Sunday, 20 January 2019

Hindi Murli 21-01-2019

21-01-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बाप समान रूहानी टीचर बनो। जो बाप से पढ़ा है वह दूसरों को भी पढ़ाओ, धारणा है तो किसको भी समझाकर दिखाओ।''
प्रश्नः- किस बात में बाबा को अटल निश्चय है? बच्चों को भी उसमें अटल बनना है?
उत्तर:- बाबा को ड्रामा पर अटल निश्चय है। बाबा कहेंगे जो पास्ट हुआ ड्रामा। कल्प पहले जो किया था वही करेंगे। ड्रामा तुम्हें ऊपर नीचे नहीं करने देगा। परन्तु अभी तक बच्चों की अवस्था ऐसी बनी नहीं है इसलिए मुख से निकलता - ऐसे होता तो ऐसा करते, पता होता तो यह नहीं करते.. बाबा कहते बीती को चितओ नहीं, आगे के लिए पुरूषार्थ करो कि ऐसी कोई भूल फिर से न हो।
ओम् शान्ति।
रूहानी बाप रूहानी बच्चों को बैठ समझाते हैं। बाप खुद कहते हैं मैं जब आता हूँ तो किसको पता नहीं पड़ता क्योंकि मैं हूँ गुप्त। गर्भ में भी जब आत्मा प्रवेश करती है तो प्रवेश होने का मालूम थोड़ेही पड़ता है। तिथि तारीख निकल न सके। जब गर्भ से बाहर निकलती है तब वह तिथि तारीख निकलती है। तो बाबा की प्रवेशता की तिथि तारीख का भी पता नहीं लगता, कब प्रवेश किया, कब रथ में पधारे - कुछ पता नहीं पड़ता। कोई को देखते थे तो वह नशे में चले जाते थे। समझा कुछ प्रवेशता है या कुछ ताकत आई है। ताकत कहाँ से आई? मैंने खास कोई जप तप तो नहीं किया। इसको कहा जाता है गुप्त। तिथि तारीख कुछ नहीं। सूक्ष्मवतन की भी स्थापना कब होती है, यह कुछ नहीं कह सकते। मुख्य बात है मनमनाभव। बाप कहते हैं हे आत्मायें तुम मुझ अपने बाप को बुलाती हो कि आकर पतितों को पावन बनाओ, पावन दुनिया बनाओ। बाप समझाते हैं ड्रामा प्लैन अनुसार जब मुझे आना होता है तो चेन्ज जरूर होती है। सतयुग से लेकर जो कुछ पास हुआ सो फिर रिपीट करेंगे। सतयुग त्रेता फिर ज़रूर रिपीट करेंगे। सेकेण्ड-सेकेण्ड पास होता जाता है। संवत भी पास होता जाता है। कहते हैं सतयुग पास्ट हुआ। देखा तो नहीं। बाप ने समझाया है तुमने पास किया है। तुम ही पहले-पहले हमसे बिछुड़े हो। तो इस पर गौर करना है, कैसे हमने 84 जन्म लिये हैं जो फिर हूबहू लेने पड़ेंगे अर्थात् दु:ख और सुख का पार्ट बजाना पड़ेगा। सतयुग में होता है सुख, जब मकान पुराना होता है तो कहाँ से छत बहती है, कहाँ से कुछ होता रहता है। तो फुरना हो जाता है कि इसकी मरम्मत करनी है। जब बहुत पुराना हो जाता है तो समझा जाता है यह मकान रहने लायक नहीं है। नई दुनिया के लिए ऐसे नहीं कहेंगे। अब तुम नई दुनिया में चलने के लायक बनते हो। हर चीज़ पहले नई फिर पुरानी होती है।
अब तुम बच्चों को यह ख्याल में आता है और कोई तो इन बातों को समझ न सके। गीता रामायण आदि सुनाते रहते हैं, उसमें ही बिज़ी रहते हैं। तुम हम भी इन्हीं धन्धों में बिज़ी थे। अब बाप ने कितना समझदार बनाया है। बाबा कहते हैं बच्चे अब यह पुरानी दुनिया खत्म होने वाली है, अब नई दुनिया में चलना है। ऐसे भी नहीं सब चलेंगे। सब मुक्तिधाम में बैठ जायें यह भी कायदा नहीं है, प्रलय हो जाए। तुम जानते हो यह पुरानी दुनिया और नई दुनिया का बहुत ही कल्याणकारी संगमयुग है। अब चेन्ज होनी है फिर शान्तिधाम में जायेंगे। वहाँ सुख के भासना की भी कोई बात नहीं। गायन है यज्ञ में विघ्न पड़े सो तो पड़ते रहते हैं। कल्प के बाद भी पड़ते रहेंगे। तुम अब पक्के हो गये हो। यह स्थापना विनाश का कोई छोटा काम नहीं है। विघ्न किस बात में पड़ते हैं? बाप कहते हैं काम महाशत्रु है इस पर ही अत्याचार होते हैं। द्रोपदी की भी बात है ना। ब्रह्मचर्य पर ही सारी खिटपिट है। सतोप्रधान से तमोप्रधान बनना है ज़रूर। सीढ़ी उतरनी है, पुरानी दुनिया होनी है ज़रूर। इन सब बातों को तुम ही समझते हो और सिमरण भी करते हो और पढ़कर पढ़ाना भी है, टीचर बनना है। ज़रूर नॉलेज बुद्धि में है तब पढ़कर टीचर बनते हैं। फिर टीचर से जो सीखकर होशियार होते हैं तो गवर्मेन्ट उनको पास करती है। तुम भी टीचर हो। बाप ने तुमको टीचर बनाया है। एक टीचर क्या कर सकते हैं। तुम सब हो रूहानी टीचर। तो बुद्धि में नॉलेज होनी चाहिए। ज्ञान तो बिल्कुल एक्यूरेट है - मनुष्य से देवता बनने का।
अभी जितना तुम बच्चे बाप को याद करते हो तो लाइट आती रहती है। मनुष्यों को साक्षात्कार होता रहेगा क्योंकि आत्मा प्योर बनेगी ही याद से फिर किसको साक्षात्कार भी हो सकता है। बाप मददगार भी बैठा है, बाप हमेशा बच्चों का मददगार है। पढ़ाई में नम्बरवार हैं। हर एक अपनी बुद्धि से समझ सकते हैं मेरे में कितनी धारणा है। अगर धारणा है तो किसको समझाकर दिखाओ। यह है धन, धन देते नहीं तो कोई मानेंगे भी नहीं कि इनके पास धन है। धन दान करेंगे तो महादानी कहेंगे। महारथी, महावीर बात एक ही है। सब एक जैसे तो हो न सकें। तुम्हारे पास कितने आते हैं। एक-एक से बैठ माथा मारना होता है क्या? वो लोग अखबार द्वारा बहुत बातें सुनते हैं तो बहुत चमकते हैं। फिर जब तुम्हारे पास आकर सुनते हैं तो कहते हैं हमने परमत पर क्या किया, यहाँ तो बहुत अच्छा है। एक-एक को ठीक करने में मेहनत लगती है। यहाँ भी कितनी मेहनत लगी है। फिर भी कोई महारथी, कोई घोड़ेसवार, कोई प्यादा। यह ड्रामा में पार्ट है, यह तो समझते हो आखरीन जीत तुम्हारी होनी है, जो कल्प पहले बने थे वही बनेंगे। पुरूषार्थ तो बच्चों को करना ही है। बाप राय देते हैं समझाने की कोशिश करो। पहले तो शिवबाबा के मन्दिर में जाकर सर्विस करो। तुम पूछ सकते हो - यह कौन हैं? इस पर क्यों पानी चढ़ाते हैं? तुम अच्छी तरह जानते हो। कहते हैं गई टांडे पर (आग लेने) और मालिक होकर बैठ गई। यह दृष्टांत भी तुम्हारा ही है। तुम जाते हो जगाने के लिए। तुमको निमंत्रण देकर बुलाते हैं, तो ऐसा निमंत्रण आये तो खुशी होनी चाहिए। काशी आदि में बड़े-बड़े टाइटल देते हैं। भक्ति में कितने ढेर मन्दिर हैं, यह भी एक धन्धा है। कोई अच्छी स्त्री देखी तो उनको गीता कण्ठ कराए आगे कर देते हैं, फिर जो कमाई होती है वह मिल जाती है। है कुछ भी नहीं। रिद्धि सिद्धि बहुत सीखते हैं। ऐसे स्थानों पर जाना चाहिए। तुम बच्चों को कभी शास्त्रार्थ नहीं करना चाहिए। तुमको तो जाकर बाप का परिचय देना है। मुक्ति जीवनमुक्ति दाता एक है, उनकी महिमा करनी है। वह कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो। बाकी मनमनाभव का अर्थ यह नहीं है कि गंगा में जाकर स्नान करो। मामेकम् का अर्थ है मुझ एक को याद करो - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ मैं तुमको सब पापों से मुक्त करूंगा। जब से रावण आया है तब से पाप शुरू हुए हैं। तो ऊंच पद पाने का बहुत पुरूषार्थ करना है। पोजीशन के लिए मनुष्य रात दिन कितना माथा मारते हैं, यह भी पढ़ाई है, इसमें कोई किताब आदि उठाने की बात नहीं है। 84 का चक्र तो बुद्धि में आ गया है। कोई बड़ी बात नहीं है। एक-एक जन्म की डीटेल थोड़ेही बताते हैं। 84 जन्म पूरे हुए अब हम आत्माओं को वापस घर जाना है। आत्मा जो पतित बनी है उनको पावन ज़रूर बनना है। सबको यही कहते रहो मामेकम् याद करो। बच्चे कहते हैं बाबा योग में नहीं रह सकते। अरे तुमको सम्मुख कह रहा हूँ - मुझे याद करो फिर योग अक्षर तुम क्यों कहते हो। योग कहने से ही तुम भूलते भी हो। बाप को याद कौन नहीं कर सकता। लौकिक माँ बाप को कैसे याद करते हो, यह भी माँ बाप हैं ना। यह भी पढ़ते हैं। सरस्वती भी पढ़ती है। पढ़ाने वाला एक बाप ही है। तुम जितना पढ़ते हो फिर औरों को समझाते हो। बाप कहते हैं बच्चे शास्त्र पढ़ने, जप तप करने से मुझे प्राप्त नहीं कर सकते हो, बाकी फायदा क्या है। सीढ़ी तो उतरते ही आते हो।
तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं। फिर भी तुमको समझाना है ज़रूर कि पाप और पुण्य कैसे जमा होता है। रावण राज्य के बाद ही तुमने पाप करना शुरू किया है। ऐसे भी बच्चे हैं जिनको नई दुनिया, पुरानी दुनिया क्या है यह भी समझाने नहीं आता है। अब बाप कहते हैं कि बेहद के बाप को याद करो, वही पतित-पावन है। बाकी तुमको कहाँ भी जाने की ज़रूरत नहीं है। भक्ति मार्ग में सदैव पैर घर से बाहर निकलता था। पति स्त्री को कहते हैं कृष्ण का चित्र घर में भी है फिर बाहर क्यों जाती हो? क्या फ़र्क है? पति परमेश्वर है इसको भी नहीं मानते। भक्ति मार्ग में बहुत दूर-दूर ऊंचा मन्दिर बनाते हैं, जो मनुष्यों का भाव बैठे। तुम समझाते हो मन्दिरों में कितना धक्का खाते हैं। यह एक रसम पड़ी है। शिव काशी में तीर्थ करने जाते हैं परन्तु प्राप्ति कुछ भी नहीं। अब तुमको तो बाप की श्रीमत मिलती है। तुमको कहाँ भी जाना नहीं है। पतियों का पति परमेश्वर वास्तव में वह एक ही है। जिसको तुम्हारे पति, काके, मामे सब याद करते हैं वह है पति परमेश्वर अथवा पिता परमेश्वर। वह तुमको कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। तुम्हारी ज्योत अब जग रही है तो तुम्हारे से मनुष्यों को लाइट देखने में आती है। तो बच्चों का भी नाम बाला होना चाहिए। बाप बच्चों का नाम तो बाला करते हैं ना। सुदेश बच्ची समझाने में बड़ी तीखी है। पुरूषार्थ बहुत अच्छा किया है तो पुरानों से भी आगे गई है। इसमें भी जास्ती पुरूषार्थ कर आगे चली जायेगी। सारा मदार पुरूषार्थ पर है। हार्टफेल नहीं होना चाहिए। पिछाड़ी में आया तो भी सेकेण्ड में जीवनमुक्ति पा सकते हैं। दिनप्रतिदिन ऐसे बहुत निकलते रहेंगे। ड्रामा में तुम्हारा विजय का पार्ट तो है ही। विघ्न भी पड़ने हैं। और कोई सतसंगों में ऐसे विघ्न नहीं पड़ते हैं। यहाँ विकारों पर ही हंगामा होता है। गायन भी है अमृत छोड़ विष काहे को खाए। ज्ञान से एक देवी-देवता धर्म की स्थापना हो जाती है। सतयुग में रावण राज्य हो न सके। समझानी कितनी साफ है। राम राज्य के बाजू में ही रावण राज्य भी दिखाया है। तुम टाइम भी दिखाते हो। यह है संगम। दुनिया बदल रही है। स्थापना, पालना, विनाश कराने वाला एक बाप है। है बहुत सहज, परन्तु धारणा पूरी होती नहीं और सब बातें याद रहती हैं बाकी ज्ञान और योग भूल जाता है। तुम ऊंच ते ऊंच भगवान की सन्तान हो। दिन प्रतिदिन तुम सालवेन्ट होते जाते हो। धन मिलता है ना। खर्चा भी आता जाता है। बाबा कहते हैं हुण्डी भरती जायेगी। कल्प पहले मिसल ही तुम खर्चा करेंगे। कम ज्यादा ड्रामा करने नहीं देगा। ड्रामा पर बाबा का अटल निश्चय है। जो पास्ट हुआ ड्रामा। ऐसे नहीं कहना चाहिए ऐसा होता था, यह नहीं करते थे। अभी वह अवस्था आई नहीं है। कुछ न कुछ मुख से निकल जाता है, फिर फील होता है। बाबा कहते हैं बीती को चितओ नहीं, आगे के लिए पुरूषार्थ करो कि ऐसी भूल फिर न हो इसलिए बाबा कहते हैं चार्ट लिखो, इसमें बहुत कल्याण है। बाबा ने एक को देखा सारी जीवन कहानी लिख रहे थे, समझते हैं बच्चे सीखेंगे। यहाँ फिर श्रीमत पर चलने में ही कल्याण है। यहाँ झूठ भी चल न सके। नारद का मिसाल। चार्ट से फायदा बहुत है। बाबा फरमान करते हैं तो बच्चों को फरमान पर चलना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान धारण कर दूसरों को समझाना है। ज्ञान धन दान करके महादानी बनना है। किसी से भी शास्त्रार्थ न कर बाप का सत्य परिचय देना है।
2) तुम्हें बीती बातों का चिंतन नहीं करना है। ऐसा पुरूषार्थ करना है जो फिर कभी भूल न हो। अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखना है।

वरदान:-सत्यता की अथॉरिटी को धारण कर सर्व को आकर्षित करने वाले निर्भय और विजयी भव
आप बच्चे सत्यता की शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। सत्य ज्ञान, सत्य बाप, सत्य प्राप्ति, सत्य याद, सत्य गुण, सत्य शक्तियां सब प्राप्त हैं। इतनी बड़ी अथॉरिटी का नशा रहे तो यह सत्यता की अथॉरिटी हर आत्मा को आकर्षित करती रहेगी। झूठखण्ड में भी ऐसी सत्यता की शक्ति वाले विजयी बनते हैं। सत्यता की प्राप्ति खुशी और निर्भयता है। सत्य बोलने वाला निर्भय होगा। उनको कभी भय नहीं हो सकता।

स्लोगन:- वायुमण्डल को परिवर्तन करने का साधन है -पॉजिटिव संकल्प और शक्तिशाली वृत्ति।

ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्
जैसे बह्मा बाप हर कर्म में, वाणी में, सम्पर्क व सम्बन्ध में लवफुल रहे और स्मृति व स्थिति में लवलीन रहे, ऐसे फालो फादर करो। जितना लवली बनेंगे उतना लवलीन रह सकेंगे और औरों को भी सहज आप-समान व बाप-समान बना सकेंगे।

Thursday, 17 January 2019

Hindi Murli 01/01/2019

01-01-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - यहाँ तुम वनवाह में हो, अच्छा-अच्छा पहनना, खाना.. यह शौक तुम बच्चों में नहीं होना चाहिए, पढ़ाई और कैरेक्टर पर पूरा-पूरा ध्यान दो''
प्रश्नः- ज्ञान रत्नों से सदा भरपूर रहने का साधन क्या है?
उत्तर:- दान। जितना-जितना दूसरों को दान करेंगे उतना स्वयं भरपूर रहेंगे। सयाने वह जो सुनकर धारण करे और फिर दूसरों को दान करे। बुद्धि रूपी झोली में अगर छेद होगा तो बह जायेगा, धारणा नहीं होगी इसलिए कायदे अनुसार पढ़ाई पढ़नी है। 5विकारों से दूर रहना है। रूप-बसन्त बनना है।
ओम् शान्ति।
रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझाते हैं। रूहानी बाप भी कर्मेन्द्रियों से बोलते हैं, रूहानी बच्चे भी कर्मेन्द्रियों से सुनते हैं। यह है नई बात। दुनिया में कोई मनुष्य ऐसे कह न सके। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार समझाते हैं। जैसे टीचर पढ़ाते हैं तो स्टूडेन्ट का रजिस्टर शो करता है। रजिस्टर से उनकी पढ़ाई और चलन का पता पड़ जाता है। मूल है ही पढ़ाई और कैरेक्टर, यह है ईश्वरीय पढ़ाई जो कोई पढ़ा न सके। रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त की, सृष्टि चक्र की नॉलेज है, यह कोई भी मनुष्य सारी दुनिया में नहीं जानते। ऋषि मुनि जो इतने पढ़े लिखे अथॉरिटी हैं, वह प्राचीन ऋषि मुनि खुद कहते थे कि हम रचता और रचना को नहीं जानते। बाप ने ही आकर पहचान दी है। गाया भी जाता है - यह है काँटों का जंगल। जंगल को आग ज़रूर लगती है। फूलों के बगीचे को कभी आग नहीं लगती क्योंकि जंगल सारा सूखा हुआ है। बगीचा हरा होता है। हरे बगीचे को आग नहीं लगती। सूखे को आग झट लग जाती है। यह है बेहद का जंगल, इनको भी आग लगी थी। बगीचा भी स्थापन हुआ था। तुम्हारा बगीचा अब गुप्त स्थापन हो रहा है। तुम जानते हो हम बगीचे के फूल खुशबूदार देवता बन रहे हैं, उसका नाम है ही स्वर्ग। अब स्वर्ग स्थापन हो रहा है। वन्डर है, तुम कितना भी लोगों को समझाते हो परन्तु किसकी बुद्धि में बैठता नहीं है, जो इस धर्म के नहीं होंगे उनकी बुद्धि में बैठेगा भी नहीं। एक कान से सुनेंगे दूसरे से निकाल देंगे। सतयुग त्रेता में भारतवासी कितने थोड़े होंगे। फिर द्वापर कलियुग में कितनी वृद्धि हो जाती है। वहाँ एक दो बच्चे यहाँ 4-5 बच्चे तो ज़रूर वृद्धि हो गई। भारतवासी ही अब हिन्दू कहलाते हैं। वास्तव में देवता धर्म के थे और कोई भी धर्म वाला अपने धर्म को नहीं भूलता। यह भारतवासी ही भूले हुए हैं। देखो इस समय कितने ढेर मनुष्य हैं। इतने सब तो ज्ञान आकर नहीं लेंगे। हर एक अपने जन्मों को भी समझ सकते हैं। जिसने पूरे 84 जन्म लिए होंगे, वह जरूर पुराने भक्त होंगे। तुम समझ सकते हो कि हमने कितनी भक्ति की है। थोड़ी की होगी तो ज्ञान भी थोड़ा ही उठायेंगे और थोड़ों को समझायेंगे। बहुत भक्ति की होगी तो ज्ञान भी बहुत उठायेंगे और बहुतों को समझायेंगे। ज्ञान नहीं उठाते तो समझा भी कम सकते, इसलिए उन्हें फल भी थोड़ा मिलता है। हिसाब है ना। बाप को एक बच्चे ने हिसाब निकाल भेजा तो इस्लामियों के इतने जन्म, बौद्धियों के इतने जन्म होने चाहिए। बुद्ध भी धर्म स्थापक है। उनके पहले कोई बुद्ध धर्म का था नहीं। बुद्ध की सोल ने प्रवेश किया। उसने बुद्ध धर्म स्थापन किया। फिर एक से वृद्धि होती है। वह भी एक प्रजापिता है। एक से कितनी वृद्धि होती है। तुमको तो राजा बनना है-नई दुनिया में। यहाँ तो वनवाह में हो। किसी चीज़ का शौक नहीं रहना चाहिए। हम अच्छे कपड़े आदि पहनें, यह भी देह-अभिमान है। जो मिला सो अच्छा। यह दुनिया ही थोड़ा समय है। यहाँ अच्छा कपड़ा पहना, वहाँ फिर कम हो जायेगा। यह शौक भी छोड़ना है। आगे चलकर तुम बच्चों को आपेही साक्षात्कार होते रहेंगे। तुम खुद कहेंगे यह तो बहुत सर्विस करते हैं, कमाल है। यह ज़रूर ऊंच नम्बर लेंगे। फिर आप समान बनाते रहेंगे। दिन प्रतिदिन बगीचा तो बड़ा होने का है। जितने देवी-देवता सतयुग के वा त्रेता के हैं, वह सब गुप्त यहाँ ही बैठे हैं फिर प्रत्यक्ष हो जायेंगे। अभी तुम गुप्त पद पा रहे हो। तुम जानते हो हम पढ़ रहे हैं - मृत्युलोक में, पद अमरलोक में पायेंगे। ऐसी पढ़ाई कभी देखी। यह वन्डर है। पढ़ना पुरानी दुनिया में, पद पाना नई दुनिया में। पढ़ाने वाला भी वही है जो अमरलोक की स्थापना और मृत्युलोक का विनाश कराने वाला है। तुम्हारा यह पुरूषोत्तम संगमयुग बहुत छोटा है, इनमें ही बाप आते हैं-पढ़ाने के लिए। आने से ही पढ़ाई शुरू हो जाती है। तब बाप कहते हैं लिखो - शिव जयन्ती सो गीता जयन्ती। इनको मनुष्य नहीं जानते। उन्होंने कृष्ण का नाम रख दिया है। अब यह भूल जब कोई समझे। कितने बड़े-बड़े आदमी म्यूज़ियम में आते हैं, ऐसे नहीं कि वह बाप को जानते हैं, कुछ नहीं इसलिए बाबा कहते हैं फार्म भराओ तो पता लगे कि कुछ सीखा है। बाकी यहाँ आकर क्या करेंगे। जैसे साधू सन्त महात्मा के पास जाते हैं, यहाँ वह बात नहीं। इनका तो वही साधारण रूप है। ड्रेस में भी कुछ फ़र्क नहीं इसलिए कोई समझ नहीं सकते हैं। समझते हैं यह तो जौहरी था। पहले था विनाशी रत्नों का जौहरी। अभी बने हैं अविनाशी रत्नों का जौहरी। तुम सौदा भी बेहद के बाप से करते हो। जो बड़ा सौदागर, जादूगर, रत्नागर है। तो हर एक अपने को समझे कि हम रूप बसन्त हैं। हमारे अन्दर ज्ञान रत्न लाखों रूपये के हैं। इन ज्ञान रत्नों से तुम पारसबुद्धि बन जाते हो। यह भी समझने की बात है। कोई अच्छे सयाने हैं जो इन बातों को धारण करते हैं। अगर धारणा नहीं होती तो कोई काम के नहीं। समझो उसकी झोली में छेद है, बह जाता है। बाप कहते हैं मैं तुमको अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देता हूँ। अगर तुम दान देते रहेंगे तो भरतू रहेंगे। नहीं तो कुछ भी नहीं, खाली हैं। पढ़ते नहीं, कायदे अनुसार चलते नहीं। इसमें सबजेक्ट बड़ी अच्छी हैं। 5 विकारों से तुमको बिल्कुल दूर जाना है।

बाप ने समझाया है यह जो राखी बन्धन मनाते हैं वह भी इस समय का है। परन्तु मनुष्य अर्थ नहीं जानते तो राखी क्यों बाँधी जाती है। वो तो अपवित्र होते रहते राखी बाँधते रहते। आगे ब्राह्मण लोग बाँधते थे। अब बहनें भाई को बाँधती हैं - खर्ची के लिए। वहाँ पवित्रता की बात नहीं। बड़ी फैशन वाली राखियाँ बनाते हैं। यह दीवाली दशहरा सब संगम के हैं। जो बाप ने एक्ट की है वह फिर भक्ति मार्ग में चलती है। बाप तुमको सच्ची गीता सुनाए यह लक्ष्मी-नारायण बनाते हैं। अभी तुम फर्स्ट ग्रेड में जाते हो। सत्य नारायण की कथा सुनकर तुम नर से नारायण बनते हो। अब तुम बच्चों को सारी दुनिया को जगाना है। कितनी योग की ताकत चाहिए। योग की ताकत से ही तुम कल्प-कल्प स्वर्ग की स्थापना करते हो। योगबल से होती है स्थापना, बाहुबल से होता है विनाश। अक्षर ही दो हैं - अल्फ और बे। योगबल से तुम विश्व के मालिक बनते हो। तुम्हारा ज्ञान बिल्कुल ही गुप्त है। तुम जो सतोप्रधान थे, वह अब तमोप्रधान बने हो। फिर सतोप्रधान बनना है। हर एक चीज़ नई से पुरानी ज़रूर होती है। नई दुनिया में क्या नहीं होगा। पुरानी दुनिया में तो कुछ भी नहीं है। जैसे खोखा। कहाँ भारत स्वर्ग था, कहाँ भारत अब नर्क है। रात दिन का फ़र्क है। रावण का बुत बनाकर जलाते हैं, परन्तु अर्थ नहीं जानते। तुम अब समझते हो यह क्या-क्या कर रहे हैं। तुम्हारे में भी कल अज्ञान था, आज ज्ञान है। कल नर्क में थे, आज स्वर्ग में जा रहे हो - रीयल। ऐसे नहीं जैसे दुनिया वाले लोग कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। तुम अब स्वर्ग में जायेंगे तो फिर नर्क होगा ही नहीं। कितनी समझने की बात है। है भी सेकेण्ड की बात। बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। यह सबको बताते रहो। बोलो, तुम इन (लक्ष्मी-नारायण) जैसे थे फिर 84 जन्म लेकर यह बने हो। सतोप्रधान से तमोप्रधान बने हो फिर सतोप्रधान बनना है। आत्मा तो विनाश नहीं होती। बाकी उनको तमोप्रधान से सतोप्रधान फिर बनना ही पड़े। बाबा किसम-किसम से समझाते रहते हैं। मेरी बैटरी कभी पुरानी होती नहीं। बाबा सिर्फ कहते हैं अपने को बिन्दू आत्मा समझो। कहते हैं इनकी आत्मा निकल गई। तो आत्मा संस्कारों अनुसार एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। अब आत्माओं को घर जाना है। यह भी ड्रामा है। सृष्टि चक्र रिपीट होता ही रहता है। पिछाड़ी में हिसाब निकाल कहते हैं दुनिया में इतने मनुष्य हैं। ऐसे क्यों नहीं कहते इतनी आत्मायें हैं। बाप कहते हैं बच्चे मुझे कितना भूल गये हैं। फिर सबका मुझे ही कल्याण करना है, तब तो बाप को पुकारते हैं। तुम बाप को भूल जाते हो, बाप बच्चों को नहीं भूलते। बाप आते हैं पतितों को पावन बनाने। यह है गऊमुख। बाकी बैल आदि की बात नहीं। यह भाग्यशाली रथ है। बाबा तुम बच्चों को कहते हैं शिवबाबा हमको श्रृंगारते हैं। यह पक्का याद रहे। शिवबाबा को याद करने से बहुत फायदा है। बाबा हमें इनके द्वारा (ब्रह्मा द्वारा) पढ़ाते हैं, तो इनको नहीं याद करना है। सतगुरू एक शिवबाबा है, उस पर तुम्हें बलिहार जाना है। यह भी उन पर बलिहार गया ना। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। बच्चे जाते हैं सतयुगी फूलों की दुनिया में, फिर काँटों में मोह क्यों होना चाहिए। 63 जन्म तो भक्ति मार्ग के शास्त्र पढ़ते पूजा करते आये हो। तुमने पूजा भी पहले शिवबाबा की की है, तब तो सोमनाथ का मन्दिर बनाया है। मन्दिर तो सभी राजाओं के घर में थे, कितने हीरे जवाहर थे। पीछे आकर चढ़ाई की। एक मन्दिर से कितना सोना आदि ले गये। तुम ऐसे धनवान विश्व के मालिक बनते हो। यह धनवान थे, विश्व के मालिक थे परन्तु इनके राज्य को कितना समय हो गया है, कोई को पता नहीं है। बाप कहते हैं 5 हज़ार वर्ष हुए। 2500 वर्ष राज्य किया, बाकी 2500 वर्ष में इतने मठ पंथ आदि वृद्धि को पाते हैं।

तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए कि हमको बेहद का बाप पढ़ाते हैं। अथाह मिलकियत मिलती है। दिखाते हैं सागर से देवता निकले रत्नों की थालियाँ भरकर आये। अब तुमको ज्ञान रत्नों की थालियाँ भर भरकर मिलती हैं। बाप तो ज्ञान का सागर है। कोई अच्छी रीति थाली भरते हैं, कोई की बह जाती है। जो अच्छी रीति पढ़ेंगे, पढ़ायेंगे वह ज़रूर अच्छा धनवान बनेंगे। राजधानी स्थापन हो रही है। यह ड्रामा में नूँध है। जो अच्छी रीति पढ़ते हैं उनको ही स्कालरशिप मिलती है। यह है ईश्वरीय स्कॉलरशिप, अविनाशी। वह है विनाशी। सीढ़ी बड़ी वन्डरफुल है। 84 जन्मों की कहानी है ना। बाप कहते हैं सीढ़ी की इतनी बड़ी ट्रांसलाइट बनाओ जो दूर से बिल्कुल साफ दिखाई दे। मनुष्य देखकर वन्डर खायेंगे। फिर तुम्हारा नाम भी बाला होता जायेगा। अभी जो फेरी पहनकर (पा लगाकर) जाते हैं वह पिछाड़ी में आयेंगे। दो चार बार फेरी पहनी, तकदीर में होगा तो जम जायेंगे। शमा तो एक ही है, कहाँ जायेंगे। बच्चों को बहुत मीठा बनना है। मीठा तब बनेंगे जब योग में रहेंगे। योग से ही कशिश होगी। जब तक कट (जंक) नहीं निकली होगी तो किसको कशिश भी नहीं होगी। यह सीढ़ी का राज़ सब आत्माओं को बताना है। धीरे-धीरे नम्बरवार सब जानते जायेंगे। यह है ड्रामा। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती रहती है। जिसने यह समझाया, उसको याद करना चाहिए ना। बाप को ओमनी प्रेजन्ट कहते हैं लेकिन वहाँ तो ओमनी प्रेजन्ट है माया, यहाँ है बाप क्योंकि सेकेण्ड में आ सकता है। तुमको समझना चाहिए कि बाबा इसमें बैठा ही है। करन-करावनहार है ना। करता भी है, कराता भी है, बच्चों को डायरेक्शन देते हैं। खुद भी करते रहते हैं। क्या कर सकते हैं, क्या नहीं कर सकते हैं - इस शरीर में, वह हिसाब करो। बाबा खाते नहीं वासना लेते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
सूचना
यह अव्यक्ति मास हम सभी ब्रह्मा वत्सों के लिए विशेष वरदानी मास है, इसमें हम अन्तर्मुखी बन साकार ब्रह्मा बाप के समान बनने का लक्ष्य रख तीव्र पुरुषार्थ करते हैं, इसके लिए इस जनवरी मास में रोज़ की मुरली के नीचे विशेष पुरुषार्थ की एक प्वाइंट लिख रहे हैं, कृपया सभी इसी अनुसार अटेन्शन रख पूरा दिन इस पर मनन चिंतन करते अव्यक्त वतन की सैर करेंब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्थ
समय प्रमाण तीन शब्द सदा याद रखो - अन्तर्मुख, अव्यक्त और अलौकिक, अभी तक कुछ लौकिकपन मिक्स है लेकिन जब बिल्कुल अलौकिक अन्तर्मुखी बन जायेंगे तो अव्यक्त फरिश्ते नज़र आयेंगे। रूहानी वा अलौकिक स्थिति में रहने के लिए अन्तर्मुखी बनो।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूप-बसन्त बन अपनी बुद्धि रूपी झोली अविनाशी ज्ञान रत्नों से सदा भरपूर रखनी है। बुद्धि रूपी झोली में कोई छेद न हो। ज्ञान रत्न धारण कर दूसरों को दान करना है।
2) स्कालरशिप लेने के लिए पढ़ाई अच्छी तरह पढ़नी है। पूरा वनवाह में रहना है। किसी भी प्रकार का शौक नहीं रखना है। खुशबूदार फूल बनकर दूसरों को बनाना है।

वरदान:- शुभचिंतक स्थिति द्वारा सर्व का सहयोग प्राप्त करने वाले सर्व के स्नेही भव
शुभचिंतक आत्माओं के प्रति हर एक के दिल में स्नेह उत्पन्न होता है और वह स्नेह ही सहयोगी बना देता है। जहाँ स्नेह होता है, वहाँ समय, सम्पत्ति, सहयोग सदा न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो शुभचिंतक, स्नेही बनायेगा और स्नेह सब प्रकार के सहयोग में न्यौछावर बनायेगा इसलिए सदा शुभचिंतन से सम्पन्न रहो और शुभचिंतक बन सर्व को स्नेही, सहयोगी बनाओ।

स्लोगन:- इस समय दाता बनो तो आपके राज्य में जन्म-जन्म हर आत्मा भरपूर रहेगी।