Monday, 30 April 2018

Hindi Murli 01/05/18

01-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम रूहानी सोशल वर्कर हो, तुम्हें भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है, दु:खधाम को सुखधाम बनाना है"

प्रश्नः- संगम पर तुम ब्राह्मण बच्चे किस बात में बहुत एक्सपर्ट (तीखे) बन जाते हो?
उत्तर:- सभी मनुष्यात्माओं की मनोकामना पूर्ण करने में अभी तुम एक्सपर्ट बने हो। मनुष्यों की कामना मुक्ति और जीवन्मुक्ति पाने की है, वह तुम्हें पूर्ण करनी है। तुम सभी को शान्ति का रास्ता बताते हो। शान्ति कोई जंगल में नहीं मिलती, लेकिन आत्मा का स्वधर्म ही शान्ति है। शरीर से डिटैच हो बाप को याद करो तो सुख-शान्ति का वर्सा मिल जायेगा।

गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी...
ओम् शान्ति। बेहद का बाप अपने सिकीलधे बच्चों को समझा रहे हैं। जिन बच्चों ने बाप को जाना है और बाप की शरण में आये हैं। कहते हैं प्रभू तेरी शरण आये। शरण मिले तब, जबकि बाप आये और बच्चों को समझावे। भगत भगवान की शरण में आते हैं क्योंकि यहाँ सब दु:खी हैं। भारत दु:खधाम है। एक दो को दु:ख देते रहते हैं। बाप ने समझाया है यह है तुम्हारी हंस मण्डली। यहाँ पावन बच्चों बिगर कोई भी आ नहीं सकता। बाप समझाते हैं - बच्चे, पावन भारत को ही सुखधाम कहा जाता है और कोई खण्ड को सुखधाम नहीं कहेंगे। भारत ही सुखधाम और भारत ही दु:खधाम बनता है। भारतवासी बहुत दु:खी हैं क्योंकि पतित हैं। परन्तु यह बात उन्हें कोई समझाते नहीं। बाप समझाते हैं - सन्यासी पावन हैं, घरबार छोड़ते हैं, परन्तु खुद भी गाते हैं - पतित-पावन सीताराम...। अभी तुम आये हो पतित-पावन बाप के पास। जो एक ही परमपिता परमात्मा है वही सारी दुनिया को पावन बनाते हैं। मनुष्य, मनुष्य को पावन बना न सके। यह है ही पतित दुनिया। कोई भी पावन नहीं। कहते भी हैं - हे परमपिता परमात्मा। फिर कह देते ईश्वर सर्वव्यापी है। शिवोहम्, तत् त्वम्। सब बिचारे बाप को भूले हुए हैं। जैसे मनुष्य शराब पीते हैं, तो भले वह देवाला मारा हुआ हो तो भी शराब से एकदम नशा चढ़ जाता है। वैसे ही मनुष्य को यह पता नहीं पड़ता कि यह विकार ही पतित बनाते हैं, तब तो सन्यासी भी पावन बनने के लिए घरबार छोड़ते हैं। परन्तु वह है निवृत्ति मार्ग। यहाँ तो बाप आये हैं। जो आधाकल्प से दु:खी हैं वह आकर शरण लेते हैं। दु:खी करने वाली है माया। पाँच विकारों के महारोगी हैं। मनुष्य को रावण ने बिल्कुल असुर बनाया है। जब बिल्कुल दु:खधाम बन जाता है, तब फिर बाप आकर सुखधाम स्थापन करते हैं।

तुम हो रूहानी सोशल वर्कर। तुमसे बाप सेवा कराते हैं कि - बच्चे, तुम इस भारत को स्वर्ग बनाओ। सारा मदार योग पर है। योग में कोई 7 रोज अच्छी रीति रहे तो कमाल हो जाये। ऐसे कोई योग में मुश्किल टिक सकेंगे। घर याद आयेगा, मन भागता रहेगा। सात रोज़ मशहूर हैं। गीता, भागवत, ग्रन्थ का पाठ भी 7 रोज रखते हैं। यह रस्म-रिवाज इस संगमयुग की है। सात रोज़ भट्ठी में रहना पड़े। किसकी भी याद न आवे। एक बाप के साथ योग लगा रहे। सात रोज़ इस एकरस अवस्था में रहना - यह बड़ा मुश्किल है। तुम बच्चों के यादगार भी यहाँ ही हैं। तुम अभी झाड़ के नीचे बैठकर राजयोग की तपस्या करते हो। जगत अम्बा भी है तो तुम बच्चे भी हो। तुम हो सभी मनुष्यों की सर्व मनोकामनायें स्वर्ग में पूरी करने वाले अथवा मनुष्यों को मुक्ति-जीवन्मुक्ति का फल देने वाले। तुम एक्सपर्ट हो। दुनिया में कोई नहीं जानते कि मुक्ति-जीवन्मुक्ति किसको कहा जाता है? कौन देते हैं? पतित दुनिया में कौन पावन बना सकते हैं? सन्यासी लोग शान्ति के लिए घरबार छोड़ते हैं। जंगल में जाते हैं, परन्तु शान्ति तो मिल नहीं सकती। आत्मा का स्वधर्म है शान्त और मनुष्य बाहर ढूँढ़ते हैं। यह किसको पता नहीं कि आत्मा का स्वधर्म शान्त है। (रानी के हार का मिसाल) यह आरगन्स हैं, चाहे कर्मेन्द्रियों से काम लो या न लो। हम आत्मा इस शरीर से अपने को डिटैच कर लेते हैं। जैसे रात को आत्मा डिटैच हो जाती है ना। सब कुछ भूल जाती है। उसको फिर नींद कहेंगे। यहाँ सिर्फ शान्ति में तुम बैठते हो। आत्मा कहती है मैं कर्मेन्द्रियों से काम कर थक गयी हूँ। अच्छा, अपने को शरीर से डिटैच कर लो। यह आरगन्स हैं कर्म करने के लिए। यह नॉलेज बाप ही देते हैं। डिटैच कर बैठ जाओ, कुछ न बोलो। परन्तु ऐसे डिटैच हो कहाँ तक बैठेंगे? यह तो तुम जानते हो कर्म बिगर कोई रह न सके। डिटैच तो हुए परन्तु साथ में फायदा भी चाहिए। सिर्फ डिटैच हो बैठने से इतना फ़ायदा नहीं होगा। डिटैच हो फिर मुझे याद करो तो तुमको फायदा होगा, शक्ति मिलेगी। बाप अपने बच्चों को समझाते हैं - बच्चे, यह ज्ञान-इन्द्र-सभा है। यहाँ तुम सब रत्न बैठे हो। कोई पत्थर-बुद्धि बैठा होगा तो वायुमण्डल खराब कर देगा क्योंकि शिवबाबा की याद में रहेगा नहीं। उनको अपने मित्र-सम्बन्धी याद पड़ते रहेंगे। तुमको तो अपने बाप को निरन्तर याद करना है। यह कोई कॉमन सतसंग नहीं है। यह बड़ी युनिवर्सिटी है। मेडिकल कॉलेज में कोई अनपढ़ आकर बैठे तो कुछ नहीं समझेगा। उनको तो एलाउ नहीं करेंगे। सिर्फ देखने से कुछ समझ नहीं सकेंगे। इस नॉलेज को भी विकारी पतित समझ न सके, इसलिए ऐसे को एलाउ नहीं किया जाता है। कोई कहे कि हम क्लास में आवें, लेक्चर सुनें? परन्तु इससे कुछ समझ नहीं सकेगा। यह युनिवर्सिटी है - मलेच्छ से स्वच्छ देवता बनने के लिए। यहाँ ऐसे कोई को एलाउ नहीं किया जाता है। बाप को तो जान न सके। बाप है गुप्त। तुम जानते हो बेहद के बाप की शरण में आये हैं - बाप से सदा सुख का वर्सा लेने। बाप खुद कहते हैं यह ब्रह्मा का जो शरीर है यह बहुत जन्मों के अन्त का वानप्रस्थ वाला है। यह भी बहुत शास्त्र आदि पढ़ा हुआ है। अभी मैं सब वेद-शास्त्रों का सार इन द्वारा सुनाता हूँ। ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र दिखाते हैं। विष्णु की नाभी-कमल से ब्रह्मा निकला। समझाया है विष्णु की नाभी-कमल से ब्रह्मा, ब्रह्मा की नाभी-कमल से विष्णु निकला है। ब्रह्मा-सरस्वती दोनों कैसे नारायण-लक्ष्मी बनते हैं। फिर 84 जन्म पूरा कर अन्त में ब्रह्मा सरस्वती बनते हैं। उन्होंने फिर गाँधी की नाभी-कमल से नेहरू दिखाया है। अभी यहाँ तो क्षीरसागर है नहीं। यह है विषय सागर। क्षीरसागर सतयुग में दिखाते हैं।

तुम बच्चे जानते हो - आधाकल्प से माया ने दु:खी बनाया है। भारत जितना दु:खी और कोई नहीं है। भारत जितना सुखी भी और कोई हो नहीं सकता। बाप कहते हैं देवी-देवता धर्म तो प्राय: लोप होना ही है। तब तो मैं आकर फिर से नया धर्म स्थापन करूं। बरोबर अब स्थापन हो रहा है। तुम बच्चे आकर बाप से वर्सा ले रहे हो। जानते हो स्वर्ग में कौन राज्य करते हैं। बचपन में राधे-कृष्ण वही फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। अब तो बाप आया हुआ है। भिन्न नाम-रूप से लक्ष्मी-नारायण पढ़ते हैं। श्रीकृष्ण का साँवरा रूप यहाँ बैठा है। बाप इसको उस पार ले जाते हैं। शास्त्रों में दिखाते हैं कृष्ण को टोकरी में उस पार ले गये। अब शिवबाबा आया हुआ है। तुम बच्चों को ऑखों पर बिठाकर स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। सारी वंशावली को पढ़ा कर बाप ले जाते हैं - कंसपुरी से कृष्णपुरी में। एक की तो बात नहीं है। रावणपुरी से तुम सबको निकाल, नयनों पर बिठाकर सुखधाम ले जाता हूँ। मैं तुम बच्चों को स्वर्ग तक पहुँचाने आया हूँ। फिर इस पुरानी दुनिया का विनाश हो जायेगा। लड़ाई की बात भी शास्त्रों में है। परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। यह दादा भी बहुत शास्त्र पढ़ा हुआ था। अब बाबा कहते हैं इन सबको छोड़ मामेकम् याद करो। मैं सबका सद्गुरू हूँ। कंसपुरी कलियुग को, कृष्णपुरी सतयुग को कहा जाता है। अब तुमको रावणपुरी से रामपुरी वा कृष्णपुरी में ले चलता हूँ। चलेंगे सुखधाम कृष्णपुरी में? गाते हैं ना - भजो राधे-गोविन्द.. यह हुआ भक्ति मार्ग। अभी तुम राधे-गोविन्द फिर से बन रहे हो। अभी तुम्हारा दोनों ताज नहीं रहा है - न लाइट का, न राजाई का। पवित्र को ही लाइट का ताज देते हैं। लक्ष्मी-नारायण तो हैं ही सदा पवित्र। उनको कभी सन्यास नहीं करना पड़ता है। सन्यासी जन्म लेकर फिर घरबार छोड़ते हैं पवित्र बनने के लिए। तुम्हारा 21 जन्मों के लिए यह एक जन्म का सन्यास होता है। वह कोई 21 जन्म पवित्र नहीं होते हैं। वह पहले तो विकारियों के पास जन्म ले पतित बन जाते फिर पवित्र बनने लिए घरबार छोड़ते हैं। वह है रजो-गुणी सन्यास। बाप कहते हैं मैं नॉलेजफुल हूँ। नॉलेजफुल, ब्लिसफुल... मेरे में ही फुल नॉलेज है। सूक्ष्मव-तन, मूलवतन, स्थूलवतन और सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की फुल नॉलेज तुम बच्चों को देता हूँ, जिससे तुम फुल बनते हो। देवी-देवतायें हैं ही फुल। तुम बच्चे बाप की गोद में आये हो। जानते हो हम श्रीमत पर चल फिर से राज्य-भाग्य लेते हैं। यह हार-जीत का खेल है। माया से हारे हार है, माया से जीते जीत है। तुम सर्वशक्तिमान बाप से योग लगाकर, शक्ति ले माया पर विजय पाते हो। समझते हो - हमारा 84 जन्मों का ड्रामा अब पूरा होता है। हम फिर से राज्य-भाग्य लेते हैं। लक्ष्मी-नारायण को क्षीरसागर में दिखाते हैं। यह है विषय सागर। राधे-कृष्ण तो छोटे बच्चे थे। कृष्ण को बहुत प्यार से झूले में झुलाते हैं। समझते हैं - वह स्वर्ग का प्रिन्स है। कृष्ण को 16 कला कहा जाता है, राम को 14 कला। वही कृष्ण फिर 16 कला से 14 कला बनते हैं। पुनर्जन्म तो लेना पड़े ना। बाबा ने समझाया है - पूरे 84 जन्म तो सब नहीं लेते होंगे। और धर्म वाले 84 जन्म नहीं लेंगे। समझने की बातें हैं। फादर से वर्सा जरूर मिलना चाहिए। वह है स्वर्ग का रचयिता। तो जरूर स्वर्ग का मालिक ही बनायेंगे। वह फादर परमधाम में रहते हैं। हम भी वहाँ से आते हैं। बाबा को अच्छी रीति याद करना है। याद से शान्ति मिलेगी। मनुष्य तो कहते हैं - परमात्मा से योग कैसे लगायें? मूँझ पड़ते हैं। तुमको तो सब समझ मिली है।

बाप आते ही हैं दु:खधाम और सुखधाम के संगम पर। कलियुग अन्त है दु:खधाम, सतयुग आदि है सुखधाम। दु:खधाम को बदल सुखधाम में बाप ही बिठायेंगे। इतनी ही समझ की बात है। यह पढ़ाई पवित्रता के बिगर कोई पढ़ न सके इसलिए यहाँ पतित को नहीं बिठाया जाता है। समझाना है - तुम आधा कल्प के महारोगी हो। माया ने महारोगी बनाया है इसलिए पहले भट्ठी में रखा जाता है। तुम बच्चे हरेक के आक्यूपेशन को जान गये हो। शिव के मन्दिर में जायेंगे तो समझ जायेंगे - यह बाबा गति-सद्गति दाता है। सबसे बड़ा तीर्थ भी भारत है। परन्तु गीता में कृष्ण का नाम डाल दिया है। शिवबाबा का नाम गुम कर दिया है। शिवबाबा ही आकर सबको दु:ख से छुड़ाते हैं। बाकी पानी की गंगा तो पतित-पावनी है नहीं। वह तो पहाड़ों से निकली है। उसको पतित-पावनी कैसे कहेंगे। इसको अन्धश्रद्धा कहा जाता है। मनुष्य क्या-क्या करते रहते हैं। गाते हैं - मनुष्य जैसा दुर्लभ जन्म है नहीं। सो दुर्लभ जन्म तुम्हारा अभी का है जबकि बाप आया हुआ है। यह तुम्हारा अमूल्य जन्म है। तुम पवित्र बन भारत को स्वर्ग बना देते हो इसलिए शिव-शक्ति भारत-माता गाई हुई है। तुम जानते हो - बाबा पवित्रता की मदद से भारत तो क्या, सारी दुनिया को पवित्र बनाते हैं। जो-जो पवित्रता की अंगुली देते हैं, मनमनाभव रहते हैं, वही मददगार हैं। इसका अर्थ भी तुम समझते हो। यह दादा भी नहीं समझते थे। इनके बहुत गुरू किये हुए हैं। शास्त्र पढ़े हुए हैं। तब बाबा कहते हैं मामेकम् याद करो। मैं ही तुम्हारा सब कुछ हूँ। गति-सद्गति दाता हूँ। मनुष्य तो पतित हैं। अब तुम आये हो शिवबाबा के पास, ब्रह्मा द्वारा वर्सा लेने। इस निश्चय बिगर कोई आ न सके। आकर और ही अशान्ति फैला देंगे। तुम भारत को सुप्रीम शान्ति में ले जाते हो। यह है स्थापना का कार्य, जो मनुष्य कर न सके। तुम भी शिवबाबा की मदद से कर रहे हो। तुमको भी प्राइज़ क्या मिलती है? स्वर्ग के मालिक बनते हो। ऐसे बाबा के बनते भी फिर निश्चय-बुद्धि नहीं हैं तो माया एकदम हप कर लेती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस एक जन्म में पुरानी दुनिया से सन्यास कर बाप का मददगार बनना है। पवित्रता की अंगुली देनी है और मनमनाभव रहना है।
2) भारत को सुप्रीम शान्ति में ले जाने की सेवा करनी है। इस शरीर से डिटैच हो बाप की याद में रहकर शक्ति लेनी है। शान्ति का दान देना है।

वरदान:- सदा बाप समान बन अपने सम्पन्न स्वरूप द्वारा सर्व को वरदान देने वाले वरदानी मूर्त भव
भारत में विशेष देवियों को वरदानी के रूप में याद करते हैं। लेकिन ऐसे वरदानी मूर्त वही बनते हैं जो बाप के समान और समीप रहने वाले हों। अगर कभी बाप समान और कभी बाप समान नहीं लेकिन स्वयं के पुरुषार्थी हैं तो वरदानी नहीं बन सकते क्योंकि बाप पुरुषार्थ नहीं करता वो सदा सम्पन्न स्वरूप में है। तो जब समान अर्थात् सम्पन्न स्वरूप में रहो तब कहेंगे वरदानी मूर्त।

स्लोगन:- याद की तीव्र दौड़ी लगाओ तो बाप के गले का हार, विजयी मणके बन जायेंगे।
 

Hindi Murli 30/04/18

30-04-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - इस कलियुगी दुनिया का सुख काग विष्टा के समान है, यह दुनिया अब गई कि गई इसलिए इससे लगाव नहीं रखना है, आसक्ति निकाल देनी है"

प्रश्नः- किन बच्चों की दिल इस पुरानी दुनिया से नहीं लग सकती है?
उत्तर:- जो आज्ञाकारी, वफादार, निश्चयबुद्धि बच्चे हैं उनकी दिल इस पुरानी दुनिया से लग नहीं सकती क्योंकि उनकी बुद्धि में रहता यह तो विनाश हुई कि हुई। यह तिलसम (जादू) का खेल है, माया का भभका है। इसका अब विनाश होना ही है। डैम फटेंगे, अर्थक्वेक होगी, सागर धरनी को हप करेगा.... यह सब होना है, नथिंगन्यु। स्वीट होम, स्वीट राजधानी याद है तो इस दुनिया से दिल नहीं लग सकती।

गीत:- जिसका साथी है भगवान...

ओम् शान्ति। यह निश्चय के ऊपर गीत है। जब बाप का बनते हैं वा बाप आते हैं तो वह आकर हमारा साथी बनते हैं। बच्चे जानते हैं बाप जब आते हैं तब ही विनाश के तूफान होते हैं। बाप आते हैं पुरानी दुनिया को खलास कर नई दुनिया स्थापन करने। अर्थक्वेक होगी, समुद्र नीचे से धरती को खा जायेगा, बरसात ऊपर से धरती को खा जायेगी। यह सब होना ही है। गीत तो उन्होंने ऐसे ही बैठ बनाये हैं। तुम ब्राह्मण कुल भूषण बच्चे जानते हो बरोबर पुरानी दुनिया का विनाश होना है। बाप आये ही हैं नई दुनिया की स्थापना करने। ब्राह्मणों को सारे विश्व का मालिक बनाते हैं। पुरानी दुनिया का विनाश कराए फिर सारे विश्व की राजाई बच्चों को वर्से में देते हैं। तुम जानते हो बाप से नये विश्व के मालिकपने का वर्सा मिलता है। यह पुरानी विश्व तो कोई काम की नहीं है। मनुष्य समझते हैं अब तो स्वर्ग बनता जा रहा है। परन्तु यह सब है माया का भभका। सब चीज़ मुलम्मे की है, सारा राज्य मुलम्मे का है। रूण्य के पानी (मृगतृष्णा) समान है, इसमें मनुष्य खुश होते हैं। आगे जब मुसलमानों का राज्य था तो यह एरोप्लेन, मोटरें आदि थोड़ेही थी। यह सब माया का भभका है। कितने प्लैन्स बनाते हैं। बच्चे जानते हैं यह सब विनाश होने हैं। अर्थक्वेक होगी, यह डैम्स आदि सब पानी ही पानी कर देंगे। मनुष्य समझते हैं इससे सुख मिलेगा, परन्तु इन सबसे दु:ख ही मिलेगा। यह एरोप्लेन भी दु:खदाई बन पड़ेंगे, बाम्ब्स गिरायेंगे। तो बच्चे यह सब बातें भूल जाते हैं इसलिए पुरानी दुनिया में दिल लग जाती है। जो बाप के आज्ञाकारी, वफादार, पूरे मददगार बच्चे बनते हैं, पक्के निश्चयबुद्धि हैं वह तो जानते हैं कि कुछ भी हो, यह कोई नई बात नहीं है। यह तो अनेक बार पुरानी दुनिया का विनाश हुआ है, सो अब होना है जरूर। वह समझते हैं बहुत नई-नई चीज़ें बन रही हैं, स्वर्ग बन रहा है और तुम बच्चे सिर्फ जानते हो कि यह तो तिलसम (जादू) का खेल है। जैसे कोई पुराने सोने को रंग रूप लगाकर चमकदार बना देते हैं, वैसे इस पुरानी दुनिया को भी रंग रूप देकर चमकदार बनाने के सब तरफ प्लैन्स बनाते रहते हैं। उनको यह पता ही नहीं है कि विनाश होना है। यह तो तुम ब्राह्मण ही जानते हो कि यह पुरानी दुनिया विनाश होनी है।

मनुष्य तो कह देते हैं कि यह पुरानी दुनिया विनाश होगी फिर नई दुनिया भगवान आकर स्थापन करेंगे। पहले ब्रह्मा को रचेंगे, फिर उनसे मनुष्य सृष्टि पैदा होगी। सो तो पता नहीं कब होगा। यह सिर्फ तुम बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं। भगवान की है श्रीमत। अब श्रीमत जब कहा जाता है तो जरूर समझना चाहिए यह तो ऊंच भगवान की ही मत है। श्रीमत ब्रह्मा की वा विष्णु की नहीं कहते हैं। भगवान आकर ब्रह्मा तन से श्रीमत कैसे देते हैं - यह मनुष्य नहीं जानते हैं। वह समझते नहीं - ब्रह्मा फिर नीचे कैसे आता है, वह तो है सूक्ष्मवतनवासी। तो इन सब बातों को न जानने के कारण कृष्ण का नाम दे दिया है। ऐसे भी नहीं हो सकता कि कृष्ण का कोई साधारण रूप है जिसमें परमात्मा प्रवेश करते हैं। यह बातें कोई नहीं जानते। बाप कहते हैं हमारे भी बहुत गुरू किये हुए थे, परन्तु कुछ पता नहीं था। भूले हुए थे कि श्रीमत किसकी है? श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ तो है निराकार, उनकी ही श्रीमत है। शिवाए नम: कहते हैं ना। उनकी महिमा अपरमअपार है। इन बातों को तुम बच्चे ही जानते हो। यह सब बातें किसको बुद्धि में बिठाने में कितनी मेहनत लगती है!

अब भक्तों को भगवान की मत चाहिए। यह तो ड्रामा में नूंध है। गीता के भगवान ने आकर भक्तों को मत दी है। तो भक्तों का उद्धार कैसे हो, भक्त फिर कह देते हैं भगवान सर्वव्यापी है। भक्त ही भगवान हैं तो बताओ उन्हों का क्या हाल होगा। अब बाप बैठ समझाते हैं कि भगवान एक है, वह आते ही हैं भक्तों की रक्षा करने। इस समय मनुष्य सब रावण की शोकवाटिका में हैं। कोई भी मनुष्य साधू सन्त आदि रक्षा नहीं कर सकते हैं। भक्तों की रक्षा भगवान को करनी है।

मनुष्य यह नहीं जानते हैं कि हम पतित दुनिया नर्क में निवास कर रहे हैं। पावन दुनिया स्वर्ग को कहा जाता है। यह बातें समझेंगे फिर भी कोटों में कोई। कल्प पहले वाले सिकीलधे बच्चे ही आयेंगे। कल्प-कल्प तुम सिकीलधे बनते हो फिर कोई तो पूरा बनते हैं, कोई को तो माया कच्चा ही खा जाती है। बाप को याद न करने से झट विकार आ जाते हैं। पहला-पहला विकार देह-अहंकार आया तो फिर औरों की भी चेष्ठा होगी, इसलिए बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो क्योंकि सबको वापिस जाना है। यहाँ तो दु:ख ही दु:ख है। कलियुगी दुनिया का सुख काग विष्टा के समान है। यह तो सन्यासी भी कहते हैं और तुम भी समझते हो। नर्क और स्वर्ग को तुम बच्चे जानते हो। नर्क में तो कोई सुख नहीं। नर्क में कोई से भी लगाव रखना अपना पद भ्रष्ट करना है। कोई भी चीज़ में आसक्ति नहीं रखनी है। समझाना चाहिए यह तो पुरानी दुनिया खत्म होने वाली है। यह दुनिया कोई काम की नहीं है। पहले-पहले देह-अभिमान आने से उनके साथ दिल लगती है। देही-अभिमानी फिर इस पुरानी दुनिया से जैसे उपराम रहेंगे। वह होता है हद का वैराग्य, यह है बेहद का वैराग्य। हम इस पुरानी दुनिया को भूलते हैं, यह बिल्कुल ही दु:ख देने वाली है। इनसे बाकी थोड़ा सा काम लेना है, यह गई कि गई। बाकी दो घड़ी के हम मेहमान हैं। तो ब्राह्मण ही कहते हैं कि हम पुरानी दुनिया में दो घड़ी के मेहमान हैं। हम अपने स्वीट होम, स्वीट राजधानी में आकर सुख भोगेंगे, अब हमको जाना है। यह पुरानी दुनिया कब्रिस्तान होनी है इसलिए देह सहित सब कुछ भूल जाना है। यह शरीर पुरानी जुत्ती है, इसको अब छोड़ना है, योग में रहना है। योग में रहने से आयु बढ़ेगी तो हम बाप से वर्सा लेंगे। देह-अभिमानी की आयु बढ़ नहीं सकती। उनका देह से प्यार हो जाता है। कोई का शरीर अच्छा है तो देह से प्यार होता है। अच्छी रीति मलते रहेंगे, जैसे बर्तन मले जाते हैं। जितना तुम योग में रहेंगे उतना आत्मा प्योर होती जायेगी फिर लायक बनेंगे - नया बर्तन लेने के। हम शरीर को भल कितना भी साबुन, वैसलीन, पाउडर आदि लगायें फिर भी पुराना शरीर है ना। पुराने मकान को कितना भी मरम्मत करो तो भी जैसे खण्डहर है, तो यह शरीर भी ऐसे है। अपने से ऐसी-ऐसी बातें करेंगे तब बाप और वर्से से दिल लगेगी और कोई चीज़ से दिल नहीं लगानी है। मैं आत्मा हूँ, बाप के पास जाने वाली हूँ। बाप को याद करने से फ़ायदा होता रहता है। आयु बढ़ती रहती है। आत्मा समझती है - मैं योगबल से प्योर होती जाती हूँ। यह मेरा शरीर कोई काम का नहीं है। भल सन्यासी पवित्र रहते हैं परन्तु शरीर तो फिर भी पतित है ना। यहाँ कोई का भी शरीर शुद्ध नहीं हो सकता। वहाँ शरीर विष से नहीं बनता। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो। अगर स्वर्ग में भी विकारों से ही पैदाइस होती तो फिर उनको निर्विकारी क्यों कहते? वहाँ तो आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होते हैं।

तुम जानते हो इस समय 5 तत्व भी आइरन एजेड हैं तो शरीर भी ऐसे मिलते हैं। बीमारी आदि हो जाती है, वहाँ कभी शरीर बीमार हो न सके। यह सब समझने की बातें हैं। वहाँ तुम्हारे शरीर भी नये बनते हैं। सतोप्रधान प्रकृति बन जाती है। वहाँ यह दवाईयां आदि कुछ नहीं होती। शरीर चमकता रहता है। काया कंचन समान बन जाती है। अभी तो लोहे की है। वन्डर है ना काया कैसे बदलती है! कोई पॉलिश तो नहीं की जाती है। काया एकदम कंचन समान हो जाती है उसको गोल्डन एज कहा जाता है। सोने के शरीर तो नहीं होते हैं। लक्ष्मी-नारायण को पारसनाथ पारसनाथिनी कहते हैं। उन्हों के शरीर देखो कितने सतोप्रधान हैं! उन्हों की कितनी महिमा है। अभी तो यह 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं, विष से शरीर पैदा होते हैं। वहाँ है योगबल की बात। स्वर्ग में जरूर वाइसलेस बच्चे होंगे। काम महाशत्रु वहाँ होता नहीं। बाप कहते हैं यह काम तुमको आदि-मध्य-अन्त दु:ख देने वाला है। उनको कहा ही जाता है सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया और इसको सम्पूर्ण विकारी दुनिया कहा जाता है। हर एक के अन्दर यह 5 भूत हैं। 5 भूतों पर विजय तब पाते जब सर्वशक्तिमान बाप से योग लगाते हो, जिस योगबल से तुम विश्व के मालिक बनते हो। तो तुम हो इनकागनीटो शिवशक्ति सेना। सेना शिवबाबा से योग लगाकर शक्ति ले रही है। वह सर्वशक्तिमान बाप है ही स्वर्ग की राजधानी स्थापन करने वाला, गॉड फादर। वह आते ही हैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाने। अभी तुम स्वर्ग के लायक नहीं हो। मैं कल्प-कल्प आकर तुम बच्चों को स्वर्ग की राजधानी में राज्य करने के लायक बनाता हूँ। अभी तुम हो नर्क के मालिक। मनुष्य कहते भी हैं फलाना मरा, स्वर्गवासी हुआ। बिल्कुल समझते नहीं हैं कि हम नर्क में हैं। स्वर्ग का वास्तव में कोई को पता ही नहीं है। कहते हैं जिनके पास धन दौलत बहुत है उनके लिए यहाँ ही स्वर्ग है। अरे इतनी बीमारियां आदि लगी पड़ी हैं इसको स्वर्ग कैसे कहेंगे। स्वर्ग तो सतयुग को कहा जाता है। कलियुग में थोड़ेही स्वर्ग है। बाप ने समझाया है यह है विकारी दुनिया। हर एक नारी द्रोपदी, पार्वती है। हर एक नारी को अमरनाथ अमरकथा सुनाते हैं। हर एक द्रोपदी नंगन होने से बच जायेगी। यह बातें बेहद का बाप बैठ समझाते हैं। वह है ही वाइसलेस वर्ल्ड, सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया, विकार बिल्कुल नहीं। आत्मा आकर प्रवेश करती है तो उस समय गर्भ में बिल्कुल प्योर रहती है। आत्मा भी प्योर आती है इसलिए उनको गर्भ में भी कोई सजा नहीं भोगनी पड़ती है। यहाँ तो सभी को सजा मिलती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस दुनिया में स्वयं को मेहमान समझना है। देही-अभिमानी बन पुरानी दुनिया और पुरानी देह से उपराम रहना है।
2) योग से आत्मा और शरीर रूपी बर्तन साफ करना है। यह शरीर काम का नहीं है इसलिए इसमें ममत्व नहीं रखना है।

वरदान:- खुशी के खजाने से अनेक आत्माओं को मालामाल बनाने वाले सदा खुशनसीब भव
खुशनसीब उन्हें कहा जाता जो सदा खुश रहते हैं और खुशी के खजाने द्वारा अनेक आत्माओं को मालामाल बना देते हैं। आजकल हर एक को विशेष खुशी के खजाने की आवश्यकता है, और सब कुछ है लेकिन खुशी नहीं है। आप सबको तो खुशियों की खान मिल गई। खुशियों का वैरायटी खजाना आपके पास है, सिर्फ इस खजाने के मालिक बन जो मिला है वो स्वयं के प्रति और सर्व के प्रति यूज़ करो तो मालामाल अनुभव करेंगे।

स्लोगन:- अन्य आत्माओं के व्यर्थ भाव को श्रेष्ठ भाव में परिवर्तन कर देना ही सच्ची सेवा है।
 

Saturday, 28 April 2018

Hindi Murli 29/04/18

29-04-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 15-05-83 मधुबन

“उड़ती कला में जाने की विधि और पुण्य आत्माओं की निशानियां”

आज बागवान बाप अपने रूहानी बगीचे में खुशबूदार फूलों को और कल की विशेष कल्याण अर्थ निमित्त बनी हुई हिम्मत-हुल्लास वाली कलियों को भी देख रहे हैं। कल के तकदीर की तस्वीर नन्हें मुन्ने बच्चों को देख रहे हैं। (आज बापदादा के सम्मुख छोटे-छोटे बच्चों का ग्रुप बैठा है) बापदादा इन छोटे-छोटे बच्चों को धरनी के चमकते सितारे कहते हैं। यही लकी सितारे विश्व को नई रोशनी देने के निमित्त बनेंगे। इन छोटे बड़े बच्चों को देख बापदादा को स्थापना के आदि का नज़ारा याद आ रहा है। जबकि ऐसे छोटे-छोटे बच्चे विश्व कल्याण के कार्य के उमंग-उत्साह में दृढ़ संकल्प करने वाले निकले कि हम छोटे सबसे बड़ा कार्य करके दिखायेंगे जो राज्य-नेतायें, धर्म नेतायें, विज्ञानी आत्मायें चाहना रखती हैं लेकिन कर नहीं पाती हैं, यह कार्य हम छोटे-छोटे कर दिखायेंगे। और आज उन छोटे-छोटे बच्चों का संकल्प साकार रूप में देख रहे हैं। वो थोड़े ही छोटे बच्चे आज शिवशक्ति पाण्डव सेना के रूप में कार्य कर रहे हैं। हिस्ट्री तो सब जानते हो ना। आज उन्हीं जगे हुए दीपकों से आप सभी दीपमाला बन बाप के गले के हार बन गये हो। अब भी छोटे बड़े बच्चों को देख हर बच्चे में विश्व के कल की तकदीरवान तस्वीर दिखाई देती है। सभी बच्चे अपने को क्या समझते हो? लकी सितारे हो ना। आज का दिन है ही बच्चों का दिन, बड़े तो गैलरी में बैठ देखने वाले हैं। बापदादा भी विशेष बच्चों को देख हर्षित होते हैं। एक एक बच्चा अनेक आत्माओं को बाप का परिचय दे बाप के वर्से के अधिकारी बनाने वाले हो ना! वैसे भी बच्चों को महात्मा कहा जाता है। सच्चे-सच्चे महान आत्मायें अर्थात् श्रेष्ठ पवित्र आत्मायें आप सब हो ना! ऐसी महान आत्मायें सदा अपने एक ही दृढ़ संकल्प में रहती हो? सदा एक बाप और एक ही श्रीमत पर चलना है। यह पक्का निश्चय किया है ना! अपने-अपने स्थानों पर जाए किसी भी संग में तो नहीं आने वाले हो? आप सभी का फोटो यहाँ निकल गया है इसलिए सदा अपना श्रेष्ठ जीवन याद रखना। हम हर एक बच्चा विश्व की सर्व आत्माओं के श्रेष्ठ परिवर्तन के निमित्त हैं, सदैव यह याद रखना। इतनी बड़ी जिम्मेवारी उठाने की हिम्मत है? सभी बच्चे अमृतवेले से लेकर अपने सेवा की जिम्मेवारी निभाने वाले हो? जो भी किसी भी बात में कमज़ोर हो तो उसको अभी से ठीक कर लेना। आप सभी के ऊपर सभी की नज़र है इसलिए अमृतवेले से लेकर रात तक सहज योगी, श्रेष्ठ योगी जो भी श्रेष्ठ जीवन के लिए दिनचर्या मिली हुई है, उसी प्रमाण सभी को यथार्थ रीति चलना पड़ेगा - यह अटेन्शन अभी से दृढ़ संकल्प के रूप में रखना। सभी को योगी के लक्षणों का पता है? (सब बच्चे बापदादा को हरेक बात पर जी हाँ का रेसपान्ड करते रहे) योगी आत्माओं की बैठक, चलन, दृष्टि क्या होती है, यह सब जानते हो? ऐसे ही चलते हो वा थोड़ी-थोड़ी चंचलता भी करते हो? सब योगी आत्मायें हो ना! जो दुनिया वाले करते हैं वह आप बच्चे नहीं कर सकते। आप महान आत्मायें ऐसे शान्त स्वरूप रहो जो भल कितने भी बड़े-बड़े हों लेकिन आप शान्त स्वरूप आत्माओं को देख शान्ति की अनुभूति करें और यही दिखाई दे कि यह साधारण बच्चे नहीं लेकिन सभी अलौकिक बच्चे हैं। न्यारे हैं और विशेष आत्मायें हैं। तो ऐसे चलते हो? अभी से यह भी परिवर्तन करना। आज सभी बच्चों से मिलने के लिए ही विशेष बापदादा आये हैं। समझा!

बच्चों के साथ बड़े भी आये हैं। बापदादा आये हुए सभी बच्चों को विशेष याद दे रहे हैं। साथ-साथ यह तो सभी जानते हो कि वर्तमान समय प्रमाण बापदादा सभी बच्चों को उड़ती कला की ओर ले जा रहे हैं, उड़ती कला का श्रेष्ठ साधन जानते हो ना। एक शब्द के परिवर्तन से सदा उड़ती कला का अनुभव कर सकते हो। एक शब्द कौन सा? सिर्फ ‘सब कुछ तेरा'। ‘मेरा' शब्द बदल ‘तेरा' कर लिया। तेरा शब्द ही तेरा हूँ बना देता है। और यही एक शब्द सदा के लिए डबल लाइट बना देता है। तेरा हूँ, तो आत्मा लाइट है। और जब सब कुछ तेरा तो भी लाइट (हल्के) बन गये ना। तो सिर्फ एक शब्द ‘तेरा'। डबल लाइट बन जाने से सहज उड़ती कला वाले बन जाते। बहुत समय का अभ्यास है ‘मेरा' कहने का। जिस मेरे शब्द ने ही अनेक प्रकार के फेरे में लाया है। अभी इसी एक शब्द को परिवर्तन कर लो। मेरा सो तेरा हो गया। यह परिवर्तन मुश्किल तो नहीं है ना। तो सदा इसी एक शब्द के अन्तर स्वरूप में स्थित रहो। समझा क्या करना है। सदा एक ही लगन में मगन रहने वाले, ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें वर्तमान भी श्रेष्ठ जीवन का अनुभव कर रही हैं और भविष्य भी अविनाशी श्रेष्ठ बना रही हैं इसलिए सदा यह एक शब्द याद रखो। समझा! इसी आधार पर जितना आगे बढ़ने चाहो उतना आगे बढ़ सकते हो और जितना अपने पास खजाने जमा करने चाहो उतने खजाने जमा कर सकते हो। वैसे भी लौकिक जीवन में सदा जो भी नामीग्रामी अच्छे कुल वाली आत्मायें होती हैं वह सदा अपने जीवन के लिए दान पुण्य करने का लक्ष्य रखती हैं। आप सभी सबसे बड़े ते बड़े कुल, श्रेष्ठ कुल के हो। तो श्रेष्ठ कुल वाली ब्राह्मण आत्मायें अर्थात् सर्व खजानों से सम्पन्न आत्मायें उन्हों का भी लक्ष्य क्या है? सदा महादानी बनो। सदा पुण्य आत्मा बनो। कभी भी संकल्प में भी किसी विकार के वश कोई संकल्प भी किया तो उसको क्या कहा जायेगा? पाप वा पुण्य? पाप कहेंगे ना। स्वयं के प्रति भी सदा पुण्य कर्ता बनो। संकल्प में भी पुण्य आत्मा, बोल में भी पुण्य आत्मा और कर्म में भी पुण्य आत्मा। जब पुण्य आत्मा बन गये तो पाप का नाम निशान नहीं रह सकता। तो सदा यह स्मृति में रखो कि हम सर्व ब्राह्मण आत्मायें सदा की पुण्य आत्मायें हैं। किसी भी आत्मा के प्रति सदा श्रेष्ठ भावना और श्रेष्ठ कामना रखना यह सबसे बड़ा पुण्य है। चाहे कैसी भी आत्मा हो, विरोधी आत्मा हो वा स्नेही आत्मा हो लेकिन पुण्य आत्मा का पुण्य ही है - जो विरोधी आत्मा को भी श्रेष्ठ भावना के पुण्य की पूँजी से उस आत्मा को भी परिवर्तन करे। पुण्य कहा ही जाता है, जिस आत्मा को जिस वस्तु की अप्राप्ति हो उसको प्राप्त कराने का कार्य करना - यह पुण्य है। जब कोई विरोधी आत्मा आपके सामने आती है तो पुण्य आत्मा, सदा उस आत्मा को सहनशक्ति से वंचित आत्मा है - उसी नज़र से देखेंगे। और अपने पुण्य की पूंजी द्वारा, शुभ भावना द्वारा, श्रेष्ठ संकल्प द्वारा उस आत्मा को सहनशक्ति की प्राप्ति के सहयोगी आत्मा बनेंगे। उसके लिए यही पुण्य का कार्य हो जाता है। पुण्य आत्मा सदा स्वयं को दाता के बच्चे देने वाला समझते हैं। किसी भी आत्मा द्वारा अल्पकाल की प्राप्ति लेने की कामना से परे रहते हैं। यह आत्मा कुछ देवे तो मैं दूँ, वा यह भी कुछ करे तो मैं भी करूँ, ऐसी हद की कामना नहीं रखते। दाता के बच्चे बन सबके प्रति स्नेह, सहयोग, शक्ति देने वाले पुण्य आत्मा होंगे। पुण्य आत्मा कभी भी अपने पुण्य के बदले प्रशंसा लेने की कामना नहीं रखते क्योंकि पुण्य आत्मा जानते हैं कि यह हद की प्रशंसा को स्वीकार करना सदाकाल की प्राप्ति से वंचित होना है इसलिए वह सदा देने में सागर के समान सम्पन्न रहते हैं। पुण्य आत्मा सदा अपने हर बोल द्वारा औरों को खुशी में, बाप के स्नेह में, अतीन्द्रिय सुख में, रूहानी आनन्दमय जीवन का अनुभव करायेंगे। उनका हर बोल खुशी की खुराक होगी, पुण्य आत्मा का हर कर्म सर्व आत्माओं के प्रति सदा सहयोग की प्राप्ति कराने वाला होगा और हर आत्मा अनुभव करेगी कि इस पुण्य आत्मा का कर्म देख सदा आगे उड़ने का सहयोग प्राप्त हो रहा है। समझा - पुण्य आत्मा के लक्षण। तो ऐसे सदा पुण्यात्मा बनो अर्थात् श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन का प्रत्यक्ष स्वरूप बनो। पवित्र प्रवृत्ति वाली पुण्य आत्मायें बनो तब ही ऐसी पुण्य आत्माओं के प्रभाव से पाप का नाम निशान समाप्त हो जायेगा। अच्छा !

ऐसे सदा हर संकल्प द्वारा पुण्य करने वाली पुण्य आत्मायें, सदा एक शब्द के परिवर्तन द्वारा उड़ती कला में जाने वाले, सदा दाता के बच्चे बन सबको देने वाली विशेष आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

कुमारों प्रति - अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य

सभी कुमार फर्स्ट नम्बर में आने वाले हो ना। फर्स्ट नम्बर एक होता है या इतने होते हैं? अच्छा फर्स्ट डिवीजन में आने वाले हो? फर्स्ट आने वाले की विशेषता क्या होती है, वह जानते हो? फर्स्ट में आने वाले सदा बाप समान होंगे। समानता ही समीपता लाती है। समीप अर्थात् समान बनने वाले ही फर्स्ट डिवीजन में आ सकते हैं। तो बाप समान कब तक बनेंगे? जब विजय माला के नम्बर आउट हो जायेंगे फिर क्या करेंगे? डेट नहीं लेकिन अब की घड़ी। क्या इसमें मुश्किल है? कुमारों को कौन सी मुश्किल है? दो रोटी खाना है और बाप की सेवा में लगना है, यही काम है ना। दो रोटी के लिए निमित्त मात्र कोई कार्य करते हो ना। ऐसे करते हो, लगाव से तो नहीं करते हो ना! निमित्त कहने से नहीं होता, कुमार कहने से नहीं करते, स्वतंत्र हैं। तो सदा लक्ष्य रहे बाप समान बनना है। जैसे बाप लाइट है वैसे डबल लाइट। औरों को देखते हो तो कमजोर होते हो, सी फादर, फालो फादर करना है। यही सदा याद रखो। स्वयं को सदा बाप की छत्रछाया के अन्दर रखो। छत्रछाया में रहने वाले सदा मायाजीत बन ही जाते हैं। अगर छत्रछाया के अन्दर नहीं रहते, कभी अन्दर कभी बाहर तो हार होती है। छत्रछाया के अन्दर रहने वाले को मेहनत नहीं करनी पड़ती। स्वत: ही सर्व शक्तियों की किरणें उसे माया जीत बनाती हैं। एक बाप सर्व सम्बन्ध से मेरा है, यही स्मृति समर्थ आत्मा बना देती है।

कुमार अब ऐसा जीवन का नक्शा तैयार करके दिखाओ जो सब कहें निर्विघ्न आत्मायें हैं तो यहाँ हैं। सब विघ्न-विनाशक बनो। हलचल में आने वाले नहीं, वायुमण्डल को परिवर्तन करने वाले। शक्तिशाली वायुमण्डल बनाने वाले बनो। सदा विजय का झण्डा लहराता रहे। ऐसा विशेष नक्शा तैयार करो। जहाँ युनिटी है वहाँ सहज सफलता है। लेकिन गिराने में युनिटी नहीं करना, चढ़ाने में। सदा उड़ती कला में जाना है और सबको ले जाना है - यही लक्ष्य रहे। कुमार अर्थात् सदा आज्ञाकारी, वफादार। हर कदम में फालो फादर करने वाले। जो बाप के गुण वह बच्चों के, जो बाप का कर्तव्य वह बच्चों का, जो बाप के संस्कार वह बच्चों के, इसको कहा जाता है फालो फादर। जो बाप ने किया है वही रिपीट करना है, कापी करना है। इस कापी करने से फुल मार्क्स मिल जायेंगी। वहाँ कापी करने से मार्क्स कट जाती और यहाँ फुल मार्क्स मिल जाती। तो जो भी संकल्प करो, पहले चेक करो कि बाप समान है। अगर नहीं है तो चेन्ज कर दो। अगर है तो प्रैक्टिकल में लाओ। कितना सहजमार्ग है। जो बाप ने किया वह आप करो। ऐसे सदा बाप को फालो करने वाले ही सदा मास्टर सर्वशक्तिवान स्थिति में स्थित रहते हैं। बाप का वर्सा ही है सर्वशक्तियाँ और सर्वगुण। तो बाप के वारिस अर्थात् सर्वशक्तियों के, सर्वगुणों के अधिकारी। अधिकारी से अधिकार जा कैसे सकते। अगर अलबेले बने तो माया चोरी कर लेगी। माया को भी सबसे अच्छे ग्राहक ब्राह्मण आत्मायें लगती हैं इसलिए वह भी अपना चांस लेती है। आधा कल्प उसके साथी रहे, तो अपने साथियों को ऐसे कैसे छोड़ेगी। माया का काम है आना, आपका काम है जीत प्राप्त करना, घबराना नहीं। शिकारी के आगे शिकार आता है तो घबरायेंगे क्या? माया आती है तो जीत प्राप्त करो, घबराओ नहीं। अच्छा!

टीचर्स के साथ:- निमित्त सेवाधारी! निमित्त कहने से सहज ही याद आ जाता है किसने निमित्त बनाया है। कभी भी सेवाधारी शब्द कहो तो उसके आगे निमित्त जरूर कहो। दूसरा निमित्त समझने से स्वत: ही निर्मान बन जायेंगे। और जो जितना निर्मान होगा उतना फलदायक होगा। निर्मान बनना अर्थात् फल स्वरूप बनना है। तो सभी निमित्त सेवाधारी, अपने को निमित्त समझकर चलते हो? निमित्त समझने वाले सदा हल्के और सदा सफलतामूर्त होते हैं। जितना हल्के होंगे उतना सफलता जरूर होगी। कभी सेवा कम होती, कभी ज्यादा तो बोझ तो नहीं लगता है ना। भारी तो नहीं होते, क्या होगा, कैसे होगा। कराने वाला करा रहा है और मैं सिर्फ निमित्त बन कार्य कर रही हूँ - यही सेवाधारी की विशेषता है। सदा स्व के पुरुषार्थ से और सेवा से सन्तुष्ट रहो तब ही जिन्हों के निमित्त बनते हैं उन्हों में सन्तुष्टता होगी। सदा सन्तुष्ट रहना और दूसरों को रखना - यही विशेषता है।

वर्तमान समय के हिसाब से सेवाधारी की सेवा कौन सी है? सर्व को हल्के बनाने की सेवा। उड़ती कला में ले जाने की सेवा। उड़ती कला में तब ले जायेंगे जब हल्के होंगे। सर्व प्रकार के बोझ स्वयं के भी हल्के और सर्व के भी बोझ हल्के करने वाले। जिन आत्मओं के निमित्त सेवाधारी बने हैं उन्हों को मंजिल पर तो पहुंचाना है ना! अटकाना वा फँसाना नहीं है लेकिन हल्के बन हल्के बनाना है। हल्के बनेंगे तो मंजिल पर स्वत: पहुंच जायेंगे। सेवाधारी की वर्तमान समय यही सेवा है। उड़ते रहो उड़ाते रहो। सभी को सेवा की लाटरी मिली है, इसी लाटरी को सदा कार्य में लगाते रहो। हर सेकेण्ड में श्वाँसों श्वांस सेवा चलती रहे। इसी में सदा बिजी रहो। अच्छा!

वरदान:- सुख स्वरूप बन सारे विश्व में सुख की किरणें फैलाने वाले मास्टर ज्ञान सूर्य भव
जैसे बाप ज्ञान का सागर, सुख का सागर है वैसे स्वयं भी ज्ञान स्वरूप, सुख स्वरूप बनो, हर गुण का सिर्फ वर्णन नहीं लेकिन अनुभव हो। जब सुख स्वरूप के अनुभवी बनेंगे तो आप सुख स्वरूप आत्मा द्वारा सुख की किरणें विश्व में फैलेंगी। जैसे सूर्य की किरणें सारे विश्व में जाती हैं वैसे आपके ज्ञान, सुख, आनंद की किरणें जब सर्व आत्माओं तक पहुंचेंगी तब कहेंगे मास्टर ज्ञान सूर्य।

स्लोगन:- दिव्य जन्मधारी ब्राह्मण वह है जो अपने बोल, संकल्प और कर्म से दिव्यता का अनुभव कराये।
 

Tuesday, 13 February 2018

Hindi Murli 14/02/18

14-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - श्री श्री की श्रेष्ठ मत पर चलने से ही तुम नर से श्री नारायण बनेंगे, निश्चय में ही विजय है''

प्रश्न: ईश्वर की डायरेक्ट रचना में कौन सी विशेषता अवश्य होनी चाहिए?
उत्तर: सदा हर्षित रहने की। ईश्वर की रचना के मुख से सदैव ज्ञान रत्न निकलते रहें। चलन बड़ी रॉयल चाहिए। बाप का नाम बदनाम करने वाली चलन न हो। रोना, लड़ना-झगड़ना, उल्टा सुल्टा खाना... यह ईश्वरीय सन्तान के लक्षण नहीं। ईश्वर की सन्तान कहलाने वाले अगर रोते हैं, कोई अकर्तव्य करते हैं, तो बाप की इज्जत गँवाते हैं इसलिए बच्चों को बहुत-बहुत सम्भाल करनी है। सदा ईश्वरीय नशे में हर्षितमुख रहना है।
ओम् शान्ति। बच्चों का मुखड़ा देखना पड़ता है। यह कोई साधू सन्त नहीं, बापदादा और बच्चे हैं। इसको कहा जाता है ईश्वरीय कुटुम्ब परिवार। ईश्वर यानी परमपिता, जिनका बच्चा है यह ब्रह्मा, फिर तुम हो ब्रह्माकुमार कुमारियां। वह है वर्ल्ड का फादर। यूँ सारी दुनिया के तीन फादर तो होते ही हैं। एक निराकार बाप, दूसरा प्रजापिता ब्रह्मा, तीसरा फिर लौकिक बाप। परन्तु यह किसी को भी पता नहीं है। चित्र आदि भी बनाते हैं लेकिन जानते नहीं कि यह कब आये थे? शिव का भी चित्र है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी चित्र है। परन्तु वह क्या पार्ट बजाते हैं? उन्हों का नाम क्यों गाया जाता है.... यह कोई भी नहीं जानते। भल बहुत पढ़े हुए हैं, लाखों की संख्या लेक्चर सुनने जाती है। परन्तु तुम बच्चों के आगे जैसे कुछ भी नहीं जानते। बिल्कुल ही तुच्छ बुद्धि हैं। बाबा आकर तुमको स्वच्छ बुद्धि बनाते हैं। तुम सब कुछ जानते हो। ऊंच ते ऊंच बाप है। अब नई रचना रच रहे हैं। नई दुनिया में नई रचना चाहिए ना। गांधी जी भी कहते थे नई दुनिया, नया राज्य चाहिए। भारत ही है जिसमें एक राज्य सतयुग में होता है। सिर्फ सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण का राज्य होता है फिर चन्द्रवंशी का राज्य होता है तो सूर्यवंशी प्राय:लोप हो जाता है। फिर कहा जाता है चन्द्रवंशी राज्य। हाँ, वह जानते हैं कि लक्ष्मी-नारायण हो करके गये हैं। परन्तु कहलायेगा राम-सीता का राज्य। तो ब्रह्मा कोई क्रियेटर नहीं है। रचयिता एक बाप है। शिवबाबा रचता आते हैं, आकर बतलाते हैं कि मैं कैसे नई रचना रच रहा हूँ। ब्रह्मा द्वारा तुम ब्राह्मणों को रच रहा हूँ। तो बाप से जरूर वर्सा मिलना चाहिए। यह थोड़ी सी बात भी कोई समझ जाए तो 21 जन्मों के लिए अहो सौभाग्य। कभी भी दु:खी वा विधवा नहीं होंगे। यह किसकी बुद्धि में पूरा नशा ही नहीं है। है बहुत सहज।

गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ... 
ओम् शान्ति। तुम आते हो इस पाठशाला में, किसकी पाठशाला है? श्रीमत भगवत की पाठशाला। फिर उनका नाम गीता रख दिया है। श्रीमत श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ परमात्मा की है, वह अपने बच्चों को श्रेष्ठ मत दे रहे हैं। आगे तो तुम रावण की आसुरी मत पर चलते आये हो। अब ईश्वर बाप की मत मिलती है। मैं सिर्फ तुम्हारा बाप नहीं हूँ। तुम्हारा बाप भी हूँ, टीचर भी हूँ, सतगुरू भी हूँ। जो हमारे बनते हैं, कहते हैं शिवबाबा ब्रह्मा मुख द्वारा हम आपके बन गये। प्रतिज्ञा करते हैं मैं आपकी हूँ, आपकी ही रहूँगी। बाबा भी कहते हैं तुम हमारे हो। अब मेरी मत पर चलना। श्रीमत पर चलने से तुम सो श्रेष्ठ लक्ष्मी-नारायण बन जायेंगे। गैरन्टी है। कल्प पहले भी तुमको नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनाया था। ऐसा कोई मनुष्य कह न सके। किसको कहने आयेगा नहीं। यह बाप ही कहते हैं मेरे बच्चे मैं तुमको राजयोग सिखलाकर फिर से स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। सतयुग है अल्लाह की दुनिया। भगवती, भगवान को अल्लाह कहेंगे। इस समय सब उल्टे लटके हुए हैं। चील आकर टूँगा लगाती है ना। यहाँ भी माया टूँगा लगा देती है। दु:खी होते रहते हैं। अभी बाप कहते हैं तुमको इन दु:खों से, विषय सागर से क्षीर सागर में ले चलते हैं। अब क्षीरसागर तो कोई है नहीं। कह देते हैं विष्णु सूक्ष्मवतन में क्षीरसागर में रहते हैं। यह अक्षर महिमा के हैं। अब मैं ज्ञान सागर तुम बच्चों को स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। तुम काम चिता पर बैठने से जलकर काले बन जाते हो, मैं आकर तुम पर ज्ञान वर्षा करता हूँ, जिससे तुम गोरे बन जाते हो। शास्त्रों में यह अक्षर हैं, सगर राजा के बच्चे जल मरे थे। बातें तो बहुत बना दी हैं। अभी बाप कहते हैं यह सब बातें बुद्धि से निकालो। अब मेरी सुनो। संशयबुद्धि विनश्यन्ती। अब मुझ पर निश्चय रखो तो निश्चयबुद्धि विजयन्ती। विजय माला के दाने बन जायेंगे। माला का राज़ भी समझाया है। जो अच्छी सर्विस करते हैं उनकी विजय माला बनती है। सबसे अच्छी सर्विस करने वाले दाने रूद्र माला में आगे जाते हैं। फिर विष्णु की माला में आगे जायेंगे। नम्बरवार 108, फिर 16000 की भी माला एड करो। ऐसे नहीं सतयुग त्रेता में सिर्फ 108 ही प्रिन्स-प्रिन्सेज होंगे। वृद्धि होते माला बढ़ती जाती है। प्रजा की वृद्धि होगी तो जरूर प्रिन्स-प्रिन्सेज की भी वृद्धि होगी। बाप कहते हैं कुछ भी नहीं समझो तो पूछो। हे मेरे लाडले बच्चे मुझे जानने से तुम सृष्टि झाड़ को जान जायेंगे। यह झाड़ कब पुराना नहीं होता है। भक्तिमार्ग कब शुरू होता है - यह तुम जानते हो। यह है कल्प वृक्ष। नीचे कामधेनु बैठी है। जरूर उनका बाप भी होगा। अभी तुम भी कल्प वृक्ष के तले में बैठे हो, फिर तुम्हारा नया झाड़ शुरू हो जायेगा। प्रजा तो लाखों की अन्दाज में बन गई और बनती जायेगी। बाकी राजा बनना यह जरा मुश्किल है। इसमें भी साधारण, गरीब उठते हैं।
बाबा कहते हैं गरीब-निवाज़ मैं हूँ। दान भी गरीब को किया जाता है। अहिल्यायें, कुब्जायें, पाप आत्मायें जो हैं, ऐसे-ऐसे को मैं आकर वरदान देता हूँ। तुम एकदम सन्यासियों को भी बैठ ज्ञान देंगे। ब्राह्मण बनने बिगर देवता कोई भी बन न सकें। जो देवता वर्ण के थे, वह ब्राह्मण वर्ण में आयें, तब फिर देवता वर्ण में जा सकें। तुम मात पिता... गाते तो सब हैं परन्तु अब तुम प्रैक्टिकल में हो। यह है ब्राह्मणों की नई रचना। ऊंच ते ऊंच चोटी ब्राह्मण, ऊंच ते ऊंच भगवान फिर ईश्वरीय सम्प्रदाय। तो तुमको इतना नशा रहना चाहिए। हम ईश्वर के पोत्रे-पोत्रियां प्रजापिता के बच्चे हैं। अब ईश्वर के बच्चे तो सदैव हर्षित रहने चाहिए। कभी रोना नहीं चाहिए। यहाँ बहुत ब्रह्माकुमार कुमारियां कहलाने वाले भी रोते हैं। खास कुमारियां। पुरुष रोते नहीं हैं। तो रोने वाले नाम बदनाम कर देते हैं। वह माया के मुरीद देखने में आते हैं। शिवबाबा के मुरीद नहीं देखने में आते। बाबा अन्दर में तो समझते हैं परन्तु बाहर से थोड़ेही दिखलायेंगे। नहीं तो और ही गिर पड़ें। बाबा कहते अपनी सम्भाल करो। सतगुरू की निन्दा कराने वाला कभी ठौर नहीं पायेगा। वह समझ लेवे हम राजगद्दी कभी नहीं पायेंगे। तुम्हें तो सदैव हर्षित रहना चाहिए। जब तुम यहाँ हर्षित रहेंगे तब 21 जन्म हर्षित रहेंगे। भाषण करना कोई बड़ी बात नहीं, वह तो बहुत सहज है। कृष्ण जैसा बनना है। तो अभी सदा हर्षितमुख रहो और मुख से रत्न निकलते रहें। मुझ आत्मा को परमपिता परमात्मा का धन मिला है, जो मुझ आत्मा में धारण होता है, सो मैं अपने मुख से दान करता जाता हूँ। जैसे बाबा शरीर का लोन ले दान करते रहते हैं, ऐसी अवस्था चाहिए। बाबा बाहर से भल प्यार देते हैं, परन्तु देखते हैं इनकी चलन बदनामी करने वाली है तो दिल में रहता है यह ठौर नहीं पा सकेंगे। बाबा को उल्हनें भी मिलते हैं ईश्वरीय सन्तान फिर रोते क्यों? आबरू (इज्जत) तो यहाँ ईश्वर की जायेगी ना। रोते हैं, झगड़ते हैं। उल्टा सुल्टा खाते हैं। देवतायें रोते तो भी और बात, यह तो डायरेक्ट ईश्वर की सन्तान रोते हैं तो क्या गति होगी! ऐसा अकर्तव्य कार्य नहीं होना चाहिए, जो बाप की आबरू गँवाओ। हर बात में सम्भाल चाहिए।
तुमको ईश्वर पढ़ाते हैं। इस समय तो जितने मनुष्य उतनी मतें हैं - एक न मिले दूसरे से। तो बाप समझाते हैं यहाँ तुम बैठे हो अपनी ऊंच ते ऊंच तकदीर बनाने। ऊंच तकदीर सिवाए परमात्मा के और कोई बना न सके। सतयुगी सृष्टि के आदि में हैं लक्ष्मी-नारायण। वह तो भगवान ही रचते हैं। उसने लक्ष्मी-नारायण को राज्य कैसे दिया? यथा राजा रानी तथा प्रजा कैसे हुई, यह कोई नहीं जानते। बाबा समझाते हैं कल्प के संगमयुग पर ही मैं आकर लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन करता हूँ। बाबा कहते हैं तुमको राजतिलक दे रहा हूँ। मैं स्वर्ग का रचयिता तुमको राजतिलक नहीं दूँगा तो कौन देगा? कहते हैं ना तुलसीदास चन्दन घिसें.. यह बात यहाँ की है। वास्तव में राम शिवबाबा है। चन्दन घिसने की बात नहीं है। अन्दर बुद्धि से बाप को और वर्से को याद करो। मायापुरी को भूलो, इनमें अथाह दु:ख हैं। यह कब्रिस्तान है। मीठे बाबा और मीठे सुखधाम को याद करो। यह दुनिया तो खत्म होनी है। विदेशों में तो बाम्ब्स आदि गिरायेंगे तो सब मकान गिर जायेंगे, सबको मरना है। किचड़पट्टी खलास होनी है। देवतायें किचड़पट्टी में नहीं रहते हैं। लक्ष्मी का आह्वान करते हैं तो सफाई आदि करते हैं ना। अब लक्ष्मी-नारायण आयेंगे तो सारी सृष्टि साफ हो जायेगी और सब खण्ड खत्म हो जायेंगे, फिर देवतायें आयेंगे। वह आकर अपने महल बनायेंगे। बाम्बे इतनी थी नहीं। गांवड़ा था। अब देखो क्या बन गया है तो फिर ऐसा होगा और खण्ड नहीं रहेंगे। सतयुग में खारे पानी पर गांव नहीं होते हैं। मीठी नदियों पर होते हैं। फिर धीरे-धीरे वृद्धि को पाते हैं। मद्रास आदि होते नहीं। वृन्दावन, गोकुल आदि नदियों पर रहते हैं, वैकुण्ठ के महल वहाँ दिखाते हैं। तुम जानते हो हम यहाँ आये हैं नर से नारायण बनने। सिर्फ मनुष्य से देवता भी नहीं कहो। देवताओं की तो राजधानी है ना। हम आये हैं राज्य लेने। इसको कहा ही जाता है राजयोग। यह कोई प्रजा योग नहीं है। हम पुरुषार्थ करके बाप से सूर्यवंशी राज्य लेंगे। बच्चों से रोज़ पूछना चाहिए कि कोई भूलचूक तो नहीं की? किसको दु:ख तो नहीं दिया? डिस-सर्विस तो नहीं की? थोड़ी सर्विस में थक नहीं जाना चाहिए। पूछना चाहिए सारा दिन क्या किया? झूठ बोलेंगे तो गिर पड़ेंगे। शिवबाबा से कुछ छिप न सके। ऐसा मत समझना - कौन देखता है? शिवबाबा तो झट जान जायेगा। मुफ्त अपनी सत्यानाश करेंगे। सच बताना चाहिए, तब ही सतयुग में नाच करते रहेंगे। सच तो बिठो नच.. खुशी में बहुत हर्षित मुख रहना चाहिए। देखो स्त्री पुरुष हैं। एक के सौभाग्य में स्वर्ग की बादशाही हो, दूसरे के भाग्य में नहीं भी हो सकती है। कोई का सौभाग्य है जो दोनों हथियाला बांधते, हम ज्ञान चिता पर बैठ इकट्ठे जायेंगे।

तुम बच्चे जगदम्बा माँ की बायोग्राफी को जानते हो और कोई 84 जन्म मानेंगे नहीं। उनको भुजायें बहुत दे दी हैं। तो मनुष्य समझेंगे यह तो देवता है, जन्म-मरण रहित है। अरे चित्र तो मनुष्य का है ना। इतनी बाहें तो होती नहीं। विष्णु को भी 4 भुजायें दिखाते हैं - प्रवृत्ति को सिद्ध करने के लिए। यहाँ तो दो भुजायें ही होती हैं। मनुष्यों ने फिर नारायण को 4 भुजा, लक्ष्मी को दो भुजायें दी हैं। कहाँ फिर लक्ष्मी को 4 भुजायें दी हैं। नारायण को सांवरा, लक्ष्मी को गोरा बना दिया है। कारण का कुछ भी पता नहीं पड़ता। तुम अभी जानते हो - देवतायें जो गोरे थे, द्वापर में आकर जब काम चिता पर बैठते हैं तो आत्मा काली बन जाती है। फिर बाप आकर उन्हें काले से गोरा बनाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।


धारणा के लिए मुख्य सार:
1) मीठे बाबा और मीठे सुखधाम को याद करना है। इस मायापुरी को बुद्धि से भूल जाना है।
2) सर्विस में कभी थकना नहीं है। विजय माला में आने के लिए अथक हो सर्विस करनी है। शिवबाबा से सच्चा रहना है। कोई भूल-चूक नहीं करनी है। किसी को दु:ख नहीं देना है।

वरदान: एक शमा के पीछे परवाने बन फिदा होने वाले कोटों में कोई श्रेष्ठ आत्मा भव
सारे विश्व के अन्दर हम कोटों में कोई, कोई में भी कोई श्रेष्ठ आत्मायें हैं, जिन्होंने स्वयं अनुभव करके यह महसूस किया है, कि हम कल्प पहले वाली वही श्रेष्ठ आत्मायें हैं, जिन्होंने स्वयं को बाप शमा के पीछे फिदा किया है। हम चक्र लगाने वाले नहीं, परवाने बन फिदा होने वाले हैं। फिदा होना अर्थात् मर जाना। तो ऐसे जल मरने वाले परवाने हो ना! जलना ही बाप का बनना है, जलना अर्थात् सम्पूर्ण परिवर्तन होना।

स्लोगन: बाबा के मिलन की और सर्व प्राप्तियों की मौज में रहना ही संगमयुग की विशेषता है।
 

Hindi Murli 13/02/18

13-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - अभी यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है, खेल पूरा होता है इसलिए पावन बन घर जाना है, फिर सतयुग से हिस्ट्री रिपीट होगी''

प्रश्न: घरबार सम्भालते हुए कौन सी कमाल तुम बच्चे ही कर सकते हो?
उत्तर: घरबार सम्भालते, पुरानी दुनिया में रहते सभी से ममत्व मिटा देना। देह सहित जो भी पुरानी चीजें हैं उन्हें भूल जाना... यह है तुम बच्चों की कमाल, इसे ही सतोप्रधान सन्यास कहा जाता है, जो बाप ही तुम्हें सिखलाते हैं। तुम बच्चे इस अन्तिम जन्म में पवित्र रहने की प्रतिज्ञा करते हो फिर 21 जन्म के लिए यह पवित्रता कायम हो जाती है। ऐसी कमाल और कोई कर नहीं सकता।

गीत:- तुम्हीं हो माता पिता...

ओम् शान्ति। बच्चों को ओम् शान्ति का अर्थ बिल्कुल सहज समझाया जाता है। हर एक बात सहज है। सहज राजाई प्राप्त करते हैं। कहाँ के लिए? सतयुग के लिए। उनको जीवनमुक्ति कहा जाता है। वहाँ रावण के यह भूत होते नहीं। कोई को क्रोध आता है तो कहा जाता है तुम्हारे में यह भूत है। अच्छा बच्चों को समझाया है ओम् का अर्थ है मैं आत्मा फिर मेरा शरीर। हर एक के शरीर रूपी रथ में आत्मा रथी बैठी हुई है। आत्मा की ताकत से यह रथ चलता है। आत्मा को यह शरीर घड़ी-घड़ी लेना और छोड़ना पड़ता है। यह तो बच्चे जानते हैं भारत अभी दु:खधाम है। आधाकल्प पहले सुखधाम था। आलमाइटी गवर्मेन्ट थी क्योंकि आलमाइटी अथॉरिटी ने भारत में देवताओं के राज्य की स्थापना की। वहाँ एक धर्म था। आज से 5 हजार वर्ष पहले बरोबर लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वह राज्य स्थापन करने वाला जरूर बाप होगा। बाप से उनको वर्सा मिला हुआ है। उन्हों की आत्मा ने 84 जन्मों का चक्र लगाया है, भारतवासी ही इन वर्णों में आते हैं। अभी हैं शूद्र वर्ण में। शूद्र वर्ण के बाद सर्वोत्तम ब्राह्मण वर्ण आता है। ब्राह्मण वर्ण माना ब्रह्मा के मुख वंशावली हैं। प्रजापिता ब्रह्मा के जरूर एडाप्टेड बच्चे होंगे। बच्चे जानते हैं कि भारत पूज्य था, अब पुजारी है। बाप तो सदैव पूज्य है। वह आते जरूर हैं - पतितों को पावन बनाने। सतयुग है पावन दुनिया। सतयुग में पतित-पावनी गंगा, यह नाम ही नहीं होगा क्योंकि वह है ही पावन दुनिया। सभी पुण्य आत्मायें हैं। नो पापात्मा। कलियुग में फिर नो पुण्यात्मा। सब पाप आत्मायें हैं। पुण्य आत्मा पवित्र को कहा जाता है। भारत में ही बहुत दान-पुण्य करते हैं। इस समय जब बाप आते हैं तो उनके ऊपर बलि चढ़ते हैं। सन्यासी तो घरबार छोड़ जाते हैं। यहाँ तो कहते हैं बाबा यह सब कुछ आपका है। आपने सतयुग में हमें अथाह धन दिया था। फिर माया ने कौड़ी जैसा बना दिया है। अब यह आत्मा भी पतित हो गई है। तन-मन-धन सब पतित है। आत्मा पहले-पहले पवित्र रहती है फिर पार्ट बजाते-बजाते पतित बन जाती है। गोल्डन, सिल्वर... इन स्टेज़ेस में मनुष्य को आना है जरूर। सारा चक्र लगाकर पिछाड़ी में तमोप्रधान झूठा जेवर बनना है। सब आत्मायें ईश्वर के लिए झूठ बोलती रहती हैं क्योंकि उनको सिखाया गया है, ईश्वर सर्वव्यापी है। गाते भी हैं तुम मात-पिता... लक्ष्मी-नारायण के आगे भी जाकर यह महिमा करते हैं। परन्तु उनको तो अपना एक बच्चा एक बच्ची होता है। जैसा सुख राजा रानी को वैसा सुख बच्चों को रहता है। सबको सुख घनेरे हैं। अभी तो वह 84 वें अन्तिम जन्म में हैं। दु:ख घनेरे हैं।
बाप कहते हैं अब फिर से तुमको राजयोग सिखलाता हूँ। बच्चों को समझाया है कि इस रथ में रथी आत्मा बैठा हुआ है। यह रथी पहले 16 कला सम्पूर्ण था। अब नो कला। कहते भी हैं - मुझ निर्गुण हारे में अब कोई गुण नाही। आपेही तरस परोई... अर्थात् रहम करो। कोई में भी गुण नहीं हैं। बिल्कुल दु:खी, पतित हैं तब तो गंगा में पावन होने जाते हैं। सतयुग में नहीं जाते। नदी तो वही है ना। बाकी हाँ, ऐसे कहेंगे इस समय हर चीज़ तमोप्रधान है। सतयुग में नदियां भी बड़ी साफ स्वच्छ होंगी। नदियों में किचड़ा कुछ भी नहीं पड़ता। यहाँ तो देखो किचड़ा पड़ता रहता है। सागर में सारा गंद जाता है। सतयुग में ऐसा हो नहीं सकता। लॉ नहीं है। सब चीजें पवित्र रहती हैं। तो बाप समझाते हैं अभी सबका यह अन्तिम जन्म है। खेल पूरा होता है। इस खेल की लिमिट ही है 5 हजार वर्ष। यह निराकार शिवबाबा समझाते हैं। वह है निराकार सबसे ऊंच परमधाम में रहने वाला। परमधाम से तो हम सब आये हैं। अभी कलियुग अन्त में ड्रामा पूरा हो फिर से हिस्ट्री रिपीट होती है। मनुष्य जो भी गीता आदि शास्त्र पढ़ते आये हैं, वह बनते हैं द्वापर में। यह ज्ञान तो प्राय:लोप हो जाता है। कोई राजयोग सिखला न सके। उन्हों के यादगार लिए पुस्तक बनाते हैं। वह खुद तो पुनर्जन्म में आने लगे। उनके यादगार पुस्तक रहने लगे। अब देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है संगम पर। बाप आकर इस रथ में विराजमान होते हैं। घोड़े गाड़ी की बात नहीं है। इस रथ में, साधारण बूढ़े तन में प्रवेश करते हैं। वह है रथी। गाया भी जाता है ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचे। यह हैं मुख वंशावली ब्राह्मण। सब बच्चे कहते हैं हम ब्रह्मा की मुख वंशावली बी.के. हैं। यह ब्रह्मा भी एडाप्ट किया हुआ है। बाप खुद कहते हैं मैं इस रथ का रथी बनता हूँ, इसको ज्ञान देता हूँ। शुरू इनसे करता हूँ। कलष देता हूँ माताओं को। माता तो यह भी ठहरी ना। पहले-पहले यह बनते हैं फिर तुम। इनमें तो वह विराजमान हैं, परन्तु सामने किसको सुनायें। फिर आत्माओं से बैठ बात करते हैं। और कोई विद्वान आदि नहीं होगा जो ऐसे आत्माओं से बैठ बात करे कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। तुम आत्मायें निराकार हो। मैं भी निराकार हूँ। मैं ज्ञान सागर स्वर्ग का रचयिता हूँ। मैं नर्क नहीं रचता हूँ। यह तो रावण माया नर्क बनाती है। बाप कहते हैं मैं तो हूँ ही रचयिता तो जरूर स्वर्ग ही बनाऊंगा। तुम भारतवासी, स्वर्गवासी थे अब नर्कवासी बने हो। नर्कवासी बनाया रावण ने क्योंकि आत्मा रावण की मत पर चलती है। इस समय तुम आत्मायें राम शिवबाबा, श्री-श्री की श्रीमत पर चलते हो।
बाप समझाते हैं अब सबका पार्ट पूरा हुआ है, सब आत्मायें इकट्ठी होंगी। जब सब आ जायेंगे तब फिर जाना शुरू होगा। फिर विनाश शुरू हो जायेगा। भारत में अब अनेक धर्म हैं। सिर्फ एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं। कोई भी अपने को देवता नहीं कहते। देवताओं की महिमा भी गाई है सर्वगुण सम्पन्न..... फिर अपने को कहेंगे हम नींच पापी.. जो सतोप्रधान पूज्य थे, वह तमोप्रधान पुजारी बन पड़ते हैं। द्वापर से रावण का राज्य शुरू होता है। रामराज्य है ब्रह्मा का दिन, रावण राज्य है ब्रह्मा की रात। अब बाप कब आये? जब ब्रह्मा की रात पूरी हो तब तो आये ना। और इसी ब्रह्मा के तन में आये तब तो ब्रह्मा से ब्राह्मण पैदा हों। उन ब्राह्मणों को राजयोग सिखलाते हैं। बाप कहते हैं जो भी आकारी वा साकारी या निराकारी चित्र हों उनको तुम्हें याद नहीं करना है। तुमको तो लक्ष्य दिया जाता है, मनुष्य तो चित्र देख याद करते हैं। बाबा कहते हैं चित्रों को देखना बन्द करो। यह है भक्तिमार्ग। अभी तो तुम आत्माओं को वापिस मेरे पास आना है। पापों का बोझा सिर पर बहुत है। ऐसे नहीं, गर्भ जेल में हर जन्म के पाप खत्म हो जाते हैं। कुछ खत्म हो जाते हैं, कुछ रहते हैं। अब मैं पण्डा बनकर आया हूँ। इस समय सब आत्मायें माया की मत पर चलती हैं। परमात्मा सर्वव्यापी कहना यह माया की मत है। कभी कहते सर्वव्यापी है, कभी कहते 24 अवतार लेते हैं। बाप कहते हैं मैं सर्वव्यापी कहाँ हूँ। मैं तो हूँ ही पतित-पावन, स्वर्ग का रचयिता। मेरा धंधा ही है नर्क को स्वर्ग बनाना। गांधी चाहते थे - रामराज्य हो। अभी कहते हैं - आलमाइटी राज्य हो। वन रिलीजन हो। स्वर्ग में तो है ही एक धर्म, एक राज्य। वहाँ कोई पार्टीशन नहीं था। बाप कहते हैं मैं युनिवर्स का मालिक नहीं बनता हूँ। तुमको बनाता हूँ। फिर रावण आकर तुमसे राज्य छीनता है। अभी हैं सब तमोप्रधान, पत्थरबुद्धि। सतयुग में हैं पारसबुद्धि। यह बाप समझाते हैं, रथी बैठे हैं। आत्मा ही बात करती है तो इनकी आत्मा भी सुनती है। कहते हैं बच्चे कोई भी चित्र को नहीं देखो। मामेकम् याद करो, बुद्धियोग ऊपर लटकाओ। जहाँ जाना है उनको ही याद करना है। एक बाप बस दूसरा न कोई। वही सच्चा पातशाह है, सच सुनाने वाला। तो तुम्हें कोई भी चित्रों का सिमरण नहीं करना है। यह शिव का जो चित्र है उनका भी ध्यान नहीं करना है क्योंकि शिव ऐसा तो है नहीं। जैसे हम आत्मा हैं वैसे वह परम आत्मा है। जैसे आत्मा भ्रकुटी के बीच में रहती है वैसे बाबा भी कहते थोड़ी जगह आत्मा के बाजू में ले बैठ जाता हूँ। रथी बन इनको बैठ ज्ञान देता हूँ। इनकी आत्मा में ज्ञान नहीं था, पतित थी। जैसे इनकी आत्मा रथी बोलती है शरीर से। वैसे मैं भी इन आरगन्स से बोलता हूँ। नहीं तो कैसे समझाऊं। ब्राह्मण रचने लिए ब्रह्मा जरूर चाहिए। जो ब्रह्मा फिर नारायण बनेगा। अभी तुम ब्रह्मा की औलाद हो। फिर सूर्यवंशी श्री नारायण के घराने में आ जायेंगे। बच्चों को समझाया है यह शास्त्र आदि सब भक्तिमार्ग के हैं, फिर भी यही बनेंगे। जो पढ़ते-पढ़ते तमोप्रधान बन जाते हैं। सतयुग से त्रेता हुआ। त्रेता से द्वापर, कलियुग हुआ। पतित बनें तब तो पतित-पावन आकर पावन बनायेंगे ना। शास्त्र किसको पावन बना न सकें। अभी तो बिल्कुल ही कंगाल बन पड़े हैं। लड़ते झगड़ते रहते हैं। बन्दर से भी बदतर हैं। बन्दर में 5 विकार बहुत कड़े होते हैं। देह अहंकार भी बन्दर जैसा और कोई में नहीं होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह सब विकार बन्दर में ऐसे होते हैं, बात मत पूछो। बच्चा मरेगा तो उनकी हड्डियों को भी छोड़ेंगे नहीं। मनुष्य भी आजकल ऐसे हैं। बच्चा मरा तो 6-8 मास रोते रहेंगे। सतयुग में तो अकाले मृत्यु होता नहीं। न कोई रोते पीटते। वहाँ कोई शैतान होते नहीं। बाप इस समय बच्चों से बात कर रहे हैं। भल घरबार भी सम्भालो, उसमें रहते हुए ऐसे कमाल कर दिखाओ, जो सन्यासी कर न सकें। यह सतोप्रधान सन्यास परमात्मा ही सिखलाते हैं। कहते हैं यह पुरानी दुनिया अब खत्म होती है, इसलिए इनसे ममत्व मिटाओ। सबको वापिस आना है। देह सहित जो भी पुरानी चीजें हैं उनको भूल जाओ। यह 5 विकार मुझे दे दो। अगर अपवित्र बनेंगे तो पवित्र दुनिया में आ नहीं सकेंगे। बाप से प्रतिज्ञा करो, इस अन्तिम जन्म के लिए। फिर तो पवित्रता कायम हो ही जायेगी, 63 जन्म तुम विकारों में गोते खाकर एकदम गन्दे बन पड़े हो। अपने धर्म, कर्म को भूल गये हो। हिन्दू धर्म कहते रहते हो। बाप कहते हैं तुम तो बेसमझ बन गये हो, क्यों नहीं समझते हो भारत स्वर्ग था, हम ही देवता थे। मैंने तुमको राजयोग सिखाया। तुम फिर कहते हो कृष्ण सभी का बाप स्वर्ग का रचयिता है। बाप तो निराकार सब आत्माओं का बाप है। फिर उनके लिए कहते हो कि सर्वव्यापी है। तुम अपने बाप को गाली देते हो। शिव शंकर को मिला दिया है, कितनी ग्लानि कर दी है। शिव तो है परमात्मा। कहते हैं मैं आता ही हूँ देवी-देवता धर्म स्थापन करने। फिर विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण राज्य करेंगे। सचखण्ड स्थापन करने वाला एक ही सतगुरू है। वह इस रथ में रथी हैं। इसे नंदीगण भी कहते हैं, भागीरथ भी कहते हैं। तुम अर्जुनों को कहते हैं मैं इस रथ में आया हूँ, युद्ध के मैदान में तुमको माया पर जीत पहनाने। सतयुग में न रावण होता, न जलाते। अभी तो रावण को जलाते ही रहेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कोई भी चित्र का सिमरण नहीं करना है। विचित्र बाप को बुद्धि से याद करना है। बुद्धि योग ऊपर लटकाना है।
2) वापस घर चलना है इसलिए देह सहित सब पुरानी चीजों से ममत्व निकाल देना है। सम्पूर्ण पावन बनना है।

वरदान: संस्कार मिटाने और मिलाने में एवररेडी रहने वाले रूहानी सेवाधारी भव
जैसे स्थूल सेवा में सदा एवररेडी रहते हो, जहाँ बुलावा होता है वहाँ पहुंच जाते हो। ऐसे मन्सा से भी जो संकल्प धारण करने चाहो उसमें भी एवररेडी रहो। जो सोचो उसी समय वह करो। रूहानी सेवाधारी बच्चे रूहानी संबंध और सम्पर्क निभाने में एवररेडी। उन्हें संस्कार मिटाने वा संस्कार मिलाने में टाइम नहीं लगता। जैसे बाप के संस्कार वैसे आप के भी संस्कार हो। यह संस्कार मिलाना बड़े से बड़ी रास है।

स्लोगन: प्योरिटी की रॉयल्टी का अनुभव करना और कराना ही रॉयल आत्मा की निशानी है।
  

Sunday, 11 February 2018

Hindi Murli 12/02/18

12-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - तुम्हारा फ़र्ज है एक दो को बाप और वर्से की याद दिलाकर सावधान करना, इसमें ही सबका कल्याण समाया हुआ है''

प्रश्न: तुम बच्चे किस एक गुह्य राज़ को समझते हो जो कोई साइन्सदान भी नहीं समझ सकते?
उत्तर: तुम समझते हो कि आत्मा अति सूक्ष्म स्टार है, उसमें ही सब संस्कार भरे हुए हैं। वही शरीर द्वारा अपना-अपना पार्ट बजा रही है। शरीर जड़ है, आत्मा चैतन्य है। ऐसे ही फिर परमात्मा भी स्टार है, उसमें सारी नॉलेज है। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सत है, चैतन्य है। वह कोई हजारों सूर्यों से तेजोमय नहीं है। यह गुह्य राज़ तुम बच्चे समझते हो। साइन्सदान इन बातों को नहीं समझ सकते। तुम्हें सबको आत्मा और परमात्मा की पहचान पहले-पहले देनी है।

गीत:- माता ओ माता तू सबकी भाग्य विधाता..
ओम् शान्ति। बाप बच्चों प्रति कहे कि बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी भव। यह बाप ने बच्चों को सावधानी दी। बच्चों को भी एक दो को सावधानी देनी है। बाप को याद करने से झट वह नशा चढ़ जाता है। स्मृति दिलाने के लिए एक दो को सावधान करना है। जैसे आपस में मिलते हैं तो नमस्ते आदि करते हैं ना। परन्तु उनसे कोई कल्याण नहीं होता है। कल्याण तब होगा जब तुम बच्चे एक दो को सावधानी देंगे। स्वदर्शन चक्रधारी अक्षर में सब कुछ आ जाता है। बाप का परिचय, मर्तबे का परिचय, चक्र का भी परिचय आ गया। तो एक दो को सावधानी देना पहला फ़र्ज है। याद कराने से खबरदार हो जायेंगे। घड़ी-घड़ी एक दो को सावधान करना है। बाप और वर्से को याद करते रहो। स्वदर्शन चक्रधारी हो, अपने को अशरीरी समझ, अशरीरी बाप को याद करते हो। याद अर्थात् योग। योग से ही तुम्हारी निरोगी काया बनती है। यह अभी का पुरुषार्थ है। अन्त में जब एकदम कर्मातीत अवस्था हो जायेगी तब निरोगी बनेंगे। अभी तो पुरुषार्थी हैं। अभी बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं क्योंकि जानते हैं सभी बेसमझ हैं। जब देवताओं आदि की पूजा करते हैं, उन्हों के आक्यूपेशन का कोई को पता नहीं है, तो तुमको समझाना है - हम सबकी बायोग्राफी बता सकते हैं। पहले तो मुख्य परमपिता परमात्मा को जानना है। उसमें भी बहुत मनुष्य मूँझते हैं। कहते हैं परमात्मा का कोई नाम रूप नहीं है। तो पहली-पहली मुख्य बात है आत्मा परमात्मा का भेद और ज्ञान बताना। यह तो जानते हैं सब आत्मा हैं। पुण्य आत्मा, पाप आत्मा कहा जाता है। पाप परमात्मा नहीं कहेंगे। पतित दुनिया है ना। परमात्मा तो पतित नहीं होता, इसलिए मनुष्य को पहले-पहले आत्मा को जानना है क्योंकि आत्मा का ज्ञान कोई भी मनुष्य में नहीं है। आत्मा ही सुनती है, आत्मायें खाती-पीती, सब कुछ करती हैं इन आरगन्स द्वारा। आत्मा का रूप क्या है? कहते हैं चमकता है भ्रकुटी के बीज में अजब सितारा। तो आत्मा का रूप समझाना पड़े ना। आत्मा का रूप कोई इतना बड़ा तो नहीं है। आत्मा अति सूक्ष्म है। आत्मा का रूप है जीरो अथवा बुरी (बिन्दी) भी कहते हैं। अब इस पर भी विचार करना चाहिए कि आत्मा कितनी सूक्ष्म है। मनुष्य पूछते हैं आत्मा शरीर से कैसे निकलती है? कहाँ से निकलती है? कोई कहते हैं कि खोपड़ी से निकलती, कोई कहते आंखों से निकलती.... क्योंकि दरवाजे तो बहुत हैं ना। परन्तु आत्मा है क्या चीज़, यह जानना बड़ा वन्डरफुल है। तो पूछते हैं आत्मा निकलती कैसे है, यह नहीं कहते आत्मा आती कैसे है। परन्तु पहले तो मालूम होना चाहिए कि आत्मा क्या चीज़ है। कितनी छोटी सी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। यह बातें मोस्ट वण्डरफुल हैं। आत्मा है तो बरोबर स्टार मुआफिक। उसको बड़ा नहीं कहेंगे। एरोप्लेन ऊपर जाने से बहुत छोटा दिखाई पड़ता है। परन्तु आत्मा बड़ी नहीं होती। उनका तो एक ही रूप है। तो पहले-पहले आत्मा को जानना चाहिए। मैं आत्मा कैसे इस शरीर में प्रवेश करता हूँ। भल कोई-कोई को साक्षात्कार होता है, जैसे स्टार है। उस छोटी सी आत्मा में सब नॉलेज भरी हुई है। आत्मा है एक ही। यह बड़ा वन्डर है। परमात्मा के रूप का भी किसको पता नहीं है। वास्तव में जैसी आत्मा है, वैसे ही परमपिता परमात्मा है। वह भी बाप है। भल यहाँ बाप और बच्चा छोटा बड़ा होता है, परन्तु आत्मा छोटी-बड़ी नहीं हो सकती। आत्मा और परमात्मा के रूप में कोई भेद नहीं है। बाकी दोनों के पार्ट में, संस्कारों में भेद है। बाप समझाते हैं मेरे में क्या संस्कार हैं। तुम आत्माओं में क्या संस्कार हैं? मनुष्य आत्मा और परमात्मा के रूप को न जानने कारण आत्मा-परमात्मा एक कह देते हैं। बड़ा घोटाला कर दिया है। जानना बहुत जरूरी है। परमात्मा भी है, ब्रह्मा विष्णु शंकर भी हैं, इन सबमें आत्मा है। जगत अम्बा सरस्वती को गॉडेज आफ नॉलेज कहते हैं। तो जरूर सरस्वती की आत्मा में नॉलेज होगी। परन्तु उनमें कौन सी नॉलेज है, यह कोई को पता नहीं है। सिर्फ कह देते हैं गॉडेज ऑफ नॉलेज। अखबारों में आर्टिकल्स आदि पड़ते हैं तो उस पर समझाना चाहिए। तुम कहते हो सरस्वती गॉडेज ऑफ नॉलेज परन्तु उसने कौन सी नॉलेज दी? कब दी? उनको जरूर गॉड से नॉलेज मिली होगी ना। गॉड का रूप क्या है? गॉडेज ऑफ नॉलेज यह नाम कैसे पड़ा? नॉलेजफुल तो गॉड है। उसने सरस्वती को नॉलेजफुल कैसे बनाया? एक ही बात पर किसको संगम पर खड़ा कर देना चाहिए।
बाबा कहते हैं हम समझाते हैं, बाकी लिखने के लिए तो संजय (जगदीश भाई निमित्त रहे) है। यह है नम्बरवन मुख्य एक्टर। यह तो बाबा के साथ राइटहैण्ड होना चाहिए। परन्तु ड्रामा की भावी ऐसी है जो इनको देहली में भी रहना होता है। कल्प पहले वाला पार्ट है। अर्जुन का नाम मुख्य गाया हुआ है। अब तुम बच्चे हर बात का अर्थ समझते हो। पहले-पहले तो आत्मा और परमात्मा को समझना है।
बाप ने बच्चों को समझाया है - आत्मा स्टार है। उसमें सारी नॉलेज कैसे भरी हुई है। यह कोई साइन्स-दान भी समझ नहीं सकेंगे। आत्मा में ही सब संस्कार रहते हैं। अब आत्मा तो स्टार है। अच्छा परमात्मा का रूप क्या है? वह भी परम आत्मा ही है। फ़र्क नहीं है। यह जो महिमा गाते हैं वह हजारों सूर्यों से तीखा है, ऐसा नहीं है। बाप कहते हैं सिर्फ तुम्हारी आत्मा में नॉलेज नहीं है, मैं परमात्मा नॉलेजफुल हूँ - बस यह फ़र्क है। माया ने तुम्हारी आत्मा को पतित बना दिया है। बाकी कोई दीवा नहीं है, बुझा हुआ। सिर्फ आत्मा से नॉलेज निकल गई है - बाप और रचना की। सो अब तुमको नॉलेज मिल रही है। बाबा में नॉलेज है, वह भी आत्मा है। कोई बड़ी नहीं है। उनको भी नॉलेजफुल, सरस्वती को भी नॉलेजफुल कहा जाता है। अब उनको नॉलेज कब मिली? सरस्वती किसकी बच्ची है? यह कोई जानते नहीं हैं। तो दिल में आना चाहिए, उन्हों को कैसे समझायें। बाप परमात्मा कौन है, वह भी समझाना है कि वह स्टार है, उसमें सारी नॉलेज है। गॉड फादर मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। सबका बेहद का बाप है। वह सत है, चैतन्य है, उनमें सच्ची नॉलेज है। उनको ट्रुथ भी कहते हैं। और कोई में सच्ची नॉलेज है नहीं। रचयिता एक बाप है। तो सारी रचना की नॉलेज भी उनमें ही है। झाड़ का बीजरूप है ना। आत्मा तो चैतन्य हैं। शरीर तो जड़ है। जब आत्मा आती है तब यह चैतन्य होता है। तो बाप समझाते हैं मैं भी वही हूँ। आत्मा छोटी बड़ी हो नहीं सकती। जैसे तुम आत्मा हो वैसे परम आत्मा यानी परमात्मा है, फिर उनकी महिमा सबसे ऊंच हैं। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। मनुष्य ही उनको याद करते हैं। यह तो जानते हैं बाप ऊपर में रहते हैं। आत्मा इन आरगन्स द्वारा कहती है हे परमपिता परमात्मा। मनुष्य यह नहीं जानते हैं क्योंकि देह-अभिमानी हैं। तुम अब देही-अभिमानी बने हो। अपने को आत्मा निश्चय करते हो। तुम जानते हो गॉड तो निराकार को ही कहा जाता है। हम उनकी सन्तान हैं। वह गॉड ही आकर नॉलेज देते हैं। उनको नॉलेजफुल, ब्लिसफुल कहा जाता है। रहम का सागर, सुख का सागर, शान्ति का सागर.. यह महिमा दी गई है। तो जरूर बाप से बच्चों को वर्सा मिलना है। उन्होंने कोई समय आकर वर्सा दिया है तब महिमा गाई जाती है। देवताओं की महिमा अलग है। बाप की महिमा अलग है। सब आत्माओं का वह बाप है। क्रियेटर होने के कारण उनको बीजरूप कहा जाता है। पहले-पहले बाप का परिचय देना है। शास्त्रों में दिखाते हैं - अंगुष्ठे मिसल है। हम कहते हैं वह ज्योर्तिबिन्दू है। चित्र भी बनाया है। परन्तु इतना बड़ा तो वह है नहीं। वह तो अति सूक्ष्म है। तो क्या समझायें? तुमको कहेंगे चित्र में इतना बड़ा रूप क्यों दिखाया है? बोलो नहीं तो क्या रखें। वह तो एक बिन्दी है फिर उनकी पूजा कैसे करेंगे? उन पर दूध कैसे चढ़ायेंगे? पूजा के लिए यह रूप बनाया हुआ है। बाकी यह समझते हैं कि वह है परमपिता परम आत्मा परमधाम में रहने वाले। वह परमधाम है हमारा स्वीट होम। निराकारी दुनिया, मूलवतन, सूक्ष्मवतन फिर स्थूलवतन। बाप निराकारी दुनिया में रहते हैं। आत्मा कहती है हम निर्वाणधाम में जावें। जहाँ यह आरगन्स न हों। आत्मा ही आकर शरीर धारण करती है। अब यह कैसे समझायें कि आत्मा कहाँ से जाती है। यह तो जानते हैं पिण्ड में आत्मा प्रवेश होने से चैतन्य बन जाती है। चीज़ कितनी सूक्ष्म है। उसी में सारे संस्कार भरे हुए हैं। फिर एक-एक जन्म के संस्कार प्रगट होते जायेंगे। तो बाप समझाते हैं हर एक बात को अच्छी रीति समझना है। सरस्वती की बात पर भी समझा सकते हैं। वह किसकी बच्ची है? इस समय तुमको तो गॉडेज कह न सकें। सरस्वती है ब्रह्मा की बेटी। तो जरूर वह भी गॉड आफ नॉलेज ठहरा। ब्रह्मा के मुख कमल से दिखाते हैं ज्ञान दिया। तो ब्रह्मा का भी नाम है ना। इस समय तुम हो ब्राह्मण। भल आत्मा प्योर होती जाती है परन्तु शरीर तो प्योर हो नहीं सकता। यह तमोप्रधान शरीर है। तो बाप समझाते हैं - बच्चे एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। बाप और वर्से को याद करते हो? स्वदर्शन चक्र को याद करते हो? बाबा कहते हैं एक भी ऐसे सावधानी नहीं देते होंगे। बाप को याद करते-करते नींद को जीतने वाला बनना है, इसमें तो बहुत कमाई है। कमाई में कभी थकावट नहीं होती है। परन्तु स्थूल काम भी करने पड़ते हैं इसलिए थकावट भी होती है।
बाप समझाते हैं रात को भी जागकर बाबा से बातें करते, ज्ञान सागर में डुबकी लगानी होती है। जैसे एक जानवर होता है, पानी में डुबकी लगाता है। तो ऐसे डुबकी मारने से, विचार सागर मंथन करने से देखते हैं कि बहुत प्वाइंट्स आती हैं। कहाँ-कहाँ से निकल आती हैं। इसको कहा जाता है रात को जागकर ज्ञान का विचार सागर मंथन करना। मनुष्य बिल्कुल ही नहीं जानते हैं, उन्हों को समझाना है। बाप ज्ञान का सागर है, उनसे वर्सा मिलना है। जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले सतयुग में थे, उन्हों को जरूर वर्सा मिला होगा ना। अब सारी राजधानी को वर्सा कैसे मिला? कलियुग से सतयुग होने में देरी तो नहीं लगती। रात पूरी हो दिन होता है। कहाँ आइरन एजेड वर्ल्ड दु:खधाम, कहाँ वह सुखधाम। ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात - कितना फर्क है! अभी गॉड फादर से तुमको नॉलेज मिल रही है। सरस्वती क्या करती थी? किसको पता नहीं। बस गॉडेज ऑफ नॉलेज सरस्वती का चित्र मिला और खुश हो गये। तो उन्हों को सावधान करना पड़ता है। परमात्मा का परिचय देना पड़े। फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर का भी परिचय देना है। बाप ने आकर यह नॉलेज दे नर से नारायण बनाया है। बड़ा युक्ति से हर एक का आक्यूपेशन बताना है। सरस्वती भी ब्रह्मा मुख वंशावली है। तो जरूर परमपिता परमात्मा आया उसने ब्रहमा द्वारा मुख वंशावली रची। पहले-पहले नॉलेज किसको दी? कहते हैं कलष सरस्वती को दिया। बीच से ब्रह्मा को गुम कर दिया है। यह किसको पता नहीं है कि ब्रह्मा तन में आकर माताओं को कलष दिया है तो जरूर ब्रह्मा भी सुनते होंगे ना। ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र भी दिखाते हैं। ब्रह्मा की मत मशहूर है। तो वह भी सभी वेदों शास्त्रों के सार की मत देता होगा। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा समझाते हैं। ब्रह्मा कहाँ से आया? यह रथ कहाँ से निकला? कोई नहीं जानते। बाबा ने अभी बताया है जो तुम समझा सकते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) रात को जागकर ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है। ज्ञान सागर में डुबकी लगानी है। बाप को याद करते नींद को जीतने वाला बनना है।
2) स्वदर्शन चक्र फिराते रहना है। आपस में बाप और वर्से की याद दिलाते एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है।

वरदान: अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा हर कार्य में सफलता प्राप्त करने वाले मास्टर दाता भव
सेवा की अविनाशी सफलता के लिए मास्टर दाता बन सर्व को सहयोग दो। बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगड़े हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना - यह है बड़े से बड़ी देन। इसने यह कहा, यह किया, यह देखते सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा परिवर्तन कर देना। किसी द्वारा कोई शक्ति की कमी भी महसूस हो तो अपने सहयोग से जगह भर देना - यही है मास्टर दाता बनना।

स्लोगन: सदा हर्षित रहना है तो विश्व ड्रामा की हर सीन को साक्षी होकर देखो। 

Saturday, 10 February 2018

Hindi Murli 11/02/18

11-02-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 30-04-83 मधुबन

“परम पूज्य बनने का आधार”
सभी मधुबन महान तीर्थ पर मेला मनाने के लिए चारों ओर से पहुँच गये हैं। इसी महान तीर्थ के मेले की यादगार अभी भी तीर्थ स्थानों पर मेले लगते रहते हैं। इसी समय का हर श्रेष्ठ कर्म का यादगार चरित्रों के रूप में, गीतों के रूप में अभी भी देख और सुन रहे हो। चैतन्य श्रेष्ठ आत्मायें अपना चित्र और चरित्र देख सुन रही हैं। ऐसे समय पर बुद्धि में क्या श्रेष्ठ संकल्प चलता है? समझते हो ना कि हम ही थे, हम ही अब हैं और कल्प-कल्प हम ही फिर होंगे। यह ‘फिर से' की स्मृति और नॉलेज और किसी भी आत्मा को, महान आत्मा को, धर्म आत्मा को वा धर्म पिता को भी नहीं है। लेकिन आप सब ब्राह्मण आत्माओं को इतनी स्पष्ट स्मृति है वा स्पष्ट नॉलेज है जैसे 5000 वर्ष की बात कल की बात है। कल थे आज हैं फिर कल होंगे। तो आज और कल इन दोनों शब्दों मे 5000 वर्ष का इतिहास समाया हुआ है। इतना सहज और स्पष्ट अनुभव करते हो! कोई होंगे वा हम ही थे, हम ही हैं! जड़ चित्रों में अपने चैतन्य श्रेष्ठ जीवन का साक्षात्कार होता है? वा समझते हो कि यह महारथियों के चित्र हैं, वा आप सबके हैं? भारत में 33 करोड़ देवताओं को नमस्कार करते हैं अर्थात् आप श्रेष्ठ ब्राह्मण सो देवताओं के वंश के भी वंश, उनके भी वंश, सभी का पूजन नहीं तो गायन तो करते ही हैं। तो सोचो जो स्वयं पूर्वज हैं उन्हों का नाम कितना श्रेष्ठ होगा! और पूजन भी पूर्वजों का कितना श्रेष्ठ होगा। 9 लाख का भी गायन है। उससे आगे 16 हजार का गायन है फिर 108 का है फिर 8 का है। उससे आगे युगल दाने का है। नम्बरवार हैं ना। गायन तो सभी का है क्योंकि जो भाग्य विधाता बाप के बच्चे बने, इस भाग्य के कारण उन्हों का गायन और पूजन दोनों होता है लेकिन पूजन में दो प्रकार का पूजन है। एक है प्रेम की विधि पूर्वक पूजन और दूसरा है सिर्फ नियम पूर्वक पूजन। दोनों में अन्तर है ना। तो अपने से पूछो मैं कौन सी पूज्य आत्मा हूँ। पहले भी सुनाया था कि कोई-कोई भक्त, देवता नाराज न हो जाए इस भय से पूजा करते हैं। और कोई-कोई भक्त दिखावा मात्र भी पूजा करते हैं। और कोई-कोई समझते हैं भक्ति का नियम वा फर्ज निभाना है। चाहे दिल हो या न हो लेकिन निभाना है। ऐसे फर्ज समझ करते हैं। चारों ही प्रकार के भक्त किसी न किसी प्रकार से बनते हैं। यहाँ भी देखो देव आत्मा बनने वाले, ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाने वाले भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं ना। नम्बरवन पूज्य सदा सहज स्नेह से और विधि पूर्वक याद और सेवा वा योगी आत्मा, दिव्यगुण धारण करने वाली आत्मा बन चल रहे हैं। चार सबजेक्ट विधि और सिद्धि प्राप्त किये हुए हैं। दूसरे नम्बर के पूज्य विधि पूर्वक नहीं लेकिन नियम समझ करके करेंगे, चार ही सबजेक्ट पूरे लेकिन विधि सिद्धि के प्राप्ति स्वरूप हो करके नहीं। लेकिन नियम समझकर चलना ही है, करना ही है, इसी लक्ष्य से जितना कायदा उतना फायदा प्राप्त करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। वह दिल का स्नेह स्वत: और सहज बनाता है और नियम पूर्वक वालों को कभी सहज कभी मुश्किल लगता। कभी मेहनत करनी पड़ती और कभी मुहब्बत की अनुभूति होती। नम्बरवन लवलीन रहते, नम्बर दो लव में रहते। नम्बर तीसरा - मैजारटी समय चारों ही सबजेक्ट दिल से नहीं लेकिन दिखावा मात्र करते हैं। याद में भी बैठेंगे - नामीग्रामी बनने के भाव से। ऐसे दिखावा मात्र सेवा भी खूब करेंगे। जैसा समय वैसा अल्पकाल का रूप भी धारण कर लेंगे लेकिन दिमाग तेज़ और दिल खाली। नम्बर चौथा - सिर्फ डर के मारे कोई कुछ कह न दे कि यह तो है ही लास्ट नम्बर का वा यह आगे चल नहीं सकता, ऐसे कोई इस नज़र से नहीं देखे। ब्राह्मण तो बन ही गये और शूद्र जीवन भी छोड़ ही चले। ऐसा न हो कि दोनों तरफ से छूट जाएं। शूद्र जीवन भी पसन्द नहीं और ब्राह्मण जीवन में विधि पूर्वक चलने की हिम्मत नहीं इसलिए मजबूरी मजधार में आ गये। ऐसे मजबूरी वा डर के मारे चलते ही रहते। ऐसे कभी-कभी अपने श्रेष्ठ जीवन का अनुभव भी करते हैं इसलिए इस जीवन को छोड़ भी नहीं सकते। ऐसे को कहेंगे चौथे नम्बर की पूज्य आत्मा। तो उन्हों की पूजा कभी-कभी और डर के मारे, मजबूरी भक्त बन निभाना है, इसी प्रमाण चलती रहती। और दिखावा वाले की भी पूजा दिल से नहीं लेकिन दिखावा मात्र होती। इसी प्रमाण चलते रहते। तो चार ही प्रकार के पूज्य देखे हैं ना। जैसा अभी स्वयं बनेंगे वैसे ही सतयुग त्रेता की रॉयल फैमली वा प्रजा उसी नम्बर प्रमाण बनेगी और द्वापर कलियुग में ऐसे ही भक्त माला बनेगी। अभी अपने आप से पूछो मैं कौन! वा चारों में ही कभी कहाँ, कभी कहाँ चक्र लगाते हो। फिर भी भाग्य विधाता के बच्चे बने, पूज्य तो जरूर बनेंगे। नामीग्रामी अर्थात् श्रेष्ठ पूज्य 16 हजार तक नम्बरवार बन जाते हैं। बाकी 9 लाख लास्ट समय तक अर्थात् कलियुग के पिछाड़ी के समय तक थोड़े बहुत पूज्य बन जाते हैं। तो समझा गायन तो सबका होता है। गायन का आधार है भाग्य विधाता बाप का बनना और पूजन का आधार है चारों सबजेक्ट में पवित्रता, स्वच्छता, सच्चाई, सफाई। ऐसे पर बापदादा भी सदा स्नेह के फूलों से पूजन अर्थात् श्रेष्ठ मानते हैं। परिवार भी श्रेष्ठ मानते हैं और और विश्व भी वाह-वाह के नगाड़े बजाए उन्हों की मन से पूजा करेगा। और भक्त तो अपना ईष्ट समझ दिल में समायेंगे। तो ऐसे पूज्य बने हो? जब है ही परमपिता। सिर्फ पिता नहीं है लेकिन परम है तो बनायेंगे भी परम ना! पूज्य बनना बड़ी बात नहीं है लेकिन परम पूज्य बनना है।
बापदादा भी बच्चों को देख हर्षित होते हैं। मुहब्बत में मेहनत को महसूस न कर पहुँच जाते हैं। अभी तो रेस्ट हाउस में आ गये ना! तन-मन दोनों के लिए रेस्ट है ना! रेस्ट माना सोना नहीं। सोना बनने की रेस्ट में आये हैं। पारसपुरी में आ गये हो ना। जहाँ संग ही पारस आत्माओं का है, वायुमण्डल ही सोना बनाने वाला है। बातें ही दिन रात सोना बनने की हैं। अच्छा -
ऐसे सदा परम पूज्य आत्माओं को, सदा विधि द्वारा श्रेष्ठ सिद्धि को पाने वाले, सदा महान बन महान आत्मायें बनाने वाले, स्वयं को सदा सहज और स्वत: योगी, निरन्तर योगी, स्नेह सम्पन्न योगी, अनुभव करने वाले, ऐसी सर्व श्रेष्ठ आत्माओं को, चारों ओर के आकारी रूपधारी समीप बच्चों को, ऐसे साकारी आकारी सर्व सम्मुख उपस्थित हुए बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दीदी-दादी जी से:- सभी परमपूज्य हो ना! पूजा अच्छी हो रही है ना! बापदादा को तो अनन्य बच्चों पर नाज़ है। बाप को नाज़ है और बच्चों में राज़ हैं। जो राज़युक्त हैं उन बच्चों पर बाप को सदा नाज़ है। राज़युक्त, योगयुक्त, गुण युक्त... सबका बैलेन्स रखने वाले सदा बाप की ब्लैसिंग की छाया में रहने वाले। ब्लैसिंग की सदा ही वर्षा होती रहती है। जन्मते ही यह ब्लैसिंग की वर्षा शुरू हुई है और अन्त तक इसी छत्रछाया के अन्दर गोल्डन फूलों की वर्षा होती रहेगी। इसी छाया के अन्दर चले हैं, पले हैं और अन्त तक चलते रहेंगे। सदा ब्लैसिंग के गोल्डन के फूलों की वर्षा। हर कदम बाप साथ है अर्थात् ब्लैसिंग साथ है। इसी छाया में सदा रहे हो (दादी से) शुरू से अथक हो, अथक भव का वरदान है इसलिए करते भी नहीं करते, यह बहुत अच्छा। फिर भी अव्यक्त होते समय जिम्मेवारी का ताज तो डाला है ना। इनको (दीदी को) साकार के साथ-साथ सिखाया और आपको अव्यक्त होने समय सेकेण्ड में सिखाया। दोनों को अपने-अपने तरीके से सिखाया। यह भी ड्रामा का पार्ट है। अच्छा!
विदाई के समय 6.30 बजे सुबह :-
संगमयुग की सब घड़ियाँ गुडमार्निंग ही हैं क्योंकि संगमयुग पूरा ही अमृतवेला है। चक्र के हिसाब से संगमयुग अमृतवेला हुआ ना। तो संगमयुग का हर समय गुडमार्निंग ही है। तो बापदादा आते भी गुडमार्निंग में हैं, जाते भी गुडमार्निंग में हैं क्योंकि बाप आता है तो रात से अमृतवेला बन गया। तो आते भी अमृतवेले में हैं और जब जाते हैं तो दिन निकल आता है लेकिन रहता अमृतवेले में ही है, दिन निकलता तो चला जाता है। और आप लोग सवेरा अर्थात् सतयुग का दिन ब्रह्मा का दिन, उसमें राज्य करते हो। बाप तो न्यारे हो जायेंगे ना। तो पुरानी दुनिया के हिसाब से सदा ही गुडमार्निंग है। सदा ही शुभ है और सदा शुभ रहेगा इसलिए शुभ सवेरा कहें, शुभ रात्रि कहें शुभ दिन कहें सब शुभ ही शुभ है। तो सभी को कलियुग के हिसाब से गुडमार्निंग और संगमयुग के हिसाब से गुडमार्निंग तो डबल गुडमार्निंग। अच्छा -
अव्यक्त महावाक्य - याद को ज्वाला स्वरूप बनाओ
बाप समान पाप कटेश्वर वा पाप हरनी तब बन सकते हो, जब आपकी याद ज्वाला स्वरूप हो। ऐसी याद ही आपके दिव्य दर्शनीय मूर्त को प्रत्यक्ष करेगी। इसके लिए कोई भी समय साधारण याद न हो। सदा ज्वाला स्वरूप, शक्ति स्वरूप याद में रहो। स्नेह के साथ शक्ति रूप कम्बाइन्ड हो। वर्तमान समय संगठित रुप के ज्वाला स्वरुप की आवश्यकता है। ज्वाला स्वरूप की याद ही शक्तिशाली वायुमण्डल बनायेगी और निर्बल आत्मायें शक्ति सम्पन्न बनेंगी। सभी विघ्न सहज समाप्त हो जायेंगे और पुरानी दुनिया के विनाश की ज्वाला भड़केगी। जैसे सूर्य विश्व को रोशनी की और अनेक विनाशी प्राप्तियों की अनुभूति कराता है। ऐसे आप बच्चे अपने महान तपस्वी रुप द्वारा प्राप्ति के किरणों की अनुभूति कराओ। इसके लिए पहले जमा का खाता बढ़ाओ। जैसे सूर्य की किरणें चारों ओर फैलती हैं, ऐसे आप मास्टर सर्वशक्तिवान् की स्टेज पर रहो तो शक्तियों व विशेषताओं रुपी किरणें चारों ओर फैलती अनुभव करेंगे।
ज्वाला-रुप बनने का मुख्य और सहज पुरुषार्थ - सदा यही धुन रहे कि अब वापिस घर जाना है और सबको साथ ले जाना है। इस स्मृति से स्वत: ही सर्व-सम्बन्ध, सर्व प्रकृति की आकर्षण से उपराम अर्थात् साक्षी बन जायेंगे। साक्षी बनने से सहज ही बाप के साथी वा बाप-समान बन जायेंगे। ज्वाला स्वरुप याद अर्थात् लाइट हाउस और माइट हाउस स्थिति को समझते हुए इसी पुरुषार्थ में रहो। विशेष ज्ञान-स्वरुप के अनुभवी बन शक्तिशाली बनो। जिससे आप श्रेष्ठ आत्माओं की शुभ वृत्ति व कल्याण की वृत्ति और शक्तिशाली वातावरण द्वारा अनेक तड़पती हुई, भटकती हुई, पुकार करने वाली आत्माओं को आनन्द, शान्ति और शक्ति की अनुभूति हो। जैसे अग्नि में कोई भी चीज़ डालने से उसका नाम, रूप, गुण सब बदल जाता है, ऐसे जब बाप के याद की लगन की अग्नि में पड़ते हो तो परिवर्तन हो जाते हो! मनुष्य से ब्राह्मण बन जाते, फिर ब्राह्मण से फरिश्ता सो देवता बन जाते। जैसे कच्ची मिट्टी को साँचे में ढालकर आग में डालते हैं तो ईट बन जाती, ऐसे यह भी परिवर्तन हो जाता। इसलिए इस याद को ही ज्वाला रूप कहा जाता है। सेवाधारी हो, स्नेही हो, एक बल एक भरोसे वाले हो, यह तो सब ठीक है, लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज अर्थात् लाइट माइट हाउस की स्टेज, स्टेज पर आ जाए, याद ज्वाला रूप हो जाए तो सब आपके आगे परवाने के समान चक्र लगाने लग जाएं। ज्वाला स्वरूप याद के लिए मन और बुद्धि दोनों को एक तो पावरफुल ब्रेक चाहिए और मोड़ने की भी शक्ति चाहिए। इससे बुद्धि की शक्ति वा कोई भी एनर्जी वेस्ट ना होकर जमा होती जायेगी। जितनी जमा होगी उतना ही परखने की, निर्णय करने की शक्ति बढ़ेगी। इसके लिए अब संकल्पों का बिस्तर बन्द करते चलो अर्थात् समेटने की शक्ति धारण करो। कोई भी कार्य करते वा बात करते बीच-बीच में संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप करो। एक मिनट के लिए भी मन के संकल्पों को, चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को बीच में रोक कर भी यह प्रैक्टिस करो तब बिन्दू रूप की पावरफुल स्टेज पर स्थित हो सकेंगे। जैसे अव्यक्त स्थिति में रह कार्य करना सरल होता जा रहा है वैसे ही यह बिन्दुरुप की स्थिति भी सहज हो जायेगी। जैसे कोई भी कीटाणु को मारने के लिए डॉक्टर लोग बिजली की रेज़ेस देते हैं। ऐसे याद की शक्तिशाली किरणें एक सेकेण्ड में अनेक विकर्मों रूपी कीटाणु भस्म कर देती हैं। विकर्म भस्म हो गये तो फिर अपने को हल्का और शक्तिशाली अनुभव करेंगे। निरन्तर सहजयोगी तो हो सिर्फ इस याद की स्टेज को बीच-बीच में पावरफुल बनाने के लिए अटेन्शन का फोर्स भरते रहो। पवित्रता की धारणा जब सम्पूर्ण रूप में होगी तब आपके श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति लगन की अग्नि प्रज्जवलित करेगी, उस अग्नि में सब किचड़ा भस्म हो जायेगा। फिर जो सोचेंगे वही होगा, विंहग मार्ग की सेवा स्वत: हो जायेगी। जैसे देवियों के यादगार में दिखाते हैं कि ज्वाला से असुरों को भस्म कर दिया। असुर नहीं लेकिन आसुरी शक्तियों को खत्म कर दिया। यह अभी का यादगार है। अभी ज्वालामुखी बन आसुरी संस्कार, आसुरी स्वभाव सब-कुछ भस्म करो। प्रकृति और आत्माओं के अन्दर जो तमोगुण है उसे भस्म करने वाले बनो। यह बहुत बड़ा काम है, स्पीड से करेंगे तब पूरा होगा। कोई भी हिसाब-चाहे इस जन्म का, चाहे पिछले जन्म का, लग्न की अग्नि-स्वरूप स्थिति के बिना भस्म नहीं होता। सदा अग्नि-स्वरूप स्थिति अर्थात् ज्वालारूप की शक्तिशाली याद, बीजरूप, लाइट हाउस, माइट हाउस स्थिति में पुराने हिसाब-किताब भस्म हो जायेंगे और अपने आपको डबल लाइट अनुभव करेंगे। शक्तिशाली ज्वाला स्वरूप की याद तब रहेगी जब याद का लिंक सदा जुटा रहेगा। अगर बार-बार लिंक टूटता है, तो उसे जोड़ने में समय भी लगता, मेहनत भी लगती और शक्तिशाली के बजाए कमजोर हो जाते हो। याद को शक्तिशाली बनाने के लिए विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, विस्तार में सार भूल न जाये। खाओ-पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नहीं भूलो। साधना अर्थात् शक्तिशाली याद। निरन्तर बाप के साथ दिल का सम्बन्ध। साधना इसको नहीं कहते कि सिर्फ योग में बैठ गये लेकिन जैसे शरीर से बैठते हो वैसे दिल, मन, बुद्धि एक बाप की तरफ बाप के साथ-साथ बैठ जाए। ऐसी एकाग्रता ही ज्वाला को प्रज्जवलित करेगी। याद की यात्रा सहज भी हो और शक्तिशाली भी हो, पावरफुल याद एक समय पर डबल अनुभव कराती है। एक तरफ याद अग्नि बन भस्म करने का काम करती है, परिवर्तन करने का काम करती है और दूसरे तरफ खुशी और हल्केपन का अनुभव कराती है। ऐसे विधिपूर्वक याद को ही यथार्थ और शक्तिशाली याद कहा जाता है।

वरदान: स्नेह की लिफ्ट द्वारा उड़ती कला का अनुभव करने वाले अविनाशी स्नेही भव !
मेहनत से मुक्त होने के लिए बाप के स्नेही बनो। यह अविनाशी स्नेह ही अविनाशी लिफ्ट बन उड़ती कला का अनुभव कराता है। लेकिन यदि स्नेह में अलबेलापन है तो बाप से करेन्ट नहीं मिलती और लिफ्ट काम नहीं करती। जैसे लाइट बन्द होने से, कनेक्शन खत्म होने से लिफ्ट द्वारा सुख की अनुभूति नहीं कर सकते, ऐसे स्नेह कम है तो मेहनत का अनुभव होता है, इसलिए अविनाशी स्नेही बनो।

स्लोगन: शुभ संकल्प और दिव्य बुद्धि के यंत्र द्वारा तीव्रगति की उड़ान भरते रहो।
 

Hindi Murli 10/02/18

10-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम्हें ज्ञान की सैक्रीन मिली है, सैक्रीन की वह बूंद है मनमनाभव, यही खुराक सबको खिलाते रहो”

प्रश्न: सच्ची-सच्ची खुशखैराफत कौन सी है? तुम्हें सबकी कौन सी रूहानी खातिरी करनी है?
उत्तर: हर एक को बाप का परिचय देना, यही है सच्ची-सच्ची खुश खैराफत। तुम श्रीमत पर सबको खुशी की खुराक खिलाते रहो। बेहद के बाप द्वारा जीवनमुक्ति की खुराक जो तुम्हें मिली है, वह सबको देते चलो। अतीन्द्रिय सुख में रह सबको ज्ञान योग की फर्स्टक्लास खुराक खिलाना, यही सबसे अच्छी रूहानी खातिरी है।

ओम् शान्ति। ज्ञान का तीसरा नेत्र देने वाला रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र सिवाए बाप के और कोई दे नहीं सकता। अभी तुम बच्चों को ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। अभी तुम जानते हो कि यह पुरानी दुनिया बदलने वाली है। बिचारे मनुष्य नहीं जानते कि कौन बदलाने वाला है और कैसे बदलाते हैं क्योंकि उन्हों को ज्ञान का तीसरा नेत्र ही नहीं है। तुम बच्चों को अभी ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है जिससे तुम सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जान गये हो। यह है ज्ञान की सैक्रीन। सैक्रीन का एक बूंद भी कितना मीठा होता है। ज्ञान का भी एक ही अक्षर है मनमनाभव। सभी से कितना मीठा है। अपने को आत्मा समझ और बाप को याद करो। बाप शान्तिधाम और सुखधाम का रास्ता बता रहे हैं। बाप आये हैं बच्चों को स्वर्ग का वर्सा देने। तो बच्चों को कितनी खुशी रहनी चाहिए। कहते भी हैं खुशी जैसी खुराक नहीं। जो सदैव खुशी मौज में रहते हैं उनके लिए वह जैसे खुराक होती है। 21 जन्म मौज में रहने की यह जबरदस्त खुराक है। यह खुराक सदैव एक दो को खिलाते रहो। एक दो की जबरदस्त खातिरी यह करनी है। ऐसी खातिरी और कोई मनुष्य, मनुष्य की कर न सके।
तुम बच्चे श्रीमत पर सभी की रूहानी खातिरी करते हो। सच्ची-सच्ची खुश खैऱाफत भी यह है किसको बाप का परिचय देना। मीठे बच्चे जानते हैं बेहद के बाप द्वारा हमको जीवनमुक्ति की खुराक मिलती है। सतयुग में भारत जीवनमुक्त था, पावन था। बाप बहुत बड़ी ऊंची खुराक देते हैं, तब तो गायन है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो। यह ज्ञान और योग की कितना फर्स्ट क्लास वन्डरफुल खुराक है और यह खुराक एक ही रूहानी सर्जन के पास है और किसको इस खुराक का मालूम ही नहीं है। बाप कहते हैं मीठे बच्चों तुम्हारे लिए तिरी (हथेली) पर सौगात ले आया हूँ। मुक्ति, जीवनमुक्ति की यह सौगात मेरे पास ही रहती है। कल्प-कल्प मँ ही आकर तुमको देता हूँ। फिर रावण छीन लेता है। तो अभी तुम बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। तुम जानते हो हमारा एक ही बाप, टीचर और सच्चा-सच्चा सतगुरू है जो हमको साथ ले जाते हैं। मोस्ट बिलवेड बाप से विश्व की बादशाही मिलती है। यह कम बात है क्या! तो सदैव हर्षित रहना चाहिए। गाडली स्टूडेन्ट लाईफ इज दी बेस्ट। यह अभी का ही गायन है ना। फिर नई दुनिया में भी तुम सदैव खुशियाँ मनाते रहेंगे। दुनिया नहीं जानती कि सच्ची-सच्ची खुशियाँ कब मनाई जायेंगी। मनुष्यों को तो सतयुग का ज्ञान ही नहीं है। तो यहाँ ही मनाते रहते हैं। परन्तु इस पुरानी तमोप्रधान दुनिया में खुशी कहाँ से आई। यहाँ तो त्राहि-त्राहि करते रहते हैं। कितना दु:ख की दुनिया है।
बाप तुम बच्चों को कितना सहज रास्ता बताते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहो। धन्धा-धोरी आदि करते भी मुझे याद करते रहो। जैसे आशुक और माशुक होते हैं। वह तो एक दो को याद करते रहते हैं। वह उनका आशुक, वह उनका माशुक ओता है। यहाँ यह बात नहीं है, यहाँ तो तुम सभी एक माशुक के जन्म-जन्मान्तर से आशुक हो रहते हो। बाप कभी तुम्हारा आशिक नहीं बनता। तुम उस माशुक से मिलने के लिए याद करते आये हो। जब दु:ख जास्ती होता है तो जास्ती सुमिरण करते हैं। गायन भी है दु:ख में सुमिरण सब करें, सुख में करे न कोय। इस समय बाप भी सर्वशक्तिवान है, तो दिन-प्रतिदिन माया भी सर्वशक्तिवान-तमोप्रधान होती जाती है इसलिए अब बाप कहते हैं मीठे बच्चे देही-अभिमानी बनो। अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो तुम ऐसे (लक्ष्मी-नारायण) बन जायेंगे। इस पढ़ाई में मुख्य बात है ही याद की। ऊंच ते ऊंच बाप को बहुत प्यार, स्नेह से याद करना चाहिए। वह ऊंच ते ऊंच बाप ही नई दुनिया स्थापन करने वाला है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुम बच्चों को विश्व का मालिक बनाने इसलिए अब मुझे याद करो तो तुम्हारे अनेक जन्मों के पाप कट जायें। पतित-पावन बाप कहते हैं तुम बहुत पतित बन गये हो इसलिए अब तुम मुझे याद करो तो तुम पावन बन और पावन दुनिया का मालिक बन जायेंगे। पतित-पावन बाप को ही बुलाते हैं ना। अब बाप आये हैं, तो जरूर पावन बनना पड़े। बाप दु:खहर्ता, सुखकर्ता है। बरोबर सतयुग में पावन दुनिया थी तो सभी सुखी थे। अब बाप फिर से कहते हैं बच्चे शान्तिधाम और सुखधाम को याद करते रहो। अभी है संगमयुग। खिवैया तुमको इस पार से उस पार ले जाते हैं। नईया कोई एक नहीं, सारी दुनिया जैसे एक बड़ा जहाज है, उनको पार ले जाते हैं।
तुम मीठे बच्चों को कितनी खुशियाँ होनी चाहिए। तुम्हारे लिए तो सदैव खुशी ही खुशी है। बेहद का बाप हमको पढ़ा रहे हैं। वाह! यह तो कब न सुना, न पढ़ा। भगवानुवाच मैं तुम रूहानी बच्चों को राजयोग सिखा रहा हूँ, तो पूरी रीति सीखना चाहिए। धारणा करनी चाहिए। पूरी रीति पढ़ना चाहिए। पढ़ाई में नम्बरवार तो सदैव होते ही हैं। अपने को देखना चाहिए मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ वा कनिष्ट हूँ? बाप कहते हैं अपने को देखो मैं ऊंच पद पाने के लायक हूँ? रूहानी सर्विस करता हूँ? क्योंकि बाप कहते हैं बच्चे सर्विसएबुल बनो, फालो करो। मैं आया ही हूँ सर्विस के लिए। रोज़ सर्विस करता हूँ इसलिए ही तो यह रथ लिया है। इनका रथ बीमार पड़ जाता है तो भी मैं इनमें बैठ मुरली लिखता हूँ। मुख से तो बोल नहीं सकते तो मैं लिख देता हूँ, ताकि बच्चों के लिए मुरली मिस न हो तो मैं भी सर्विस पर हूँ ना। यह है रूहानी सर्विस। तुम भी बाप की सर्विस में लग जाओ। आन गॉड फादरली सर्विस। सारे विश्व का मालिक बाप ही तुमको विश्व का मालिक बनाने आये हैं। जो अच्छा पुरुषार्थ करते हैं उनको महावीर कहा जाता है। देखा जाता है कौन महावीर हैं जो बाबा के डायरेक्शन पर चलते हैं। बाप का फरमान है अपने को आत्मा समझ भाई-भाई देखो। इस शरीर को भूल जाओ। बाबा भी शरीर को नहीं देखते हैं। बाप कहते हैं मैं आत्माओं को देखता हूँ। बाकी यह तो ज्ञान है कि आत्मा शरीर बिगर बोल नहीं सकती। मैं भी इस शरीर में आया हूँ, लोन लिया हुआ है। शरीर के साथ ही आत्मा पढ़ सकती है। बाबा की बैठक यहाँ है। यह है अकाल तख्त। आत्मा अकालमूर्त है। आत्मा कब छोटी बड़ी नहीं होती है, शरीर छोटा बड़ा होता है। जो भी आत्मायें हैं उन सभी का तख्त यह भृकुटी का बीच है। शरीर तो सभी के भिन्न-भिन्न होते हैं। किसको अकाल तख्त पुरुष का है, किसका अकाल तख्त स्त्री का है। किसका अकाल तख्त बच्चे का है। बाप बैठ बच्चों को रूहानी ड्रिल सिखलाते हैं। जब कोई से बात करो तो पहले अपने को आत्मा समझो। हम आत्मा फलाने भाई से बात करते हैं। बाप का पैगाम देते हैं कि शिवबाबा को याद करो। याद से ही जंक उतरनी है। सोने में जब अलाय पड़ती है तो सोने की वैल्यु ही कम हो जाती है। तुम आत्माओं में भी जंक पड़ने से तुम वैल्युलेस हो गये हो। अब फिर पावन बनना है। तुम आत्माओं को अब ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। उस नेत्र से अपने भाईयों को देखो। भाई-भाई को देखने से कर्मेन्द्रियाँ कब चंचल नहीं होंगी। राज-भाग लेना है, विश्व का मालिक बनना है तो यह मेहनत करो। भाई-भाई समझ सभी को ज्ञान दो। तो फिर यह टेव (आदत) पक्की हो जायेगी। सच्चे-सच्चे ब्रदर्स तुम सभी हो। बाप भी ऊपर से आये हैं, तुम भी आये हो। बाप बच्चों सहित सर्विस कर रहे हैं। सर्विस करने की बाप हिम्मत देते हैं। हिम्मते मर्दा... तो यह प्रैक्टिस करनी है - मैं आत्मा भाई को पढ़ाता हूँ। आत्मा पढ़ती है ना। इसको प्रीचुअल नॉलेज कहा जाता है। जो रूहानी बाप से ही मिलती है। संगम पर ही बाप आकर यह नॉलेज देते हैं कि अपने को आत्मा समझो। तुम नंगे आये थे फिर यहाँ शरीर धारण कर तुमने 84 जन्म पार्ट बजाया है। अब फिर वापिस चलना है इसलिए अपने को आत्मा समझ भाई-भाई की दृष्टि से देखना है। यह मेहनत करनी है। अपनी मेहनत करनी है, दूसरे में हमारा क्या जाता। चैरिटी बिगेन्स एट होम अर्थात् पहले खुद को आत्मा समझ फिर भाईयों को समझाओ तो अच्छी रीति तीर लगेगा। यह जौहर भरना है। मेहनत करेंगे तब ही ऊंच फल पायेंगे। बाप आये ही हैं फल देने लिए तो मेहनत करनी पड़े। कुछ सहन भी करना पड़ता है।
तुम्हें कोई उल्टी-सुल्टी बात बोले तो तुम चुप रहो। तुम चुप रहेंगे तो फिर दूसरा क्या करेगा। ताली दो हाथ से बजती है। एक ने मुख की ताली बजाई, दूसरा चुप कर दे तो वह आपेही चुप हो जायेंगे। ताली से ताली बजने से आवाज हो जाता है। बच्चों को एक दो का कल्याण करना है। बाप समझाते हैं बच्चे सदैव खुशी में रहने चाहते हो तो मनमनाभव। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। भाईयों (आत्माओं) तरफ देखो। भाईयों को भी यह नॉलेज दो। यह टेव पड़ जाने से फिर कभी क्रिमिनल आई धोखा नहीं देगी। ज्ञान के तीसरे नेत्र से तीसरे नेत्र को देखो। बाबा भी तुम्हारी आत्मा को ही देखते हैं। कोशिश यह करनी है सदैव आत्मा को ही देखें। शरीर को देखें ही नहीं। योग कराते हो तो भी अपने को आत्मा समझ भाईयों को देखते रहेंगे तो सर्विस अच्छी होगी। बाबा ने कहा है भाईयों को समझाओ। भाई सभी बाप से वर्सा लेते हैं। यह रूहानी नॉलेज एक ही बार तुम ब्राह्मण बच्चों को मिलती है। तुम ब्राह्मण हो फिर देवता बनने वाले हो। इस संगमयुग को थोड़ेही छोड़ेंगे, नहीं तो पार कैसे जायेंगे। कूदेंगे थोड़ेही। यह वन्डरफुल संगमयुग है। तो बच्चों को रूहानी यात्रा पर रहने की टेव डालनी है। तुम्हारे ही फायदे की बात है। बाप की शिक्षा भाईयों को देनी है। बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ज्ञान दे रहा हूँ। आत्मा को ही देखता हूँ। मनुष्य-मनुष्य से बात करेगा तो उनके मुँह को देखेगा ना। तुम आत्मा से बात करते हो तो आत्मा को ही देखना है। भल शरीर द्वारा ज्ञान देते हो परन्तु इसमें शरीर का भान तोड़ना होता है। तुम्हारी आत्मा समझती है परमात्मा बाप हमको ज्ञान दे रहे हैं। बाप भी कहते हैं आत्माओं को देखता हूँ, आत्मायें भी कहती हैं हम परमात्मा बाप को देख रहे हैं। उनसे नॉलेज ले रहे हैं। इसको कहा जाता है प्रीचुअल ज्ञान की लेन-देन - आत्मा की आत्मा के साथ। आत्मा में ही ज्ञान है। आत्मा को ही ज्ञान देना है। यह जैसे जौहर है। तुम्हारे ज्ञान में यह जौहर भर जायेगा तो किसको भी समझाने से झट तीर लग जायेगा। बाप कहते हैं प्रैक्टिस करके देखो तीर लगता है या नहीं। यह नई टेव (आदत) डालनी है तो फिर शरीर का भान निकल जायेगा। माया के तूफान कम आयेंगे। बुरे संकल्प नहीं आयेंगे। क्रिमिनल आई भी नहीं रहेगी। हम आत्मा ने 84 का चक्र लगाया। अब नाटक पूरा होता है। अब बाबा की याद में रहना है। याद से ही तमोप्रधान से सतोप्रधान बन, सतोप्रधान दुनिया के मालिक बन जायेंगे। कितना सहज है। बाप जानते हैं बच्चों को यह शिक्षा देना भी मेरा पार्ट है। कोई नई बात नहीं। हर 5000 वर्ष बाद हमको आना होता है। मैं बंधायमान हूँ, बच्चों को बैठ समझाता हूँ - मीठे बच्चे रूहानी याद की यात्रा में रहो तो अन्त मते सो गति हो जायेगी। यह अन्त काल है ना। मामेकम् याद करो तो तुम्हारी सद्गति हो जायेगी। याद की यात्रा से पाया (पिल्लर) मजबूत हो जायेगा। यह देही-अभिमानी बनने की शिक्षा एक ही बार तुम बच्चों को मिलती है। कितना वन्डरफुल ज्ञान है। बाबा वन्डरफुल है तो बाबा का ज्ञान भी वन्डरफुल है। कब कोई बता न सके। अभी वापस चलना है इसलिए बाप कहते हैं मीठे बच्चों यह प्रैक्टिस करो। अपने को आत्मा समझ आत्मा को ज्ञान दो। तीसरे नेत्र से भाई-भाई को देखना है। यही बड़ी मेहनत है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) आत्मा भाई-भाई को देखने का अभ्यास करना है। अपने को आत्मा समझ भाई भाई को ज्ञान देना है। महावीर बन इस फरमान को पालन करना है।
2) तुम्हें कोई उल्टी-सुल्टी बात बोले तो तुम चुप रहो। ताली दो हाथ से बजती है, एक ने मुख की ताली बजाई, दूसरा चुप कर दे तो वह आपेही चुप हो जायेंगे।

वरदान: मन्सा-वाचा और कर्मणा तीनों सेवाओं के खाते जमा करने वाले यज्ञ स्नेही भव!
बापदादा के पास सभी बच्चों की सेवा के तीन प्रकार के खाते जमा हैं। जो यज्ञ स्नेही हैं वह मन्सा-वाचा-कर्मणा, तन मन और धन तीनों सेवा में सदा सहयोगी बनते हैं। हर खाते की 100 मार्क्स हैं। अगर किसी की वाचा सेवा की ड्युटी है तो उसमें मन्सा और कर्मणा की परसेन्टेज कम न हो। वाचा सेवा सहज है लेकिन मन्सा में अटेन्शन देने की बात है और कर्मणा सिर्फ स्थूल सेवा नहीं लेकिन संगठन में सम्पर्क-सम्बन्ध में आना - यह भी कर्म के खाते में जमा होता है।

स्लोगन: अपने ऊपर राज्य करने वाले स्वराज्य अधिकारी बनो, साथियों पर राज्य करने वाले नहीं।