है ना। कितने बड़े-बड़े अखाड़े उन्हों के बन जाते हैं। ऐसी आत्मा आकर प्रवेश करती है जो कुछ न कुछ शिक्षा बैठ देती है तो नाम हो जाता है। यह तो बेहद का बाप बैठ शिक्षा देते हैं कल्प पहले मिसल। यह रूहानी कल्प वृक्ष बढ़ेगा। निराकारी झाड़ से नम्बरवार आत्मायें आती हैं। शिवबाबा की बड़ी लम्बी माला वा झाड़ बना हुआ है। इन सब बातों को याद करने से भी बाप ही याद आयेगा। उन्नति जल्दी होगी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कम से कम 8 घण्टा बाप से रूहरिहान कर बड़ी ठण्डाई वा नम्रता से रूहानी सर्विस करनी है। सर्विस में सक्सेस होने के लिए अन्दर में कोई भी माया का भूत न हो।
2) अपने आपसे बातें करनी है कि यह जो कुछ हम देखते हैं यह सब विनाश होना है, हम अपने घर जायेंगे फिर सुखधाम में आयेंगे।

वरदान: विश्व में ईश्वरीय परिवार के स्नेह का बीज बोने वाले विश्व सेवाधारी भव
आप विश्व सेवाधारी बच्चे विश्व में ईश्वरीय परिवार के स्नेह का बीज बो रहे हो। चाहे कोई नास्तिक हो या आस्तिक.....सबको अलौकिक वा ईश्वरीय स्नेह की, नि:स्वार्थ स्नेह की अनुभूति कराना ही बीज बोना है। यह बीज सहयोगी बनने का वृक्ष स्वत: ही पैदा करता है और समय पर सहजयोगी बनने का फल दिखाई देता है। सिर्फ कोई फल जल्दी निकलता है और कोई फल समय पर निकलता है।

स्लोगन: भाग्यविधाता बाप को जानना, पहचानना और उनके डायरेक्ट बच्चे बन जाना यह सबसे बड़ा भाग्य है।