05/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज-24/02/83 मधुबन
"दिलाराम बाप का दिलरूबा बच्चों से मिलन"
आज
विशेष मिलन मनाने के लिए सदा उमंग-उल्लास में रहने वाले बच्चों से मिलने
के लिए आये हैं। दिन रात यही संकल्प रहता है कि मिलन मनाना है। आकार रूप
में भी मिलन मनाते फिर भी साकार रूप द्वारा मिलने की शुभ आशा सदा ही रहती
है, सब दिन गिनती करते रहते कि आज हमको मिलना है, यह संकल्प हर बच्चे का
बापदादा के पास पहुँचता रहता है और बापदादा भी यही रेसपान्ड देने के लिए हर
बच्चे को याद करते रहते हैं इसलिए आज मुरली चलाने नहीं लेकिन मिलने का
सकंल्प पूरा करने आये हैं। कोई-कोई बच्चे दिल ही दिल में मीठे-मीठे उल्हनें
भी देते हैं कि हमें तो बोल द्वारा मुलाकात नहीं कराई। बापदादा भी हरेक
बच्चे से दिल भर-भर के मिलने चाहते हैं। लेकिन समय और माध्यम को देखना
पड़ता है। आकारी रूप से एक ही समय पर जितने चाहें जितना समय चाहें उतना समय
और उतने सब मिल सकते हैं उसके लिए टर्न आने की बात नहीं है। लेकिन जब
साकार सृष्टि में, साकार तन द्वारा मिलन होता है तो साकारी दुनिया और साकार
शरीर के हिसाब को देखना पड़ता है। आकारी वतन मे कभी दिन मुकरर होता है
क्या कि फलाना ग्रुप फलाने दिन मिलेगा वा एक घण्टे के बाद, आधा घण्टे के
बाद मिलने के लिए आना। यह बन्धन आपके वा बाप के सूक्ष्मवतन में सूक्ष्म
शरीर में नहीं है। आकारी रूप से मिलन मनाने के अनुभवी हो ना। वहाँ तो भल
सारा दिन बैठ जाओ, कोई उठायेगा नहीं यहाँ तो कहेंगे अभी पीछे जाओ, अभी आगे
जाओ। फिर भी दोनों मिलना मीठा है। आप डबल विदेशी बच्चे वा देश में रहने
वाले बच्चे जो साकार रूप में ड्रामा अनुसार पालना वा प्रैक्टिकल स्वरूप
नहीं देख पाये हैं। ऐसे बहुत समय से ढूंढने पर फिर से आकर मिले हुए बच्चों
को ब्रह्मा बाप बहुत याद करते हैं। ब्रह्मा बाप ऐसे सिकीलधे बच्चों का
विशेष गुणगान करते हैं कि आये भल पीछे हैं लेकिन आकार रूप द्वारा भी अनुभव
साकार रूप का करते हैं, ऐसे अनुभव के आधार से बोलते हैं कि हमें ऐसा नहीं
लगता कि साकार को हमने नहीं देखा। साकार में पालना ली है और अब भी ले रहे
हैं। तो आकार रूप में साकार का अनुभव करना यह बुद्धि की लगन का, स्नेह का
प्रत्यक्ष स्वरूप है। ऐसे लगता है आकार में भी साकार को देख रहे हैं। ऐसे
अनुभव करते हो ना। तो यह बच्चों की बुद्धि के चमत्कार का सबूत है। और
दिलाराम बाप के समीप दिलाराम के दिलरूबा बच्चे हैं, यह सबूत है। दिलरूबा
बच्चे हो ना। दिल रूबा पर सदा क्या गीत बजता है? वाह बाबा, वाह मेरा बाबा।
बापदादा
हर बच्चे को याद करते हैं। ऐसे नहीं समझना इनको याद किया, मेरे को पता
नहीं याद किया वा नहीं। इनसे ज्यादा प्यार है मेरे से कम प्यार है, नहीं।
आप सोचो 5 हजार वर्ष के बाद बापदादा को बिछड़े हुए बच्चे मिले हैं तो 5
हजार वर्ष का इकट्ठा प्यार हर बच्चे को मिलेगा ना। तो 5 हजार वर्ष का प्यार
5-6 वर्ष में या 10-12 वर्ष में देना तो कितना स्टाक थोड़े समय में देंगे।
ज्यादा से ज्यादा दें तब तो पूरा हो। इतना प्यार का स्टाक हरेक बच्चे के
लिए बाप के पास है। प्यार कम हो नहीं सकता। दूसरी बात कि बापदादा सदा
बच्चों की विशेषता देखता। चाहे कोई समय बच्चे माया के प्रभाव कारण थोड़ा
डगमग होने का खेल भी करते हैं। फिर भी बापदादा उस समय भी उसी नजर से देखते
कि यह बच्चा आया हुआ विघ्न लगन से पार कर फिर भी विशेष आत्मा बन विशेष
कार्य करने वाला है। विघ्न में भी लगन रूप को ही देखते हैं तो प्यार कम
कैसे होगा! हरेक बच्चे से ज्यादा से ज्यादा सदा प्यार है और हर बच्चा सदा
ही श्रेष्ठ है। समझा।
पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
न्यूयार्क:-
बाप
का बनना अर्थात् विशेष आत्मा बनना। जब से बाप के बने उस घड़ी से विश्व के
अन्दर सर्व से श्रेष्ठ गायन योग्य और पूज्यनीय आत्मा बने। अपनी मान्यता,
अपना पूजन फिर से चैतन्य रूप में देख भी रहे हो और सुन भी रहे हो। ऐसे
अनुभव करते हो? कहाँ भारत और कहाँ अमेरिका लेकिन बाप ने कोने से चुनकर एक
ही बगीचे में लाया। अभी सब कौन हो? अल्लाह के बगीचे के रूहे गुलाब। यह तो
नाम लेना पड़ता है फलाना देश, फलाना देश, वैसे एक ही बगीचे के, एक ही बाप
की पालना में आने वाले, रूहे गुलाब हो। अभी ऐसे महसूस होता है ना हम सब एक
के हैं। और हम सब एक रास्ते पर एक मंजिल पर जाने वाले हैं। बाप भी हरेक को
देख हर्षित होते हैं। सबकी शुभ भावना, सबके सेवा की अथक लगन ने दृढ़ संकल्प
ने प्रत्यक्ष सबूत दिया। चारों ओर के उमंग-उत्साह के सहयोग ने रिजल्ट
अच्छी दिखाई है। बाहर का आवाज भारत वालों को जगायेगा, इसलिए बापदादा मुबारक
देते हैं।
2) बारबेडोज:-
बापदादा सदा बच्चों को नम्बरवन बनने का साधन बताते हैं। चाहे कितना भी कोई
पीछे आये लेकिन आगे जाकर नम्बरवन ले सकता है। ऐसे तो नहीं सोचते हो पता
नहीं हमारा ऊंचा पार्ट होगा या नहीं, हम आगे कैसे जायेंगे। बापदादा के पास
चाहे पीछे आने वाले हों, चाहे किस भी देश के हों, चाहे किस भी धर्म के हों,
किस भी मान्यता के हो लेकिन सबके लिए एक ही फुल अधिकार है। बाप एक है तो
हक भी एक जैसा है। सिर्फ हिम्मत और लगन की बात है। कभी भी हिम्मतहीन नहीं
बनना। चाहे कोई कितना भी दिलशिकस्त बनाए, कहे पता नहीं आपको क्या हुआ है,
कहाँ चले गये हो लेकिन आप उनकी बातों में नहीं आना। पक्का जान पहचान कर
सौदा किया है ना! हम बाप के, बाप हमारा। बाप हर बच्चे को अधिकारी आत्मा
समझते हैं। जितना जो ले उसके लिए कोई रूकावट नहीं। अभी कोई सीट्स बुक नहीं
हुई हैं। अभी सब सीट खाली हैं। सीटी बजी ही नहीं है इसलिए हिम्मत रखते
रहेंगे तो बाप भी पदमगुणा मदद देते रहेंगे।
3) कैनाडा -
सदा उड़ती कला में जाने का आधार क्या है? डबल लाइट। तो सदा उड़ते पंछी हो
ना। उड़ता पंछी कभी किसके बन्धन में नहीं आता। नीचे आयेंगे तो बन्धन में
बधेंगे इसलिए सदा ऊपर उड़ते रहो। उड़ते पंछी अर्थात् सर्व बन्धनों से
मुक्त, जीवन मुक्त। कैनाडा में साइन्स भी उड़ने की कला सिखाती है ना। तो
कैनाडा निवासी सदा ही उड़ते पंछी हैं।
4) सैनफ़्रानसिसको -
सभी अपने को विश्व के अन्दर विशेष पार्ट बजाने वाले हीरो एक्टर समझकर
पार्ट बजाते हो? (कभी-कभी) बापदादा को बच्चों का कभी-कभी शब्द सुनकर
आश्चर्य लगता है। जब सदा बाप का साथ है तो सदा उसकी ही याद होगी ना। बाप के
सिवाए और कौन है जिसको याद करते हो। औरों को याद करते-करते क्या पाया और
कहाँ पहुँचे, इसका भी अनुभव है। जब यह भी अनुभव कर चुके तो अब बाप के सिवाए
और याद आ ही क्या सकता! सर्व सम्बन्ध एक बाप से अनुभव किया है या कोई रह
गया है? जब एक द्वारा सर्व सम्बन्ध का अनुभव कर सकते हो तो अनेक तरफ जाने
की आवश्यकता ही नहीं। इसको ही कहा जाता है एक बल एक भरोसा। अच्छा।
सभी
ने अच्छी मेहनत कर विशेष आत्माओं को सम्पर्क में लाया, जिन्होंने भी सेवा
में सहयोग दिया उस सहयोग का रिर्टन अनेक जन्मों तक सहयोग प्राप्त होता
रहेगा। एक जन्म की मेहनत और अनेक जन्म मेहनत से छूट गये। सतयुग में मेहनत
थोड़े ही करेंगे। बापदादा बच्चों की हिम्मत और निमित्त बनने का भाव देखकर
खुश होते हैं। अगर निमित्त भाव से नहीं करते तो रिजल्ट भी नहीं निकलती।
अच्छा।
05/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज-27/02/83 मधुबन
"संगमयुग पर श्रृंगारा हुआ मधुर अलौकिक मेला"
आज
बाप और बच्चे मिलन मेला मना रहे हैं। मेले में बहुत ही वैरायटी और
सुन्दर-सुन्दर वस्तु बहुत सुन्दर सजावट और एक दो में मिलना होता है।
बापदादा इस मधुर मेले में क्या देख रहे हैं, ऐसा अलौकिक श्रृंगारा हुआ मेला
सिवाय संगमयुग के कोई मना नहीं सकता। हरेक, एक दो से विशेष श्रृंगारे हुए
अमूल्य रत्न हैं। अपने श्रृंगार को जानते हो ना। सभी के सिर पर कितना
सुन्दर लाइट का ताज चमक रहा है। इसी लाइट के क्राउन के बीच आत्मा की निशानी
कितनी चमकती हुई मणि मुआफिक चमक रही है। अपना ताजधारी स्वरूप देख रहे हो?
हरेक दिव्य गुणों के श्रृंगार से कितने सुन्दर सजी-सजाई मूर्त हो। ऐसा
सुन्दर श्रृंगार, जिससे विश्व की सर्व आत्मायें आपके तरफ न चाहते हुए भी
स्वत: ही आकर्षित होती हैं। ऐसा श्रेष्ठ अविनाशी श्रृंगार किया है? जो इस
समय के श्रृंगार के यादगार आपके जड़ चित्रों को भी सदा ही भक्त लोग सुन्दर
से सुन्दर सजाते रहेंगे। अभी का श्रृंगार आधा कल्प चैतन्य देव-आत्मा के रूप
में श्रृंगारे जायेंगे और आधाकल्प जड़ चित्रों के रूप में श्रृंगारे
जायेंगे। ऐसा अविनाशी श्रृंगार बापदादा द्वारा सर्व बच्चों का अभी हो गया
है। बापदादा आज हर बच्चे के तीनों ही स्वरूप वर्तमान और अपने राज्य का देव
आत्मा का और फिर भक्ति मार्ग में यादगार चित्र, तीनों ही स्वरूप हरेक बच्चे
के देख हर्षित हो रहे हैं। आप सब भी अपने तीनों रूपों को जान गये हो ना।
तीनों ही अपने रूप नालेज के नेत्र द्वारा देखे हैं ना!
आज
तो बापदादा मिलने का उल्हना पूरा करने आये हैं। कमाल तो बच्चों की है जो
निरबन्धन को भी बन्धन में बाँध देते हैं। बापदादा को भी हिसाब सिखा देते कि
इस हिसाब से मिलो। तो जादूगर कौन हुए - बच्चे वा बाप? ऐसा स्नेह का जादू
बच्चे बाप को लगाते हैं जो बाप को सिवाए बच्चों के और कुछ सूझता ही नहीं।
निरन्तर बच्चों को याद करते हैं। तुम सब खाते हो तो भी एक का आह्वान करते
हो। तो कितने बच्चों के साथ खाना पड़े! कितने बारी तो भोजन पर बुलाते हो।
खाते हैं, चलते हैं, चलते हुए भी हाथ में हाथ देकर चलते, सोते भी साथ में
हैं। तो जब इतने अनेक बच्चों साथ खाते, सोते, चलते तो और क्या फुर्सत होगी!
कोई कर्म करते तो भी यही कहते कि काम आपका है, निमित्त हम हैं। करो कराओ
आप, निमित्त हाथ हम चलाते हैं। तो वह भी करना पड़े ना। और फिर जिस समय
थोड़ा बहुत तूफान आता तो भी कहते आप जानो। तूफानों को मिटाने का कार्य भी
बाप को देते। कर्म का बोझ भी बाप को दे देते। साथ भी सदा रखते, तो बड़े
जादूगर कौन हुए? भुजाओं के सहयोग बिना तो कुछ हो नहीं सकता इसलिए ही तो
माला जपते हैं ना। अच्छा।
आस्ट्रेलिया
निवासी बच्चों ने बहुत अच्छा त्याग किया है और हर बार त्याग करते हैं। सदा
ही लास्ट सो फास्ट जाते और फर्स्ट आते हैं। जितना ही वह त्याग करते हैं,
औरों को आगे करते हैं उतना ही जितने भी मिलते रहते उन सबका थोड़ा-थोड़ा
शेयर आस्ट्रेलिया वालों को भी मिल जाता है। तो त्याग किया या भाग्य लिया!
और फिर साथ-साथ यू.के. का भी बड़ा ग्रुप है। यह दोनों ही पहले-पहले के
निमित्त बने हुए सेन्टर्स हैं और विशाल सेन्टर्स हैं। एक से अनेक स्थानों
पर बाप को प्रत्यक्ष करने वाले बच्चे हैं इसलिए दोनों ही (आस्ट्रेलिया और
यू.के.) बड़ों को, औरों को आगे रखना पड़ेगा। दूसरों की खुशी में आप सब खुश
हो ना। जहाँ तक देखा गया है दोनों ही स्थान के सेवाधारी, सहयोगी, स्नेही
बच्चे सब बातों में फराखदिल हैं। इस बात में भी सहयोगी बनने में महादानी
बच्चे हैं। बापदादा को सब बच्चे याद हैं। सबसे मिल लेंगे, बापदादा को तो
खुशी होती है कि कितना दूर-दूर से बच्चे मिलने के उमंग से अपने स्वीट होम
में पहुँच जाते हैं। उड़ते-उड़ते पहुँच जाते हो। भले स्थूल में किसी भी देश
के हैं लेकिन हैं तो सब एक देशी। सब ही एक हैं। एक बाप, एक देश, एक मत और
एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले। यह तो निमित्त मात्र देश का नाम लेकर
थोड़ा समय मिलने के लिए कहा जाता है। हो सब एक देशी। साकार के हिसाब में भी
इस समय तो सब मधुबन निवासी हैं। मधुबन निवासी अपने को समझना अच्छा लगता है
ना।
नये स्थान पर सेवा की सफलता का आधार:-
जब
भी किसी नये स्थान पर सेवा शुरू करते हो तो एक ही समय पर सर्व प्रकार की
सेवा करो। मन्सा में शुभ भावना, वाणी में बाप से सम्बन्ध जुड़वाने और शुभ
कामना के श्रेष्ठ बोल और सम्बन्ध सम्पर्क में आने से स्नेह और शान्ति के
स्वरूप से आकर्षित करो। ऐसे सर्व प्रकार की सेवा से सफलता को पायेंगे।
सिर्फ वाणी से नहीं लेकिन एक ही समय साथ-साथ सेवा हो। ऐसा प्लैन बनाओ,
क्योंकि किसी की भी सर्विस करने के लिए विशेष स्वयं को स्टेज पर स्थित करना
पड़ता है। सेवा में रिजल्ट कुछ भी हो लेकिन सेवा के हर कदम में कल्याण भरा
हुआ है, एक भी यहाँ तक पहुँच जाए यह भी सफलता तो समाई हुई है ही। अनेक
आत्माओं के भाग्य की लकीर खींचने के निमित्त हैं। ऐसी विशेष आत्मा समझकर
सेवा करते चलो। अच्छा - ओम् शान्ति।
वरदान: परमात्म प्यार की शक्ति से असम्भव को सम्भव करने वाले पदमापदम भाग्यवान भव!
पदमापदम
भाग्यवान बच्चे सदा परमात्म प्यार में लवलीन रहते हैं। परमात्म प्यार की
शक्ति किसी भी परिस्थिति को श्रेष्ठ स्थिति में बदल देती है। असम्भव कार्य
भी सम्भव हो जाते हैं। मुश्किल सहज हो जाता है क्योंकि बापदादा का वायदा है
कि हर समस्या को पार करने में प्रीति की रीति निभाते रहेंगे। लेकिन
कभी-कभी प्रीत करने वाले नहीं बनना। सदा प्रीत निभाने वाले बनना।
स्लोगन: अपने श्रेष्ठ कर्म वा श्रेष्ठ चलन द्वारा दुआयें जमा कर लो तो पहाड़ जैसी बात भी रुई के समान अनुभव होगी।