Tuesday, 13 February 2018

Hindi Murli 14/02/18

14-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - श्री श्री की श्रेष्ठ मत पर चलने से ही तुम नर से श्री नारायण बनेंगे, निश्चय में ही विजय है''

प्रश्न: ईश्वर की डायरेक्ट रचना में कौन सी विशेषता अवश्य होनी चाहिए?
उत्तर: सदा हर्षित रहने की। ईश्वर की रचना के मुख से सदैव ज्ञान रत्न निकलते रहें। चलन बड़ी रॉयल चाहिए। बाप का नाम बदनाम करने वाली चलन न हो। रोना, लड़ना-झगड़ना, उल्टा सुल्टा खाना... यह ईश्वरीय सन्तान के लक्षण नहीं। ईश्वर की सन्तान कहलाने वाले अगर रोते हैं, कोई अकर्तव्य करते हैं, तो बाप की इज्जत गँवाते हैं इसलिए बच्चों को बहुत-बहुत सम्भाल करनी है। सदा ईश्वरीय नशे में हर्षितमुख रहना है।
ओम् शान्ति। बच्चों का मुखड़ा देखना पड़ता है। यह कोई साधू सन्त नहीं, बापदादा और बच्चे हैं। इसको कहा जाता है ईश्वरीय कुटुम्ब परिवार। ईश्वर यानी परमपिता, जिनका बच्चा है यह ब्रह्मा, फिर तुम हो ब्रह्माकुमार कुमारियां। वह है वर्ल्ड का फादर। यूँ सारी दुनिया के तीन फादर तो होते ही हैं। एक निराकार बाप, दूसरा प्रजापिता ब्रह्मा, तीसरा फिर लौकिक बाप। परन्तु यह किसी को भी पता नहीं है। चित्र आदि भी बनाते हैं लेकिन जानते नहीं कि यह कब आये थे? शिव का भी चित्र है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी चित्र है। परन्तु वह क्या पार्ट बजाते हैं? उन्हों का नाम क्यों गाया जाता है.... यह कोई भी नहीं जानते। भल बहुत पढ़े हुए हैं, लाखों की संख्या लेक्चर सुनने जाती है। परन्तु तुम बच्चों के आगे जैसे कुछ भी नहीं जानते। बिल्कुल ही तुच्छ बुद्धि हैं। बाबा आकर तुमको स्वच्छ बुद्धि बनाते हैं। तुम सब कुछ जानते हो। ऊंच ते ऊंच बाप है। अब नई रचना रच रहे हैं। नई दुनिया में नई रचना चाहिए ना। गांधी जी भी कहते थे नई दुनिया, नया राज्य चाहिए। भारत ही है जिसमें एक राज्य सतयुग में होता है। सिर्फ सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण का राज्य होता है फिर चन्द्रवंशी का राज्य होता है तो सूर्यवंशी प्राय:लोप हो जाता है। फिर कहा जाता है चन्द्रवंशी राज्य। हाँ, वह जानते हैं कि लक्ष्मी-नारायण हो करके गये हैं। परन्तु कहलायेगा राम-सीता का राज्य। तो ब्रह्मा कोई क्रियेटर नहीं है। रचयिता एक बाप है। शिवबाबा रचता आते हैं, आकर बतलाते हैं कि मैं कैसे नई रचना रच रहा हूँ। ब्रह्मा द्वारा तुम ब्राह्मणों को रच रहा हूँ। तो बाप से जरूर वर्सा मिलना चाहिए। यह थोड़ी सी बात भी कोई समझ जाए तो 21 जन्मों के लिए अहो सौभाग्य। कभी भी दु:खी वा विधवा नहीं होंगे। यह किसकी बुद्धि में पूरा नशा ही नहीं है। है बहुत सहज।

गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ... 
ओम् शान्ति। तुम आते हो इस पाठशाला में, किसकी पाठशाला है? श्रीमत भगवत की पाठशाला। फिर उनका नाम गीता रख दिया है। श्रीमत श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ परमात्मा की है, वह अपने बच्चों को श्रेष्ठ मत दे रहे हैं। आगे तो तुम रावण की आसुरी मत पर चलते आये हो। अब ईश्वर बाप की मत मिलती है। मैं सिर्फ तुम्हारा बाप नहीं हूँ। तुम्हारा बाप भी हूँ, टीचर भी हूँ, सतगुरू भी हूँ। जो हमारे बनते हैं, कहते हैं शिवबाबा ब्रह्मा मुख द्वारा हम आपके बन गये। प्रतिज्ञा करते हैं मैं आपकी हूँ, आपकी ही रहूँगी। बाबा भी कहते हैं तुम हमारे हो। अब मेरी मत पर चलना। श्रीमत पर चलने से तुम सो श्रेष्ठ लक्ष्मी-नारायण बन जायेंगे। गैरन्टी है। कल्प पहले भी तुमको नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनाया था। ऐसा कोई मनुष्य कह न सके। किसको कहने आयेगा नहीं। यह बाप ही कहते हैं मेरे बच्चे मैं तुमको राजयोग सिखलाकर फिर से स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। सतयुग है अल्लाह की दुनिया। भगवती, भगवान को अल्लाह कहेंगे। इस समय सब उल्टे लटके हुए हैं। चील आकर टूँगा लगाती है ना। यहाँ भी माया टूँगा लगा देती है। दु:खी होते रहते हैं। अभी बाप कहते हैं तुमको इन दु:खों से, विषय सागर से क्षीर सागर में ले चलते हैं। अब क्षीरसागर तो कोई है नहीं। कह देते हैं विष्णु सूक्ष्मवतन में क्षीरसागर में रहते हैं। यह अक्षर महिमा के हैं। अब मैं ज्ञान सागर तुम बच्चों को स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। तुम काम चिता पर बैठने से जलकर काले बन जाते हो, मैं आकर तुम पर ज्ञान वर्षा करता हूँ, जिससे तुम गोरे बन जाते हो। शास्त्रों में यह अक्षर हैं, सगर राजा के बच्चे जल मरे थे। बातें तो बहुत बना दी हैं। अभी बाप कहते हैं यह सब बातें बुद्धि से निकालो। अब मेरी सुनो। संशयबुद्धि विनश्यन्ती। अब मुझ पर निश्चय रखो तो निश्चयबुद्धि विजयन्ती। विजय माला के दाने बन जायेंगे। माला का राज़ भी समझाया है। जो अच्छी सर्विस करते हैं उनकी विजय माला बनती है। सबसे अच्छी सर्विस करने वाले दाने रूद्र माला में आगे जाते हैं। फिर विष्णु की माला में आगे जायेंगे। नम्बरवार 108, फिर 16000 की भी माला एड करो। ऐसे नहीं सतयुग त्रेता में सिर्फ 108 ही प्रिन्स-प्रिन्सेज होंगे। वृद्धि होते माला बढ़ती जाती है। प्रजा की वृद्धि होगी तो जरूर प्रिन्स-प्रिन्सेज की भी वृद्धि होगी। बाप कहते हैं कुछ भी नहीं समझो तो पूछो। हे मेरे लाडले बच्चे मुझे जानने से तुम सृष्टि झाड़ को जान जायेंगे। यह झाड़ कब पुराना नहीं होता है। भक्तिमार्ग कब शुरू होता है - यह तुम जानते हो। यह है कल्प वृक्ष। नीचे कामधेनु बैठी है। जरूर उनका बाप भी होगा। अभी तुम भी कल्प वृक्ष के तले में बैठे हो, फिर तुम्हारा नया झाड़ शुरू हो जायेगा। प्रजा तो लाखों की अन्दाज में बन गई और बनती जायेगी। बाकी राजा बनना यह जरा मुश्किल है। इसमें भी साधारण, गरीब उठते हैं।
बाबा कहते हैं गरीब-निवाज़ मैं हूँ। दान भी गरीब को किया जाता है। अहिल्यायें, कुब्जायें, पाप आत्मायें जो हैं, ऐसे-ऐसे को मैं आकर वरदान देता हूँ। तुम एकदम सन्यासियों को भी बैठ ज्ञान देंगे। ब्राह्मण बनने बिगर देवता कोई भी बन न सकें। जो देवता वर्ण के थे, वह ब्राह्मण वर्ण में आयें, तब फिर देवता वर्ण में जा सकें। तुम मात पिता... गाते तो सब हैं परन्तु अब तुम प्रैक्टिकल में हो। यह है ब्राह्मणों की नई रचना। ऊंच ते ऊंच चोटी ब्राह्मण, ऊंच ते ऊंच भगवान फिर ईश्वरीय सम्प्रदाय। तो तुमको इतना नशा रहना चाहिए। हम ईश्वर के पोत्रे-पोत्रियां प्रजापिता के बच्चे हैं। अब ईश्वर के बच्चे तो सदैव हर्षित रहने चाहिए। कभी रोना नहीं चाहिए। यहाँ बहुत ब्रह्माकुमार कुमारियां कहलाने वाले भी रोते हैं। खास कुमारियां। पुरुष रोते नहीं हैं। तो रोने वाले नाम बदनाम कर देते हैं। वह माया के मुरीद देखने में आते हैं। शिवबाबा के मुरीद नहीं देखने में आते। बाबा अन्दर में तो समझते हैं परन्तु बाहर से थोड़ेही दिखलायेंगे। नहीं तो और ही गिर पड़ें। बाबा कहते अपनी सम्भाल करो। सतगुरू की निन्दा कराने वाला कभी ठौर नहीं पायेगा। वह समझ लेवे हम राजगद्दी कभी नहीं पायेंगे। तुम्हें तो सदैव हर्षित रहना चाहिए। जब तुम यहाँ हर्षित रहेंगे तब 21 जन्म हर्षित रहेंगे। भाषण करना कोई बड़ी बात नहीं, वह तो बहुत सहज है। कृष्ण जैसा बनना है। तो अभी सदा हर्षितमुख रहो और मुख से रत्न निकलते रहें। मुझ आत्मा को परमपिता परमात्मा का धन मिला है, जो मुझ आत्मा में धारण होता है, सो मैं अपने मुख से दान करता जाता हूँ। जैसे बाबा शरीर का लोन ले दान करते रहते हैं, ऐसी अवस्था चाहिए। बाबा बाहर से भल प्यार देते हैं, परन्तु देखते हैं इनकी चलन बदनामी करने वाली है तो दिल में रहता है यह ठौर नहीं पा सकेंगे। बाबा को उल्हनें भी मिलते हैं ईश्वरीय सन्तान फिर रोते क्यों? आबरू (इज्जत) तो यहाँ ईश्वर की जायेगी ना। रोते हैं, झगड़ते हैं। उल्टा सुल्टा खाते हैं। देवतायें रोते तो भी और बात, यह तो डायरेक्ट ईश्वर की सन्तान रोते हैं तो क्या गति होगी! ऐसा अकर्तव्य कार्य नहीं होना चाहिए, जो बाप की आबरू गँवाओ। हर बात में सम्भाल चाहिए।
तुमको ईश्वर पढ़ाते हैं। इस समय तो जितने मनुष्य उतनी मतें हैं - एक न मिले दूसरे से। तो बाप समझाते हैं यहाँ तुम बैठे हो अपनी ऊंच ते ऊंच तकदीर बनाने। ऊंच तकदीर सिवाए परमात्मा के और कोई बना न सके। सतयुगी सृष्टि के आदि में हैं लक्ष्मी-नारायण। वह तो भगवान ही रचते हैं। उसने लक्ष्मी-नारायण को राज्य कैसे दिया? यथा राजा रानी तथा प्रजा कैसे हुई, यह कोई नहीं जानते। बाबा समझाते हैं कल्प के संगमयुग पर ही मैं आकर लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन करता हूँ। बाबा कहते हैं तुमको राजतिलक दे रहा हूँ। मैं स्वर्ग का रचयिता तुमको राजतिलक नहीं दूँगा तो कौन देगा? कहते हैं ना तुलसीदास चन्दन घिसें.. यह बात यहाँ की है। वास्तव में राम शिवबाबा है। चन्दन घिसने की बात नहीं है। अन्दर बुद्धि से बाप को और वर्से को याद करो। मायापुरी को भूलो, इनमें अथाह दु:ख हैं। यह कब्रिस्तान है। मीठे बाबा और मीठे सुखधाम को याद करो। यह दुनिया तो खत्म होनी है। विदेशों में तो बाम्ब्स आदि गिरायेंगे तो सब मकान गिर जायेंगे, सबको मरना है। किचड़पट्टी खलास होनी है। देवतायें किचड़पट्टी में नहीं रहते हैं। लक्ष्मी का आह्वान करते हैं तो सफाई आदि करते हैं ना। अब लक्ष्मी-नारायण आयेंगे तो सारी सृष्टि साफ हो जायेगी और सब खण्ड खत्म हो जायेंगे, फिर देवतायें आयेंगे। वह आकर अपने महल बनायेंगे। बाम्बे इतनी थी नहीं। गांवड़ा था। अब देखो क्या बन गया है तो फिर ऐसा होगा और खण्ड नहीं रहेंगे। सतयुग में खारे पानी पर गांव नहीं होते हैं। मीठी नदियों पर होते हैं। फिर धीरे-धीरे वृद्धि को पाते हैं। मद्रास आदि होते नहीं। वृन्दावन, गोकुल आदि नदियों पर रहते हैं, वैकुण्ठ के महल वहाँ दिखाते हैं। तुम जानते हो हम यहाँ आये हैं नर से नारायण बनने। सिर्फ मनुष्य से देवता भी नहीं कहो। देवताओं की तो राजधानी है ना। हम आये हैं राज्य लेने। इसको कहा ही जाता है राजयोग। यह कोई प्रजा योग नहीं है। हम पुरुषार्थ करके बाप से सूर्यवंशी राज्य लेंगे। बच्चों से रोज़ पूछना चाहिए कि कोई भूलचूक तो नहीं की? किसको दु:ख तो नहीं दिया? डिस-सर्विस तो नहीं की? थोड़ी सर्विस में थक नहीं जाना चाहिए। पूछना चाहिए सारा दिन क्या किया? झूठ बोलेंगे तो गिर पड़ेंगे। शिवबाबा से कुछ छिप न सके। ऐसा मत समझना - कौन देखता है? शिवबाबा तो झट जान जायेगा। मुफ्त अपनी सत्यानाश करेंगे। सच बताना चाहिए, तब ही सतयुग में नाच करते रहेंगे। सच तो बिठो नच.. खुशी में बहुत हर्षित मुख रहना चाहिए। देखो स्त्री पुरुष हैं। एक के सौभाग्य में स्वर्ग की बादशाही हो, दूसरे के भाग्य में नहीं भी हो सकती है। कोई का सौभाग्य है जो दोनों हथियाला बांधते, हम ज्ञान चिता पर बैठ इकट्ठे जायेंगे।

तुम बच्चे जगदम्बा माँ की बायोग्राफी को जानते हो और कोई 84 जन्म मानेंगे नहीं। उनको भुजायें बहुत दे दी हैं। तो मनुष्य समझेंगे यह तो देवता है, जन्म-मरण रहित है। अरे चित्र तो मनुष्य का है ना। इतनी बाहें तो होती नहीं। विष्णु को भी 4 भुजायें दिखाते हैं - प्रवृत्ति को सिद्ध करने के लिए। यहाँ तो दो भुजायें ही होती हैं। मनुष्यों ने फिर नारायण को 4 भुजा, लक्ष्मी को दो भुजायें दी हैं। कहाँ फिर लक्ष्मी को 4 भुजायें दी हैं। नारायण को सांवरा, लक्ष्मी को गोरा बना दिया है। कारण का कुछ भी पता नहीं पड़ता। तुम अभी जानते हो - देवतायें जो गोरे थे, द्वापर में आकर जब काम चिता पर बैठते हैं तो आत्मा काली बन जाती है। फिर बाप आकर उन्हें काले से गोरा बनाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।


धारणा के लिए मुख्य सार:
1) मीठे बाबा और मीठे सुखधाम को याद करना है। इस मायापुरी को बुद्धि से भूल जाना है।
2) सर्विस में कभी थकना नहीं है। विजय माला में आने के लिए अथक हो सर्विस करनी है। शिवबाबा से सच्चा रहना है। कोई भूल-चूक नहीं करनी है। किसी को दु:ख नहीं देना है।

वरदान: एक शमा के पीछे परवाने बन फिदा होने वाले कोटों में कोई श्रेष्ठ आत्मा भव
सारे विश्व के अन्दर हम कोटों में कोई, कोई में भी कोई श्रेष्ठ आत्मायें हैं, जिन्होंने स्वयं अनुभव करके यह महसूस किया है, कि हम कल्प पहले वाली वही श्रेष्ठ आत्मायें हैं, जिन्होंने स्वयं को बाप शमा के पीछे फिदा किया है। हम चक्र लगाने वाले नहीं, परवाने बन फिदा होने वाले हैं। फिदा होना अर्थात् मर जाना। तो ऐसे जल मरने वाले परवाने हो ना! जलना ही बाप का बनना है, जलना अर्थात् सम्पूर्ण परिवर्तन होना।

स्लोगन: बाबा के मिलन की और सर्व प्राप्तियों की मौज में रहना ही संगमयुग की विशेषता है।
 

Hindi Murli 13/02/18

13-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - अभी यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है, खेल पूरा होता है इसलिए पावन बन घर जाना है, फिर सतयुग से हिस्ट्री रिपीट होगी''

प्रश्न: घरबार सम्भालते हुए कौन सी कमाल तुम बच्चे ही कर सकते हो?
उत्तर: घरबार सम्भालते, पुरानी दुनिया में रहते सभी से ममत्व मिटा देना। देह सहित जो भी पुरानी चीजें हैं उन्हें भूल जाना... यह है तुम बच्चों की कमाल, इसे ही सतोप्रधान सन्यास कहा जाता है, जो बाप ही तुम्हें सिखलाते हैं। तुम बच्चे इस अन्तिम जन्म में पवित्र रहने की प्रतिज्ञा करते हो फिर 21 जन्म के लिए यह पवित्रता कायम हो जाती है। ऐसी कमाल और कोई कर नहीं सकता।

गीत:- तुम्हीं हो माता पिता...

ओम् शान्ति। बच्चों को ओम् शान्ति का अर्थ बिल्कुल सहज समझाया जाता है। हर एक बात सहज है। सहज राजाई प्राप्त करते हैं। कहाँ के लिए? सतयुग के लिए। उनको जीवनमुक्ति कहा जाता है। वहाँ रावण के यह भूत होते नहीं। कोई को क्रोध आता है तो कहा जाता है तुम्हारे में यह भूत है। अच्छा बच्चों को समझाया है ओम् का अर्थ है मैं आत्मा फिर मेरा शरीर। हर एक के शरीर रूपी रथ में आत्मा रथी बैठी हुई है। आत्मा की ताकत से यह रथ चलता है। आत्मा को यह शरीर घड़ी-घड़ी लेना और छोड़ना पड़ता है। यह तो बच्चे जानते हैं भारत अभी दु:खधाम है। आधाकल्प पहले सुखधाम था। आलमाइटी गवर्मेन्ट थी क्योंकि आलमाइटी अथॉरिटी ने भारत में देवताओं के राज्य की स्थापना की। वहाँ एक धर्म था। आज से 5 हजार वर्ष पहले बरोबर लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वह राज्य स्थापन करने वाला जरूर बाप होगा। बाप से उनको वर्सा मिला हुआ है। उन्हों की आत्मा ने 84 जन्मों का चक्र लगाया है, भारतवासी ही इन वर्णों में आते हैं। अभी हैं शूद्र वर्ण में। शूद्र वर्ण के बाद सर्वोत्तम ब्राह्मण वर्ण आता है। ब्राह्मण वर्ण माना ब्रह्मा के मुख वंशावली हैं। प्रजापिता ब्रह्मा के जरूर एडाप्टेड बच्चे होंगे। बच्चे जानते हैं कि भारत पूज्य था, अब पुजारी है। बाप तो सदैव पूज्य है। वह आते जरूर हैं - पतितों को पावन बनाने। सतयुग है पावन दुनिया। सतयुग में पतित-पावनी गंगा, यह नाम ही नहीं होगा क्योंकि वह है ही पावन दुनिया। सभी पुण्य आत्मायें हैं। नो पापात्मा। कलियुग में फिर नो पुण्यात्मा। सब पाप आत्मायें हैं। पुण्य आत्मा पवित्र को कहा जाता है। भारत में ही बहुत दान-पुण्य करते हैं। इस समय जब बाप आते हैं तो उनके ऊपर बलि चढ़ते हैं। सन्यासी तो घरबार छोड़ जाते हैं। यहाँ तो कहते हैं बाबा यह सब कुछ आपका है। आपने सतयुग में हमें अथाह धन दिया था। फिर माया ने कौड़ी जैसा बना दिया है। अब यह आत्मा भी पतित हो गई है। तन-मन-धन सब पतित है। आत्मा पहले-पहले पवित्र रहती है फिर पार्ट बजाते-बजाते पतित बन जाती है। गोल्डन, सिल्वर... इन स्टेज़ेस में मनुष्य को आना है जरूर। सारा चक्र लगाकर पिछाड़ी में तमोप्रधान झूठा जेवर बनना है। सब आत्मायें ईश्वर के लिए झूठ बोलती रहती हैं क्योंकि उनको सिखाया गया है, ईश्वर सर्वव्यापी है। गाते भी हैं तुम मात-पिता... लक्ष्मी-नारायण के आगे भी जाकर यह महिमा करते हैं। परन्तु उनको तो अपना एक बच्चा एक बच्ची होता है। जैसा सुख राजा रानी को वैसा सुख बच्चों को रहता है। सबको सुख घनेरे हैं। अभी तो वह 84 वें अन्तिम जन्म में हैं। दु:ख घनेरे हैं।
बाप कहते हैं अब फिर से तुमको राजयोग सिखलाता हूँ। बच्चों को समझाया है कि इस रथ में रथी आत्मा बैठा हुआ है। यह रथी पहले 16 कला सम्पूर्ण था। अब नो कला। कहते भी हैं - मुझ निर्गुण हारे में अब कोई गुण नाही। आपेही तरस परोई... अर्थात् रहम करो। कोई में भी गुण नहीं हैं। बिल्कुल दु:खी, पतित हैं तब तो गंगा में पावन होने जाते हैं। सतयुग में नहीं जाते। नदी तो वही है ना। बाकी हाँ, ऐसे कहेंगे इस समय हर चीज़ तमोप्रधान है। सतयुग में नदियां भी बड़ी साफ स्वच्छ होंगी। नदियों में किचड़ा कुछ भी नहीं पड़ता। यहाँ तो देखो किचड़ा पड़ता रहता है। सागर में सारा गंद जाता है। सतयुग में ऐसा हो नहीं सकता। लॉ नहीं है। सब चीजें पवित्र रहती हैं। तो बाप समझाते हैं अभी सबका यह अन्तिम जन्म है। खेल पूरा होता है। इस खेल की लिमिट ही है 5 हजार वर्ष। यह निराकार शिवबाबा समझाते हैं। वह है निराकार सबसे ऊंच परमधाम में रहने वाला। परमधाम से तो हम सब आये हैं। अभी कलियुग अन्त में ड्रामा पूरा हो फिर से हिस्ट्री रिपीट होती है। मनुष्य जो भी गीता आदि शास्त्र पढ़ते आये हैं, वह बनते हैं द्वापर में। यह ज्ञान तो प्राय:लोप हो जाता है। कोई राजयोग सिखला न सके। उन्हों के यादगार लिए पुस्तक बनाते हैं। वह खुद तो पुनर्जन्म में आने लगे। उनके यादगार पुस्तक रहने लगे। अब देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है संगम पर। बाप आकर इस रथ में विराजमान होते हैं। घोड़े गाड़ी की बात नहीं है। इस रथ में, साधारण बूढ़े तन में प्रवेश करते हैं। वह है रथी। गाया भी जाता है ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचे। यह हैं मुख वंशावली ब्राह्मण। सब बच्चे कहते हैं हम ब्रह्मा की मुख वंशावली बी.के. हैं। यह ब्रह्मा भी एडाप्ट किया हुआ है। बाप खुद कहते हैं मैं इस रथ का रथी बनता हूँ, इसको ज्ञान देता हूँ। शुरू इनसे करता हूँ। कलष देता हूँ माताओं को। माता तो यह भी ठहरी ना। पहले-पहले यह बनते हैं फिर तुम। इनमें तो वह विराजमान हैं, परन्तु सामने किसको सुनायें। फिर आत्माओं से बैठ बात करते हैं। और कोई विद्वान आदि नहीं होगा जो ऐसे आत्माओं से बैठ बात करे कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। तुम आत्मायें निराकार हो। मैं भी निराकार हूँ। मैं ज्ञान सागर स्वर्ग का रचयिता हूँ। मैं नर्क नहीं रचता हूँ। यह तो रावण माया नर्क बनाती है। बाप कहते हैं मैं तो हूँ ही रचयिता तो जरूर स्वर्ग ही बनाऊंगा। तुम भारतवासी, स्वर्गवासी थे अब नर्कवासी बने हो। नर्कवासी बनाया रावण ने क्योंकि आत्मा रावण की मत पर चलती है। इस समय तुम आत्मायें राम शिवबाबा, श्री-श्री की श्रीमत पर चलते हो।
बाप समझाते हैं अब सबका पार्ट पूरा हुआ है, सब आत्मायें इकट्ठी होंगी। जब सब आ जायेंगे तब फिर जाना शुरू होगा। फिर विनाश शुरू हो जायेगा। भारत में अब अनेक धर्म हैं। सिर्फ एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं। कोई भी अपने को देवता नहीं कहते। देवताओं की महिमा भी गाई है सर्वगुण सम्पन्न..... फिर अपने को कहेंगे हम नींच पापी.. जो सतोप्रधान पूज्य थे, वह तमोप्रधान पुजारी बन पड़ते हैं। द्वापर से रावण का राज्य शुरू होता है। रामराज्य है ब्रह्मा का दिन, रावण राज्य है ब्रह्मा की रात। अब बाप कब आये? जब ब्रह्मा की रात पूरी हो तब तो आये ना। और इसी ब्रह्मा के तन में आये तब तो ब्रह्मा से ब्राह्मण पैदा हों। उन ब्राह्मणों को राजयोग सिखलाते हैं। बाप कहते हैं जो भी आकारी वा साकारी या निराकारी चित्र हों उनको तुम्हें याद नहीं करना है। तुमको तो लक्ष्य दिया जाता है, मनुष्य तो चित्र देख याद करते हैं। बाबा कहते हैं चित्रों को देखना बन्द करो। यह है भक्तिमार्ग। अभी तो तुम आत्माओं को वापिस मेरे पास आना है। पापों का बोझा सिर पर बहुत है। ऐसे नहीं, गर्भ जेल में हर जन्म के पाप खत्म हो जाते हैं। कुछ खत्म हो जाते हैं, कुछ रहते हैं। अब मैं पण्डा बनकर आया हूँ। इस समय सब आत्मायें माया की मत पर चलती हैं। परमात्मा सर्वव्यापी कहना यह माया की मत है। कभी कहते सर्वव्यापी है, कभी कहते 24 अवतार लेते हैं। बाप कहते हैं मैं सर्वव्यापी कहाँ हूँ। मैं तो हूँ ही पतित-पावन, स्वर्ग का रचयिता। मेरा धंधा ही है नर्क को स्वर्ग बनाना। गांधी चाहते थे - रामराज्य हो। अभी कहते हैं - आलमाइटी राज्य हो। वन रिलीजन हो। स्वर्ग में तो है ही एक धर्म, एक राज्य। वहाँ कोई पार्टीशन नहीं था। बाप कहते हैं मैं युनिवर्स का मालिक नहीं बनता हूँ। तुमको बनाता हूँ। फिर रावण आकर तुमसे राज्य छीनता है। अभी हैं सब तमोप्रधान, पत्थरबुद्धि। सतयुग में हैं पारसबुद्धि। यह बाप समझाते हैं, रथी बैठे हैं। आत्मा ही बात करती है तो इनकी आत्मा भी सुनती है। कहते हैं बच्चे कोई भी चित्र को नहीं देखो। मामेकम् याद करो, बुद्धियोग ऊपर लटकाओ। जहाँ जाना है उनको ही याद करना है। एक बाप बस दूसरा न कोई। वही सच्चा पातशाह है, सच सुनाने वाला। तो तुम्हें कोई भी चित्रों का सिमरण नहीं करना है। यह शिव का जो चित्र है उनका भी ध्यान नहीं करना है क्योंकि शिव ऐसा तो है नहीं। जैसे हम आत्मा हैं वैसे वह परम आत्मा है। जैसे आत्मा भ्रकुटी के बीच में रहती है वैसे बाबा भी कहते थोड़ी जगह आत्मा के बाजू में ले बैठ जाता हूँ। रथी बन इनको बैठ ज्ञान देता हूँ। इनकी आत्मा में ज्ञान नहीं था, पतित थी। जैसे इनकी आत्मा रथी बोलती है शरीर से। वैसे मैं भी इन आरगन्स से बोलता हूँ। नहीं तो कैसे समझाऊं। ब्राह्मण रचने लिए ब्रह्मा जरूर चाहिए। जो ब्रह्मा फिर नारायण बनेगा। अभी तुम ब्रह्मा की औलाद हो। फिर सूर्यवंशी श्री नारायण के घराने में आ जायेंगे। बच्चों को समझाया है यह शास्त्र आदि सब भक्तिमार्ग के हैं, फिर भी यही बनेंगे। जो पढ़ते-पढ़ते तमोप्रधान बन जाते हैं। सतयुग से त्रेता हुआ। त्रेता से द्वापर, कलियुग हुआ। पतित बनें तब तो पतित-पावन आकर पावन बनायेंगे ना। शास्त्र किसको पावन बना न सकें। अभी तो बिल्कुल ही कंगाल बन पड़े हैं। लड़ते झगड़ते रहते हैं। बन्दर से भी बदतर हैं। बन्दर में 5 विकार बहुत कड़े होते हैं। देह अहंकार भी बन्दर जैसा और कोई में नहीं होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह सब विकार बन्दर में ऐसे होते हैं, बात मत पूछो। बच्चा मरेगा तो उनकी हड्डियों को भी छोड़ेंगे नहीं। मनुष्य भी आजकल ऐसे हैं। बच्चा मरा तो 6-8 मास रोते रहेंगे। सतयुग में तो अकाले मृत्यु होता नहीं। न कोई रोते पीटते। वहाँ कोई शैतान होते नहीं। बाप इस समय बच्चों से बात कर रहे हैं। भल घरबार भी सम्भालो, उसमें रहते हुए ऐसे कमाल कर दिखाओ, जो सन्यासी कर न सकें। यह सतोप्रधान सन्यास परमात्मा ही सिखलाते हैं। कहते हैं यह पुरानी दुनिया अब खत्म होती है, इसलिए इनसे ममत्व मिटाओ। सबको वापिस आना है। देह सहित जो भी पुरानी चीजें हैं उनको भूल जाओ। यह 5 विकार मुझे दे दो। अगर अपवित्र बनेंगे तो पवित्र दुनिया में आ नहीं सकेंगे। बाप से प्रतिज्ञा करो, इस अन्तिम जन्म के लिए। फिर तो पवित्रता कायम हो ही जायेगी, 63 जन्म तुम विकारों में गोते खाकर एकदम गन्दे बन पड़े हो। अपने धर्म, कर्म को भूल गये हो। हिन्दू धर्म कहते रहते हो। बाप कहते हैं तुम तो बेसमझ बन गये हो, क्यों नहीं समझते हो भारत स्वर्ग था, हम ही देवता थे। मैंने तुमको राजयोग सिखाया। तुम फिर कहते हो कृष्ण सभी का बाप स्वर्ग का रचयिता है। बाप तो निराकार सब आत्माओं का बाप है। फिर उनके लिए कहते हो कि सर्वव्यापी है। तुम अपने बाप को गाली देते हो। शिव शंकर को मिला दिया है, कितनी ग्लानि कर दी है। शिव तो है परमात्मा। कहते हैं मैं आता ही हूँ देवी-देवता धर्म स्थापन करने। फिर विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण राज्य करेंगे। सचखण्ड स्थापन करने वाला एक ही सतगुरू है। वह इस रथ में रथी हैं। इसे नंदीगण भी कहते हैं, भागीरथ भी कहते हैं। तुम अर्जुनों को कहते हैं मैं इस रथ में आया हूँ, युद्ध के मैदान में तुमको माया पर जीत पहनाने। सतयुग में न रावण होता, न जलाते। अभी तो रावण को जलाते ही रहेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कोई भी चित्र का सिमरण नहीं करना है। विचित्र बाप को बुद्धि से याद करना है। बुद्धि योग ऊपर लटकाना है।
2) वापस घर चलना है इसलिए देह सहित सब पुरानी चीजों से ममत्व निकाल देना है। सम्पूर्ण पावन बनना है।

वरदान: संस्कार मिटाने और मिलाने में एवररेडी रहने वाले रूहानी सेवाधारी भव
जैसे स्थूल सेवा में सदा एवररेडी रहते हो, जहाँ बुलावा होता है वहाँ पहुंच जाते हो। ऐसे मन्सा से भी जो संकल्प धारण करने चाहो उसमें भी एवररेडी रहो। जो सोचो उसी समय वह करो। रूहानी सेवाधारी बच्चे रूहानी संबंध और सम्पर्क निभाने में एवररेडी। उन्हें संस्कार मिटाने वा संस्कार मिलाने में टाइम नहीं लगता। जैसे बाप के संस्कार वैसे आप के भी संस्कार हो। यह संस्कार मिलाना बड़े से बड़ी रास है।

स्लोगन: प्योरिटी की रॉयल्टी का अनुभव करना और कराना ही रॉयल आत्मा की निशानी है।
  

Sunday, 11 February 2018

Hindi Murli 12/02/18

12-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - तुम्हारा फ़र्ज है एक दो को बाप और वर्से की याद दिलाकर सावधान करना, इसमें ही सबका कल्याण समाया हुआ है''

प्रश्न: तुम बच्चे किस एक गुह्य राज़ को समझते हो जो कोई साइन्सदान भी नहीं समझ सकते?
उत्तर: तुम समझते हो कि आत्मा अति सूक्ष्म स्टार है, उसमें ही सब संस्कार भरे हुए हैं। वही शरीर द्वारा अपना-अपना पार्ट बजा रही है। शरीर जड़ है, आत्मा चैतन्य है। ऐसे ही फिर परमात्मा भी स्टार है, उसमें सारी नॉलेज है। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सत है, चैतन्य है। वह कोई हजारों सूर्यों से तेजोमय नहीं है। यह गुह्य राज़ तुम बच्चे समझते हो। साइन्सदान इन बातों को नहीं समझ सकते। तुम्हें सबको आत्मा और परमात्मा की पहचान पहले-पहले देनी है।

गीत:- माता ओ माता तू सबकी भाग्य विधाता..
ओम् शान्ति। बाप बच्चों प्रति कहे कि बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी भव। यह बाप ने बच्चों को सावधानी दी। बच्चों को भी एक दो को सावधानी देनी है। बाप को याद करने से झट वह नशा चढ़ जाता है। स्मृति दिलाने के लिए एक दो को सावधान करना है। जैसे आपस में मिलते हैं तो नमस्ते आदि करते हैं ना। परन्तु उनसे कोई कल्याण नहीं होता है। कल्याण तब होगा जब तुम बच्चे एक दो को सावधानी देंगे। स्वदर्शन चक्रधारी अक्षर में सब कुछ आ जाता है। बाप का परिचय, मर्तबे का परिचय, चक्र का भी परिचय आ गया। तो एक दो को सावधानी देना पहला फ़र्ज है। याद कराने से खबरदार हो जायेंगे। घड़ी-घड़ी एक दो को सावधान करना है। बाप और वर्से को याद करते रहो। स्वदर्शन चक्रधारी हो, अपने को अशरीरी समझ, अशरीरी बाप को याद करते हो। याद अर्थात् योग। योग से ही तुम्हारी निरोगी काया बनती है। यह अभी का पुरुषार्थ है। अन्त में जब एकदम कर्मातीत अवस्था हो जायेगी तब निरोगी बनेंगे। अभी तो पुरुषार्थी हैं। अभी बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं क्योंकि जानते हैं सभी बेसमझ हैं। जब देवताओं आदि की पूजा करते हैं, उन्हों के आक्यूपेशन का कोई को पता नहीं है, तो तुमको समझाना है - हम सबकी बायोग्राफी बता सकते हैं। पहले तो मुख्य परमपिता परमात्मा को जानना है। उसमें भी बहुत मनुष्य मूँझते हैं। कहते हैं परमात्मा का कोई नाम रूप नहीं है। तो पहली-पहली मुख्य बात है आत्मा परमात्मा का भेद और ज्ञान बताना। यह तो जानते हैं सब आत्मा हैं। पुण्य आत्मा, पाप आत्मा कहा जाता है। पाप परमात्मा नहीं कहेंगे। पतित दुनिया है ना। परमात्मा तो पतित नहीं होता, इसलिए मनुष्य को पहले-पहले आत्मा को जानना है क्योंकि आत्मा का ज्ञान कोई भी मनुष्य में नहीं है। आत्मा ही सुनती है, आत्मायें खाती-पीती, सब कुछ करती हैं इन आरगन्स द्वारा। आत्मा का रूप क्या है? कहते हैं चमकता है भ्रकुटी के बीज में अजब सितारा। तो आत्मा का रूप समझाना पड़े ना। आत्मा का रूप कोई इतना बड़ा तो नहीं है। आत्मा अति सूक्ष्म है। आत्मा का रूप है जीरो अथवा बुरी (बिन्दी) भी कहते हैं। अब इस पर भी विचार करना चाहिए कि आत्मा कितनी सूक्ष्म है। मनुष्य पूछते हैं आत्मा शरीर से कैसे निकलती है? कहाँ से निकलती है? कोई कहते हैं कि खोपड़ी से निकलती, कोई कहते आंखों से निकलती.... क्योंकि दरवाजे तो बहुत हैं ना। परन्तु आत्मा है क्या चीज़, यह जानना बड़ा वन्डरफुल है। तो पूछते हैं आत्मा निकलती कैसे है, यह नहीं कहते आत्मा आती कैसे है। परन्तु पहले तो मालूम होना चाहिए कि आत्मा क्या चीज़ है। कितनी छोटी सी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। यह बातें मोस्ट वण्डरफुल हैं। आत्मा है तो बरोबर स्टार मुआफिक। उसको बड़ा नहीं कहेंगे। एरोप्लेन ऊपर जाने से बहुत छोटा दिखाई पड़ता है। परन्तु आत्मा बड़ी नहीं होती। उनका तो एक ही रूप है। तो पहले-पहले आत्मा को जानना चाहिए। मैं आत्मा कैसे इस शरीर में प्रवेश करता हूँ। भल कोई-कोई को साक्षात्कार होता है, जैसे स्टार है। उस छोटी सी आत्मा में सब नॉलेज भरी हुई है। आत्मा है एक ही। यह बड़ा वन्डर है। परमात्मा के रूप का भी किसको पता नहीं है। वास्तव में जैसी आत्मा है, वैसे ही परमपिता परमात्मा है। वह भी बाप है। भल यहाँ बाप और बच्चा छोटा बड़ा होता है, परन्तु आत्मा छोटी-बड़ी नहीं हो सकती। आत्मा और परमात्मा के रूप में कोई भेद नहीं है। बाकी दोनों के पार्ट में, संस्कारों में भेद है। बाप समझाते हैं मेरे में क्या संस्कार हैं। तुम आत्माओं में क्या संस्कार हैं? मनुष्य आत्मा और परमात्मा के रूप को न जानने कारण आत्मा-परमात्मा एक कह देते हैं। बड़ा घोटाला कर दिया है। जानना बहुत जरूरी है। परमात्मा भी है, ब्रह्मा विष्णु शंकर भी हैं, इन सबमें आत्मा है। जगत अम्बा सरस्वती को गॉडेज आफ नॉलेज कहते हैं। तो जरूर सरस्वती की आत्मा में नॉलेज होगी। परन्तु उनमें कौन सी नॉलेज है, यह कोई को पता नहीं है। सिर्फ कह देते हैं गॉडेज ऑफ नॉलेज। अखबारों में आर्टिकल्स आदि पड़ते हैं तो उस पर समझाना चाहिए। तुम कहते हो सरस्वती गॉडेज ऑफ नॉलेज परन्तु उसने कौन सी नॉलेज दी? कब दी? उनको जरूर गॉड से नॉलेज मिली होगी ना। गॉड का रूप क्या है? गॉडेज ऑफ नॉलेज यह नाम कैसे पड़ा? नॉलेजफुल तो गॉड है। उसने सरस्वती को नॉलेजफुल कैसे बनाया? एक ही बात पर किसको संगम पर खड़ा कर देना चाहिए।
बाबा कहते हैं हम समझाते हैं, बाकी लिखने के लिए तो संजय (जगदीश भाई निमित्त रहे) है। यह है नम्बरवन मुख्य एक्टर। यह तो बाबा के साथ राइटहैण्ड होना चाहिए। परन्तु ड्रामा की भावी ऐसी है जो इनको देहली में भी रहना होता है। कल्प पहले वाला पार्ट है। अर्जुन का नाम मुख्य गाया हुआ है। अब तुम बच्चे हर बात का अर्थ समझते हो। पहले-पहले तो आत्मा और परमात्मा को समझना है।
बाप ने बच्चों को समझाया है - आत्मा स्टार है। उसमें सारी नॉलेज कैसे भरी हुई है। यह कोई साइन्स-दान भी समझ नहीं सकेंगे। आत्मा में ही सब संस्कार रहते हैं। अब आत्मा तो स्टार है। अच्छा परमात्मा का रूप क्या है? वह भी परम आत्मा ही है। फ़र्क नहीं है। यह जो महिमा गाते हैं वह हजारों सूर्यों से तीखा है, ऐसा नहीं है। बाप कहते हैं सिर्फ तुम्हारी आत्मा में नॉलेज नहीं है, मैं परमात्मा नॉलेजफुल हूँ - बस यह फ़र्क है। माया ने तुम्हारी आत्मा को पतित बना दिया है। बाकी कोई दीवा नहीं है, बुझा हुआ। सिर्फ आत्मा से नॉलेज निकल गई है - बाप और रचना की। सो अब तुमको नॉलेज मिल रही है। बाबा में नॉलेज है, वह भी आत्मा है। कोई बड़ी नहीं है। उनको भी नॉलेजफुल, सरस्वती को भी नॉलेजफुल कहा जाता है। अब उनको नॉलेज कब मिली? सरस्वती किसकी बच्ची है? यह कोई जानते नहीं हैं। तो दिल में आना चाहिए, उन्हों को कैसे समझायें। बाप परमात्मा कौन है, वह भी समझाना है कि वह स्टार है, उसमें सारी नॉलेज है। गॉड फादर मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। सबका बेहद का बाप है। वह सत है, चैतन्य है, उनमें सच्ची नॉलेज है। उनको ट्रुथ भी कहते हैं। और कोई में सच्ची नॉलेज है नहीं। रचयिता एक बाप है। तो सारी रचना की नॉलेज भी उनमें ही है। झाड़ का बीजरूप है ना। आत्मा तो चैतन्य हैं। शरीर तो जड़ है। जब आत्मा आती है तब यह चैतन्य होता है। तो बाप समझाते हैं मैं भी वही हूँ। आत्मा छोटी बड़ी हो नहीं सकती। जैसे तुम आत्मा हो वैसे परम आत्मा यानी परमात्मा है, फिर उनकी महिमा सबसे ऊंच हैं। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। मनुष्य ही उनको याद करते हैं। यह तो जानते हैं बाप ऊपर में रहते हैं। आत्मा इन आरगन्स द्वारा कहती है हे परमपिता परमात्मा। मनुष्य यह नहीं जानते हैं क्योंकि देह-अभिमानी हैं। तुम अब देही-अभिमानी बने हो। अपने को आत्मा निश्चय करते हो। तुम जानते हो गॉड तो निराकार को ही कहा जाता है। हम उनकी सन्तान हैं। वह गॉड ही आकर नॉलेज देते हैं। उनको नॉलेजफुल, ब्लिसफुल कहा जाता है। रहम का सागर, सुख का सागर, शान्ति का सागर.. यह महिमा दी गई है। तो जरूर बाप से बच्चों को वर्सा मिलना है। उन्होंने कोई समय आकर वर्सा दिया है तब महिमा गाई जाती है। देवताओं की महिमा अलग है। बाप की महिमा अलग है। सब आत्माओं का वह बाप है। क्रियेटर होने के कारण उनको बीजरूप कहा जाता है। पहले-पहले बाप का परिचय देना है। शास्त्रों में दिखाते हैं - अंगुष्ठे मिसल है। हम कहते हैं वह ज्योर्तिबिन्दू है। चित्र भी बनाया है। परन्तु इतना बड़ा तो वह है नहीं। वह तो अति सूक्ष्म है। तो क्या समझायें? तुमको कहेंगे चित्र में इतना बड़ा रूप क्यों दिखाया है? बोलो नहीं तो क्या रखें। वह तो एक बिन्दी है फिर उनकी पूजा कैसे करेंगे? उन पर दूध कैसे चढ़ायेंगे? पूजा के लिए यह रूप बनाया हुआ है। बाकी यह समझते हैं कि वह है परमपिता परम आत्मा परमधाम में रहने वाले। वह परमधाम है हमारा स्वीट होम। निराकारी दुनिया, मूलवतन, सूक्ष्मवतन फिर स्थूलवतन। बाप निराकारी दुनिया में रहते हैं। आत्मा कहती है हम निर्वाणधाम में जावें। जहाँ यह आरगन्स न हों। आत्मा ही आकर शरीर धारण करती है। अब यह कैसे समझायें कि आत्मा कहाँ से जाती है। यह तो जानते हैं पिण्ड में आत्मा प्रवेश होने से चैतन्य बन जाती है। चीज़ कितनी सूक्ष्म है। उसी में सारे संस्कार भरे हुए हैं। फिर एक-एक जन्म के संस्कार प्रगट होते जायेंगे। तो बाप समझाते हैं हर एक बात को अच्छी रीति समझना है। सरस्वती की बात पर भी समझा सकते हैं। वह किसकी बच्ची है? इस समय तुमको तो गॉडेज कह न सकें। सरस्वती है ब्रह्मा की बेटी। तो जरूर वह भी गॉड आफ नॉलेज ठहरा। ब्रह्मा के मुख कमल से दिखाते हैं ज्ञान दिया। तो ब्रह्मा का भी नाम है ना। इस समय तुम हो ब्राह्मण। भल आत्मा प्योर होती जाती है परन्तु शरीर तो प्योर हो नहीं सकता। यह तमोप्रधान शरीर है। तो बाप समझाते हैं - बच्चे एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। बाप और वर्से को याद करते हो? स्वदर्शन चक्र को याद करते हो? बाबा कहते हैं एक भी ऐसे सावधानी नहीं देते होंगे। बाप को याद करते-करते नींद को जीतने वाला बनना है, इसमें तो बहुत कमाई है। कमाई में कभी थकावट नहीं होती है। परन्तु स्थूल काम भी करने पड़ते हैं इसलिए थकावट भी होती है।
बाप समझाते हैं रात को भी जागकर बाबा से बातें करते, ज्ञान सागर में डुबकी लगानी होती है। जैसे एक जानवर होता है, पानी में डुबकी लगाता है। तो ऐसे डुबकी मारने से, विचार सागर मंथन करने से देखते हैं कि बहुत प्वाइंट्स आती हैं। कहाँ-कहाँ से निकल आती हैं। इसको कहा जाता है रात को जागकर ज्ञान का विचार सागर मंथन करना। मनुष्य बिल्कुल ही नहीं जानते हैं, उन्हों को समझाना है। बाप ज्ञान का सागर है, उनसे वर्सा मिलना है। जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले सतयुग में थे, उन्हों को जरूर वर्सा मिला होगा ना। अब सारी राजधानी को वर्सा कैसे मिला? कलियुग से सतयुग होने में देरी तो नहीं लगती। रात पूरी हो दिन होता है। कहाँ आइरन एजेड वर्ल्ड दु:खधाम, कहाँ वह सुखधाम। ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात - कितना फर्क है! अभी गॉड फादर से तुमको नॉलेज मिल रही है। सरस्वती क्या करती थी? किसको पता नहीं। बस गॉडेज ऑफ नॉलेज सरस्वती का चित्र मिला और खुश हो गये। तो उन्हों को सावधान करना पड़ता है। परमात्मा का परिचय देना पड़े। फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर का भी परिचय देना है। बाप ने आकर यह नॉलेज दे नर से नारायण बनाया है। बड़ा युक्ति से हर एक का आक्यूपेशन बताना है। सरस्वती भी ब्रह्मा मुख वंशावली है। तो जरूर परमपिता परमात्मा आया उसने ब्रहमा द्वारा मुख वंशावली रची। पहले-पहले नॉलेज किसको दी? कहते हैं कलष सरस्वती को दिया। बीच से ब्रह्मा को गुम कर दिया है। यह किसको पता नहीं है कि ब्रह्मा तन में आकर माताओं को कलष दिया है तो जरूर ब्रह्मा भी सुनते होंगे ना। ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र भी दिखाते हैं। ब्रह्मा की मत मशहूर है। तो वह भी सभी वेदों शास्त्रों के सार की मत देता होगा। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा समझाते हैं। ब्रह्मा कहाँ से आया? यह रथ कहाँ से निकला? कोई नहीं जानते। बाबा ने अभी बताया है जो तुम समझा सकते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) रात को जागकर ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है। ज्ञान सागर में डुबकी लगानी है। बाप को याद करते नींद को जीतने वाला बनना है।
2) स्वदर्शन चक्र फिराते रहना है। आपस में बाप और वर्से की याद दिलाते एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है।

वरदान: अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा हर कार्य में सफलता प्राप्त करने वाले मास्टर दाता भव
सेवा की अविनाशी सफलता के लिए मास्टर दाता बन सर्व को सहयोग दो। बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगड़े हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना - यह है बड़े से बड़ी देन। इसने यह कहा, यह किया, यह देखते सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा परिवर्तन कर देना। किसी द्वारा कोई शक्ति की कमी भी महसूस हो तो अपने सहयोग से जगह भर देना - यही है मास्टर दाता बनना।

स्लोगन: सदा हर्षित रहना है तो विश्व ड्रामा की हर सीन को साक्षी होकर देखो। 

Saturday, 10 February 2018

Hindi Murli 11/02/18

11-02-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 30-04-83 मधुबन

“परम पूज्य बनने का आधार”
सभी मधुबन महान तीर्थ पर मेला मनाने के लिए चारों ओर से पहुँच गये हैं। इसी महान तीर्थ के मेले की यादगार अभी भी तीर्थ स्थानों पर मेले लगते रहते हैं। इसी समय का हर श्रेष्ठ कर्म का यादगार चरित्रों के रूप में, गीतों के रूप में अभी भी देख और सुन रहे हो। चैतन्य श्रेष्ठ आत्मायें अपना चित्र और चरित्र देख सुन रही हैं। ऐसे समय पर बुद्धि में क्या श्रेष्ठ संकल्प चलता है? समझते हो ना कि हम ही थे, हम ही अब हैं और कल्प-कल्प हम ही फिर होंगे। यह ‘फिर से' की स्मृति और नॉलेज और किसी भी आत्मा को, महान आत्मा को, धर्म आत्मा को वा धर्म पिता को भी नहीं है। लेकिन आप सब ब्राह्मण आत्माओं को इतनी स्पष्ट स्मृति है वा स्पष्ट नॉलेज है जैसे 5000 वर्ष की बात कल की बात है। कल थे आज हैं फिर कल होंगे। तो आज और कल इन दोनों शब्दों मे 5000 वर्ष का इतिहास समाया हुआ है। इतना सहज और स्पष्ट अनुभव करते हो! कोई होंगे वा हम ही थे, हम ही हैं! जड़ चित्रों में अपने चैतन्य श्रेष्ठ जीवन का साक्षात्कार होता है? वा समझते हो कि यह महारथियों के चित्र हैं, वा आप सबके हैं? भारत में 33 करोड़ देवताओं को नमस्कार करते हैं अर्थात् आप श्रेष्ठ ब्राह्मण सो देवताओं के वंश के भी वंश, उनके भी वंश, सभी का पूजन नहीं तो गायन तो करते ही हैं। तो सोचो जो स्वयं पूर्वज हैं उन्हों का नाम कितना श्रेष्ठ होगा! और पूजन भी पूर्वजों का कितना श्रेष्ठ होगा। 9 लाख का भी गायन है। उससे आगे 16 हजार का गायन है फिर 108 का है फिर 8 का है। उससे आगे युगल दाने का है। नम्बरवार हैं ना। गायन तो सभी का है क्योंकि जो भाग्य विधाता बाप के बच्चे बने, इस भाग्य के कारण उन्हों का गायन और पूजन दोनों होता है लेकिन पूजन में दो प्रकार का पूजन है। एक है प्रेम की विधि पूर्वक पूजन और दूसरा है सिर्फ नियम पूर्वक पूजन। दोनों में अन्तर है ना। तो अपने से पूछो मैं कौन सी पूज्य आत्मा हूँ। पहले भी सुनाया था कि कोई-कोई भक्त, देवता नाराज न हो जाए इस भय से पूजा करते हैं। और कोई-कोई भक्त दिखावा मात्र भी पूजा करते हैं। और कोई-कोई समझते हैं भक्ति का नियम वा फर्ज निभाना है। चाहे दिल हो या न हो लेकिन निभाना है। ऐसे फर्ज समझ करते हैं। चारों ही प्रकार के भक्त किसी न किसी प्रकार से बनते हैं। यहाँ भी देखो देव आत्मा बनने वाले, ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाने वाले भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं ना। नम्बरवन पूज्य सदा सहज स्नेह से और विधि पूर्वक याद और सेवा वा योगी आत्मा, दिव्यगुण धारण करने वाली आत्मा बन चल रहे हैं। चार सबजेक्ट विधि और सिद्धि प्राप्त किये हुए हैं। दूसरे नम्बर के पूज्य विधि पूर्वक नहीं लेकिन नियम समझ करके करेंगे, चार ही सबजेक्ट पूरे लेकिन विधि सिद्धि के प्राप्ति स्वरूप हो करके नहीं। लेकिन नियम समझकर चलना ही है, करना ही है, इसी लक्ष्य से जितना कायदा उतना फायदा प्राप्त करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। वह दिल का स्नेह स्वत: और सहज बनाता है और नियम पूर्वक वालों को कभी सहज कभी मुश्किल लगता। कभी मेहनत करनी पड़ती और कभी मुहब्बत की अनुभूति होती। नम्बरवन लवलीन रहते, नम्बर दो लव में रहते। नम्बर तीसरा - मैजारटी समय चारों ही सबजेक्ट दिल से नहीं लेकिन दिखावा मात्र करते हैं। याद में भी बैठेंगे - नामीग्रामी बनने के भाव से। ऐसे दिखावा मात्र सेवा भी खूब करेंगे। जैसा समय वैसा अल्पकाल का रूप भी धारण कर लेंगे लेकिन दिमाग तेज़ और दिल खाली। नम्बर चौथा - सिर्फ डर के मारे कोई कुछ कह न दे कि यह तो है ही लास्ट नम्बर का वा यह आगे चल नहीं सकता, ऐसे कोई इस नज़र से नहीं देखे। ब्राह्मण तो बन ही गये और शूद्र जीवन भी छोड़ ही चले। ऐसा न हो कि दोनों तरफ से छूट जाएं। शूद्र जीवन भी पसन्द नहीं और ब्राह्मण जीवन में विधि पूर्वक चलने की हिम्मत नहीं इसलिए मजबूरी मजधार में आ गये। ऐसे मजबूरी वा डर के मारे चलते ही रहते। ऐसे कभी-कभी अपने श्रेष्ठ जीवन का अनुभव भी करते हैं इसलिए इस जीवन को छोड़ भी नहीं सकते। ऐसे को कहेंगे चौथे नम्बर की पूज्य आत्मा। तो उन्हों की पूजा कभी-कभी और डर के मारे, मजबूरी भक्त बन निभाना है, इसी प्रमाण चलती रहती। और दिखावा वाले की भी पूजा दिल से नहीं लेकिन दिखावा मात्र होती। इसी प्रमाण चलते रहते। तो चार ही प्रकार के पूज्य देखे हैं ना। जैसा अभी स्वयं बनेंगे वैसे ही सतयुग त्रेता की रॉयल फैमली वा प्रजा उसी नम्बर प्रमाण बनेगी और द्वापर कलियुग में ऐसे ही भक्त माला बनेगी। अभी अपने आप से पूछो मैं कौन! वा चारों में ही कभी कहाँ, कभी कहाँ चक्र लगाते हो। फिर भी भाग्य विधाता के बच्चे बने, पूज्य तो जरूर बनेंगे। नामीग्रामी अर्थात् श्रेष्ठ पूज्य 16 हजार तक नम्बरवार बन जाते हैं। बाकी 9 लाख लास्ट समय तक अर्थात् कलियुग के पिछाड़ी के समय तक थोड़े बहुत पूज्य बन जाते हैं। तो समझा गायन तो सबका होता है। गायन का आधार है भाग्य विधाता बाप का बनना और पूजन का आधार है चारों सबजेक्ट में पवित्रता, स्वच्छता, सच्चाई, सफाई। ऐसे पर बापदादा भी सदा स्नेह के फूलों से पूजन अर्थात् श्रेष्ठ मानते हैं। परिवार भी श्रेष्ठ मानते हैं और और विश्व भी वाह-वाह के नगाड़े बजाए उन्हों की मन से पूजा करेगा। और भक्त तो अपना ईष्ट समझ दिल में समायेंगे। तो ऐसे पूज्य बने हो? जब है ही परमपिता। सिर्फ पिता नहीं है लेकिन परम है तो बनायेंगे भी परम ना! पूज्य बनना बड़ी बात नहीं है लेकिन परम पूज्य बनना है।
बापदादा भी बच्चों को देख हर्षित होते हैं। मुहब्बत में मेहनत को महसूस न कर पहुँच जाते हैं। अभी तो रेस्ट हाउस में आ गये ना! तन-मन दोनों के लिए रेस्ट है ना! रेस्ट माना सोना नहीं। सोना बनने की रेस्ट में आये हैं। पारसपुरी में आ गये हो ना। जहाँ संग ही पारस आत्माओं का है, वायुमण्डल ही सोना बनाने वाला है। बातें ही दिन रात सोना बनने की हैं। अच्छा -
ऐसे सदा परम पूज्य आत्माओं को, सदा विधि द्वारा श्रेष्ठ सिद्धि को पाने वाले, सदा महान बन महान आत्मायें बनाने वाले, स्वयं को सदा सहज और स्वत: योगी, निरन्तर योगी, स्नेह सम्पन्न योगी, अनुभव करने वाले, ऐसी सर्व श्रेष्ठ आत्माओं को, चारों ओर के आकारी रूपधारी समीप बच्चों को, ऐसे साकारी आकारी सर्व सम्मुख उपस्थित हुए बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दीदी-दादी जी से:- सभी परमपूज्य हो ना! पूजा अच्छी हो रही है ना! बापदादा को तो अनन्य बच्चों पर नाज़ है। बाप को नाज़ है और बच्चों में राज़ हैं। जो राज़युक्त हैं उन बच्चों पर बाप को सदा नाज़ है। राज़युक्त, योगयुक्त, गुण युक्त... सबका बैलेन्स रखने वाले सदा बाप की ब्लैसिंग की छाया में रहने वाले। ब्लैसिंग की सदा ही वर्षा होती रहती है। जन्मते ही यह ब्लैसिंग की वर्षा शुरू हुई है और अन्त तक इसी छत्रछाया के अन्दर गोल्डन फूलों की वर्षा होती रहेगी। इसी छाया के अन्दर चले हैं, पले हैं और अन्त तक चलते रहेंगे। सदा ब्लैसिंग के गोल्डन के फूलों की वर्षा। हर कदम बाप साथ है अर्थात् ब्लैसिंग साथ है। इसी छाया में सदा रहे हो (दादी से) शुरू से अथक हो, अथक भव का वरदान है इसलिए करते भी नहीं करते, यह बहुत अच्छा। फिर भी अव्यक्त होते समय जिम्मेवारी का ताज तो डाला है ना। इनको (दीदी को) साकार के साथ-साथ सिखाया और आपको अव्यक्त होने समय सेकेण्ड में सिखाया। दोनों को अपने-अपने तरीके से सिखाया। यह भी ड्रामा का पार्ट है। अच्छा!
विदाई के समय 6.30 बजे सुबह :-
संगमयुग की सब घड़ियाँ गुडमार्निंग ही हैं क्योंकि संगमयुग पूरा ही अमृतवेला है। चक्र के हिसाब से संगमयुग अमृतवेला हुआ ना। तो संगमयुग का हर समय गुडमार्निंग ही है। तो बापदादा आते भी गुडमार्निंग में हैं, जाते भी गुडमार्निंग में हैं क्योंकि बाप आता है तो रात से अमृतवेला बन गया। तो आते भी अमृतवेले में हैं और जब जाते हैं तो दिन निकल आता है लेकिन रहता अमृतवेले में ही है, दिन निकलता तो चला जाता है। और आप लोग सवेरा अर्थात् सतयुग का दिन ब्रह्मा का दिन, उसमें राज्य करते हो। बाप तो न्यारे हो जायेंगे ना। तो पुरानी दुनिया के हिसाब से सदा ही गुडमार्निंग है। सदा ही शुभ है और सदा शुभ रहेगा इसलिए शुभ सवेरा कहें, शुभ रात्रि कहें शुभ दिन कहें सब शुभ ही शुभ है। तो सभी को कलियुग के हिसाब से गुडमार्निंग और संगमयुग के हिसाब से गुडमार्निंग तो डबल गुडमार्निंग। अच्छा -
अव्यक्त महावाक्य - याद को ज्वाला स्वरूप बनाओ
बाप समान पाप कटेश्वर वा पाप हरनी तब बन सकते हो, जब आपकी याद ज्वाला स्वरूप हो। ऐसी याद ही आपके दिव्य दर्शनीय मूर्त को प्रत्यक्ष करेगी। इसके लिए कोई भी समय साधारण याद न हो। सदा ज्वाला स्वरूप, शक्ति स्वरूप याद में रहो। स्नेह के साथ शक्ति रूप कम्बाइन्ड हो। वर्तमान समय संगठित रुप के ज्वाला स्वरुप की आवश्यकता है। ज्वाला स्वरूप की याद ही शक्तिशाली वायुमण्डल बनायेगी और निर्बल आत्मायें शक्ति सम्पन्न बनेंगी। सभी विघ्न सहज समाप्त हो जायेंगे और पुरानी दुनिया के विनाश की ज्वाला भड़केगी। जैसे सूर्य विश्व को रोशनी की और अनेक विनाशी प्राप्तियों की अनुभूति कराता है। ऐसे आप बच्चे अपने महान तपस्वी रुप द्वारा प्राप्ति के किरणों की अनुभूति कराओ। इसके लिए पहले जमा का खाता बढ़ाओ। जैसे सूर्य की किरणें चारों ओर फैलती हैं, ऐसे आप मास्टर सर्वशक्तिवान् की स्टेज पर रहो तो शक्तियों व विशेषताओं रुपी किरणें चारों ओर फैलती अनुभव करेंगे।
ज्वाला-रुप बनने का मुख्य और सहज पुरुषार्थ - सदा यही धुन रहे कि अब वापिस घर जाना है और सबको साथ ले जाना है। इस स्मृति से स्वत: ही सर्व-सम्बन्ध, सर्व प्रकृति की आकर्षण से उपराम अर्थात् साक्षी बन जायेंगे। साक्षी बनने से सहज ही बाप के साथी वा बाप-समान बन जायेंगे। ज्वाला स्वरुप याद अर्थात् लाइट हाउस और माइट हाउस स्थिति को समझते हुए इसी पुरुषार्थ में रहो। विशेष ज्ञान-स्वरुप के अनुभवी बन शक्तिशाली बनो। जिससे आप श्रेष्ठ आत्माओं की शुभ वृत्ति व कल्याण की वृत्ति और शक्तिशाली वातावरण द्वारा अनेक तड़पती हुई, भटकती हुई, पुकार करने वाली आत्माओं को आनन्द, शान्ति और शक्ति की अनुभूति हो। जैसे अग्नि में कोई भी चीज़ डालने से उसका नाम, रूप, गुण सब बदल जाता है, ऐसे जब बाप के याद की लगन की अग्नि में पड़ते हो तो परिवर्तन हो जाते हो! मनुष्य से ब्राह्मण बन जाते, फिर ब्राह्मण से फरिश्ता सो देवता बन जाते। जैसे कच्ची मिट्टी को साँचे में ढालकर आग में डालते हैं तो ईट बन जाती, ऐसे यह भी परिवर्तन हो जाता। इसलिए इस याद को ही ज्वाला रूप कहा जाता है। सेवाधारी हो, स्नेही हो, एक बल एक भरोसे वाले हो, यह तो सब ठीक है, लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज अर्थात् लाइट माइट हाउस की स्टेज, स्टेज पर आ जाए, याद ज्वाला रूप हो जाए तो सब आपके आगे परवाने के समान चक्र लगाने लग जाएं। ज्वाला स्वरूप याद के लिए मन और बुद्धि दोनों को एक तो पावरफुल ब्रेक चाहिए और मोड़ने की भी शक्ति चाहिए। इससे बुद्धि की शक्ति वा कोई भी एनर्जी वेस्ट ना होकर जमा होती जायेगी। जितनी जमा होगी उतना ही परखने की, निर्णय करने की शक्ति बढ़ेगी। इसके लिए अब संकल्पों का बिस्तर बन्द करते चलो अर्थात् समेटने की शक्ति धारण करो। कोई भी कार्य करते वा बात करते बीच-बीच में संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप करो। एक मिनट के लिए भी मन के संकल्पों को, चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को बीच में रोक कर भी यह प्रैक्टिस करो तब बिन्दू रूप की पावरफुल स्टेज पर स्थित हो सकेंगे। जैसे अव्यक्त स्थिति में रह कार्य करना सरल होता जा रहा है वैसे ही यह बिन्दुरुप की स्थिति भी सहज हो जायेगी। जैसे कोई भी कीटाणु को मारने के लिए डॉक्टर लोग बिजली की रेज़ेस देते हैं। ऐसे याद की शक्तिशाली किरणें एक सेकेण्ड में अनेक विकर्मों रूपी कीटाणु भस्म कर देती हैं। विकर्म भस्म हो गये तो फिर अपने को हल्का और शक्तिशाली अनुभव करेंगे। निरन्तर सहजयोगी तो हो सिर्फ इस याद की स्टेज को बीच-बीच में पावरफुल बनाने के लिए अटेन्शन का फोर्स भरते रहो। पवित्रता की धारणा जब सम्पूर्ण रूप में होगी तब आपके श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति लगन की अग्नि प्रज्जवलित करेगी, उस अग्नि में सब किचड़ा भस्म हो जायेगा। फिर जो सोचेंगे वही होगा, विंहग मार्ग की सेवा स्वत: हो जायेगी। जैसे देवियों के यादगार में दिखाते हैं कि ज्वाला से असुरों को भस्म कर दिया। असुर नहीं लेकिन आसुरी शक्तियों को खत्म कर दिया। यह अभी का यादगार है। अभी ज्वालामुखी बन आसुरी संस्कार, आसुरी स्वभाव सब-कुछ भस्म करो। प्रकृति और आत्माओं के अन्दर जो तमोगुण है उसे भस्म करने वाले बनो। यह बहुत बड़ा काम है, स्पीड से करेंगे तब पूरा होगा। कोई भी हिसाब-चाहे इस जन्म का, चाहे पिछले जन्म का, लग्न की अग्नि-स्वरूप स्थिति के बिना भस्म नहीं होता। सदा अग्नि-स्वरूप स्थिति अर्थात् ज्वालारूप की शक्तिशाली याद, बीजरूप, लाइट हाउस, माइट हाउस स्थिति में पुराने हिसाब-किताब भस्म हो जायेंगे और अपने आपको डबल लाइट अनुभव करेंगे। शक्तिशाली ज्वाला स्वरूप की याद तब रहेगी जब याद का लिंक सदा जुटा रहेगा। अगर बार-बार लिंक टूटता है, तो उसे जोड़ने में समय भी लगता, मेहनत भी लगती और शक्तिशाली के बजाए कमजोर हो जाते हो। याद को शक्तिशाली बनाने के लिए विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, विस्तार में सार भूल न जाये। खाओ-पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नहीं भूलो। साधना अर्थात् शक्तिशाली याद। निरन्तर बाप के साथ दिल का सम्बन्ध। साधना इसको नहीं कहते कि सिर्फ योग में बैठ गये लेकिन जैसे शरीर से बैठते हो वैसे दिल, मन, बुद्धि एक बाप की तरफ बाप के साथ-साथ बैठ जाए। ऐसी एकाग्रता ही ज्वाला को प्रज्जवलित करेगी। याद की यात्रा सहज भी हो और शक्तिशाली भी हो, पावरफुल याद एक समय पर डबल अनुभव कराती है। एक तरफ याद अग्नि बन भस्म करने का काम करती है, परिवर्तन करने का काम करती है और दूसरे तरफ खुशी और हल्केपन का अनुभव कराती है। ऐसे विधिपूर्वक याद को ही यथार्थ और शक्तिशाली याद कहा जाता है।

वरदान: स्नेह की लिफ्ट द्वारा उड़ती कला का अनुभव करने वाले अविनाशी स्नेही भव !
मेहनत से मुक्त होने के लिए बाप के स्नेही बनो। यह अविनाशी स्नेह ही अविनाशी लिफ्ट बन उड़ती कला का अनुभव कराता है। लेकिन यदि स्नेह में अलबेलापन है तो बाप से करेन्ट नहीं मिलती और लिफ्ट काम नहीं करती। जैसे लाइट बन्द होने से, कनेक्शन खत्म होने से लिफ्ट द्वारा सुख की अनुभूति नहीं कर सकते, ऐसे स्नेह कम है तो मेहनत का अनुभव होता है, इसलिए अविनाशी स्नेही बनो।

स्लोगन: शुभ संकल्प और दिव्य बुद्धि के यंत्र द्वारा तीव्रगति की उड़ान भरते रहो।
 

Hindi Murli 10/02/18

10-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम्हें ज्ञान की सैक्रीन मिली है, सैक्रीन की वह बूंद है मनमनाभव, यही खुराक सबको खिलाते रहो”

प्रश्न: सच्ची-सच्ची खुशखैराफत कौन सी है? तुम्हें सबकी कौन सी रूहानी खातिरी करनी है?
उत्तर: हर एक को बाप का परिचय देना, यही है सच्ची-सच्ची खुश खैराफत। तुम श्रीमत पर सबको खुशी की खुराक खिलाते रहो। बेहद के बाप द्वारा जीवनमुक्ति की खुराक जो तुम्हें मिली है, वह सबको देते चलो। अतीन्द्रिय सुख में रह सबको ज्ञान योग की फर्स्टक्लास खुराक खिलाना, यही सबसे अच्छी रूहानी खातिरी है।

ओम् शान्ति। ज्ञान का तीसरा नेत्र देने वाला रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र सिवाए बाप के और कोई दे नहीं सकता। अभी तुम बच्चों को ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। अभी तुम जानते हो कि यह पुरानी दुनिया बदलने वाली है। बिचारे मनुष्य नहीं जानते कि कौन बदलाने वाला है और कैसे बदलाते हैं क्योंकि उन्हों को ज्ञान का तीसरा नेत्र ही नहीं है। तुम बच्चों को अभी ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है जिससे तुम सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जान गये हो। यह है ज्ञान की सैक्रीन। सैक्रीन का एक बूंद भी कितना मीठा होता है। ज्ञान का भी एक ही अक्षर है मनमनाभव। सभी से कितना मीठा है। अपने को आत्मा समझ और बाप को याद करो। बाप शान्तिधाम और सुखधाम का रास्ता बता रहे हैं। बाप आये हैं बच्चों को स्वर्ग का वर्सा देने। तो बच्चों को कितनी खुशी रहनी चाहिए। कहते भी हैं खुशी जैसी खुराक नहीं। जो सदैव खुशी मौज में रहते हैं उनके लिए वह जैसे खुराक होती है। 21 जन्म मौज में रहने की यह जबरदस्त खुराक है। यह खुराक सदैव एक दो को खिलाते रहो। एक दो की जबरदस्त खातिरी यह करनी है। ऐसी खातिरी और कोई मनुष्य, मनुष्य की कर न सके।
तुम बच्चे श्रीमत पर सभी की रूहानी खातिरी करते हो। सच्ची-सच्ची खुश खैऱाफत भी यह है किसको बाप का परिचय देना। मीठे बच्चे जानते हैं बेहद के बाप द्वारा हमको जीवनमुक्ति की खुराक मिलती है। सतयुग में भारत जीवनमुक्त था, पावन था। बाप बहुत बड़ी ऊंची खुराक देते हैं, तब तो गायन है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो। यह ज्ञान और योग की कितना फर्स्ट क्लास वन्डरफुल खुराक है और यह खुराक एक ही रूहानी सर्जन के पास है और किसको इस खुराक का मालूम ही नहीं है। बाप कहते हैं मीठे बच्चों तुम्हारे लिए तिरी (हथेली) पर सौगात ले आया हूँ। मुक्ति, जीवनमुक्ति की यह सौगात मेरे पास ही रहती है। कल्प-कल्प मँ ही आकर तुमको देता हूँ। फिर रावण छीन लेता है। तो अभी तुम बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। तुम जानते हो हमारा एक ही बाप, टीचर और सच्चा-सच्चा सतगुरू है जो हमको साथ ले जाते हैं। मोस्ट बिलवेड बाप से विश्व की बादशाही मिलती है। यह कम बात है क्या! तो सदैव हर्षित रहना चाहिए। गाडली स्टूडेन्ट लाईफ इज दी बेस्ट। यह अभी का ही गायन है ना। फिर नई दुनिया में भी तुम सदैव खुशियाँ मनाते रहेंगे। दुनिया नहीं जानती कि सच्ची-सच्ची खुशियाँ कब मनाई जायेंगी। मनुष्यों को तो सतयुग का ज्ञान ही नहीं है। तो यहाँ ही मनाते रहते हैं। परन्तु इस पुरानी तमोप्रधान दुनिया में खुशी कहाँ से आई। यहाँ तो त्राहि-त्राहि करते रहते हैं। कितना दु:ख की दुनिया है।
बाप तुम बच्चों को कितना सहज रास्ता बताते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहो। धन्धा-धोरी आदि करते भी मुझे याद करते रहो। जैसे आशुक और माशुक होते हैं। वह तो एक दो को याद करते रहते हैं। वह उनका आशुक, वह उनका माशुक ओता है। यहाँ यह बात नहीं है, यहाँ तो तुम सभी एक माशुक के जन्म-जन्मान्तर से आशुक हो रहते हो। बाप कभी तुम्हारा आशिक नहीं बनता। तुम उस माशुक से मिलने के लिए याद करते आये हो। जब दु:ख जास्ती होता है तो जास्ती सुमिरण करते हैं। गायन भी है दु:ख में सुमिरण सब करें, सुख में करे न कोय। इस समय बाप भी सर्वशक्तिवान है, तो दिन-प्रतिदिन माया भी सर्वशक्तिवान-तमोप्रधान होती जाती है इसलिए अब बाप कहते हैं मीठे बच्चे देही-अभिमानी बनो। अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो तुम ऐसे (लक्ष्मी-नारायण) बन जायेंगे। इस पढ़ाई में मुख्य बात है ही याद की। ऊंच ते ऊंच बाप को बहुत प्यार, स्नेह से याद करना चाहिए। वह ऊंच ते ऊंच बाप ही नई दुनिया स्थापन करने वाला है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुम बच्चों को विश्व का मालिक बनाने इसलिए अब मुझे याद करो तो तुम्हारे अनेक जन्मों के पाप कट जायें। पतित-पावन बाप कहते हैं तुम बहुत पतित बन गये हो इसलिए अब तुम मुझे याद करो तो तुम पावन बन और पावन दुनिया का मालिक बन जायेंगे। पतित-पावन बाप को ही बुलाते हैं ना। अब बाप आये हैं, तो जरूर पावन बनना पड़े। बाप दु:खहर्ता, सुखकर्ता है। बरोबर सतयुग में पावन दुनिया थी तो सभी सुखी थे। अब बाप फिर से कहते हैं बच्चे शान्तिधाम और सुखधाम को याद करते रहो। अभी है संगमयुग। खिवैया तुमको इस पार से उस पार ले जाते हैं। नईया कोई एक नहीं, सारी दुनिया जैसे एक बड़ा जहाज है, उनको पार ले जाते हैं।
तुम मीठे बच्चों को कितनी खुशियाँ होनी चाहिए। तुम्हारे लिए तो सदैव खुशी ही खुशी है। बेहद का बाप हमको पढ़ा रहे हैं। वाह! यह तो कब न सुना, न पढ़ा। भगवानुवाच मैं तुम रूहानी बच्चों को राजयोग सिखा रहा हूँ, तो पूरी रीति सीखना चाहिए। धारणा करनी चाहिए। पूरी रीति पढ़ना चाहिए। पढ़ाई में नम्बरवार तो सदैव होते ही हैं। अपने को देखना चाहिए मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ वा कनिष्ट हूँ? बाप कहते हैं अपने को देखो मैं ऊंच पद पाने के लायक हूँ? रूहानी सर्विस करता हूँ? क्योंकि बाप कहते हैं बच्चे सर्विसएबुल बनो, फालो करो। मैं आया ही हूँ सर्विस के लिए। रोज़ सर्विस करता हूँ इसलिए ही तो यह रथ लिया है। इनका रथ बीमार पड़ जाता है तो भी मैं इनमें बैठ मुरली लिखता हूँ। मुख से तो बोल नहीं सकते तो मैं लिख देता हूँ, ताकि बच्चों के लिए मुरली मिस न हो तो मैं भी सर्विस पर हूँ ना। यह है रूहानी सर्विस। तुम भी बाप की सर्विस में लग जाओ। आन गॉड फादरली सर्विस। सारे विश्व का मालिक बाप ही तुमको विश्व का मालिक बनाने आये हैं। जो अच्छा पुरुषार्थ करते हैं उनको महावीर कहा जाता है। देखा जाता है कौन महावीर हैं जो बाबा के डायरेक्शन पर चलते हैं। बाप का फरमान है अपने को आत्मा समझ भाई-भाई देखो। इस शरीर को भूल जाओ। बाबा भी शरीर को नहीं देखते हैं। बाप कहते हैं मैं आत्माओं को देखता हूँ। बाकी यह तो ज्ञान है कि आत्मा शरीर बिगर बोल नहीं सकती। मैं भी इस शरीर में आया हूँ, लोन लिया हुआ है। शरीर के साथ ही आत्मा पढ़ सकती है। बाबा की बैठक यहाँ है। यह है अकाल तख्त। आत्मा अकालमूर्त है। आत्मा कब छोटी बड़ी नहीं होती है, शरीर छोटा बड़ा होता है। जो भी आत्मायें हैं उन सभी का तख्त यह भृकुटी का बीच है। शरीर तो सभी के भिन्न-भिन्न होते हैं। किसको अकाल तख्त पुरुष का है, किसका अकाल तख्त स्त्री का है। किसका अकाल तख्त बच्चे का है। बाप बैठ बच्चों को रूहानी ड्रिल सिखलाते हैं। जब कोई से बात करो तो पहले अपने को आत्मा समझो। हम आत्मा फलाने भाई से बात करते हैं। बाप का पैगाम देते हैं कि शिवबाबा को याद करो। याद से ही जंक उतरनी है। सोने में जब अलाय पड़ती है तो सोने की वैल्यु ही कम हो जाती है। तुम आत्माओं में भी जंक पड़ने से तुम वैल्युलेस हो गये हो। अब फिर पावन बनना है। तुम आत्माओं को अब ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। उस नेत्र से अपने भाईयों को देखो। भाई-भाई को देखने से कर्मेन्द्रियाँ कब चंचल नहीं होंगी। राज-भाग लेना है, विश्व का मालिक बनना है तो यह मेहनत करो। भाई-भाई समझ सभी को ज्ञान दो। तो फिर यह टेव (आदत) पक्की हो जायेगी। सच्चे-सच्चे ब्रदर्स तुम सभी हो। बाप भी ऊपर से आये हैं, तुम भी आये हो। बाप बच्चों सहित सर्विस कर रहे हैं। सर्विस करने की बाप हिम्मत देते हैं। हिम्मते मर्दा... तो यह प्रैक्टिस करनी है - मैं आत्मा भाई को पढ़ाता हूँ। आत्मा पढ़ती है ना। इसको प्रीचुअल नॉलेज कहा जाता है। जो रूहानी बाप से ही मिलती है। संगम पर ही बाप आकर यह नॉलेज देते हैं कि अपने को आत्मा समझो। तुम नंगे आये थे फिर यहाँ शरीर धारण कर तुमने 84 जन्म पार्ट बजाया है। अब फिर वापिस चलना है इसलिए अपने को आत्मा समझ भाई-भाई की दृष्टि से देखना है। यह मेहनत करनी है। अपनी मेहनत करनी है, दूसरे में हमारा क्या जाता। चैरिटी बिगेन्स एट होम अर्थात् पहले खुद को आत्मा समझ फिर भाईयों को समझाओ तो अच्छी रीति तीर लगेगा। यह जौहर भरना है। मेहनत करेंगे तब ही ऊंच फल पायेंगे। बाप आये ही हैं फल देने लिए तो मेहनत करनी पड़े। कुछ सहन भी करना पड़ता है।
तुम्हें कोई उल्टी-सुल्टी बात बोले तो तुम चुप रहो। तुम चुप रहेंगे तो फिर दूसरा क्या करेगा। ताली दो हाथ से बजती है। एक ने मुख की ताली बजाई, दूसरा चुप कर दे तो वह आपेही चुप हो जायेंगे। ताली से ताली बजने से आवाज हो जाता है। बच्चों को एक दो का कल्याण करना है। बाप समझाते हैं बच्चे सदैव खुशी में रहने चाहते हो तो मनमनाभव। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। भाईयों (आत्माओं) तरफ देखो। भाईयों को भी यह नॉलेज दो। यह टेव पड़ जाने से फिर कभी क्रिमिनल आई धोखा नहीं देगी। ज्ञान के तीसरे नेत्र से तीसरे नेत्र को देखो। बाबा भी तुम्हारी आत्मा को ही देखते हैं। कोशिश यह करनी है सदैव आत्मा को ही देखें। शरीर को देखें ही नहीं। योग कराते हो तो भी अपने को आत्मा समझ भाईयों को देखते रहेंगे तो सर्विस अच्छी होगी। बाबा ने कहा है भाईयों को समझाओ। भाई सभी बाप से वर्सा लेते हैं। यह रूहानी नॉलेज एक ही बार तुम ब्राह्मण बच्चों को मिलती है। तुम ब्राह्मण हो फिर देवता बनने वाले हो। इस संगमयुग को थोड़ेही छोड़ेंगे, नहीं तो पार कैसे जायेंगे। कूदेंगे थोड़ेही। यह वन्डरफुल संगमयुग है। तो बच्चों को रूहानी यात्रा पर रहने की टेव डालनी है। तुम्हारे ही फायदे की बात है। बाप की शिक्षा भाईयों को देनी है। बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ज्ञान दे रहा हूँ। आत्मा को ही देखता हूँ। मनुष्य-मनुष्य से बात करेगा तो उनके मुँह को देखेगा ना। तुम आत्मा से बात करते हो तो आत्मा को ही देखना है। भल शरीर द्वारा ज्ञान देते हो परन्तु इसमें शरीर का भान तोड़ना होता है। तुम्हारी आत्मा समझती है परमात्मा बाप हमको ज्ञान दे रहे हैं। बाप भी कहते हैं आत्माओं को देखता हूँ, आत्मायें भी कहती हैं हम परमात्मा बाप को देख रहे हैं। उनसे नॉलेज ले रहे हैं। इसको कहा जाता है प्रीचुअल ज्ञान की लेन-देन - आत्मा की आत्मा के साथ। आत्मा में ही ज्ञान है। आत्मा को ही ज्ञान देना है। यह जैसे जौहर है। तुम्हारे ज्ञान में यह जौहर भर जायेगा तो किसको भी समझाने से झट तीर लग जायेगा। बाप कहते हैं प्रैक्टिस करके देखो तीर लगता है या नहीं। यह नई टेव (आदत) डालनी है तो फिर शरीर का भान निकल जायेगा। माया के तूफान कम आयेंगे। बुरे संकल्प नहीं आयेंगे। क्रिमिनल आई भी नहीं रहेगी। हम आत्मा ने 84 का चक्र लगाया। अब नाटक पूरा होता है। अब बाबा की याद में रहना है। याद से ही तमोप्रधान से सतोप्रधान बन, सतोप्रधान दुनिया के मालिक बन जायेंगे। कितना सहज है। बाप जानते हैं बच्चों को यह शिक्षा देना भी मेरा पार्ट है। कोई नई बात नहीं। हर 5000 वर्ष बाद हमको आना होता है। मैं बंधायमान हूँ, बच्चों को बैठ समझाता हूँ - मीठे बच्चे रूहानी याद की यात्रा में रहो तो अन्त मते सो गति हो जायेगी। यह अन्त काल है ना। मामेकम् याद करो तो तुम्हारी सद्गति हो जायेगी। याद की यात्रा से पाया (पिल्लर) मजबूत हो जायेगा। यह देही-अभिमानी बनने की शिक्षा एक ही बार तुम बच्चों को मिलती है। कितना वन्डरफुल ज्ञान है। बाबा वन्डरफुल है तो बाबा का ज्ञान भी वन्डरफुल है। कब कोई बता न सके। अभी वापस चलना है इसलिए बाप कहते हैं मीठे बच्चों यह प्रैक्टिस करो। अपने को आत्मा समझ आत्मा को ज्ञान दो। तीसरे नेत्र से भाई-भाई को देखना है। यही बड़ी मेहनत है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) आत्मा भाई-भाई को देखने का अभ्यास करना है। अपने को आत्मा समझ भाई भाई को ज्ञान देना है। महावीर बन इस फरमान को पालन करना है।
2) तुम्हें कोई उल्टी-सुल्टी बात बोले तो तुम चुप रहो। ताली दो हाथ से बजती है, एक ने मुख की ताली बजाई, दूसरा चुप कर दे तो वह आपेही चुप हो जायेंगे।

वरदान: मन्सा-वाचा और कर्मणा तीनों सेवाओं के खाते जमा करने वाले यज्ञ स्नेही भव!
बापदादा के पास सभी बच्चों की सेवा के तीन प्रकार के खाते जमा हैं। जो यज्ञ स्नेही हैं वह मन्सा-वाचा-कर्मणा, तन मन और धन तीनों सेवा में सदा सहयोगी बनते हैं। हर खाते की 100 मार्क्स हैं। अगर किसी की वाचा सेवा की ड्युटी है तो उसमें मन्सा और कर्मणा की परसेन्टेज कम न हो। वाचा सेवा सहज है लेकिन मन्सा में अटेन्शन देने की बात है और कर्मणा सिर्फ स्थूल सेवा नहीं लेकिन संगठन में सम्पर्क-सम्बन्ध में आना - यह भी कर्म के खाते में जमा होता है।

स्लोगन: अपने ऊपर राज्य करने वाले स्वराज्य अधिकारी बनो, साथियों पर राज्य करने वाले नहीं।
 


Thursday, 8 February 2018

Hindi Murli 09/02/18

09-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे - “सवेरे-सवेरे उठ बाप से गुडमार्निंग करो, ज्ञान के चिंतन में रहो तो खुशी का पारा चढ़ा रहेगा”

प्रश्न: एक्यूरेट याद क्या है? उसकी निशानियां क्या होंगी?
उत्तर: बड़े धैर्य, गम्भीरता और समझ से बाप को याद करना ही एक्यूरेट याद है। जो एक्यूरेट याद में रहते हैं उन्हें जास्ती करेन्ट मिलती है, पापों का बोझा उतरता जाता है। आत्मा सतोप्रधान बनती जाती है। उनकी आयु बढ़ती जाती है, उन्हें बाप की सर्चलाइट मिलती है।

ओम् शान्ति। बाप कहते हैं मीठे बच्चे ततत्वम् अर्थात् तुम आत्मायें भी शान्त स्वरूप हो। तुम सर्व आत्माओं का स्वधर्म है ही शान्ति। शान्तिधाम से फिर यहाँ आकर टाकी बनते हो। यह कर्मेन्द्रियां तुमको मिलती है पार्ट बजाने के लिए। आत्मा छोटी-बड़ी नहीं होती है। शरीर छोटा बड़ा होता है। बाप कहते हैं मैं तो शरीरधारी नहीं हूँ। मुझे बच्चों से सन्मुख मिलने आना होता है। समझो जैसे बाप है, इनसे बच्चे पैदा होते हैं, तो वह बच्चा ऐसे नहीं कहेगा कि मैं परमधाम से जन्म ले मात-पिता से मिलने आया हूँ। भल कोई नई आत्मा आती है किसके भी शरीर में, वा कोई पुरानी आत्मा किसके शरीर में प्रवेश करती है तो ऐसे नहीं कहेंगे कि मात-पिता से मिलने आया हूँ। उनको आटोमेटिकली मात-पिता मिल जाते हैं। यहाँ यह है नई बात। बाप कहते हैं मैं परमधाम से आकर तुम बच्चों के सम्मुख हुआ हूँ। बच्चों को फिर से नॉलेज देता हूँ क्योंकि मैं हूँ नॉलेजफुल, ज्ञान का सागर मैं आता हूँ तुम बच्चों को पढ़ाने, राजयोग सिखाने। राजयोग सिखाने वाला भगवान ही है। कृष्ण की आत्मा का यह ईश्वरीय पार्ट नहीं है। हर एक का पार्ट अपना, ईश्वर का पार्ट अपना है।
यह ड्रामा कैसा वन्डरफुल बना हुआ है यह भी तुम अभी समझाते हो। यह पुरुषोत्तम संगमयुग है इतना सिर्फ याद रहे तो भी पक्का हो जाता है कि हम सतयुग में जाने वाले हैं। अभी संगम पर हैं, फिर जाना है अपने घर इसलिए पावन तो जरूर बनना है। अन्दर में बहुत खुशी होनी चाहिए। ओहो! बेहद का बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों मुझे याद करो तो तुम सतोप्रधान बनेंगे। विश्व का मालिक बनेंगे। बाप कितना बच्चों को प्यार करते हैं। ऐसे नहीं कि सिर्फ टीचर के रूप में पढ़ाकर और घर चले जाते हैं। यह तो बाप भी है, टीचर भी है। तुमको पढ़ाते भी है। याद की यात्रा भी सिखलाते हैं।
ऐसा विश्व का मालिक बनाने वाले, पतित से पावन बनाने वाले बाप के साथ बहुत लव होना चाहिए। सवेरे-सवेरे उठने से ही पहले-पहले शिवबाबा से गुडमार्निंग करना चाहिए। तुम जितना प्यार से याद करेंगे उतना खुशी में रहेंगे। बच्चों को अपने दिल से पूछना है कि हम सवेरे उठकर कितना बेहद के बाप को याद करते हैं। मनुष्य भक्ति भी सवेरे करते हैं ना। भक्ति कितना प्यार से करते हैं। परन्तु बाबा जानते हैं कई बच्चे दिल व जान, सिक व प्रेम से याद नहीं करते हैं। सवेरे उठ बाबा से गुडमार्निंग करें, ज्ञान के चिन्तन में रहें तो खुशी का पारा चढ़े। बाप से गुडमार्निंग नहीं करेंगे तो पापों का बोझा कैसे उतरेगा। मुख्य है ही याद। इससे तुम्हारे भविष्य के लिए बहुत भारी कमाई होती है, कल्प-कल्पान्तर यह कमाई काम आयेगी। बड़ा धैर्य, गम्भीरता, समझ से याद करना होता है। मोटे हिसाब में तो भल करके यह कह देते हैं कि हम बाबा को बहुत याद करते हैं परन्तु एक्यूरेट याद करने में मेहनत है। जो बाप को जास्ती याद करते हैं उनको करेन्ट जास्ती मिलती है क्योंकि याद से याद मिलती है। योग और ज्ञान दो चीज़ें हैं। योग की सब्जेक्ट अलग है, बहुत भारी सबजेक्ट है। योग से ही आत्मा सतोप्रधान बनती है। याद बिना सतोप्रधान होना, असम्भव है। अच्छी रीति प्यार से बाप को याद करेंगे तो आटोमेटिक्ली करेन्ट मिलेगी, हेल्दी बन जायेंगे। करेन्ट से आयु भी बढ़ती है। बच्चे याद करते हैं तो बाबा भी सर्चलाइट देते हैं। बाप कितना बड़ा भारी खजाना तुम बच्चों को देते हैं।
मीठे बच्चों को यह पक्का याद रखना है, शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। शिवबाबा पतित-पावन भी हैं। सद्गति दाता भी हैं। सद्गति माना स्वर्ग की राजाई देते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार से बच्चों को बैठ पढ़ाते हैं। बाप दादा द्वारा हमको पढ़ाते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार करते हैं। कोई तकलीफ नहीं देते। सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो और चक्र को याद करो। बाप की याद में दिल एकदम ठर जानी चाहिए। एक बाप की ही याद सतानी चाहिए क्योंकि बाप से वर्सा कितना भारी मिलता है। अपने को देखना चाहिए हमारा बाप के साथ कितना लव है। कहाँ तक हमारे में दैवी गुण हैं क्योंकि तुम बच्चे अब कांटों से फूल बन रहे हो। जितना-जितना योग में रहेंगे उतना कांटों से फूल, सतोप्रधान बनते जायेंगे। फूल बन गये फिर यहाँ रह नहीं सकेंगे। फूलों का बगीचा है ही स्वर्ग। जो बहुत कांटों को फूल बनाते हैं वह ही सच्चा खुशबूदार फूल कहेंगे। कभी किसको कांटा नहीं लगायेंगे। क्रोध भी बड़ा कांटा है। बहुतों को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे कांटों की दुनिया से किनारे पर आ गये हो, तुम हो संगम पर। जैसे माली फूलों को अलग पाट (बर्तन) में निकाल रखते हैं, वैसे ही तुम फूलों को भी अब संगमयुगी पाट में अलग रखा हुआ है। फिर तुम फूल स्वर्ग में चले जायेंगे। कलियुगी कांटें भस्म हो जायेंगे।
मीठे बच्चे जानते हैं पारलौकिक बाप से हमको अविनाशी वर्सा मिलता है। जो सच्चे-सच्चे बच्चे हैं जिनका बापदादा से पूरा लव है उनको बड़ी खुशी रहेगी। हम विश्व का मालिक बनते हैं। हाँ पुरुषार्थ से ही विश्व का मालिक बना जाता है। सिर्फ कहने से नहीं। जो अनन्य बच्चे हैं उन्हों को सदैव यह याद रहेगा कि हम अपने लिए फिर से वही सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। बाप कहते हैं मीठे बच्चे जितना तुम बच्चे बहुतों का कल्याण करेंगे उतना तुमको उजूरा मिलेगा। बहुतों को रास्ता बतायेंगे तो बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी। ज्ञान रत्नों से झोली भरकर फिर दान करना है। ज्ञान सागर तुमको रत्नों की थालियाँ भर-भर कर देते हैं। जो उन रत्नों का दान करते हैं वही सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए। सेन्सीबुल बच्चे जो होंगे वह तो कहेंगे हम बाबा से पूरा ही वर्सा लेंगे। एकदम चटक पड़ेंगे। बाप से बहुत लव रहेगा क्योंकि जानते हैं प्राण देने वाला बाप मिला है। नॉलेज का वरदान ऐसा देते हैं जिससे हम क्या से क्या बन जाते हैं! इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बन जाते हैं! इतना भण्डारा भरपूर कर देते हैं। जितना बाप को याद करेंगे उतना लव रहेगा, कशिश होगी। सुई साफ होती है तो चुम्बक तरफ खैंच जाती है ना। बाप की याद से कट निकलती जायेगी। एक बाप के सिवाए और कोई याद न आये। जैसे स्त्री का पति के साथ कितना लव होता है। तुम्हारी भी सगाई हुई है ना। सगाई की खुशी कभी कम होती है क्या? शिवबाबा कहते हैं मीठे बच्चे तुम्हारी हमारे साथ सगाई हुई है, ब्रह्मा के साथ सगाई नहीं है। सगाई पक्की हो गई फिर तो उनकी ही याद सतानी चाहिए।
बाप समझाते हैं मीठे बच्चे गफलत मत करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो, लाइट हाउस बनो। स्वदर्शन चक्रधारी बनने की प्रैक्टिस अच्छी हो जायेगी तो फिर तुम जैसे ज्ञान का सागर हो जायेंगे। जैसे स्टूडेन्ट पढ़कर टीचर बन जाते हैं ना। तुम्हारा धन्धा ही यह है। सबको स्वदर्शन चक्रधारी बनाओ तब ही चक्रवर्ती राजा-रानी बनेंगे इसलिए बाबा सदैव बच्चों से पूछते हैं बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी हो बैठे हो? बाप भी स्वदर्शन चक्रधारी है ना। बाप आये हैं तुम मीठे बच्चों को वापिस ले जाने। तुम बच्चों बिगर हमको भी जैसे बेआरामी होती है। जब समय होता है तो बेआरामी हो जाती है। बस अभी हम जाऊं। बच्चे बहुत पुकारते हैं, बहुत दु:खी हैं। तरस पड़ता है। अब तुम बच्चों को चलना है घर। फिर वहाँ से तुम आपेही चले जायेंगे सुखधाम। वहाँ मैं तुम्हारा साथी नहीं बनूँगा। अपनी अवस्था अनुसार तुम्हारी आत्मा चली जायेगी।
तुम बच्चों को यह नशा रहना चाहिए हम रूहानी युनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। हम गाडली स्टूडेन्ट हैं। हम मनुष्य से देवता अथवा विश्व का मालिक बनने लिए पढ़ रहे हैं। इससे हम सारी डिग्रियां पा लेते हैं। हेल्थ की एज्यूकेशन भी पढ़ते हैं, कैरेक्टर सुधारने की भी नॉलेज पढ़ते हैं। हेल्थ मिनिस्टरी, फुड मिनिस्टरी, लैन्ड मिनिस्टरी, बिल्डिंग मिनिस्टरी सब इसमें आ जाती है। तुम बड़े ट्रेजरर (खजांची) भी हो। तुम्हारे जैसा अमूल्य खजाना और किसी के पास नहीं हो सकता। ऐसे-ऐसे तुम बच्चों को विचार सागर मन्थन कर रूहानी नशे में रहना चाहिए।
मीठे-मीठे बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं जब कोई सभा में भाषण करते हो वा किसको समझाते हो तो घड़ी-घड़ी बोलो अपने को आत्मा समझ परमपिता परमात्मा को याद करो। इस याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे, तुम पावन बन जायेंगे। घड़ी-घड़ी यह याद करना है। परन्तु यह भी तुम तब कह सकेंगे जब खुद याद में होंगे। इस बात की बच्चों में बहुत कमजोरी है। याद में रहेंगे तब दूसरों को समझाने का असर होगा। तुम्हारा बोलना जास्ती नहीं होना चाहिए। आत्म-अभिमानी हो थोड़ा भी समझायेंगे तो तीर भी लगेगा। बाप कहते हैं बच्चे बीती सो बीती। अब पहले अपने को सुधारो। खुद याद करेंगे नहीं, दूसरों को कहते रहेंगे, यह ठगी चल न सके। अन्दर दिल जरूर खाती होगी। बाप के साथ पूरा लव नहीं है तो श्रीमत पर चलते नहीं हैं। बेहद के बाप जैसी शिक्षा तो और कोई दे न सके। बाप कहते हैं मीठे बच्चे इस पुरानी दुनिया को अब भूल जाओ। पिछाड़ी में तो यह सब भूल ही जाना है। बुद्धि लग जाती है अपने शान्तिधाम और सुखधाम में। बाप को याद करते-करते बाप के पास चले जाना है। पतित आत्मा तो जा न सके। वह है ही पावन आत्माओं का घर। यह शरीर 5 तत्वों से बना हुआ है। तो 5 तत्व यहाँ रहने लिए खींचते हैं क्योंकि आत्मा ने यह जैसे प्रापटी ली हुई है, इसलिए शरीर में ममत्व हो गया है। अब इनसे ममत्व निकाल अपने घर जाना है। वहाँ तो यह 5 तत्व हैं नहीं। सतयुग में भी शरीर योगबल से बनता है, सतोप्रधान प्रकृति होती है इसलिए खींचती नहीं। दु:ख नहीं हाता। यह बड़ी महीन बातें हैं समझने की। यहाँ 5 तत्वों का बल आत्मा को खींचता है इसलिए शरीर छोड़ने की दिल नहीं होती है। नहीं तो इसमें और ही खुश होना चाहिए। पावन बन शरीर ऐसे छोड़ेंगे जैसे मक्खन से बाल। तो शरीर से, सब चीज़ों से ममत्व एकदम मिटा देना है। इससे हमारा कोई कनेक्शन नहीं। बस हम जाते हैं बाबा के पास। इस दुनिया में अपना बैग बैगेज तैयार कर पहले से ही भेज दिया है। साथ में तो चल न सके। बाकी आत्माओं को जाना है। शरीर को भी यहाँ छोड़ देना है। बाबा ने नये शरीर का साक्षात्कार करा दिया है। हीरे जवाहरों के महल मिल जायेंगे। ऐसे सुखधाम में जाने लिए कितनी मेहनत करनी चाहिए। थकना नहीं चाहिए। दिनरात बहुत कमाई करनी है इसलिए बाबा कहते हैं नींद को जीतने वाले बच्चे, मामेकम् याद करो और विचार सागर मन्थन करो। ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखने से बुद्धि एकदम शीतल हो जाती है। जो महारथी बच्चे होंगे वह कभी हिलेंगे नहीं। शिवबाबा को याद करेंगे तो वह सम्भाल भी करेंगे।
बाप तुम बच्चों को दु:ख से छुड़ाकर शान्ति का दान देते हैं। तुमको भी शान्ति का दान देना है। तुम्हारी यह बेहद की शान्ति अर्थात् योगबल दूसरों को भी एकदम शान्त कर देंगे। झट मालूम पड़ जायेगा। यह हमारे घर का है वा नहीं। आत्मा को झट कशिश होगी यह हमारा बाबा है। नब्ज भी देखनी होती है। बाप की याद में रह फिर देखो यह आत्मा हमारे कुल की है। अगर होगी तो एकदम शान्त हो जायेगी। जो इस कुल के होंगे उन्हों को ही इन बातों में रस बैठेगा। बच्चे याद करते हैं तो बाप भी प्यार करते हैं। आत्मा को प्यार किया जाता है। यह भी जानते हैं जिन्होंने बहुत भक्ति की है वह ही जास्ती पढ़ेंगे। उनके चेहरे से मालूम पड़ता जायेगा कि बाप में कितना लव है। आत्मा बाप को देखती है। बाप हम आत्माओं को पढ़ा रहे हैं। बाप भी समझते हैं हम इतनी छोटी बिन्दी आत्मा को पढ़ाता हूँ। आगे चल तुम्हारी यह अवस्था हो जायेगी। समझेंगे हम भाई-भाई को पढ़ाते हैं। शक्ल बहन की होते भी दृष्टि आत्मा तरफ जाए। शरीर पर दृष्टि बिल्कुल न जाये, इसमें बड़ी मेहनत है। यह बड़ी महीन बातें हैं। बड़ी ऊंच पढ़ाई है। वज़न करो तो इस पढ़ाई का तरफ बहुत भारी हो जायेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बीती सो बीती कर पहले अपने को सुधारना है। आत्म अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। जास्ती बोलना नहीं है।
2) अपनी झोली ज्ञान रत्नों से भरकर उनका दान कर बहुतों के कल्याण के निमित्त बनना है। सबका प्यारा बनना है। अपार खुशी में रहना है।

वरदान: यथार्थ श्रेष्ठ हैन्डलिंग द्वारा सर्व की दुआयें प्राप्त करने वाले सर्व के स्नेही भव!
जैसे बाप ने किसी भी बच्चे की कमजोरी को नहीं देखा, हिम्मत बढ़ाई कि आप ही मेरे थे, हैं और सदा बनेंगे, ऐसे फालो फादर करो। हर एक की विशेषता को देखते सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ तो आत्माओं से स्वत: आत्मिक प्यार इमर्ज होगा और बाप के साथ-साथ सर्व के स्नेही बन जायेंगे। जहाँ आत्मिक स्नेह है वहाँ सदा सभी द्वारा सद्भावना, सहयोग की भावना स्वत: ही दुआओं के रूप में प्राप्त होती है, इसको ही रूहानी यथार्थ हैन्डलिंग कहा जाता है।

स्लोगन: अपने श्रेष्ठ संकल्पों की एकाग्रता द्वारा, अन्य आत्माओं की भटकती हुई बुद्धि को एकाग्र कर देना ही सच्ची सेवा है।
 

Wednesday, 7 February 2018

Hindi Murli 08/02/18

08-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - सूर्यवंशी विजय माला का दाना बनने के लिए श्रीमत पर पूरा पावन बनो, पावन बनने वाले बच्चे धर्मराज़ की सजाओं से छूट जाते हैं”

प्रश्न: देही-अभिमानी बनने की मेहनत में लगे हुए बच्चों को कौन सा नशा रहेगा?
उत्तर: मैं बाबा का हूँ, मैं बाबा के ब्रह्माण्ड का मालिक हूँ, बाबा से वर्सा ले विश्व का मालिक बनता हूँ। यह नशा देही-अभिमानी रहने वाले बच्चों को ही रहता, वही वारिस बनते हैं। उन्हें पुरानी दुनिया के सम्बन्ध याद नहीं रहते। देह-अभिमान में आने से ही माया की चमाट लगती है। खुशी गुम हो जाती है इसलिए बाबा कहते बच्चे देही-अभिमानी बनने की मेहनत करो। अपना चार्ट रखो।

गीत:- आने वाले कल की तुम तकदीर हो ...
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हो कि शिवबाबा ने यहाँ संगमयुग पर अवतार लिया है या ऊपर से आया हुआ है और तुम शिव शक्तियां हो, शिव के वारिस। तुम्हारा नाम वास्तव में है शिवशक्तियां। शिव से पैदा हुई शक्तियां। शिव ने तुमको अपना बनाया है और तुम शक्तियों ने फिर शिवबाबा को अपना बनाया है। शिव ने आकर अपने वारिस बनाये हैं। तुम शक्तियां हो गई शिवबाबा के वारिस। अभी यह तो तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा आया हुआ है, नर्क को स्वर्ग बनाने। हम उनके वारिस उनके साथ मददगार हैं, उनसे वर्सा पाने के लिए। बाप आया हुआ है इस पतित दुनिया अथवा नर्क को पावन बनाने। पतित सृष्टि को पावन बनाने वाला निराकार परमपिता परमात्मा के सिवाए और कोई हो नहीं सकता। तुम हो निराकार शिवबाबा के बच्चे। वह यहाँ जिसमें आया हुआ है वह है साकारी तन। यूँ तो तुम जब निराकारी दुनिया में हो तो भी वारिस हो। सब आत्मायें उस परमपिता परमात्मा के बच्चे हैं। परन्तु वह हो गया निराकारी दुनिया में। वहाँ तुम जब मेरे पास हो तो मेरे ही बच्चे हो। फिर मुझे भी आना पड़ा है - पतित सृष्टि को पावन बनाने। आकर शरीर धारण करना पड़ा। अब उस निराकारी दुनिया से बाप आया हुआ है। तुम बच्चों को वारिस बनाया है वर्सा देने लिए। शिव शक्तियां तो मशहूर हैं, शिवशक्तियां अर्थात् शिव की औलाद। दुनिया में यह कोई नहीं जानते हैं कि पतित-पावन कौन है। पतित दुनिया को जरूर कलियुग कहेंगे, पावन दुनिया को सतयुग। निराकारी दुनिया में तुम आत्मायें सदैव पावन रहती हो। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ.. भिन्न-भिन्न प्रकार से याद करते हैं। परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। यह नहीं समझते कि पावन बनाने के लिए जरूर कलियुग के अन्त में संगम पर आयेंगे। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ, आकर तुम बच्चों को अपना वारिस बनाता हूँ। गोया तुम डबल वारिस बनते हो। वैसे तो तुम शिवबाबा के बच्चे हो परन्तु अपने को भूल गये हो। अभी तुम जानते हो हम आत्मायें तो वास्तव में शिवबाबा के निर्वाणधाम के वारिस हैं। शिवबाबा कहते हैं तुम सब वारिस हो ना। ब्रह्माण्ड में रहने वाले बच्चे ब्रह्माण्ड के मालिक हो। फिर यहाँ सृष्टि पर आकर पार्ट बजाना है। बाप को सभी याद तो बहुत करते हैं। जब बहुत दु:खी होते हैं तो रड़ियां मारते हैं - हे भगवान रहम करो। अजुन तो बहुत दु:ख आने वाला है। जैसे चीनी आदि पर कन्ट्रोल रखते, वैसे अनाज पर भी रखेंगे। मनुष्यों को अन्न तो चाहिए ना। फिर भूख मरेंगे तो मारपीट लूटमार करेंगे। जब दुनिया बहुत दु:खी हो तब तो बाप आकर सुखी दुनिया स्थापन करे ना। तो अब बाप की श्रीमत पर पूरा पावन बन दिखाना है। पूरा पावन बनने वाले ही सूर्यवंशी विजय माला के दाने बनते हैं। वह धर्मराज की सज़ायें नहीं खायेंगे। बाप हर एक बात अच्छी रीति बैठ समझाते हैं। यह तो समझाया है जगत पिता है तो जगत अम्बा भी है। परन्तु उनका गीता में कुछ वर्णन है नहीं। गीता का कनेक्शन सारा बिगड़ा हुआ है। भक्त भगवान को याद करते हैं। भगवान ही सब मनुष्यों की मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं, इसलिए उनको याद करते हैं। कृष्ण तो मनोकामना पूरी कर न सके। एक ही भगवान को कहा जाता है सभी की मनोकामना पूरी करने वाला। दूसरा फिर है जगत अम्बा, भगवती, सब मनोकामनायें पूरी करने वाली। जगत अम्बा कौन है? पूरा वारिस ब्रह्मा की बच्ची, शिवबाबा की पोत्री। और मनुष्य बड़े-बड़े राजाओं आदि के वारिस होते हैं। यह वारिस अक्षर फैमिली से लगता है। सन्यासियों से नहीं लगता है। तुम जानते हो हम अभी शिवबाबा के वारिस बने हुए हैं। वहाँ तो बाबा के साथ रहते हैं। वहाँ वर्से की कोई बात नहीं। यहाँ तो हमको वर्सा चाहिए। बाप की मिलकियत है स्वर्ग, वहाँ दु:ख की बात ही नहीं होती। अब तुम बच्चों को दादे की मिलकियत मिलती है, तो उनको याद करना है।
तुम हो ईश्वर के वारिस, बाकी सब हैं रावण के वारिस। रावण सम्प्रदाय गाया जाता है ना। यहाँ तुम हो ब्राह्मण सम्प्रदाय। वह हैं आसुरी रावण सम्प्रदाय। उनको वर्सा मिल रहा है रावण से। रावण राज्य है ना। 5 विकारों का वर्सा मिला हुआ है, जिस वर्से को फिर तुम आकर शिवबाबा को दान करते हो। कृष्ण को थोड़ेही 5 विकारों का दान देंगे। तुम शिवबाबा को 5 विकारों का दान देते हो। देवताओं को थोड़ेही दान देंगे। कृष्ण आदि देवताओं ने तो विकारों का दान शिवबाबा को दे ऐसा पद पाया है। वह फिर दान लेंगे कैसे? शिवबाबा कहते हैं यह 5 विकारों का दान दो तो छूटे ग्रहण। ग्रहण भी ऐसा लगा हुआ है जो एक भी कला नहीं रही है। बिल्कुल काले बन पड़े हैं। अभी हमें दान दे दो फिर विकारों में नहीं जाना। दान देकर फिर वापिस नहीं लेना है। अगर विकार में जायेंगे तो पद भ्रष्ट बन पड़ेंगे। सो नारायण बनना है तो भूतों को भगाना है। बाप आते ही हैं नर से नारायण बनाने। तुम जानते हो बाबा ने हमको हकदार बनाया है - अपने घर का और जायदाद का। डबल वर्सा हुआ ना। मुक्ति और जीवनमुक्ति दोनों वर्सा बाप देते हैं। जो बाप के वारिस बच्चे हैं वे अब मेरे को याद कर योग और ज्ञान बल से विकर्म विनाश करते हैं। ज्ञान भी बल है ना। नॉलेज है, नॉलेज पढ़कर बड़ा-बड़ा दर्जा पाते हैं। पुलिस के बड़े ऑफिसर्स आदि बनते हैं। मनुष्य कितना पुलिस से डरते हैं। कोई ऐसा काम करते हैं तो पुलिस का नाम सुन पीला पड़ जाते हैं। तुम बच्चे अभी पढ़ाई से ऊंच पद पाते हो। बाप का बच्चा बनकर और बाप को याद नहीं करेंगे तो वर्सा कैसे पायेंगे। वह तो है लौकिक बाप। इस पारलौकिक बाप को तो बहुत याद करना पड़े। बहुत याद करने से ही ऊंच पद पायेंगे। जितना मेहनत करेंगे उतना पावन बन पावन दुनिया का राज्य पायेंगे। वापिस मेरे पास आकर फिर सतयुग में जाए राजाई करनी है। सब भगवान को याद करते हैं कि फिर से हम बाप के पास जायें।
कहते हैं अमरनाथ ने पार्वती को कथा सुनाई सो तो तुम सब पार्वतियां हो। शिवबाबा ने सिर्फ एक पार्वती को थोड़ेही कथा सुनाई होगी। तुम तो बहुत सुनते हो ना। सब याद करते हैं कि हमको पतित से पावन बनाओ। पावन बनाने वाला है एक। कैसे पावन बनाते हैं? पहले-पहले जगत अम्बा पावन बनती है। फिर उनकी शक्तियां हैं। स्वर्ग का रचयिता एक ही बाप है और कोई हो न सके। अभी तुम अनुभवी बन गये हो। तुम बच्चों को कितना नशा रहना चाहिए। शिवबाबा तुमको गोद में ले स्वर्ग का मालिक बनाने लायक बनाते हैं। तुम समझते हो हम ईश्वर की गोद में आये हैं। जरूर ईश्वर हमको वापिस अपने साथ ले जायेंगे। खास तुम बच्चों को वारिस बनाया है। तुम्हारा पार्ट है। अभी तुम्हारी बुद्धि कितनी विशाल हो गई है। समझना चाहिए सतयुग में है ही देवी-देवताओं का राज्य। जरूर भगवान ने स्थापन किया होगा। परन्तु कैसे किया? यह कोई नहीं जानते। नाम भी है यादव, कौरव, पाण्डव। पाण्डवों में सभी मेल्स ही दिखाते हैं। शक्ति सेना का नाम कहाँ? तुम हो गुप्त। उनको तो पता ही नहीं फिर कहते जो लड़ाई में मरेगा वह स्वर्ग में जायेगा। परन्तु कौन सी लड़ाई? यह है माया पर जीत पाने की लड़ाई। जो एक बाप ही सिखलाते हैं। जबकि तुम समझते हो बरोबर शिवबाबा ने हमको गोद में लिया है। एडाप्ट किया है। तो और सब तरफ से बुद्धियोग टूट जाना चाहिए। राजा की गोद में जायेंगे तो राजा-रानी का ही बच्चा अपने को समझेंगे। प्रिन्स-प्रिन्सेज ही मित्र-सम्बन्धी होंगे। वह कुल अथवा बिरादरी बदल जाती है। तो यहाँ भी ब्राह्मण कुल का बनना है। देवताओं अथवा शक्तियों के साथ नारद को भी बिठाते हैं। भगवान ने नारद को कहा तुम अपनी शक्ल तो देखो। नारद भक्ति करता था।
अभी तुम बच्चों को अच्छी रीति पुरुषार्थ करना है। तुम्हारे अन्दर कोई भी भूत नहीं होना चाहिए। कोई क्रोध करे तो समझो इनमें भूत है। पांच विकारों का यहाँ दान देना है, तब वह नशा चढ़ सके। फिर तुम बहुत खुश मिजाज़ रहेंगे। जैसे देवताओं के चेहरे रहते हैं। तुम रूप-बसन्त हो ना। जैसे बाबा ज्ञान रत्न देता है, तुम्हारे मुख से भी रत्न निकलने चाहिए। पुरुषार्थ करते रहो। मंजिल बहुत बड़ी है, विश्व का मालिक बनना होता है। हम ही अनेक बार विश्व के मालिक बने हैं। ऐसे और कोई सन्यासी आदि कह न सकें। बाप कहते हैं लाडले बच्चे तुम अनगिनत बार विश्व के मालिक बने हो, फिर हराया है। अब फिर जीत पहनो। है सारा पुरुषार्थ पर मदार। बच्चों को बड़ी खुशी रहनी चाहिए। हम विश्व के मालिक बनते हैं, तो वह खुशी स्थाई क्यों नहीं रहती? पुरानी दुनिया के सम्बन्ध याद आ जाते हैं। देह-अभिमान आ जाता है। पहला-पहला दुश्मन है ही देह-अभिमान। देह-अभिमान आया और लगी माया की चमाट। मैं बाबा का हूँ, बाबा के ब्रह्माण्ड का मालिक हूँ। बाबा से वर्सा ले विश्व का मालिक बनता हूँ, यह नशा रहना चाहिए। देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी चाहिए। कल्प में एक ही बार बाबा आकर तुमको देही-अभिमानी बनना सिखलाते हैं। कितना कहते हैं बाबा को याद करो। फिर भी भूल जाते हैं, चार्ट लिखने में थक जाते हैं। बच्चों को अपना चार्ट देखना है। एक बाबा इतने बच्चों का चार्ट कहॉ तक देखेंगे। बाबा को कितना काम रहता है। पत्रों के जवाब लिखने में अंगुलियां ही घिस जाती हैं। परन्तु बच्चों को शौक रहता है कि बाबा के हाथ का पत्र पढ़ें। तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से लिखा पढ़ी करुँ... लिखते भी हैं शिवबाबा केअरआफ ब्रह्मा। फिर बाबा जवाब भी देते हैं। कितने पत्र लिखने पड़ें। हाँ, सर्विसएबुल बच्चे सर्विस का समाचार देंगे तो बाप भी खुश होगा। अच्छी-अच्छी चिट्ठी आयेगी तो नयनों पर रखेंगे, दिल पर रखेंगे। नहीं तो वेस्ट पेपर बॉक्स में डाल देनी पड़ती हैं। सर्विसएबुल बच्चों की बहुत महिमा करता हूँ। सर्विस करने वाले बच्चे ही दिल पर चढ़ सकते हैं। सपूत बच्चे माँ बाप को फालो करते हैं। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। भक्ति मार्ग में मनुष्य मुक्ति के लिए कितने धक्के खाते रहते हैं। परन्तु वह जानते ही नहीं कि मुक्ति कहाँ है? कुछ नहीं जानते। ज्ञान है ही एक ज्ञान सागर के पास। सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जानना, इसको ज्ञान कहा जाता है। जब तक सृष्टि के आदि मध्य अन्त को नहीं जाना तो ब्लाइन्ड हैं। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। बहुत तकलीफ होने वाली है। यह दुनिया बड़ी गन्दी है। बाप बच्चों को फिर भी समझाते हैं बच्चे खबरदार रहना। कोई भूत होगा तो तुम गोरे कैसे बनेंगे? तुम कहते हो बाबा हम आपकी मत पर चलेंगे तो बाबा कहते हैं भूतों को भगाओ। इस दुनिया से ममत्व नहीं रखना है। बुद्धियोग नई दुनिया में चला जाना चाहिए। तुम जानते हो हमारे लिए स्वर्ग की स्थापना हो रही है। तो याद करना पड़े ना। बाप को, स्वीट होम को और राजधानी को याद करो। शरीर निर्वाह अर्थ सर्विस भी करो। फिर यह ईश्वरीय सर्विस भी करो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) रूप-बसन्त बन मुख से सदैव ज्ञान रत्न निकालने हैं। देवताओं जैसा खुशमिजाज़ बनना है।
2) ज्ञान और योग बल से विकर्म विनाश कर बाप से डबल वर्सा (मुक्ति-जीवनमुक्ति का) लेना है।

वरदान: “पहले आप” के विशेष गुण द्वारा सर्व के प्रिय बनने वाले सफल मूर्त भव!
एक दो को आगे बढ़ाने का गुण अर्थात् “पहले आप” का गुण परमार्थ और व्यवहार दोनों में ही सर्व का प्रिय बना देता है। बाप का भी यही मुख्य गुण है। बाप कहते हैं बच्चे “पहले आप”। तो इसी गुण में फालो फादर करो, यही सफलता प्राप्त करने की विधि है। जो बाप के प्रिय, ब्राह्मण परिवार के प्रिय और विश्व सेवा के प्रिय हैं वही एवररेडी हैं।

स्लोगन: मनन शक्ति के आधार से ज्ञान खजाने को अपना बना लो तो विघ्न विदाई ले लेंगे।
 

Tuesday, 6 February 2018

Hindi Murli 07/02/18

07-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम्हें क्षीरखण्ड होकर रहना है, मतभेद में नहीं आना है, कोई भी गन्दी आदत है तो उसे छोड़ देना है, किसी को भी दु:ख नहीं देना है”


प्रश्न: जन्म-जन्मान्तर के लिए ऊंच पद पाने के लिए कौन सा रहम स्वयं पर जरूर करना है?
उत्तर: स्वयं की अन्दर से जांच करके जो भी बुरी आदतें हैं, क्रोध आदि विकार हैं उन्हें निकाल देना, क्षीरखण्ड होकर रहना, एक की श्रीमत पर चलना, मतभेद में न आना, कोई भी ईविल बातें न सुनना, न सुनाना - यही अपने ऊपर रहम करना है। इससे ही जन्म-जन्मान्तर के लिए ऊंच पद मिल जाता है। जो अपने ऊपर रहम नहीं करते वह 21 जन्मों के सुख को लकीर लगा देते हैं।

गीत:- ओम् नमो शिवाए......
ओम् शान्ति। शिवबाबा की महिमा बच्चों ने सुनी। यह महिमा कौन करते हैं और कौन जानते हैं? सिर्फ ब्राह्मण कुल भूषण अर्थात् नई मनुष्य सृष्टि की सम्प्रदाय जिन्हें परमपिता परमात्मा ने अपना बनाया या जन्म दिया है वही जानते हैं क्योंकि पहले-पहले इस सृष्टि में वही ब्रह्मा द्वारा जन्म लेते हैं। जैसे तुमने पहले-पहले जन्म लिया है परमपिता परमात्मा से। तो वह है सभी का सहायक, सारी दुनिया का सहायक, सभी दु:ख दूर करने वाला है। मनुष्य बहुत दु:खी हैं क्योंकि अभी है कलियुग का अन्त। तो सभी का सहायक बनते हैं। फिर भी अक्षर हैं ना आम और खास। तो खास भारत का है, उनमें भी खास जो बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में आकर मिलते हैं अर्थात् जो पहले-पहले सृष्टि पर आते हैं। तुम बच्चे जानते हो तो कैसे सबका सहायक आकर बनते हैं। भगत भगवान को याद करते हैं, परन्तु भगवान को जानते नहीं हैं। जब भगवान को ही नहीं जानते हैं तो भगवान जो नई ब्राह्मण मुख वंशावली रचते हैं, उनको भी नहीं जानते। परमपिता परमात्मा आकर पहले-पहले ब्राह्मण सम्प्रदाय रचते हैं, यह कोई को पता ही नहीं। आदि सनातन देवी-देवता धर्म तो है सतयुग में। बाकी संगमयुग को भूल गये हैं क्योंकि गीता के भगवान को ही द्वापर में ले गये हैं। सतयुग के आदि और कलियुग के अन्त के संगम का किसको पता नहीं है। न गीता के भगवान को जानते हैं। गीता तो है ही सभी शास्त्रों की मात-पिता। ऐसे नहीं कि सिर्फ भारत के शास्त्रों की मात-पिता है। नहीं, जो भी बड़े ते बड़े शास्त्र सारी दुनिया में हैं, सभी की मात-पिता है। भगवानुवाच - मैं तुमको फिर से सहज राजयोग सिखाता हूँ जिसको फिर गीता नाम दिया है। तो अपने को भी कहना पड़ता है कि हम नई गीता सुनाते हैं। पुरानी गीता तो खण्डन की हुई है। यह तो भगवान खुद अपने मुख कंवल से बैठ सुनाते हैं। तुम्हारी बुद्धि में परमपिता परमात्मा शिव ही याद आता है। वह है स्वर्ग का रचयिता, सबका सहायक। कृष्ण को सभी का सहायक नहीं कहेंगे। भगवान सृष्टि का रचयिता एक ही है। कृष्ण तो स्वयं रचना है। बगीचे का फर्स्टक्लास फूल है। परमपिता परमात्मा को बागवान भी कहते हैं, खिवैया भी कहते हैं। मनुष्य तो समझ न सकें कि खिवैया कैसे है? बरोबर असार संसार से ले जाकर फिर यहाँ नई दुनिया में भेज देते हैं। यहाँ ही फूलों का बगीचा बनाते हैं। सभी बच्चे जो भगत बन गये हैं, असुल भगवान की सन्तान थे, उनको माया दु:खी बनाती है। भगवान तो है ही एक। वह सभी भक्तों को जरूर सुख देता है। कोई भी किसको सुख देता है तब उनको याद करते हैं। स्त्री पति को अथवा बच्चा बाप को अथवा दोस्त, दोस्त को याद करते हैं। जरूर उसने सुख दिया होगा। भाई से भी दोस्त प्यारा होता है क्योंकि सुख देते हैं। तो सुख देने वाले को ही याद किया जाता है। अभी सारी सृष्टि के मनुष्य भगत हैं। मनुष्य के ही 84 जन्म गाये हुए हैं। कुत्ते बिल्ली के 84 जन्म नहीं कहेंगे। गाया भी गया है कि आत्मा परमात्मा अलग रहे.... इस समय मेला होता है। परमपिता परमात्मा सभी बच्चों के बीच आते हैं। महफिल लगी हुई है ना। एक होती है सुख की महफिल, दूसरी होती है दु:ख की। सतयुग में है सुख की महफिल। यहाँ तो दु:ख की कहेंगे। कोई मरते हैं तो भी दु:ख की महफिल लग जाती है। कोई बड़ा आदमी मरता है तो शोक में झण्डा नीचे कर देते हैं। तो दु:ख की महफिल हुई ना। भगत बहुत दु:खी होते हैं तो भगवान को याद करते हैं। परन्तु उनको जानते बिल्कुल नहीं। कहते भी हैं उसने पैदा किया। आखरीन भी उनको जानेंगे या नहीं? अन्त में गायन करते हैं हे भगवान तेरी लीला अपरमअपार है। महिमा गाई हुई है। तुम जानते हो बाप नहीं होता तो सृष्टि चक्र का राज़ कौन समझाता, कौन हमको चक्रवर्ती बनाता?
अब संगम पर तुम सदा के लिए दु:ख से छूटने का प्रयत्न कर रहे हो। संगमयुग कोई बड़ा नहीं है। अपना यह नया जन्म है। यह छोटा सा युग है - हम बच्चों के पुरुषार्थ के लिए। बड़ा इम्तहान है। इनकी सब्जेक्ट सभी इम्तहानों से न्यारी है। पांच विकारों पर जीत पानी है। बहुत मनुष्य कहते हैं पवित्र रहना तो असम्भव है। गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए माया को जीतना तो बड़ा मुश्किल है। समझते हैं ऐसा उस्ताद तो मिल न सके। सन्यासी भी घरबार छोड़ने बिगर पवित्र रह नहीं सकते। तो बाप इस माया पर जीत पाने की युक्ति बताते हैं। जैसे कल्प पहले भी सिखाई थी। जब बाबा सिखाते हैं तब हम भगत से ज्ञानी बनते हैं। इसको ही भारत का प्राचीन ज्ञान और योग कहा जाता है। इसको दुनिया में कोई भी नहीं जानते। बाप समझाते हैं यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है और यह देवता धर्म भी लोप हो जाता है। ड्रामा में ही ऐसा है। जब प्राय:लोप हो जाए, सृष्टि दु:खी हो तब तो भगवान आकर फिर से स्थापन करे। यह भी कोई को पता नहीं कि कलियुग की आयु कब पूरी होती है। तुम ही बाप को और इस ड्रामा के आदि मध्य अन्त को जानते हो। देखने में कितने साधारण हो - कुब्जाएं-अहिल्यायें। परन्तु नॉलेज कितनी ऊंची है। अपने सारे 84 जन्मों के चक्र को तुम जानती हो। थोड़ा भी कोई याद करे तो भी अच्छा। परन्तु कोई प्रश्न पूछे और उत्तर देना न आये तो बोलना चाहिए कि हम अभी पढ़ रहे हैं। हमसे बहुत तीखे हैं। वह आपको अच्छी रीति समझा सकेंगे। अपना अहंकार नहीं रखना चाहिए। कह देना चाहिए, हमारी बड़ी बहन जी बहुत तीखी हैं। आप फिर कोई समय आना तो वह समझायेंगी। समझो कोई ऐसा प्रश्न निकलता है तो तीखी भी उसका उत्तर नहीं दे सकती तो बोलना चाहिए हम सब पढ़ रहे हैं। अन्त तक पढ़ते रहेंगे। गुह्य से गुह्य नॉलेज सुनते रहेंगे। यह प्वाइंट अभी हमको समझाई नहीं गई है। यह तो जरूर है, इतना समय जो पड़ा है तो जरूर अजुन गुह्य प्वाइंट रही हुई हैं, जो सुनाते रहेंगे। स्कूल में भी धीरे-धीरे पढ़ाया जाता है। ऐसे थोड़ेही एक ही दिन में सारी नॉलेज मिल जाती है। वैसे यहाँ भी पढ़ाई में, योग लगाने में, आप समान बनाने में समय लगता है। बाप दिन-प्रतिदिन सहज कर समझाते हैं। भगवान एक है, उनको ही सब याद करते हैं। भगवान ही हेविन स्थापन करते हैं तो जरूर देवता बनाने के लिए संगम पर ही राजयोग सिखायेंगे। तो मैनर्स भी ऐसे चाहिए। जब पाप खत्म हों तब तो विजय माला का दाना बनें। टाइम लगता है।
यह है सुहावना संगम का मेला। समझाना है सारी दुनिया के मनुष्य भगत हैं। साधना करते हैं भगवान के लिए कि वह परमात्मा आकर सभी को वापिस ले जाये। मुक्ति जीवनमुक्ति का ज्ञान दे देवे, देवता धर्म की स्थापना करे। सन्यासी तो समझते हैं सुख काग विष्टा समान है। सो तो जरूर इस दुनिया का सुख ऐसा है। परन्तु क्या भारत में कभी सुख नहीं था। सन्यासी तो पसन्द करते हैं मुक्ति को। वह कभी जीवनमुक्ति का ज्ञान दे न सके। भगवान को ही आकर राजयोग सिखाना है। सन्यासियों को नहीं सिखाना है क्योंकि वह कोई आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन नहीं करते हैं। अभी सब कहते भी हैं कि एक मत हो। परन्तु इस दुनिया में तो एकमत हो न सके। अथाह मतें हैं। माता पिता, भाई बहन, काका मामा आदि सभी अनेक मत देने वाले हैं। अब उन पर नहीं चलना है। एक की ही श्रीमत पर चलना है। भगवान आकर एक श्रीमत देते हैं तो फिर एक मत की राजधानी हो जाती है। देवी-देवतायें सदैव क्षीरखण्ड रहते हैं। यहाँ तो बहुत लड़ते झगड़ते रहते हैं। शास्त्रों में भी है कि कौरव पाण्डव दिन में लड़ते थे, रात को क्षीरखण्ड हो जाते थे। यहाँ भी बच्चे समझते हैं कि हमारे में क्रोध का अंश आ गया। बाबा हम आपसे माफी मांगते हैं। तो तुमको भी देखना चाहिए - सारे दिन में किसको दु:ख तो नहीं दिया? किससे मतभेद में तो नहीं आये? किससे ईविल तो नहीं बोला, जिससे कोई को दु:ख हुआ हो? ईविल तो कभी नहीं सुनना चाहिए, ऐसा कुछ देखा, सुना तो बाप को बतलाना चाहिए। बाप ही बच्चों को सब समझाते हैं। नहीं तो आदत पक्की हो जाए। कोई में कोई भी गन्दी आदत है तो छोड़ देना चाहिए, नहीं तो पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। बादशाही के आगे प्रजा के नौकर चाकर गरीब ही कहेंगे ना। यह मजदूर लोग क्या हैं? वहाँ भी मकान बनाने वाले तो होंगे ना। तो बाप समझाते हैं कभी लूनपानी नहीं होना चाहिए। क्रोध करना बहुत बुरा है। जन्म-जन्मान्तर के सुख को लकीर लग जाती है। अपने ऊपर रहम करते रहो। ज्ञान मार्ग में मैनर्स बहुत अच्छे चाहिए। पांच भूतों को भगाते रहो। बाप श्रीमत देते हैं और क्या करेंगे। बहुत लिखते भी हैं कि बाबा हमारा क्रोध छूट गया है। बीड़ी पीना आदि गंदी आदतें छूट गई हैं। तो गोया अपने पर रहम किया ना। अब हेविनली गॉड फादर स्वर्ग का पद प्राप्त कराने हमको पढ़ा रहे हैं। ऐसा बुद्धि में आता है? यह नशा रहना चाहिए। जितना याद करेंगे उतनी खुशी रहेगी। भल भगवान को सभी तो नहीं जानते परन्तु न जानते भी कल्याण तो सभी का होना है। सभी को यह पता पड़ जाए कि भगवान आया है तो यहाँ भीड़ मच जाए। चीटियों मिसल आकर इकट्ठे हों, मिल भी न सकें इसलिए बड़ा कायदे से यह ड्रामा बना हुआ है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) ज्ञान और योग सीख, भगत से ज्ञानी तू आत्मा बनना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते माया को जीतना है। पवित्र जरूर बनना है।
2) ज्ञान मार्ग में बहुत अच्छे मैनर्स धारण करने हैं। बहुत-बहुत मीठा, निरंहकारी बनना है। ईविल बातें नहीं बोलनी हैं। मतभेद में नहीं आना है।

वरदान: हर आत्मा से आत्मिक अटूट प्यार रख स्नेह सम्पन्न व्यवहार करने वाले सफलतामूर्त भव!
जैसे बाप के प्रति अटूट, अखण्ड, अटल प्यार है, श्रेष्ठ भावना है, निश्चय है ऐसे ब्राह्मण आत्माओं से आत्मिक प्यार अटूट और अखण्ड हो। किसी के कैसे भी संस्कार हो, चलन हो लेकिन ब्राह्मण आत्माओं का सारे कल्प में अटूट संबंध है, ईश्वरीय परिवार है, बाप ने हर आत्मा को चुनकर ईश्वरीय परिवार में लाया है, यह स्मृति रहे तो आत्मिक प्यार अटूट होने से स्नेह सम्पन्न व्यवहार होगा और सहज सफलतामूर्त बन जायेंगे।

स्लोगन: अन्तर्मुखी वह है जो जिस समय चाहे आवाज में आये और जिस समय चाहे आवाज से परे हो जाए।