Monday, 30 September 2019

Hindi Murli 01/10/2019

01-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - हियर नो ईविल...... यहाँ तुम सतसंग में बैठे हो, तुम्हें मायावी कुसंग में नहीं जाना है, कुसंग लगने से ही संशय के रूप में घुटके आते हैं''

प्रश्नः- इस समय किसी भी मनुष्य को स्प्रीचुअल नहीं कह सकते हैं - क्यों?
उत्तर:- क्योंकि सभी देह-अभिमानी हैं। देह-अभिमान वाले स्प्रीचुअल कैसे कहला सकते हैं। स्प्रीचुअल फादर तो एक ही निराकार बाप है जो तुम्हें भी देही-अभिमानी बनने की शिक्षा देते हैं। सुप्रीम का टाइटिल भी एक बाप को ही दे सकते हैं, बाप के सिवाए सुप्रीम कोई भी कहला नहीं सकते।

ओम् शान्ति। बच्चे जब यहाँ बैठते हो तो जानते हो बाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है और सतगुरू भी है। तीन की दरकार रहती है। पहले बाप फिर पढ़ाने वाला टीचर और फिर पिछाड़ी में गुरू। यहाँ याद भी ऐसे करना है क्योंकि नई बात है ना। बेहद का बाप भी है, बेहद का माना सबका। यहाँ जो भी आयेंगे कहेंगे यह स्मृति में लाओ। इसमें किसको संशय हो तो हाथ उठाओ। यह वन्डरफुल बात है ना। जन्म-जन्मान्तर कभी ऐसा कोई मिला होगा जिसको तुम बाप, टीचर, सतगुरू समझो। सो भी सुप्रीम। बेहद का बाप, बेहद का टीचर, बेहद का सतगुरू। ऐसा कभी कोई मिला? सिवाए इस पुरूषोत्तम संगमयुग के कभी मिल न सके। इसमें कोई को संशय हो तो हाथ उठावे। यहाँ सब निश्चय बुद्धि होकर बैठे हैं। मुख्य हैं ही यह तीन। बेहद का बाप नॉलेज भी बेहद की देते हैं। बेहद की नॉलेज तो यह एक ही है। हद की नॉलेज तो तुम अनेक पढ़ते आये हो। कोई वकील बनते हैं, कोई सर्जन बनते हैं क्योंकि यहाँ तो डॉक्टर, जज, वकील आदि सब चाहिए ना। वहाँ तो दरकार नहीं। वहाँ दु:ख की कोई बात ही नहीं। तो अब बाप बैठ बेहद की शिक्षा बच्चों को देते हैं। बेहद का बाप ही बेहद की शिक्षा देते हैं फिर आधाकल्प कोई शिक्षा तुमको पढ़ने की नहीं है। एक ही बार शिक्षा मिलती है जो 21 जन्मों के लिए फलीभूत होती है अर्थात् उनका फल मिलता है। वहाँ तो डॉक्टर, बैरिस्टर, जज आदि होते नहीं। यह तो निश्चय है ना। बरोबर ऐसे है ना? वहाँ दु:ख होता नहीं। कर्मभोग होता नहीं। बाप कर्मों की गति बैठ समझाते हैं। वह गीता सुनाने वाले क्या ऐसे सुनाते हैं? बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों को राजयोग सिखाता हूँ। उसमें तो लिख दिया है कृष्ण भगवानुवाच। परन्तु वह है दैवीगुणों वाला मनुष्य। शिवबाबा तो कोई नाम धरते नहीं। उनका दूसरा कोई नाम नहीं। बाप कहते हैं मैं यह शरीर लोन लेता हूँ। यह शरीर रूपी मकान हमारा नहीं है, यह भी इनका मकान है। खिड़कियाँ आदि सब हैं। तो बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बेहद का बाप अर्थात् सभी आत्माओं का बाप हूँ, पढ़ाता भी हूँ आत्माओं को। इनको कहा जाता है स्प्रीचुअल फादर अर्थात् रूहानी बाप और कोई को भी रूहानी बाप नहीं कहेंगे। यहाँ तुम बच्चे जानते हो यह बेहद का बाप है। अब स्प्रीचुअल कान्फ्रेन्स हो रही है। वास्तव में स्प्रीचुअल कान्फ्रेन्स तो है ही नहीं। वह तो सच्चे स्प्रीचुअल हैं नहीं। देह-अभिमानी हैं। बाप कहते हैं - बच्चे, देही-अभिमानी भव। देह का अभिमान छोड़ो। ऐसे थोड़ेही किसको कहेंगे। स्प्रीचुअल अक्षर अभी डालते हैं। आगे सिर्फ रिलीजस कान्फ्रेन्स कहते थे। स्प्रीचुअल का कोई अर्थ नहीं समझते हैं। स्प्रीचुअल फादर अर्थात् निराकारी फादर। तुम आत्मायें हो स्प्रीचुअल बच्चे। स्प्रीचुअल फादर आकर तुमको पढ़ाते हैं। यह समझ और कोई में हो न सके। बाप खुद बैठ बतलाते हैं कि मैं कौन हूँ। गीता में यह नहीं है। मैं तुमको बेहद की शिक्षा देता हूँ। इसमें वकील, जज, सर्जन आदि की दरकार नहीं क्योंकि वहाँ तो एकदम सुख ही सुख है। दु:ख का नाम-निशान नहीं होता। यहाँ फिर सुख का नाम-निशान नहीं है, इसको कहा जाता है प्राय:लोप। सुख तो काग विष्टा समान है। जरा-सा सुख है तो बेहद सुख की नॉलेज दे कैसे सकते। पहले जब देवी-देवताओं का राज्य था तो सत्यता 100 प्रतिशत थी। अभी तो झूठ ही झूठ है।
यह है बेहद की नॉलेज। तुम जानते हो यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ है, जिसका बीजरूप मैं हूँ। उनमें झाड़ की सारी नॉलेज है। मनुष्यों को यह नॉलेज नहीं है। मैं चैतन्य बीजरूप हूँ। मुझे कहते ही हैं ज्ञान का सागर। ज्ञान से सेकण्ड में गति-सद्गति होती है। मैं हूँ सबका बाप। मुझे पहचानने से तुम बच्चों को वर्सा मिल जाता है। परन्तु राजधानी है ना। स्वर्ग में भी मर्तबे तो नम्बरवार बहुत हैं। बाप एक ही पढ़ाई पढ़ाते हैं। पढ़ने वाले तो नम्बरवार ही होते हैं। इसमें फिर और कोई पढ़ाई की दरकार नहीं रहती। वहाँ कोई बीमार होता नहीं। पाई पैसे की कमाई के लिए पढ़ाई नहीं पढ़ते। तुम यहाँ से बेहद का वर्सा ले जाते हो। वहाँ यह मालूम नहीं पड़ेगा कि यह पद हमको कोई ने दिलाया है। यह तुम अभी समझते हो। हद की नॉलेज तो तुम पढ़ते आये हो। अब बेहद की नॉलेज पढ़ाने वाले को देख लिया, जान लिया। जानते हो बाप, बाप भी है, टीचर भी है, आकर हमको पढ़ाते हैं। सुप्रीम टीचर है, राजयोग सिखलाते हैं। सच्चा सतगुरू भी है। यह है बेहद का राजयोग। वह बैरिस्टरी, डॉक्टरी ही सिखलायेंगे क्योंकि यह दुनिया ही दु:ख की है। वह सब है हद की पढ़ाई, यह है बेहद की पढ़ाई। बाप तुमको बेहद की पढ़ाई पढ़ाते हैं। यह भी जानते हो यह बाप, टीचर, सतगुरू कल्प-कल्प आते हैं फिर यही पढ़ाई पढ़ाते हैं सतयुग-त्रेता के लिए। फिर प्राय:लोप हो जाता है। सुख की प्रालब्ध पूरी हो जाती है ड्रामा अनुसार। यह बेहद का बाप बैठ समझाते हैं, उनको ही पतित-पावन कहा जाता है। कृष्ण को त्वमेव माता च पिता वा पतित-पावन कहेंगे क्या? इनके मर्तबे और उनके मर्तबे में रात-दिन का फ़र्क है। अब बाप कहते हैं मुझे पहचानने से तुम सेकण्ड में जीवनमुक्ति पा सकते हो। अब कृष्ण भगवान् अगर होता तो कोई भी झट पहचान ले। कृष्ण का जन्म कोई दिव्य अलौकिक नहीं गाया हुआ है। सिर्फ पवित्रता से होता है। बाप तो कोई के गर्भ से नहीं निकलते हैं। समझाते हैं मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, रूह ही पढ़ती है। सब संस्कार अच्छे वा बुरे रूह में रहते हैं। जैसे-जैसे कर्म करते हैं, उस अनुसार उन्हें शरीर मिलता है। कोई बहुत दु:ख भोगते हैं। कोई काने, कोई बहरे होते हैं। कहेंगे पास्ट में ऐसे कर्म किये हैं जिसका यह फल है। आत्मा के कर्मों अनुसार ही रोगी शरीर आदि मिलता है।
अभी तुम बच्चे जानते हो - हमको पढ़ाने वाला है गॉड फादर। गॉड टीचर, गॉड प्रीसेप्टर है। उसको कहते है गॉड परम आत्मा। उसको मिलाकर परमात्मा कहते हैं, सुप्रीम सोल। ब्रह्मा को तो सुप्रीम नहीं कहेंगे। सुप्रीम अर्थात् ऊंच ते ऊंच, पवित्र ते पवित्र। मर्तबे तो हरेक के अलग-अलग हैं। कृष्ण का जो मर्तबा है वह दूसरे को मिल नहीं सकता। प्राइम मिनिस्टर का मर्तबा दूसरे को थोड़ेही देंगे। बाप का भी मर्तबा अलग है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी अलग है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर देवता है, शिव तो परमात्मा है। दोनों को मिलाकर शिव शंकर कैसे कहेंगे। दोनों अलग-अलग हैं ना। न समझने के कारण शिव शंकर को एक कह देते हैं। नाम भी ऐसे रख देते हैं। यह सब बातें बाप ही आकर समझाते हैं। तुम जानते हो यह बाबा भी है, टीचर भी है, सत-गुरू भी है। हरेक मनुष्य को बाप भी होता है, टीचर भी होता है और गुरू भी होता है। जब बुढ़े होते हैं तो गुरू करते हैं। आजकल तो छोटेपन में ही गुरू करा देते हैं, समझते हैं अगर गुरू नहीं किया तो अवज्ञा हो जायेगी। आगे 60 वर्ष के बाद गुरू करते थे। वह होती है वानप्रस्थ अवस्था। निर्वाण अर्थात् वाणी से परे स्वीट साइलेन्स होम, जिसमें जाने के लिए आधाकल्प तुमने मेहनत की है। परन्तु पता ही नहीं तो कोई जा नहीं सकते। किसको रास्ता बता कैसे सकते। एक के सिवाए तो कोई रास्ता बता न सके। सबकी बुद्धि एक जैसी नहीं होती है। कोई तो जैसे कथायें सुनते हैं, फायदा कुछ नहीं। उन्नति कुछ नहीं। तुम अभी बगीचे के फूल बनते हो। फूल से कांटे बने, अब फिर कांटे से फूल बाप बनाते हैं। तुम ही पूज्य फिर पुजारी बने। 84 जन्म लेते-लेते सतोप्रधान से तमोप्रधान पतित बन गये। बाप ने सीढ़ी सारी समझाई है। अब फिर पतित से पावन कैसे बनते हैं, यह किसको भी पता नहीं। गाते भी हैं ना हे पतित-पावन आओ, आकर हमको पावन बनाओ फिर पानी की नदियाँ सागर आदि को पतित-पावन समझ क्यों जाकर स्नान करते हैं। गंगा को पतित-पावनी कह देते हैं। परन्तु नदियां भी कहाँ से निकली? सागर से ही निकलती हैं ना। यह सभी सागर की सन्तान हैं तो हरेक बात अच्छी रीति समझने की होती है।
यहाँ तो तुम बच्चे सतसंग में बैठे हो। बाहर कुसंग में जाते हो तो तुमको बहुत उल्टी बातें सुनायेंगे। फिर यह इतनी सब बातें भूल जायेंगी। कुसंग में जाने से घुटका खाने लग पड़ते हैं, संशय का तब मालूम पड़ता है। परन्तु यह बातें तो भूलनी नहीं चाहिए। बाबा हमारा बेहद का बाबा भी है, टीचर भी है, पार भी ले जाते हैं, इस निश्चय से तुम आये हो। वह सभी हैं जिस्मानी लौकिक पढ़ाई, लौकिक भाषायें। यह है अलौकिक। बाप कहते हैं मेरा जन्म भी अलौकिक है। मैं लोन लेता हूँ। पुरानी जुत्ती लेता हूँ। सो भी पुराने ते पुरानी, सबसे पुरानी है यह जुत्ती। बाप ने जो लिया है, इसको लांग बूट कहते हैं। यह कितनी सहज बात है। यह तो कोई भूलने की नहीं है। परन्तु माया इतनी सहज बातें भी भुला देती है। बाप, बाप भी है, बेहद की शिक्षा देने वाला भी है, जो और कोई दे न सके। बाबा कहते हैं भल जाकर देखो कहाँ से मिलती है। सब हैं मनुष्य। वह तो यह नॉलेज दे न सकें। भगवान एक ही रथ लेते हैं, जिसको भाग्यशाली रथ कहा जाता है, जिसमें बाप की प्रवेशता होती है, पदमापदम भाग्यशाली बनाने। बिल्कुल नजदीक का दाना है। ब्रह्मा सो विष्णु बनते हैं। शिव-बाबा इनको भी बनाते हैं, तुमको भी इन द्वारा विश्व का मालिक बनाते हैं। विष्णु की पुरी स्थापन होती है, इसको कहा जाता है राजयोग, राजाई स्थापन करने लिए। अभी यहाँ सुन तो सब रहे हैं, परन्तु बाबा जानते हैं बहुतों के कानों से बह जाता है, कोई धारण कर और सुना सकते हैं। उनको कहा जाता है महारथी। सुनकर फिर धारण करते हैं, औरों को भी रूचि से समझाते हैं। महारथी समझाने वाला होगा तो झट समझेंगे, घोड़े-सवार से कम, प्यादे से और भी कम। यह तो बाप जानते हैं कौन महारथी हैं, कौन घोड़ेसवार हैं। अब इसमें मूँझने की तो बात ही नहीं। परन्तु बाबा देखते रहते हैं बच्चे मूँझते हैं फिर झुटके खाते रहते हैं। आंखें बन्द कर बैठते हैं। कमाई में कभी घुटका आता है क्या? झुटका खाते रहेंगे तो फिर धारणा कैसे होगी। उबासी से बाबा समझ जाते हैं यह थका हुआ है। कमाई में कभी थकावट नहीं होती। उबासी है उदासी की निशानी। कोई न कोई बात के घुटके अन्दर खाते रहने वालों को उबासी बहुत आती है। अभी तुम बाप के घर में बैठे हो, तो परिवार भी है, टीचर भी बनते हैं, गुरू भी बनते हैं रास्ता बताने के लिए। मास्टर गुरू कहा जाता है। तो अब बाप का राइट हैण्ड बनना चाहिए ना। जो बहुतों का कल्याण कर सकते हैं। धन्धे सभी में है नुकसान, बिगर धन्धे नर से नारायण बनने के। सभी की कमाई खत्म हो जाती है। नर से नारायण बनने का धन्धा बाप ही सिखलाते हैं। तो फिर कौन सी पढ़ाई पढ़नी चाहिए। जिनके पास धन बहुत है, वह समझते हैं स्वर्ग तो यहाँ ही है। बापू गांधी ने रामराज्य स्थापन किया? अरे, दुनिया तो यह पुरानी तमोप्रधान है ना और ही दु:ख बढ़ता जाता है, इनको रामराज्य कैसे कहेंगे। मनुष्य कितने बेसमझ बन पड़े हैं। बेसमझ को तमोप्रधान कहा जाता है। समझदार होते हैं सतोप्रधान। यह चक्र फिरता रहता है, इसमें कुछ भी बाप से पूछने का नहीं रहता। बाप का फ़र्ज है रचता और रचना की नॉलेज देना। वह तो देते रहते हैं। मुरली में सब समझाते रहते हैं। सभी बातों का रेसपॉन्ड मिल जाता है। बाकी पूछेंगे क्या? बाप के सिवाए कोई समझा ही नहीं सकते तो पूछ भी कैसे सकते। यह भी तुम बोर्ड पर लिख सकते हो एवरहेल्दी, एवरवेल्दी 21 जन्म के लिए बनना है तो आकर समझो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप जो सुनाते हैं उसे सुनकर अच्छी तरह धारण करना है। दूसरों को रूचि से सुनाना है। एक कान से सुन दूसरे से निकालना नहीं है। कमाई के समय कभी उबासी नहीं लेनी है।
2) बाबा का राइट हैण्ड बन बहुतों का कल्याण करना है। नर से नारायण बनने और बनाने का धन्धा करना है।

वरदान:- चलन और चेहरे से पवित्रता के श्रृंगार की झलक दिखाने वाले श्रंगारी मूर्त भव
पवित्रता ब्राह्मण जीवन का श्रंगार है। हर समय पवित्रता के श्रंगार की अनुभूति चेहरे वा चलन से औरों को हो। दृष्टि में, मुख में, हाथों में, पांवों में सदा पवित्रता का श्रंगार प्रत्यक्ष हो। हर एक वर्णन करे कि इनके फीचर्स से पवित्रता दिखाई देती है। नयनों में पवित्रता की झलक है, मुख पर पवित्रता की मुस्कराहट है। और कोई बात उन्हें नज़र न आये - इसको ही कहते हैं - पवित्रता के श्रंगार से श्रंगारी हुई मूर्त।

स्लोगन:- व्यर्थ सम्बन्ध-सम्पर्क भी एकाउन्ट को खाली कर देता है इसलिए व्यर्थ को समाप्त करो।

Sunday, 29 September 2019

Hindi Murli 30/09/2019

30-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - सदा श्रीमत पर चलना - यही श्रेष्ठ पुरुषार्थ है, श्रीमत पर चलने से आत्मा का दीपक जग जाता है''

प्रश्नः- पूरा-पूरा पुरुषार्थ कौन कर सकते हैं? ऊंच पुरुषार्थ क्या है?
उत्तर:- पूरा पुरुषार्थ वही कर सकते जिनका अटेन्शन वा बुद्धियोग एक में है। सबसे ऊंचा पुरुषार्थ है बाप के ऊपर पूरा-पूरा कुर्बान जाना। कुर्बान जाने वाले बच्चे बाप को बहुत प्रिय लगते हैं।

प्रश्नः- सच्ची-सच्ची दीपावली मनाने के लिए बेहद का बाप कौन-सी राय देते हैं?
उत्तर:- बच्चे, बेहद की पवित्रता को धारण करो। जब यहाँ बेहद पवित्र बनेंगे, ऐसा ऊंचा पुरुषार्थ करेंगे तब लक्ष्मी-नारायण के राज्य में जा सकेंगे अर्थात् सच्ची-सच्ची दीपावली वा कारोनेशन डे मना सकेंगे।

ओम् शान्ति। बच्चे अभी यहाँ बैठकर क्या कर रहे हैं? चलते फिरते अथवा यहाँ बैठे-बैठे जन्म-जन्मान्तर के जो पाप सिर पर हैं, उन पापों का याद की यात्रा से विनाश करते हैं। यह तो आत्मा जानती है, हम जितना बाप को याद करेंगे उतना पाप कटते जायेंगे। बाप ने तो अच्छी रीति समझाया है - भल यहाँ बैठे हो तो भी जो श्रीमत पर चलने वाले हैं, उनको तो बाप की राय अच्छी ही लगेगी। बेहद बाप की राय मिलती है, बेहद पवित्र बनना है। तुम यहाँ आये हो बेहद पवित्र बनने के लिए, सो बनेंगे ही याद की यात्रा से। कई तो बिल्कुल याद कर नहीं सकते, कई समझते हैं हम याद की यात्रा से अपने पाप काट रहे हैं, गोया अपना कल्याण कर रहे हैं। बाहर वाले तो इन बातों को जानते नहीं। तुमको ही बाप मिला है, तुम रहते ही हो बाप के पास। जानते हो अभी हम ईश्वरीय सन्तान बने हैं, आगे आसुरी सन्तान थे। अब हमारा संग ईश्वरीय सन्तानों से है। गायन भी है ना - संग तारे कुसंग डुबोये। बच्चों को घड़ी-घड़ी यह भूल जाता है कि हम ईश्वरीय सन्तान हैं तो हमको ईश्वरीय मत पर ही चलना चाहिए, न कि अपनी मनमत पर। मनमत मनुष्य मत को कहा जाता है। मनुष्य मत आसुरी ही होती है। जो बच्चे अपना कल्याण चाहते हैं वह बाप को अच्छी रीति याद करते रहते हैं, सतोप्रधान बनने के लिए। सतोप्रधान की महिमा भी होती है। बरोबर जानते हैं हम सुखधाम के मालिक बनते हैं नम्बरवार। जितना-जितना श्रीमत पर चलते हैं, उतना ऊंच पद पाते हैं, जितना अपनी मत पर चलते तो पद भ्रष्ट हो जायेगा। अपना कल्याण करने के लिए बाप के डायरेक्शन तो मिलते ही रहते हैं। बाप ने समझाया है यह भी पुरुषार्थ है, जो जितना याद करते हैं तो उनके भी पाप कटते हैं। याद की यात्रा बिगर तो पवित्र बन नहीं सकेंगे। उठते, बैठते, चलते यही ओना रखना है। तुम बच्चों को कितने वर्षों से शिक्षा मिली है तो भी समझते हैं हम बहुत दूर हैं। इतना बाप को याद नहीं कर सकते हैं। सतोप्रधान बनने में तो बहुत टाइम लग जायेगा। इस बीच में शरीर छूट जाए तो कल्प-कल्पान्तर के लिए कम पद हो जायेगा। ईश्वर का बने हैं तो उनसे पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ करना चाहिए। बुद्धि एक तरफ ही रहनी चाहिए। तुमको अब श्रीमत मिलती है। वह है ऊंच ते ऊंच भगवान। उनकी मत पर नहीं चलेंगे तो बहुत धोखा खायेंगे। चलते हो वा नहीं, वह तो तुम जानो और शिवबाबा जाने। तुमको पुरुषार्थ कराने वाला वह शिवबाबा है। देहधारी सब पुरुषार्थ करते हैं। यह भी देहधारी है, इनको शिवबाबा पुरुषार्थ कराते हैं। बच्चों को ही पुरुषार्थ करना है। मूल बात है पतितों को पावन बनाने की। वैसे दुनिया में पावन तो बहुत होते हैं। सन्यासी भी पवित्र रहते हैं। वह तो एक जन्म के लिए पावन बनते हैं। ऐसे बहुत हैं जो इस जन्म में बाल ब्रह्मचारी रहते हैं। वह कोई दुनिया को मदद नहीं दे सकते हैं पवित्रता की। मदद तब हो जबकि श्रीमत पर पावन बनें और दुनिया को पावन बनायें।
अभी तुमको श्रीमत मिल रही है। जन्म-जन्मान्तर तो तुम आसुरी मत पर चले हो। अब तुम जानते हो सुखधाम की स्थापना हो रही है। जितना हम श्रीमत पर पुरुषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। यह ब्रह्मा की मत नहीं है। यह तो पुरुषार्थी है। इनका पुरुषार्थ जरूर इतना ऊंच है तब तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। तो बच्चों को यह फालो करना है। श्रीमत पर चलना पड़े, मनमत पर नहीं। अपने आत्मा की ज्योति को जगाना है। अभी दीपावली आती है, सतयुग में दीपावली होती नहीं। सिर्फ कारोनेशन है। बाकी आत्मायें तो सतोप्रधान बन जाती हैं। यह जो दीपमाला मनाते हैं, वह है झूठी। बाहर के दीपक जगाते हैं, वहाँ तो घर-घर में दीप जगा हुआ है अर्थात् सबकी आत्मा सतोप्रधान रहती है। 21 जन्मों के लिए ज्ञान घृत पड़ जाता है। फिर आहिस्ते-आहिस्ते कम होते-होते इस समय ज्योति उझाई है - सारी दुनिया की। इसमें भी खास भारतवासी, आम दुनिया। अभी पाप आत्मायें तो सब हैं, सबकी कयामत का समय है, सबको हिसाब-किताब चुक्तू करना है। अभी तुम बच्चों को पुरुषार्थ करना है ऊंच ते ऊंच पद पाने का, श्रीमत पर चलने से ही पायेंगे। रावण राज्य में तो शिवबाबा की बहुत अवज्ञा की है। अब भी उनके फ़रमान पर नहीं चलेंगे तो बहुत धोखा खायेंगे। उनको ही बुलाया है कि आकर हमको पावन बनाओ। तो अब अपना कल्याण करने के लिए शिवबाबा की श्रीमत पर चलना पड़े। नहीं तो बहुत अकल्याण हो जायेगा। मीठे-मीठे बच्चे यह भी जानते हो - शिवबाबा की याद बिगर हम सम्पूर्ण पावन बन नहीं सकते। तुमको इतने वर्ष हुए हैं फिर भी ज्ञान की धारणा क्यों नहीं होती है। सोने के बर्तन में ही धारणा होगी। नये-नये बच्चे कितने सर्विसएबुल हो जाते हैं। फर्क देखो कितना है। पुराने-पुराने बच्चे इतना याद की यात्रा में नहीं रहते, जितना नये रहते हैं। कई अच्छे शिवबाबा के लाडले बच्चे आते हैं, कितनी सर्विस करते हैं। जैसेकि शिवबाबा के पिछाड़ी आत्मा को कुर्बान कर दिया है। कुर्बान करने से फिर सर्विस भी कितनी करते हैं। कितने प्रिय मीठे लगते हैं। बाप को मदद करते ही हैं याद की यात्रा में रहने से। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम पावन बनेंगे। बुलाया ही है कि मुझे आकर पावन बनाओ तो अब बाप कहते हैं मुझे याद करते रहो। देह के सम्बन्ध सब त्याग करना पड़े। मित्र-सम्बन्धियों आदि की भी याद न रहे, सिवाए एक बाप के, तब ही ऊंच पद पा सकेंगे। याद नहीं करेंगे तो ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। यह बापदादा भी समझ सकते हैं। तुम बच्चे भी जानते हो। नये-नये आते हैं, समझते हैं दिन-प्रतिदिन सुधरते जाते हैं। श्रीमत पर चलने से ही सुधरते हैं। क्रोध पर भी पुरुषार्थ करते-करते जीत पाते हैं। तो बाप भी समझाते हैं, खराबियों को निकालते रहो। क्रोध भी बड़ा खराब है। अपने अन्दर को भी जलाते हैं, दूसरे को भी जलाते हैं। वह भी निकलना चाहिए। बच्चे बाप की श्रीमत पर नहीं चलते हैं तो पद कम हो जाता है, जन्म-जन्मान्तर, कल्प-कल्पान्तर का घाटा पड़ जाता है।
तुम बच्चे जानते हो कि वह है जिस्मानी पढ़ाई, यह है रूहानी पढ़ाई जो रूहानी बाप पढ़ाते हैं। हर प्रकार की सम्भाल भी होती रहती है। कोई विकारी यहाँ अन्दर (मधुबन में) आ न सके। बीमारी आदि में भी विकारी मित्र-सम्बन्धी आयें, यह तो अच्छा नहीं। पसन्द भी हम न करें। नहीं तो अन्तकाल वह मित्र-सम्बन्धी ही याद पड़ेंगे। फिर वह ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। बाप तो पुरुषार्थ कराते हैं, कोई की भी याद न आये। ऐसे नहीं, हम बीमार हैं इसलिए मित्र-सम्बन्धी आदि आयें देखने के लिए। नहीं, उन्हों को बुलाना, कायदा नहीं। कायदेसिर चलने से ही सद्गति होती है। नहीं तो मुफ्त अपने को नुकसान पहुँचाते हैं। परन्तु तमोप्रधान बुद्धि यह समझते नहीं हैं। ईश्वर राय देते हैं तो भी सुधरते नहीं। बड़ा खबरदारी से चलना चाहिए। यह है होलीएस्ट ऑफ होली स्थान। पतित ठहर न सकें। मित्र-सम्बन्धी आदि याद होंगे तो मरने समय जरूर वह याद आयेंगे। देह-अभिमान में आने से अपने को ही नुकसान पहुँचाते हैं। सज़ा के निमित्त बन पड़ते हैं। श्रीमत पर न चलने से बड़ी दुर्गति हो जाती है। सर्विस लायक बन न सके। कितना भी माथा मारे परन्तु सर्विस लायक हो नहीं सकते। अवज्ञा की तो पत्थरबुद्धि बन जाते हैं। ऊपर चढ़ने बदले नीचे गिर जाते हैं। बाप तो कहेंगे बच्चों को आज्ञाकारी बनना चाहिए। नहीं तो पद भ्रष्ट हो पड़ेगा। लौकिक बाप के पास भी 4-5 बच्चे होते हैं, परन्तु उनमें जो आज्ञाकारी होते हैं वही बच्चे प्रिय लगते हैं। जो आज्ञाकारी नहीं वह तो दु:ख ही देंगे। अभी तुम बच्चों को दोनों बाप बहुत बड़े मिले हैं, उनकी अवज्ञा नहीं करनी है। अवज्ञा करेंगे तो जन्म-जन्मान्तर, कल्प-कल्पान्तर बहुत कम पद पायेंगे। पुरुषार्थ ऐसा करना है जो अन्त में एक ही शिवबाबा याद आये। बाप कहते हैं मैं जान सकता हूँ - हर एक क्या पुरुषार्थ करते हैं। कोई तो बहुत थोड़ा याद करते हैं, बाकी तो अपने मित्र-सम्बन्धियों को ही याद करते रहते हैं। वह इतना खुशी में नहीं रह सकते। ऊंच पद पा न सकें।
तुम्हारा तो रोज़ सतगुरूवार है। बृहस्पति के दिन कॉलेज में बैठते हैं। वह है जिस्मानी विद्या। यह तो है रूहानी विद्या। तुम जानते हो शिवबाबा हमारा बाप, टीचर, सतगुरू है। तो उनके डायरेक्शन पर चलना चाहिए, तब ही ऊंच पद पा सकेंगे। जो पुरुषार्थी हैं, उन्हों के अन्दर बहुत खुशी रहती है। बात मत पूछो। खुशी है तो औरों को भी खुश करने का पुरुषार्थ करते हैं। बच्चियां देखो कितनी मेहनत करती रहती हैं - दिन-रात क्योंकि यह वन्डरफुल ज्ञान है ना। बापदादा को तरस पड़ता है कि कई बच्चे बेसमझी से कितना घाटा पाते हैं। देह-अभिमान में आकर अन्दर में बड़ा जलते हैं। क्रोध में मनुष्य ताम्बे जैसा लाल हो जाते हैं। क्रोध मनुष्य को जलाता है, काम काला बना देता है। मोह अथवा लोभ में इतना जलते नहीं हैं। क्रोध में जलते हैं। क्रोध का भूत बहुतों में है। कितना लड़ते हैं। लड़ने से अपना ही नुकसान कर लेते हैं। निराकार साकार दोनों की अवज्ञा करते हैं। बाप समझते हैं यह तो कपूत हैं। मेहनत करेंगे तो ऊंच पद पायेंगे। तो अपने कल्याण के लिए सब सम्बन्ध भुला देने हैं। सिवाए एक बाप के किसको भी याद नहीं करना है। घर में रहते सम्बन्धियों को देखते हुए शिवबाबा को याद करना है। तुम हो संगमयुग पर, अब अपने नये घर को, शान्तिधाम को याद करो।
यह तो बेहद की पढ़ाई है ना। बाप शिक्षा देते हैं इसमें बच्चों का ही फ़ायदा है। कई बच्चे अपनी बेढंगी चलन से मुफ्त अपने को नुकसान पहुँचाते हैं। पुरुषार्थ करते हैं विश्व की बादशाही लेने के लिए परन्तु माया बिल्ली कान काट लेती है। जन्म लिया है, कहते हैं हम यह पद पायेंगे परन्तु माया बिल्ली लेने नहीं देती, तो पद भ्रष्ट हो जाता है। माया बड़ा जोर से वार कर देती है। तुम यहाँ आते हो राज्य लेने के लिए। परन्तु माया हैरान करती है। बाप को तरस पड़ता है बिचारे ऊंच पद पावें तो अच्छा है। मेरी निंदा कराने वाला न बनें। सतगुरू का निंदक ठौर न पाये, किसकी निंदा? शिवबाबा की। ऐसी चलन नहीं चलनी चाहिए जो बाप की निंदा हो, इसमें अहंकार की बात नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपने कल्याण के लिए देह के सब सम्बन्ध भुला देने हैं, उनसे प्रीत नहीं रखनी है। ईश्वर की ही मत पर चलना है, अपनी मत पर नहीं। कुसंग से बचना है, ईश्वरीय संग में रहना है।
2) क्रोध बहुत खराब है, यह स्वयं को जलाता है, क्रोध के वश होकर अवज्ञा नहीं करनी है। खुश रहना है और सबको खुश करने का पुरुषार्थ करना है।

वरदान:- दिल की महसूसता से दिलाराम की आशीर्वाद प्राप्त करने वाले स्व परिवर्तक भव
स्व को परिवर्तन करने के लिए दो बातों की महसूसता सच्चे दिल से चाहिए 1- अपनी कमजोरी की महसूसता 2- जो परिस्थिति वा व्यक्ति निमित्त बनते हैं उनकी इच्छा और उनके मन की भावना की महसूसता। परिस्थिति के पेपर के कारण को जान स्वयं को पास होने के श्रेष्ठ स्वरूप की महसूसता हो कि स्वस्थिति श्रेष्ठ है, परिस्थिति पेपर है - यह महसूसता सहज परिवर्तन करा लेगी और सच्चे दिल से महसूस किया तो दिलाराम की आशीर्वाद प्राप्त होगी।

स्लोगन:- वारिस वह है जो एवररेडी बन हर कार्य में जी हजूर हाजिर कहता है।

Saturday, 28 September 2019

Hindi Murli 29/09/2019

29-09-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 16-02-85 मधुबन

हर श्वांस में खुशी का साज बजना ही इस श्रेष्ठ जन्म की सौगात है
आज भोलेनाथ बाप भोले भण्डारी अपने अति स्नेही, सदा सहयोगी, सहजयोगी सर्व खजानों के मालिक बच्चों से मिलन मनाने आये हैं। अब भी मालिक, भविष्य में भी मालिक। अभी विश्व रचयिता के बालक सो मालिक हो, भविष्य में विश्व के मालिक हो। बापदादा अपने ऐसे मालिक बच्चों को देख हर्षित होते हैं। यह बालक सो मालिकपन का अलौकिक नशा, अलौकिक खुशी है। ऐसे सदा खुशनसीब सदा सम्पन्न श्रेष्ठ आत्मायें हो ना। आज सभी बच्चे बाप के अवतरण की जयन्ती मनाने के लिए उमंग उत्साह में हर्षित हो रहे हैं। बापदादा कहते हैं बाप की जयन्ती सो बच्चों की भी जयन्ती है इसलिए यह वन्डरफुल जयन्ती है। वैसे बाप और बच्चे की एक ही जयन्ती नहीं होती है। होती है? वही दिन बाप के जन्म का हो और बच्चे का भी हो, ऐसा कब सुना है? यही अलौकिक जयन्ती है। जिस घड़ी बाप ब्रह्मा बच्चे में अवतरित हुए उसी दिन उस घड़ी ब्रह्मा का भी साथ-साथ अलौकिक जन्म हुआ। इकट्ठा जन्म हो गया ना। और ब्रह्मा के साथ अनन्य ब्राह्मणों का भी हुआ इसलिए दिव्य जन्म की तिथि, वेला, रेखा ब्रह्मा की और शिवबाबा के अवतरण की एक ही होने कारण शिव बाप और ब्रह्मा बच्चा परम आत्मा और महान आत्मा होते हुए भी ब्रह्मा बाप समान बना। समानता के कारण कम्बाइन्ड रूप बन गये। बापदादा, बापदादा सदा इकट्ठे बोलते हो। अलग नहीं। ऐसे ही अनन्य ब्राह्मण बापदादा के साथ-साथ ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारी के रूप में अवतरित हुए।
तो ब्रह्मा और कुमार कुमारी यह भी कम्बाइन्ड बाप और बच्चे की स्मृति का नाम है। तो बापदादा बच्चों के ब्राह्मण जीवन की अवतरण जयन्ती मनाने आये हैं। आप सभी भी अवतार हो ना! अवतार अर्थात् श्रेष्ठ स्मृति-"मैं दिव्य जीवन वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ।'' तो नया जन्म हुआ ना! ऊंची स्मृति से इस साकार शरीर में अवतरित हो विश्व कल्याण के कार्य में निमित्त बने हो। तो अवतार हुए ना। जैसे बाप अवतरित हुए हैं वैसे आप सब अवतरित हुए हो विश्व परिवर्तन के लिए। परिवर्तन होना ही अवतरित होना है। तो यह अवतारों की सभा है। बाप के साथ-साथ आप ब्राह्मण बच्चों का भी अलौकिक बर्थ डे है। तो बच्चे बाप की जयन्ती मनायेंगे या बाप बच्चों की मनायेंगे। या सभी मिल करके एक दो की मनायेंगे! यह तो भक्त लोग सिर्फ यादगार मनाते रहते और आप सम्मुख बाप के साथ मनाते हो। ऐसा श्रेष्ठ भाग्य, कल्प-कल्प के भाग्य की लकीर अविनाशी खिंच गई। सदा यह समृति में रहे कि हमारा भगवान के साथ भाग्य है। डायरेक्ट भाग्य विधाता के साथ भाग्य प्राप्त करने का पार्ट है। ऐसे डबल हीरो, हीरो पार्टधारी भी हो और हीरे तुल्य जीवन वाले भी हो। तो डबल हीरो हो गये ना। सारे विश्व की नज़र आप हीरो पार्टधारी आत्माओं की तरफ है। आप भाग्यवान आत्माओं की आज अन्तिम जन्म में भी वा कल्प के अन्तिम काल में भी कितनी याद, यादगार के रूप में बनी हुई है। बाप के वा ब्राह्मणों के बोल यादगार रूप में शास्त्र बन गये हैं जो अभी भी दो वचन सुनने के लिए प्यासे रहते हैं। दो वचन सुनने से शान्ति का, सुख का अनुभव करने लगते हैं।
आप भाग्यवान आत्माओं के श्रेष्ठ कर्म चरित्र के रूप में अब तक भी गाये जा रहे हैं। आप भाग्यवान आत्माओं की श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना के श्रेष्ठ संकल्प दुआ के रूप में गाये जा रहे हैं। किसी भी देवता के आगे दुआ मांगने जाते हैं। आप भाग्यवान आत्माओं की श्रेष्ठ स्मृति-सिमरण के रूप में अब भी यादगार चल रहा है। सिमरण की कितनी महिमा करते हैं। चाहे नाम सिमरण करते, चाहे माला के रूप में सिमरण करते। यह स्मृति का यादगार सिमरण रूप में चल रहा है। तो ऐसे भाग्यवान कैसे बने! क्योंकि भाग्य विधाता के साथ भाग्यवान बने हो। तो समझते हो कितना भाग्यवान दिव्य जन्म है? ऐसे दिव्य जन्म की, बापदादा भगवान, भाग्यवान बच्चों को बधाई दे रहे हैं। सदा बधाईयाँ ही बधाईयाँ हैं। यह सिर्फ एक दिन की बधाई नहीं। यह भाग्यवान जन्म हर सेकेण्ड, हर समय बधाईयों से भरपूर है। अपने इस श्रेष्ठ जन्म को जानते हो ना? हर श्वाँस में खुशी का साज बज रहा है। श्वाँस नहीं चलता लेकिन खुशी का साज़ चल रहा है। साज़ सुनने में आता है ना! नैचुरल साज़ कितना श्रेष्ठ है! इस दिव्य जन्म का यह खुशी का साज़ अर्थात् श्वाँस दिव्य जन्म की श्रेष्ठ सौगात है। ब्राह्मण जन्म होते ही यह खुशी का साज़ गिफ्ट में मिला है ना। साज़ में भी अंगुलियाँ नीचे ऊपर करते हो ना। तो श्वाँस भी नीचे ऊपर चलता है। तो श्वाँस चलना अर्थात् साज़ चलना। श्वाँस बन्द नहीं हो सकता। तो साज़ भी बन्द नहीं हो सकता। सभी का खुशी का साज़ ठीक चल रहा है ना! डबल विदेशी क्या समझते हैं? भोले भण्डारी से सभी खजाने ले अपना भण्डारा भरपूर कर लिया है ना, जो इक्कीस जन्म भण्डारे भरपूर रहेंगे। भरने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। आराम से प्रालब्ध प्राप्त होगी। अभी का पुरूषार्थ इक्कीस जन्म की प्रालब्ध। इक्कीस जन्म सदा सम्पन्न स्वरूप में होंगे। तो पुरूषार्थ क्या किया? मेहनत लगती है? पुरूषार्थ अर्थात् सिर्फ अपने को इस रथ में विराजमान पुरूष अर्थात् आत्मा समझो। इसको कहते हैं पुरुषार्थ। यह पुरुषार्थ किया ना। इस पुरुषार्थ के फलस्वरूप इक्कीस जन्म सदा खुश और मौज में रहेंगे। अब भी संगमयुग मौजों का युग है। मूँझने का नहीं, मौजों का युग है। अगर किसी भी बात में मूँझते हैं तो संगमयुग से पांव थोड़ा कलियुग तरफ ले जाते, इसलिए मूँझते हैं। संकल्प अथवा बुद्धि रूपी पांव संमगयुग पर है तो सदा मौजों में हैं। संगमयुग अर्थात् दो का मिलन मनाने का युग है। तो बाप और बच्चे का मिलन मनाने का संगमयुग है। जहाँ मिलन है वहाँ मौज है। तो मौज मनाने का जन्म है ना। मूँझने का नाम निशान नहीं। मौजों के समय पर खूब रूहानी मौज मनाओ। डबल विदेशी तो डबल मौज में रहने वाले हैं ना। ऐसे मौजों के जन्म की मुबारक हो। मूँझने के लिए विश्व में अनेक आत्मायें हैं, आप नहीं हो। वह पहले ही बहुत हैं। और मौज मनाने वाले आप थोड़े से हो। समझा-अपनी इस श्रेष्ठ जयन्ती को! वैसे भी आजकल ज्योतिष विद्या वाले दिन, तिथि और वेला के आधार पर भाग्य बताते हैं। आप सबकी वेला कौन-सी है! तिथि कौन-सी है? बाप के साथ-साथ ब्राह्मणों का भी जन्म है ना। तो भगवान की जो तिथि वह आपकी।
भगवान के अवतरण अर्थात् दिव्य जन्म की जो वेला वह आपकी वेला हो गई। कितनी ऊंची वेला है। कितनी ऊंची रेखा है, जिसको दशा कहते हैं। तो दिल में सदा यह उमंग उत्साह रहे कि बाप के साथ-साथ हमारा जन्म है। ब्रह्मा ब्राह्मणों के बिना कुछ कर नहीं सकते। शिव बाप ब्रह्मा के बिना कुछ कर नहीं सकते। तो साथ-साथ हुआ ना। तो जन्म तिथि, जन्म वेला का महत्व सदा याद रखो। जिस तिथि पर भगवान उतरे उस तिथि पर हम आत्मा अवतरित हुई। नाम राशि भी देखो-ब्रह्मा-ब्राह्मण। ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारी। नाम राशि भी वही श्रेष्ठ है, ऐसे श्रेष्ठ जन्म वा जीवन वाले बच्चों को देख बाप सदा हर्षित होते हैं। बच्चे कहते वाह! बाबा वाह! और बाप कहते वाह बच्चे! ऐसे बच्चे भी किसको नहीं मिलेंगे।
आज के इस दिव्य दिवस की विशेष सौगात बापदादा सभी स्नेही बच्चों को दो गोल्डन बोल दे रहे हैं। एक सदा अपने को समझो-"मैं बाप का नूरे रत्न हूँ।'' नूरे रत्न अर्थात् सदा नयनों में समाया हुआ। नयनों में समाने का स्वरूप बिन्दी होता है। नयनों में बिन्दी की कमाल है। तो नूरे रत्न अर्थात् बिन्दु बाप में समाया हुआ हूँ। स्नेह में समाया हुआ हूँ। तो एक यह गोल्डन बोल याद रखना कि नूरे रत्न हूँ। दूसरा-"सदा बाप का साथ और हाथ मेरे ऊपर है।'' साथ भी है और हाथ भी है। सदा आशीर्वाद का हाथ है और सदा सह-योग का साथ है। तो सदा बाप का साथ और हाथ है ही है। साथ देना हाथ रखना नहीं है, लेकिन है ही। यह दूसरा गोल्डन बोल सदा साथ और सदा हाथ। यह आज के इस दिव्य जन्म की सौगात है। अच्छा-
ऐसे चारों ओर के सदा श्रेष्ठ भाग्यवान बच्चों को, सदा हर श्वाँस को खुशी का साज़ अनुभव करने वाले बच्चों को, डबल हीरो बच्चों को, सदा भगवान और भाग्य ऐसे स्मृति स्वरूप बच्चों को, सदा सर्व खजानों से भरपूर भण्डार वाले बच्चों को भोलेनाथ, अमरनाथ वरदाता बाप का बहुत-बहुत दिव्य जन्म की बधाइयों के साथ-साथ यादप्यार और नमस्ते।
दादियों से - बेहद बाप की स्नेह की बाहें बहुत बड़ी हैं, उसी स्नेह की बाहों में वा भाकी में सभी समाये हुए हैं। सदा ही सभी बच्चे बाप की भुजाओं के अन्दर भुजाओं की माला के अन्दर हो तभी मायाजीत हो। ब्रह्मा के साथ-साथ जन्म लेने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना। तिथि में जरा भी अन्तर नहीं है इसीलिए ब्रह्मा के बहुत मुख दिखाये हैं। ब्रह्मा को ही पाँच मुखी वा तीन मुखी दिखाते हैं क्योंकि ब्रह्मा के साथ-साथ ब्राह्मण हैं। तो तीन मुख वाले में आप हो या पाँच मुख वाले में हो। मुख भी सहयोगी होता है ना। बाप को भी नशा है-कौन-सा? सारे विश्व में कोई भी बाप ऐसे बच्चे ढूँढकर लाये तो मिलेंगे! (नहीं) बाप कहेंगे ऐसे बच्चे नहीं मिलेंगे, बच्चे कहते ऐसा बाप नहीं मिलेगा। अच्छा है-बच्चे ही घर की रौनक होते हैं। अकेले बाप से घर की रौनक नहीं होती इसलिए बच्चे इस विश्व रूपी घर की रौनक हैं। इतने सारे ब्राह्मणों की रौनक लगाने के निमित्त कौन बने? बच्चे बने ना! बाप भी बच्चों की रौनक देख खुश होते हैं। बाप को आप लोगों से भी ज्यादा मालायें सिमरण करनी पड़ती हैं। आपको तो एक ही बाप को याद करना पड़ता और बाप को कितनी मालायें सिमरण करनी पड़ती। जितनी भक्तिमार्ग में मालायें डाली हैं उतनी बाप को अभी सिमरण करनी पड़ती। एक बच्चे की भी माला बाप एक दिन भी सिमरण न करे यह हो नहीं सकता। तो बाप भी नौधा भक्त हो गया ना। एक-एक बच्चे के विशेषताओं की, गुणों की माला बाप सिमरण करते और जितने बार सिमरण करते उतने वह गुण विशेषतायें और फ्रेश होती जाती। माला बाप सिमरण करते लेकिन माला का फल बच्चों को देता, खुद नहीं लेता। अच्छा-बापदादा तो सदा बच्चों के साथ ही रहते हैं। एक पल भी बच्चों से अलग नहीं रह सकते हैं। रहने चाहें तो भी नहीं रह सकते। क्यों? जितना बच्चे याद करते उसका रिसपान्ड तो देंगे ना! याद करने का रिटर्न तो देना पड़ेगा ना। तो सेकेण्ड भी बच्चों के सिवाय रह नहीं सकते। ऐसा भी कभी वन्डर नहीं देखा होगा जो साथ ही रहें। बाप बच्चों से अलग ही न हों। ऐसा बाप बेटे की जोड़ी कभी नहीं देखी होगी। बहुत अच्छा बगीचा तैयार हुआ है। आप सबको भी बगीचा अच्छा लगता है ना। एक-एक की खुशबू न्यारी और प्यारी है इसलिए अल्लाह का बगीचा गाया हुआ है।
सभी आदि रत्न हो, एक-एक रत्न की कितनी वैल्यु है और हरेक रत्न की हर समय हर कार्य में आवश्यकता है। तो सभी श्रेष्ठ रत्न हो। जिन्हों की अभी भी रत्नों के रूप में पूजा होती है। अभी अनेक आत्माओं के विघ्न विनाशक बनने की सेवा करते हो तब यादगार रूप में एक-एक रत्न की वैल्यु होती है। एक-एक रत्न की विशेषता होती है। कोई विघ्न को नाश करने वाला रत्न होता, कोई कौन-सा! तो अभी लास्ट तक भी स्थूल यादगार रूप सेवा कर रहा है। ऐसे सेवाधारी बने हो। समझा।
सम्मेलन में आये हुए विदेशी प्रतिनिधियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
सभी कहाँ पहुंचे हो? बाप के घर में आये हैं, ऐसा अनुभव करते हो? तो बाप के घर में मेहमान आते हैं या बच्चे आते हैं? बच्चे हो, अधिकारी हो या मेहमान हो? बाप के घर में आये हो, बाप के घर में सदा अधिकारी बच्चे आते हैं। अभी से अपने को मेहमान नहीं लेकिन बाप के बच्चे महान आत्मायें समझते हुए आगे बढ़ना। भाग्यवान थे जब इस स्थान पर पहुंचे हो। अभी क्या करना है? यहाँ पहुंचना यह भाग्य तो हुआ लेकिन आगे क्या करना है। अभी सदा साथ रहना, याद में रहना ही साथ है। अकेले नहीं जाना। कम्बाइण्ड होकर जहाँ भी जायेंगे, जो भी कर्म करेंगे वह कम्बाइण्ड रूप से करने से सदा सहज और सफल अनुभव करेंगे। सदा साथ रहेंगे यह संकल्प जरूर करके जाना। पुरुषार्थ करेंगे, देखेंगे, यह नहीं, करना ही है क्योंकि दृढ़ता सफलता की चाबी है। तो यह चाबी सदा अपने साथ रखना। यह ऐसी चाबी है जो खजाना चाहिए वह संकल्प किया और खजाना मिला। यह चाबी सदा साथ रखना अर्थात् सदा सफलता पाना। अभी मेहमान नहीं अधिकारी आत्मा। बापदादा भी ऐसे अधिकारी बच्चों को देख हर्षित होते हैं। जो अनुभव किया वह अनुभव का खजाना सदा बांटते रहना, जितना बांटेंगे उतना बढ़ता रहेगा। तो महादानी बनना सिर्फ अपने पास नहीं रखना। अच्छा!
विदाई के समय 3-30 बजे - सभी बच्चों को मुबारक के साथ-साथ गुडमार्निंग। जैसे आज की रात शुभ मिलन की मौज में बिताया वैसे सदा दिन रात बाप के मिलन मौज में मनाते रहना। पूरा ही संगमयुग सदा बाप से बधाईयाँ लेते हुए वृद्धि को पाते हुए, आगे बढ़ते हुए सभी को आगे बढ़ाते रहना। सदा महादानी वरदानी बनकर अनेक आत्माओं को दान भी देना, वरदान भी देना।
अच्छा-ऐसे सदा विश्व कल्याणकारी, सदा रहमदिल सदा सर्व के प्रति शुभ भावना रखने वाले बच्चों को यादप्यार और गुडमार्निंग।

वरदान:-
महसूसता की शक्ति द्वारा स्व परिवर्तन करने वाले तीव्र पुरुषार्थी भव
कोई भी परिवर्तन का सहज आधार महसूसता की शक्ति है। जब तक महसूसता की शक्ति नहीं आती तब तक अनुभूति नहीं होती और जब तक अनुभूति नहीं तब तक ब्राह्मण जीवन की विशेषता का फाउण्डेशन मजबूत नहीं। उमंग-उत्साह की चाल नहीं। जब महसूसता की शक्ति हर बात का अनुभवी बनाती है तब तीव्र पुरुषार्थी बन जाते हो। महसूसता की शक्ति सदाकाल के लिए सहज परिवर्तन करा देती है।

स्लोगन:- स्नेह के स्वरूप को साकार में इमर्ज कर ब्रह्मा बाप समान बनो।

Friday, 27 September 2019

Hindi Murli 28/09/2019

28-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बाप की श्रीमत पर चलकर अपना श्रृंगार करो, परचिन्तन से अपना श्रृंगार मत बिगाड़ो, टाइम वेस्ट न करो''

प्रश्नः- तुम बच्चे बाप से भी तीखे जादूगर हो - कैसे?
उत्तर:- यहाँ बैठे-बैठे तुम इन लक्ष्मी-नारायण जैसा अपना श्रृंगार कर रहे हो। यहाँ बैठे अपने आपको चेन्ज कर रहे हो, यह भी जादूगरी है। सिर्फ अल्फ को याद करने से तुम्हारा श्रृंगार हो जाता है। कोई हाथ-पांव चलाने की भी बात नहीं सिर्फ विचार की बात है। योग से तुम साफ, स्वच्छ और शोभनिक बन जाते हो, तुम्हारी आत्मा और शरीर कंचन बन जाता है, यह भी कमाल है ना।

ओम् शान्ति। रूहानी जादूगर बैठ रूहानी बच्चों को, जो बाप से भी तीखे जादूगर हैं, उन्हों को समझाते हैं - तुम यहाँ क्या कर रहे हो? यहाँ बैठे-बैठे कोई चुरपुर नहीं। बाप अथवा साजन, सजनियों को युक्ति बता रहे हैं। साजन कहते हैं - यहाँ बैठे तुम क्या करते हो? अपने को तुम ऐसे लक्ष्मी-नारायण मिसल श्रृंगार रहे हो। कोई समझेंगे? तुम यहाँ सब बैठे हो फिर नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार तो हो ही ना। बाप कहते हैं ऐसे श्रृंगारे हुए बनना है। तुम्हारी एम ऑबजेक्ट ही यह है भविष्य अमरपुरी के लिए। यहाँ बैठे हुए तुम क्या कर रहे हो? पैराडाइज़ के श्रृंगार के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। इसको क्या कहें? यहाँ बैठे हुए अपने को चेन्ज कर रहे हो। उठते, बैठते, चलते बाप ने एक मनमनाभव की चाबी दे दी है। बस एक सिवाए इसके और कोई भी फालतू बातें सुन-सुनाकर टाइम वेस्ट मत करो। तुम अपने ही श्रृंगार में लगे रहो। दूसरा करता है वा नहीं, इसमें तुम्हारा क्या जाता है! तुम अपने पुरूषार्थ में रहो। कितनी समझ की बातें हैं। कोई नया सुनेगा तो जरूर वन्डर खायेगा। तुम्हारे में कोई तो अपना श्रृंगार कर रहे हैं, कोई तो और ही बिगाड़ रहे हैं। परचिन्तन आदि में टाइम वेस्ट करते रहते हैं। बाप बच्चों को समझाते हैं तुम सिर्फ अपने को देखो कि हम क्या कर रहे हैं। बहुत छोटी युक्ति बताई है, बस एक ही अक्षर है - मनमनाभव। तुम यहाँ बैठे हो परन्तु बुद्धि में है कि सारी सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है। अभी फिर से हम विश्व का श्रृंगार कर रहे हैं। तुम कितने पद्मापद्म भाग्यशाली हो। यहाँ बैठे-बैठे तुम कितना कार्य करते हो। कोई हाथ-पांव तो चलाने की बात ही नहीं है। सिर्फ विचार की बात है। तुम कहेंगे हम यहाँ बैठे ऊंच ते ऊंच विश्व का श्रृंगार कर रहे हैं। मनमनाभव का मंत्र कितना ऊंच है। इस योग से ही तुम्हारे पाप भस्म होते जायेंगे और तुम साफ बनते-बनते फिर कितने शोभनिक हो जायेंगे। अभी आत्मा पतित है तो शरीर की भी हालत देखो क्या हो गई है। अब तुम्हारी आत्मा और काया कंचन बन जायेगी। यह कमाल है ना। तो ऐसा अपना श्रृंगार करना है। दैवीगुण भी धारण करने हैं। बाप सभी को एक ही रास्ता बताते हैं - अल्फ बे। सिर्फ अल्फ की बात है। बाप को याद करते रहो तो तुम्हारा श्रृंगार सारा बदल जायेगा।
बाप से भी तुम बड़े जादूगर हो। तुमको युक्ति बताते हैं कि ऐसा-ऐसा करने से तुम्हारा श्रृंगार बन जायेगा। अपना श्रृंगार न करने से तुम मुफ्त अपने को नुकसान पहुँचाते हो। इतना तो समझते हो हम भक्ति मार्ग में क्या-क्या करते थे। सारा श्रृंगार ही बिगाड़ कर क्या बन गये हो! अब एक ही अक्षर से, बाप की याद से तुम्हारा श्रृंगार होता है। बच्चों को कितना अच्छी रीति समझाकर फ्रेश करते हैं। यहाँ बैठे तुम क्या करते हो? याद की यात्रा में बैठे हो। अगर कोई का ख्याल और और तरफ होगा तो श्रृंगार थोड़ेही होगा। तुम श्रृंगारे हो तो फिर औरों को भी रास्ता बताना है। बाप आते ही हैं ऐसा श्रृंगार बनाने। कमाल शिवबाबा आपकी, आप हमारा कितना श्रृंगार करते हो। उठते, बैठते, चलते हमको अपना श्रृंगार करना है। कोई तो अपना श्रृंगार कर फिर दूसरों का भी करते हैं। कोई तो अपना भी श्रृंगार नहीं करते तो दूसरे का भी श्रृंगार बिगाड़ते रहते हैं। फालतू बातें सुनाकर उनकी अवस्था को भी नीचे गिरा देते हैं। खुद भी श्रृंगार से रह जाते हैं, तो दूसरे को भी रहा देते हैं। तो अच्छी रीति सोच विचार करो - बाबा कैसे-कैसे युक्ति बताते हैं। भक्ति मार्ग के शास्त्र पढ़ने से यह युक्तियां नहीं आती हैं। शास्त्र तो हैं भक्ति मार्ग के। तुमको कहते हैं तुम क्यों शास्त्रों को नहीं मानते हो? बोलो, हम तो सब मानते हैं। आधाकल्प भक्ति की है। शास्त्र पढ़ते हैं तो कौन नहीं मानेंगे। रात और दिन होते हैं तो जरूर दोनों को मानेंगे ना। यह है बेहद का दिन और रात।
बाप कहते हैं - मीठे बच्चों, तुम अपना श्रृंगार करो। टाइम वेस्ट मत करो। टाइम बहुत थोड़ा है। तुम्हारी बड़ी विशाल बुद्धि चाहिए। आपस में बहुत प्रेम होना चाहिए। टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि तुम्हारा टाइम तो बहुत वैल्युबुल है। कौड़ी से हीरे जैसा तुम बनते हो। मुफ्त में इतना थोड़ेही सुन रहे हो। कोई कथा है क्या। बाप अक्षर ही एक सुनाते हैं। बड़े-बड़े आदमियों को जास्ती बात थोड़ेही करनी चाहिए। बाप तो सेकण्ड में जीवनमुक्ति का रास्ता बताते हैं। यह हैं ही ऊंच श्रृंगार वाले, तब तो उन्हों के ही चित्र हैं जिनको बहुत पूजते रहते हैं। जितना बड़ा आदमी होगा, उतना बड़ा मन्दिर बनायेंगे, बड़ा श्रृंगार करेंगे। आगे तो देवताओं के चित्र पर हीरे का हार पहनाते थे। बाबा को तो अनुभव है ना। बाबा ने खुद हीरे का हार बनाया था लक्ष्मी-नारायण के लिए। वास्तव में तो उन्हों जैसी यहाँ पहरवाइस कोई बना न सके। अभी तुम बना रहे हो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। तो बाप समझाते हैं - बच्चे, टाइम वेस्ट न अपना करो, न औरों का करो। बाप युक्ति बहुत सहज बताते हैं। मुझे याद करो तो पाप मिट जाएं। याद बिगर इतना श्रृंगार हो न सके। तुम यह बनने वाले हो ना। दैवी स्वभाव धारण करना है। इसमें कहने की भी दरकार नहीं। परन्तु पत्थरबुद्धि होने कारण सब समझाना पड़ता है। एक सेकेण्ड की बात है। बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, तुमने अपने बाप को भूलने से कितना श्रृंगार बिगाड़ दिया है। बाप तो कहते हैं चलते-फिरते श्रृंगार करते रहो। परन्तु माया भी कम नहीं है। कोई-कोई लिखते हैं - बाबा, आपकी माया बहुत तंग करती है। अरे हमारी माया कहाँ है, यह तो खेल है ना! मैं तो तुमको माया से छुड़ाने आया हूँ। मेरी माया फिर काहे की। इस समय पूरा ही इनका राज्य है। जैसे इस रात और दिन में फर्क नहीं हो सकता। यह फिर है बेहद की रात और दिन। इनमें एक सेकेण्ड का भी फर्क नहीं हो सकता है। अभी तुम बच्चे नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार ऐसा श्रृंगार कर रहे हो। बाप कहते हैं - चक्रवर्ती राजा बनना है तो चक्र फिराते रहो। भल गृहस्थ व्यवहार में रहो, इसमें सारा बुद्धि से काम लेना है। आत्मा में ही मन-बुद्धि है। यहाँ तुमको बाहर का गोरख धन्धा कुछ भी नहीं है। यहाँ आते ही हो तुम अपने को श्रृंगारने, रिफ्रेश होने। बाप पढ़ाते तो सबको एक ही जैसा हैं। यहाँ बाबा पास आते हैं नई-नई प्वाइंट्स सम्मुख सुनने, फिर घर में जाते हैं तो जो कुछ सुना है वह बाहर निकल जाता है। यहाँ से बाहर निकलने से ही झोली छांट लेते हैं। जो सुना उस पर मनन-चितंन नहीं करते हैं। तुम्हारे लिए तो यहाँ एकान्त की जगह बहुत है। बाहर में तो खटमल फिरते रहते हैं। एक-दो का खून करते, पीते रहते हैं।
तो बाप बच्चों को समझाते हैं - यह तुम्हारा टाइम मोस्ट वैल्युबुल है, इसको तुम वेस्ट मत करो। अपने को श्रृंगारने की बहुत युक्तियां मिली हैं। मैं सबका उद्धार करने आता हूँ। मैं आया हूँ तुमको विश्व की बादशाही देने। तो अब मुझे याद करो, टाइम वेस्ट मत करो। काम-काज करते भी बाप को याद करते रहो। इतनी ढेर सब आत्मायें आशिक हैं एक परमपिता परमात्मा माशूक की। वह सब जिस्मानी कथायें आदि तो तुम बहुत सुनते हो। अब बाप कहते हैं वह सब भूल जाओ। भक्ति मार्ग में तुमने मुझे याद किया और वायदा भी किया है, हम आपके ही बनेंगे। ढेर के ढेर आशिकों का एक माशूक। भक्ति मार्ग में कहते हैं - ब्रह्म में लीन होंगे, यह सब हैं फालतू बातें। एक भी मनुष्य मोक्ष को नहीं पा सकता है। यह तो अनादि ड्रामा है, इतने सब एक्टर्स हैं, इसमें ज़रा भी फर्क नहीं हो सकता है। बाप कहते हैं सिर्फ एक अल्फ को याद करो तो तुम्हारा यह श्रृंगार हो जायेगा। अभी तुम यह बन रहे हो। स्मृति में आता है - अनेक बार हमने यह श्रृंगार किया है। कल्प-कल्प बाबा आप आयेंगे, हम आपसे ही सुनेंगे। कितनी गुह्य-गुह्य प्वाइंट्स हैं। बाबा ने युक्ति बहुत अच्छी बताई है। वारी जाऊं, ऐसे बाप पर। आशिक-माशूक भी सब एक जैसे नहीं होते। यह तो सभी आत्माओं का एक ही माशूक है। जिस्मानी कोई बात नहीं। परन्तु तुम्हें संगमयुग पर ही बाप से यह युक्ति मिलती है। कहाँ भी तुम जाओ, खाओ-पियो, घूमो फिरो, नौकरी करो, अपना श्रृंगार करते रहो। आत्मायें सब एक माशूक की आशिक हैं। बस, उनको ही याद करते रहो। कोई-कोई बच्चे कहते हैं हम तो 24 घण्टे याद करते रहते हैं। परन्तु सदैव तो कोई कर नहीं सकते। बहुत में बहुत दो अढ़ाई घण्टे तक। जास्ती अगर लिखें तो बाबा मानता नहीं। दूसरे को स्मृति दिलाते नहीं तो कैसे समझें तुम याद करते हो? क्या कोई डिफीकल्ट बात है? कोई इसमें खर्चा है? कुछ भी नहीं। बस, बाबा को याद करते रहो तो तुम्हारे पाप कट जाएं। दैवीगुण भी धारण करने हैं। पतित कोई शान्तिधाम वा सुखधाम में जा न सके। बाप बच्चों को कहते हैं अपने को आत्मा भाई-भाई समझो। 84 जन्मों का पार्ट अभी पूरा होता है। यह पुराना चोला छोड़ने का है। ड्रामा देखो कैसा बना हुआ है। तुम जानते हो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। दुनिया में तो कोई कुछ भी नहीं समझते। हरेक अपने से पूछे कि हम बाप की मत पर चलते हैं? चलेंगे तो श्रृंगार भी अच्छा होगा। एक-दो को उल्टी बातें सुनाकर अथवा सुनकर अपना श्रृंगार भी बिगाड़ देते हैं तो दूसरे का भी बिगाड़ देते हैं। बच्चों को तो इसी धुन में लगा रहना है कि हम ऐसे श्रृंगारधारी कैसे बनें। बाकी तो जो कुछ है वह ठीक है। सिर्फ पेट के लिए रोटी आराम से मिले। वास्तव में पेट जास्ती नहीं खाता। भल तुम सन्यासी हो परन्तु राजयोगी हो। न बहुत ऊंचा, न नीचा। खाओ भल परन्तु ज्यादा हिर न जाओ (आदत न पड़ जाए)। यही एक-दो को याद दिलाओ - शिवबाबा याद है? वर्सा याद है? विश्व की बादशाही का श्रृंगार याद है? विचार करो - यहाँ बैठे-बैठे तुम्हारी क्या कमाई है! इस कमाई से अपार सुख मिलना है, सिर्फ याद की यात्रा से और कोई तकलीफ नहीं। भक्ति मार्ग में मनुष्य कितने धक्के खाते हैं। अभी बाप आये हैं श्रृंगारने। तो अपना अच्छी रीति ख्याल करो। भूलो मत। माया भुला देती है फिर टाइम बहुत वेस्ट करते हैं। तुम्हारा तो यह बहुत वैल्युबुल टाइम है। पढ़ाई की मेहनत से मनुष्य क्या से क्या बन जाते हैं। बाबा तुमको और कोई तकलीफ नहीं देते हैं। सिर्फ कहते हैं - मुझे याद करो। कोई भी किताब आदि उठाने की दरकार नहीं। बाबा कोई किताब उठाता है क्या? बाप कहते हैं मैं आकर इस प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट करता हूँ। प्रजापिता है ना। तो इतनी कुख वंशावली प्रजा कैसे होगी? बच्चे एडाप्ट होते हैं। वर्सा बाप से मिलना है। बाप ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट करते हैं, इसलिए उनको मात-पिता कहा जाता है। यह भी तुम जानते हो। बाप का आना बड़ा एक्यूरेट है। एक्यूरेट टाइम पर आते हैं, एक्यूरेट टाइम पर जायेंगे। दुनिया की बदली तो होनी ही है। अभी बाप तुम बच्चों को कितनी अक्ल देते हैं। बाप की मत पर चलना है। स्टूडेन्ट जो पढ़ते हैं वही बुद्धि में चलना है। तुम भी यह संस्कार ले जाते हो। जैसे बाप में संस्कार हैं वैसे तुम्हारी आत्मा में भी यह संस्कार भरते हैं। फिर जब यहाँ आयेंगे तो वही पार्ट रिपीट होगा। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार आयेंगे। अपने दिल से पूछो - कितना पुरूषार्थ किया है, अपने को श्रृंगारने का। टाइम कहाँ वेस्ट तो नहीं किया है? बाप सावधान करते हैं - वाह्यात बातों में कहाँ भी टाइम न गँवाओ। बाप की श्रीमत याद रखो। मनुष्य मत पर न चलो। तुमको यह पता थोड़ेही था कि हम पुरानी दुनिया में हैं। बाप ने बताया है कि तुम क्या थे। इस पुरानी दुनिया में कितने अपार दु:ख हैं। यह भी ड्रामा अनुसार पार्ट मिला हुआ है। ड्रामा अनुसार अनेकानेक विघ्न भी पड़ते हैं। बाप समझाते हैं - बच्चे, यह ज्ञान और भक्ति का खेल है। वन्डरफुल ड्रामा है। इतनी छोटी आत्मा में सारा पार्ट अविनाशी भरा हुआ है, जो बजाती ही रहती है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) दूसरी सब बातों को छोड़ इसी धुन में रहना है कि हम लक्ष्मी-नारायण जैसा श्रृंगारधारी कैसे बने?
2) अपने से पूछना है कि :- (अ) हम श्रीमत पर चलकर मनमनाभव की चाबी से अपना श्रृंगार ठीक कर रहे हैं?(ब) उल्टी सुल्टी बातें सुनकर वा सुनाकर श्रृंगार बिगाड़ते तो नहीं हैं? (स) आपस में प्रेम से रहते हैं? अपना वैल्युबुल टाइम कहीं पर वेस्ट तो नहीं करते हैं?---(द) दैवी स्वभाव धारण किया है?

वरदान:- स्व-परिवर्तन से विश्व परिवर्तन के कार्य में दिल-पसन्द सफलता प्राप्त करने वाले सिद्धि स्वरूप भव
हर एक स्व परिवर्तन द्वारा विश्व परिवर्तन करने की सेवा में लगे हुए हैं। सभी के मन में यही उमंग-उत्साह है कि इस विश्व को परिवर्तन करना ही है और निश्चय भी है कि परिवर्तन होना ही है। जहाँ हिम्मत है वहाँ उमंग-उत्साह है। स्व परिवर्तन से ही विश्व परिवर्तन के कार्य में दिलपसन्द सफलता प्राप्त होती है लेकिन यह सफलता तभी मिलती है जब एक ही समय वृत्ति, वायब्रेशन और वाणी तीनों शक्तिशाली हों।

स्लोगन:- जब बोल में स्नेह और सयंम हो तब वाणी की एनर्जी जमा होगी।

Thursday, 26 September 2019

Hindi Murli 27/09/2019

27-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम सर्व आत्माओं को कर्मबन्धन से सैलवेज़ करने वाले सैलवेशन आर्मी हो, तुम्हें कर्म-बन्धन में नहीं फँसना है''

प्रश्नः- कौन-सी प्रैक्टिस करते रहो तो आत्मा बहुत-बहुत शक्तिशाली बन जायेगी?
उत्तर:- जब भी समय मिले तो शरीर से डिटैच होने की प्रैक्टिस करो। डिटैच होने से आत्मा में शक्ति वापिस आयेगी, उसमें बल भरेगा। तुम अण्डर-ग्राउण्ड मिलेट्री हो, तुम्हें डायरेक्शन मिलता है - अटेन्शन प्लीज़ अर्थात् एक बाप की याद में रहो, अशरीरी हो जाओ।

ओम् शान्ति। ओम् शान्ति का अर्थ तो बाप ने अच्छी रीति समझाया है। जहाँ मिलेट्री खड़ी होती है वह फिर कहते हैं अटेन्शन, उन लोगों का अटेन्शन माना साइलेन्स। यहाँ भी तुमको बाप कहते हैं अटेन्शन अर्थात् एक बाप की याद में रहो। मुख से बोलना होता है, नहीं तो वास्तव में बोलने से भी दूर होना चाहिए। अटेन्शन, बाप की याद में हो? बाप का डायरेक्शन अथवा श्रीमत मिलती है, तुमने आत्मा को भी पहचाना है, बाप को भी पहचाना है तो बाप को याद करने बिगर तुम विकर्माजीत अथवा सतोप्रधान पवित्र नहीं बन सकते। मूल बात ही यह है, बाप कहते हैं मीठे-मीठे लाडले बच्चों! अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। यह हैं सब इस समय की बातें, जो फिर वह उस तरफ ले गये हैं। वह भी मिलेट्री है, तुम भी मिलेट्री हो। अन्डरग्राउण्ड मिलेट्री भी होती है ना। गुम हो जाते हैं। तुम भी अन्डरग्राउण्ड हो। तुम भी गुम हो जाते अर्थात् बाप की याद में लीन हो जाते हो। इसको कहा जाता है अन्डरग्राउण्ड। कोई पहचान न सके क्योंकि तुम गुप्त हो ना। तुम्हारी याद की यात्रा गुप्त है, सिर्फ बाप कहते हैं मुझे याद करो क्योंकि बाप जानते हैं याद से इन बिचारों का कल्याण होगा। अब तुमको बिचारा कहेंगे ना। स्वर्ग में बिचारे होते नहीं। बिचारे उनको कहा जाता है जो कहाँ बन्धन में फंसे रहते हैं। यह भी तुम समझते हो, बाप ने समझाया है - तुमको लाइट हाउस भी कहा जाता है। बाप को भी लाइट हाउस कहा जाता है। बाप घड़ी-घड़ी समझाते हैं एक आंख में शान्तिधाम, दूसरी आंख में सुखधाम रखो। तुम जैसे लाइट हाउस हो। उठते, बैठते, चलते तुम लाइट होकर रहो। सबको सुखधाम-शान्तिधाम का रास्ता बताते रहो। इस दु:खधाम में सबकी नईया अटक पड़ी है तब तो कहते हैं नईया मेरी पार लगाओ। हे मांझी। सबकी नईयां फंसी पड़ी है, उनको सैलवेज़ कौन करे? वह कोई सैलवेशन आर्मी तो है नहीं। ऐसे ही नाम रख दिया है। वास्तव में सैलवेशन आर्मी तो तुम हो जो हर एक को सैलवेज़ करते हो। सब 5 विकारों की जंज़ीरों में अटक पड़े हैं इसलिए कहते हैं हमको लिबरेट करो, सैलवेज़ करो। तो बाप कहते हैं कि इस याद की यात्रा से तुम पार हो जायेंगे। अभी तो सब फंसे हुए हैं। बाप को बागवान भी कहते हैं। इस समय की ही सभी बातें हैं। तुमको फूल बनना है, अभी तो सब कांटे हैं क्योंकि हिंसक हैं। अभी अहिंसक बनना है। पावन बनना है। जो धर्म स्थापन करने आते हैं, वह तो पवित्र आत्मायें ही आती हैं। वह तो अपवित्र हो न सकें। पहले-पहले जब आते हैं तो पवित्र होने कारण उनकी आत्मा वा शरीर को दु:ख मिल न सके क्योंकि उन पर कोई पाप है नहीं। हम जब पवित्र हैं तो कोई पाप नहीं होता है तो दूसरों का भी नहीं होता है। हर एक बात पर विचार करना होता है। वहाँ से आत्मायें आती हैं धर्म स्थापन करने। जिनकी फिर डिनायस्टी भी चलती है। सिक्ख धर्म की भी डिनायस्टी है। सन्यासियों की डिनायस्टी थोड़ेही चलती है, राजायें थोड़ेही बने हैं। सिक्ख धर्म में महाराजा आदि हैं तो वह जब आते हैं स्थापना करने तो वह नई आत्मा आती है। क्राइस्ट ने आकर क्रिश्चियन धर्म स्थापन किया, बुद्ध ने बौद्धी, इब्राहिम ने इस्लाम - सबके नाम से राशि मिलती है। देवी-देवता धर्म का नाम नहीं मिलता है। निराकार बाप ही आकर देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। वह देहधारी नहीं है। और जो धर्म स्थापक हैं उनकी देह के नाम हैं, यह तो देहधारी नहीं। डिनायस्टी नई दुनिया में चलती है। तो बाप कहते हैं - बच्चे, अपने को रूहानी मिलेट्री जरूर समझो। उन मिलेट्री आदि के कमान्डर आदि आते हैं, कहते हैं अटेन्शन, तो झट खड़े हो जाते हैं। अब वह तो हर एक अपने-अपने गुरू को याद करेंगे या शान्त में रहेंगे। परन्तु वह झूठी शान्ति हो जाती है। तुम जानते हो हम आत्मा हैं, हमारा धर्म ही शान्त है। फिर याद किसको करना है। अभी तुमको ज्ञान मिलता है। ज्ञान सहित याद में रहने से पाप कटते हैं। यह ज्ञान और कोई को नहीं है। मनुष्य यह थोड़ेही समझते हैं - हम आत्मा शान्त स्वरूप हैं। हमको शरीर से डिटैच हो बैठना है। यहाँ तुमको वह बल मिलता है जिससे तुम अपने को आत्मा समझ बाप की याद में बैठ सकते हो। बाप समझाते हैं - कैसे अपने को आत्मा समझ डिटैच होकर बैठो।
तुम जानते हो हम आत्माओं को अब वापिस जाना है। हम वहाँ के रहने वाले हैं। इतने दिन घर भूल गये थे, और कोई थोड़ेही समझते हैं - हमको घर जाना है। पतित आत्मा तो वापिस जा न सके। न कोई ऐसा समझाने वाला है कि किसको याद करो। बाप समझाते हैं - याद एक को ही करना है। और कोई को याद करने से क्या फायदा! समझो, भक्ति मार्ग में शिव-शिव कहते रहते हैं, मालूम तो किसको है नहीं कि इससे क्या होगा। शिव को याद करने से पाप कटेंगे - यह किसको भी पता नहीं है। आवाज़ सुनाई देगा। सो तो जरूर आवाज़ होगा ही। इन सब बातों से कोई फायदा नहीं। बाबा तो इन सब गुरूओं से अनुभवी है ना।
बाप ने कहा है ना - हे अर्जुन, इन सबको छोड़ो...... सतगुरू मिला तो इन सबकी दरकार नहीं। सतगुरू तारता है। बाप कहते हैं - मैं तुम्हें आसुरी संसार से पार ले जाता हूँ। विषय सागर से पार जाना है। यह सब बातें समझाने की हैं। मांझी तो वैसे नांव चलाने वाला होता है परन्तु समझाने लिए यह नाम पड़ गये हैं। उनको कहा जाता है - प्राणेश्वर बाबा अर्थात् प्राणों का दान देने वाले बाबा, वह अमर बना देते हैं। प्राण आत्मा को कहा जाता है। आत्मा निकल जाती है तो कहते हैं प्राण निकल गये। फिर शरीर को रखने भी नहीं देते हैं। आत्मा है तो शरीर भी तन्दुरूस्त है। आत्मा बिगर तो शरीर में ही बांस हो जाती है। फिर उनको रख करके क्या करेंगे। जानवर भी ऐसा नहीं करेंगे। सिर्फ एक बन्दर है, उनका बच्चा मर जाता है, बांस होती है तो भी उस मुर्दे को छोड़ेंगे नहीं, लटकाये रहेंगे। वह तो जानवर है, तुम तो मनुष्य हो ना। शरीर छोड़ा तो कहेंगे जल्दी उनको बाहर निकालो। मनुष्य कहेंगे स्वर्ग पधारा। जब मुर्दे को उठाते हैं तो पहले पैर शमशान तरफ करते हैं। फिर जब वहाँ अन्दर घुसते हैं, पूजा आदि कर समझते हैं अभी यह स्वर्ग जा रहा है तो उसे फिराकर मुंह शमशान तरफ कर देते हैं। तुमने कृष्ण को भी एक्यूरेट दिखाया है, नर्क को लात मार रहा है। कृष्ण का यह शरीर तो नहीं है, उनका नाम रूप तो बदलता है। कितनी बातें बाप समझाकर फिर कहते हैं - मनमनाभव।
यहाँ आकर जब बैठते हो तो अटेन्शन। बुद्धि बाप में लगी रहे। तुम्हारा यह अटेन्शन फार एवर (सदा के लिए) है। जब तक जीना है, बाप को याद करना है। याद से ही जन्म-जन्मान्तर के पाप कटते हैं। याद ही नहीं करेंगे तो पाप भी नहीं कटेंगे। बाप को याद करना है, याद में आंखें कभी बन्द नहीं करनी हैं। सन्यासी लोग आंखे बन्दकर बैठते हैं। कोई-कोई तो स्त्री का मुंह नहीं देखते हैं। पट्टी बांधकर बैठते हैं। तुम जब यहाँ बैठते हो तो रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का स्वदर्शन चक्र फिराना चाहिए। तुम लाइट हाउस हो ना। यह है दु:खधाम, एक आंख में दु:खधाम, दूसरी आंख में सुखधाम। उठते-बैठते अपने को लाइट हाउस समझो। बाबा भिन्न-भिन्न नमूने से बताते हैं। तुम अपनी भी सम्भाल करते हो। लाइट हाउस बनने से अपना कल्याण करते हो। बाप को याद जरूर करना है, जब कोई रास्ते में मिले तो उनको बताना है। पहचान वाले भी बहुत मिलते हैं, वह तो एक-दो को राम-राम करते हैं, उनको बोलो आपको पता है यह दु:खधाम है, वह है शान्तिधाम और सुखधाम। आप शान्तिधाम-सुखधाम में चलना चाहते हो? यह 3 चित्र किसको समझाना तो बहुत सहज है। आपको इशारा देते हैं। लाइट-हाउस भी इशारा देता है। यह नईया है जो रावण की जेल में लटक पड़ी है। मनुष्य, मनुष्य को सैलवेज़ कर नहीं सकते। वह तो सब हैं आर्टीफिशयल हद की बातें। यह है बेहद की बात। सोशल सोसायटी की सेवा भी वह नहीं है। वास्तव में सच्ची सेवा यह है - सभी का बेड़ा पार करना है। तुम्हारी बुद्धि में है मनुष्यों की क्या सर्विस करें।
पहले तो कहना है तुम गुरू करते हो - मुक्तिधाम में जाने लिए, बाप से मिलने लिए। परन्तु कोई मिलता नहीं। मिलने का रास्ता बाप ही बतलाते हैं। वह समझते हैं - यह शास्त्र आदि पढ़ने से भगवान मिलता है, दिलासे पर रहने से फिर आखरीन कोई न कोई रूप में मिलेगा। कब मिलेगा - यह बाप ने तुमको सब कुछ समझाया है। तुमने चित्र में दिखाया है एक को याद करना है। जो भी धर्म स्थापक हैं वह भी ऐसे इशारा देते हैं क्योंकि तुमने शिक्षा दी है तो वह भी ऐसे इशारे देते हैं। साहेब को जपो, वह बाप है सतगुरू। बाकी तो अनेक प्रकार की शिक्षायें देने वाले हैं। उनको कहा जाता है गुरू। अशरीरी बनने की शिक्षा कोई जानते नहीं। तुम कहेंगे शिवबाबा को याद करो। वो लोग शिव के मन्दिर में जाते हैं तो हमेशा शिव को बाबा कहने की आदत पड़ी हुई है और किसको बाबा नहीं कहते हैं, परन्तु वह निराकार तो नहीं है। शरीरधारी है। शिव तो है निराकार, सच्चा बाबा, वह तो सबका बाबा हुआ। सब आत्मायें अशरीरी हैं।
तुम बच्चे यहाँ जब बैठते हो तो इस धुन में बैठो। तुम जानते हो कि हम कैसे फंसे हुए थे। अब बाबा ने आकर रास्ता बताया है, बाकी सब फंसे हुए हैं, छूटते नहीं। सजायें खाकर फिर सब छूट जायेंगे। तुम बच्चों को समझाते रहते हैं, मोचरा खाकर थोड़ेही मानी (रोटी) लेनी है। मोचरा बहुत खाते हैं तो पद भ्रष्ट हो जाता है, मानी (रोटी) कम मिलती है! थोड़ा मोचरा (सजा) तो मानी अच्छी मिलेगी। यह है कांटों का जंगल। सब एक-दो को कांटा लगाते रहते हैं। स्वर्ग को कहा जाता है - गॉर्डन ऑफ अल्लाह। क्रिश्चियन लोग भी कहते हैं - पैराडाइज़ था। कोई समय साक्षात्कार भी कर सकते हैं, हो सकता है यहाँ के धर्म वाला हो जो फिर अपने धर्म में आ सकते हैं। बाकी सिर्फ देखा तो इसमें क्या हुआ! देखने से कोई जा नहीं सकते। जबकि बाप को पहचाने और नॉलेज ले। सब तो आ न सकें। देवतायें तो वहाँ बहुत थोड़े होते हैं। अभी इतने हिन्दू हैं, असुल में देवतायें थे ना। परन्तु वह थे पावन, यह हैं पतित। पतित को देवता कहना शोभेगा नहीं। यह एक ही धर्म है, जिसे धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट कहा जाता है। आदि सनातन हिन्दू धर्म कह देते हैं। देवता धर्म का कॉलम ही नहीं रखते।
हम बच्चों का मोस्ट बिलवेड बाप है, जो तुमको क्या से क्या बना देते हैं। तुम समझा सकते हो कि बाप कैसे आते हैं, जबकि देवताओं के पैर भी पुरानी तमोप्रधान सृष्टि पर नहीं आते तो फिर बाप कैसे आयेंगे? बाप तो है निराकार, उनको तो अपना पांव है नहीं इसलिए इनमें प्रवेश करते हैं।
अब तुम बच्चे ईश्वरीय दुनिया में बैठे हो, वह सब हैं आसुरी दुनिया में। यह बहुत छोटा संगमयुग है। तुम समझते हो हम न दैवी संसार में हैं, न आसुरी संसार में हैं। हम ईश्वरीय संसार में हैं। बाप आये हैं हमको घर ले जाने के लिए। बाप कहते हैं वह मेरा घर है। तुम्हारे खातिर मैं अपना घर छोड़कर आता हूँ। भारत सुखधाम बन जाता है तो फिर मैं थोड़ेही आता हूँ। मैं विश्व का मालिक नहीं बनता हूँ, तुम बनते हो। हम ब्रह्माण्ड के मालिक हैं। ब्रह्माण्ड में सब आते हैं। अभी भी वहाँ मालिक बन बैठे हैं, जिनको बाकी आना है, परन्तु वह आकर विश्व का मालिक नहीं बनते। समझाते तो बहुत हैं। कोई स्टूडेन्ट बहुत अच्छे होते हैं तो स्कॉलरशिप ले लेते हैं। वन्डर हैं यहाँ कहते भी हैं हम पवित्र बनेंगे फिर जाकर पतित बन जाते हैं। ऐसे-ऐसे कच्चों को नहीं ले आओ। ब्राह्मणी का काम है जांच कर लाना। तुम जानते हो कि आत्मा ही शरीर धारण कर पार्ट बजाती है, उनको अविनाशी पार्ट मिला हुआ है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) लाइट हाउस बन सबको शान्तिधाम, सुखधाम का रास्ता बताना है। सबकी नईया को दु:खधाम से निकालने की सेवा करनी है। अपना भी कल्याण करना है।
2) अपने शान्त स्वरूप स्थिति में स्थित हो शरीर से डिटैच होने का अभ्यास करना है, याद में आंखे खोलकर बैठना है, बुद्धि से रचता और रचना का सिमरण करना है।

वरदान:- इस अलौकिक जीवन में संबंध की शक्ति से अविनाशी स्नेह और सहयोग प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्मा भव
इस अलौकिक जीवन में संबंध की शक्ति आप बच्चों को डबल रूप में प्राप्त है। एक बाप द्वारा सर्व संबंध, दूसरा दैवी परिवार द्वारा संबंध। इस संबंध से सदा नि:स्वार्थ स्नेह, अविनाशी स्नेह और सहयोग सदा प्राप्त होता रहता है। तो आपके पास संबंध की भी शक्ति है। ऐसी श्रेष्ठ अलौकिक जीवन वाली शक्ति सम्पन्न वरदानी आत्मायें हो इसलिए अर्जी करने वाले नहीं, सदा राज़ी रहने वाले बनो।

स्लोगन:- कोई भी प्लैन विदेही, साक्षी बन सोचो और सेकण्ड में प्लेन स्थिति बनाते चलो।

Wednesday, 25 September 2019

Hindi Murli 26/09/2019

26-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम बाप के पास आये हो अपने कैरेक्टर्स सुधारने, तुम्हें अभी दैवी कैरेक्टर्स बनाने हैं''

प्रश्नः- तुम बच्चों को ऑखें बन्द करके बैठने की मना क्यों की जाती है?
उत्तर:- क्योंकि नज़र से निहाल करने वाला बाप तुम्हारे सम्मुख है। अगर ऑखें बन्द होंगी तो निहाल कैसे होंगे। स्कूल में ऑखें बन्द करके नहीं बैठते हैं। ऑखें बन्द होंगी तो सुस्ती आयेगी। तुम बच्चे तो स्कूल में पढ़ाई पढ़ रहे हो, यह सोर्स ऑफ इनकम है। लाखों पद्मों की कमाई हो रही है, कमाई में सुस्ती, उदासी नहीं आ सकती।

ओम् शान्ति। 
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों प्रति बाप समझाते हैं। यह तो बच्चे जानते हैं कि रूहानी बाप परमधाम से आकर हमको पढ़ा रहे हैं। क्या पढ़ा रहे हैं? बाप के साथ आत्मा का योग लगाना सिखलाते ह़ैं जिसको याद की यात्रा कहा जाता है। यह भी बताया है - बाप को याद करते-करते मीठे रूहानी बच्चे तुम पवित्र बन अपने पवित्र शान्तिधाम में पहुँच जायेंगे। कितनी सहज समझानी है। अपने को आत्मा समझो और अपने प्रीतम बेहद के बाप को याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप जो हैं, वह भस्म होते जायेंगे। इसको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह भारत का प्राचीन राजयोग है, जो बाप ही हर 5 हज़ार वर्ष के बाद आकर सिखलाते हैं। बेहद का बाप ही भारत में, इस साधारण तन में आकर तुम बच्चों को समझाते हैं। इस याद से ही तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे क्योंकि बाप पतित-पावन है और सर्वशक्तिमान् है। तुम्हारी आत्मा की बैटरी अभी तमोप्रधान बन गई है। जो सतो-प्रधान थी अब उनको फिर से सतोप्रधान कैसे बनायें, जो तुम सतोप्रधान दुनिया में जा सको वा शान्तिधाम घर में जा सको। बच्चों को यह बहुत अच्छी रीति याद रखना है। बाप बच्चों को यह डोज़ देते हैं। यह याद की यात्रा उठते-बैठते, चलते-फिरते तुम कर सकते हो। जितना हो सके गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहना है। बाप को भी याद करना है और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करने है क्योंकि दुनिया वालों के तो आसुरी कैरेक्टर्स हैं। तुम बच्चे यहाँ आये हो दैवी कैरेक्टर्स बनाने। इन लक्ष्मी-नारायण के कैरेक्टर्स बड़े मीठे थे। भक्ति मार्ग में उन्हों की ही महिमा गाई हुई है। भक्ति मार्ग कब से शुरू होता है, यह भी किसको पता नहीं है। अभी तुमने समझा है और रावण राज्य कब से शुरू हुआ, यह भी अब समझा है। तुम बच्चों को यह सारी नॉलेज बुद्धि में रखनी है। जबकि जानते हो हम ज्ञान सागर रूहानी बाप के बच्चे हैं, अब रूहानी बाप हमको पढ़ाने आते हैं। यह भी जानते हो यह कोई ऑर्डनरी बाप नहीं है। यह है रूहानी बाप, जो हमको पढ़ाने आया है। उनका निवास स्थान सदैव ब्रह्म-लोक में है। लौकिक बाप तो सबके यहाँ हैं। यह बच्चों को अच्छी रीति निश्चय में रखना है - हम आत्माओं को पढ़ाने वाला परमपिता परमात्मा है, जो बेहद का बाप है। भक्ति मार्ग में लौकिक बाप होते हुए भी परमपिता परमात्मा को बुलाते हैं। उनका एक ही नाम यथार्थ शिव है। बाप खुद समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, मेरा नाम एक ही शिव है। भल अनेक नाम अनेक मन्दिर बनाये हैं परन्तु वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। यथार्थ नाम मेरा एक ही शिव है। तुम बच्चों को आत्मा ही कहते हैं, सालिग्राम कहें तो भी हर्जा नहीं। अनेकानेक सालिग्राम हैं। शिव एक ही है। वह है बेहद का बाप, बाकी सब हैं बच्चे। इसके पहले तुम हद के बच्चे, हद के बाप के पास रहते थे। ज्ञान तो था नहीं। बाकी अनेक प्रकार की भक्ति करते रहते थे। आधाकल्प भक्ति की है, द्वापर से लेकर भक्ति शुरू होती है। रावणराज्य भी शुरू हुआ है। यह है बहुत सहज बात। परन्तु इतनी सहज बात भी कोई मुश्किल समझते हैं। रावणराज्य कब से शुरू होता है, यह भी कोई नहीं जानता। तुम मीठे बच्चे जानते हो - बाप ही ज्ञान का सागर है। जो उनके पास है वह आकर बच्चों को देते हैं। शास्त्र तो हैं भक्ति मार्ग के।
अभी तुम समझ गये हो - ज्ञान, भक्ति और फिर है वैराग्य। यह 3 मुख्य हैं। सन्यासी लोग भी जानते हैं - ज्ञान भक्ति और वैराग्य। परन्तु सन्यासियों का है अपना हद का वैराग्य। वह बेहद का वैराग्य सिखला न सकें। दो प्रकार के वैराग्य हैं - एक है हद का, दूसरा है बेहद का। वह है हठयोगी सन्यासियों का वैराग्य। यह है बेहद का। तुम्हारा है राजयोग, वह घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं तो उन्हों का नाम ही पड़ जाता है सन्यासी। हठयोगी घरबार छोड़ते हैं पवित्र रहने के लिए। यह भी है अच्छा। बाप कहते हैं - भारत तो बहुत पवित्र था। इतना पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं। भारत की तो बहुत ऊंची महिमा है जो भारतवासी खुद नहीं जानते हैं। बाप को भूलने कारण सब कुछ भूल जाते हैं अर्थात् नास्तिक निधनके बन पड़ते हैं। सतयुग में कितनी सुख-शान्ति थी। अभी कितनी दु:ख-अशान्ति है! मूलवतन तो है ही शान्तिधाम, जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। आत्मायें अपने घर से यहाँ आती हैं बेहद का पार्ट बजाने। अभी यह है पुरूषोत्तम संगमयुग जबकि बेहद का बाप आते हैं नई दुनिया में ले चलने के लिए। बाप आकर उत्तम ते उत्तम बनाते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान कहा जाता है। परन्तु वह कौन है, किसको कहा जाता है, यह कुछ भी समझते नहीं हैं। एक बड़ा लिंग रख दिया है। समझते हैं यह निराकार परमात्मा है। हम आत्माओं का वह बाप है - यह भी नहीं समझते, सिर्फ पूजा करते हैं। हमेशा शिवबाबा कहते हैं, रूद्र बाबा वा बबुलनाथ बाबा नहीं कहेंगे। तुम लिखते भी हो शिवबाबा याद है? वर्सा याद है? यह स्लोगन्स घर-घर में लगाने चाहिए - शिवबाबा को याद करो तो पाप भस्म होंगे क्योंकि पतित-पावन एक ही बाप है। इस पतित दुनिया में तो एक भी पावन हो नहीं सकता। पावन दुनिया में फिर एक भी पतित नहीं हो सकता। शास्त्रों में तो सब जगह पतित लिख दिये हैं। त्रेता में भी कहते रावण था, सीता चुराई गई। कृष्ण के साथ कंस, जरासन्धी, हिरण्यकश्यप आदि दिखाये हैं। कृष्ण पर कलंक लगा दिये हैं। अब सतयुग में यह सब हो नहीं सकते। कितने झूठे कलंक लगाये हैं। बाप पर भी कलंक लगाये हैं तो देवताओं पर भी कलंक लगाये हैं। सबकी ग्लानि करते रहते हैं। तो अब बाप कहते हैं यह याद की यात्रा है आत्मा को पवित्र बनाने की। पावन बन फिर पावन दुनिया में जाना है। बाप 84 का चक्र भी समझाते हैं। अभी तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है फिर घर जाना है। घर में शरीर तो नहीं जायेगा। सब आत्मायें जानी हैं इसलिए मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, अपने को आत्मा समझकर बैठो, देह नहीं समझो। और सतसंगों में तो तुम देह-अभिमानी हो बैठते हो। यहाँ बाप कहते हैं देही-अभिमानी होकर बैठो। जैसे मेरे में यह संस्कार हैं, मैं ज्ञान का सागर हूँ....... तुम बच्चों को भी ऐसा बनना है। बेहद के बाप और हद के बाप का कान्ट्रास्ट भी बतलाते हैं। बेहद का बाप बैठ तुमको सारा ज्ञान समझाते हैं। आगे नहीं जानते थे। अभी सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, उनका आदि-मध्य-अन्त और चक्र की आयु कितनी है, सब बतलाते हैं। भक्ति मार्ग में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष सुनाकर घोर अन्धियारे में डाल दिया है। नीचे ही उतरते आये हैं। कहते भी हैं ना जितना हम भक्ति करेंगे उतना बाप को नीचे खींचेंगे। बाप आकर हमको पावन बनायेंगे। बाप को खींचते हैं क्योंकि पतित हैं, बड़े दु:खी बन जाते हैं। फिर कहते हैं हम बाप को बुलाते हैं। बाप भी देखते हैं बिल्कुल दु:खी तमोप्रधान बन गये हैं, 5 हज़ार वर्ष पूरे हुए हैं तब फिर आते हैं। यह पढ़ाई कोई इस पुरानी दुनिया के लिए नहीं है। तुम्हारी आत्मा धारण कर साथ ले जायेगी। जैसे मैं ज्ञान का सागर हूँ, तुम भी ज्ञान की नदियां हो। यह नॉलेज कोई इस दुनिया के लिए नहीं है। यह तो छी-छी दुनिया, छी-छी शरीर है, इनको तो छोड़ना है। शरीर तो यहाँ पवित्र हो नहीं सकता। मैं आत्माओं का बाप हूँ। आत्माओं को ही पवित्र बनाने आया हूँ। इन बातों को मनुष्य तो कुछ भी समझ नहीं सकते हैं, बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि, पतित हैं इसलिए गाते हैं पतित-पावन..... आत्मा ही पतित बनी है। आत्मा ही सब कुछ करती है। भक्ति भी आत्मा करती है, शरीर भी आत्मा लेती है।
अब बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ले जाने आया हूँ। मैं बेहद का बाप तुम आत्माओं के बुलावे पर आया हूँ। तुमने कितना पुकारा है। अभी तक भी बुलाते रहते हैं - हे पतित-पावन, ओ गॉड फादर आकर इस पुरानी दुनिया के दु:खों से, डेविल से लिबरेट करो तो हम सब घर में चले जावें। और तो कोई को पता ही नहीं है - हमारा घर कहाँ है, घर में कैसे, कब जायेंगे। मुक्ति में जाने के लिए कितना माथा मारते हैं, कितने गुरू करते हैं। जन्म-जन्मान्तर माथा मारते चले आये हैं। वे गुरू लोग जीवनमुक्ति के सुख को तो जानते ही नहीं। वे चाहते हैं मुक्ति। कहते भी हैं विश्व में शान्ति कैसे हो? सन्यासी भी मुक्ति को ही जानते हैं। जीवनमुक्ति को तो जानते नहीं। परन्तु मुक्ति-जीवन-मुक्ति दोनों वर्सा बाप ही देते हैं। तुम जब जीवनमुक्ति में रहते हो तो बाकी सब मुक्ति में चले जाते हैं। अभी तुम बच्चे नॉलेज ले रहे हो, यह बनने के लिए। तुमने ही सबसे जास्ती सुख देखा है फिर सबसे जास्ती दु:ख भी तुमने देखा है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले तुम ही फिर धर्म-भ्रष्ट, कर्म-भ्रष्ट हो गये हो। तुम पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वाले थे, यह लक्ष्मी-नारायण पवित्र प्रवृत्ति मार्ग के हैं। घरबार छोड़ना यह सन्यासियों का धर्म है। सन्यासी भी पहले अच्छे थे। तुम भी पहले बहुत अच्छे थे, अभी तमोप्रधान बने हो। बाप कहते हैं यह ड्रामा का खेल है। बाप समझाते हैं - यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। पतित शरीर, पतित दुनिया में ड्रामा अनुसार हमको फिर 5 हज़ार वर्ष के बाद आना पड़ता है। न कल्प लाखों वर्ष का है, न मैं सर्वव्यापी हूँ। यह तो तुम मेरी ग्लानि करते आये हो। मैं फिर भी तुम पर कितना उपकार करता हूँ। जितनी शिवबाबा की ग्लानि की है, उतना और कोई की नहीं की है। जो बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं उनके लिए तुम कहते रहते हो सर्वव्यापी है। जब ग्लानि की भी हद हो जाती है, तब फिर मैं आकर उपकार करता हूँ। यह है पुरूषोत्तम संगमयुग, कल्याणकारी युग। जबकि तुमको पवित्र बनाने आता हूँ। कितनी सहज युक्ति पावन बनाने की बतलाते हैं। तुमने भक्तिमार्ग में बहुत धक्के खाये हैं, तलाव में भी स्नान करने जाते हैं, समझते हैं इससे पावन बन जायेंगे। अब कहाँ वह पानी और कहाँ पतित-पावन बाप। वह सब है भक्तिमार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। मनुष्य कितने घोर अन्धियारे में हैं। कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। यह तो तुम जानते हो - गाया भी जाता है विनाशकाले विपरीत बुद्धि विनशयन्ति। अभी तुम्हारी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार प्रीत बुद्धि है। पूरी नहीं है, क्योंकि माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। यह है 5 विकारों की लड़ाई। पाँच विकारों को रावण कहा जाता है। रावण पर गधे का शीश दिखाते हैं।
बाबा ने यह भी समझाया है - स्कूल में कब ऑखें बन्द करके नहीं बैठना होता है। वह तो भक्तिमार्ग में भगवान को याद करने की शिक्षा देते हैं कि ऑखें बन्द करके बैठो। यहाँ तो बाप कहते हैं यह स्कूल है। सुना भी है नज़र से निहाल....... कहते हैं यह जादूगर है। अरे, वह तो गायन भी है। देवतायें भी नज़र से निहाल होते हैं। नज़र से मनुष्य को देवता बनाने वाला जादूगर हुआ ना। बाप बैठ बैटरी चार्ज करे और बच्चे ऑखें बन्द कर बैठें तो क्या कहेंगे! स्कूल में ऑखें बन्द कर नहीं बैठते। नहीं तो सुस्ती आती है। पढ़ाई तो है सोर्स ऑफ इनकम। लाखों पद्मों की कमाई है। कमाई में कभी उबासी नहीं लेंगे। यहाँ आत्माओं को सुधारना है। यह एम आब्जेक्ट खड़ी है। उन्हों की राजधानी देखनी हो तो जाओ देलवाड़ा में। वह है जड़, यह है चेतन्य देलवाड़ा मन्दिर। देवतायें भी हैं, स्वर्ग भी है। सर्व का सद्गति दाता आबू में ही आते हैं, इसलिए बड़े ते बड़ा तीर्थ आबू ठहरा। जो भी धर्म स्थापक अथवा गुरू लोग हैं, सबकी सद्गति बाप यहाँ आकर करते हैं। यह सबसे बड़ा तीर्थ है, परन्तु गुप्त है। इनको कोई जानते नहीं हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) जो संस्कार बाप में हैं, वही संस्कार धारण करने हैं। बाप समान ज्ञान का सागर बनना है। देही-अभि-मानी होकर रहने का अभ्यास करना है।
2) आत्मा रूपी बैटरी को सतोप्रधान बनाने के लिए चलते-फिरते याद की यात्रा में रहना है। दैवी कैरेक्टर्स धारण करने हैं। बहुत-बहुत मीठा बनना है।

वरदान:- ज्ञान धन द्वारा प्रकृति के सब साधन प्राप्त करने वाले पदमा-पदमपति भव
ज्ञान धन स्थूल धन की प्राप्ति स्वत: कराता है। जहाँ ज्ञान धन है वहाँ प्रकृति स्वत: दासी बन जाती है। ज्ञान धन से प्रकृति के सब साधन स्वत: प्राप्त हो जाते हैं इसलिए ज्ञान धन सब धन का राजा है। जहाँ राजा है वहाँ सर्व पदार्थ स्वत: प्राप्त होते हैं। यह ज्ञान धन ही पदमा-पदमपति बनाने वाला है, परमार्थ और व्यवहार को स्वत: सिद्ध करता है। ज्ञान धन में इतनी शक्ति है जो अनेक जन्मों के लिए राजाओं का राजा बना देती है।

स्लोगन:- "कल्प-कल्प का विजयी हूँ'' - यह रूहानी नशा इमर्ज हो तो मायाजीत बन जायेंगे।

Tuesday, 24 September 2019

Hindi Murli 25/09/2019

25-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - माया को वश करने का मंत्र है मन्मनाभव, इसी मंत्र में सब खूबियां समाई हुई हैं, यही मंत्र तुम्हें पवित्र बना देता है''

प्रश्नः- आत्मा की सेफ्टी का नम्बरवन साधन कौन-सा है और कैसे?
उत्तर:- याद की यात्रा ही सेफ्टी का नम्बरवन साधन है क्योंकि इस याद से ही तुम्हारे कैरेक्टर सुधरते हैं। तुम माया पर जीत पा लेते हो। याद से पतित कर्मेन्द्रियां शान्त हो जाती हैं। याद से ही बल आता है। ज्ञान तलवार में याद का जौहर चाहिए। याद से ही मीठे सतोप्रधान बनेंगे। कोई को भी नाराज़ नहीं करेंगे इसलिए याद की यात्रा में कमज़ोर नहीं बनना है। अपने आपसे पूछना है कि हम कहाँ तक याद में रहते हैं?

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रोज़-रोज़ सावधानी जरूर देनी होती है। कौन सी? सेफ्टी फर्स्ट। सेफ्टी क्या है? याद की यात्रा से तुम बहुत-बहुत सेफ रहते हो। मूल बात ही बच्चों के लिए यह है। बाप ने समझाया है - तुम बच्चे जितना याद की यात्रा में तत्पर रहेंगे उतनी खुशी भी रहेगी और मैनर्स भी ठीक होंगे क्योंकि पावन भी बनना है। कैरेक्टर्स भी सुधारना है। अपनी जांच करनी है - मेरा कैरेक्टर किसको दु:ख देने जैसा तो नहीं है! मुझे कोई देह-अभिमान तो नहीं आ जाता है? यह अच्छी रीति अपनी जांच रखनी है। बाप बैठ बच्चों को पढ़ाते हैं। तुम बच्चे पढ़ते भी हो तो फिर पढ़ाते भी हो। बेहद का बाप सिर्फ पढ़ाते हैं। बाकी तो सब हैं देहधारी। इसमें सारी दुनिया आ जाती है। एक बाप ही विदेही है। वह तुम बच्चों को कहते हैं कि तुमको भी विदेही बनना है। मैं आया हूँ तुमको विदेही बनाने। पवित्र बनकर ही वहाँ जायेंगे। छी-छी को तो साथ ले नहीं जायेंगे इसलिए पहले-पहले मंत्र ही यह देते हैं। माया को वश करने का यह मंत्र है। पवित्र होने का यह मंत्र है। इस मंत्र में बहुत खूबियां भरी हुई हैं, इनसे ही पवित्र बनना है। मनुष्य से देवता बनना है। जरूर हम ही देवता थे इसलिए बाप कहते हैं - अपनी सेफ्टी चाहो, मजबूत महावीर बनना चाहो तो यह पुरूषार्थ करो। बाप तो शिक्षा देते रहेंगे। भल ड्रामा भी कहते रहेंगे। ड्रामा अनुसार बिल्कुल ठीक ही चल रहा है फिर आगे के लिए भी समझाते रहेंगे। याद की यात्रा में कमजोर नहीं बनना है। बाहर रहने वाली बांधेली गोपिकाएं जितना याद करती हैं, उतना सामने रहने वाले भी याद नहीं करते हैं क्योंकि उनको तड़फन होती है शिवबाबा से मिलने की। जो मिल जाते हैं उन्हों का पेट जैसेकि भर जाता है। जो बहुत याद करते हैं, वह ऊंच पद पा सकते हैं। देखा जाता है - अच्छे-अच्छे, बड़े-बड़े सेन्टर्स सम्भालने वाले मुख्य भी याद की यात्रा में कमज़ोर हैं। याद का जौहर बहुत अच्छा चाहिए। ज्ञान तलवार में याद का जौहर न होने कारण किसको तीर लगता ही नहीं, पूरा मरते नहीं। बच्चे कोशिश करते हैं ज्ञान का बाण लगाकर बाप का बनायें वा मरजीवा बनायें। परन्तु मरते नहीं, तो जरूर ज्ञान तलवार में गड़बड़ है। बाबा भल जानते हैं - ड्रामा बिल्कुल एक्यूरेट चल रहा है, परन्तु आगे के लिए तो समझाते रहेंगे ना। हरेक अपनी दिल से पूछो - हम कहाँ तक याद करते हैं? याद से ही बल आयेगा इसलिए कहा जाता है - ज्ञान तलवार में जौहर चाहिए। ज्ञान तो बहुत सहज रीति समझा सकते हैं।
जितना-जितना याद में रहेंगे उतना बड़े मीठे बनते जायेंगे। तुम सतोप्रधान थे तो बहुत मीठे थे। अब फिर सतोप्रधान बनना है। तुम्हारा स्वभाव भी बहुत मीठा चाहिए। कभी रंज (नाराज़) नहीं होना चाहिए। ऐसा वातावरण न हो जो कोई रंज हो। ऐसी कोशिश करनी चाहिए क्योंकि यह ईश्वरीय कॉलेज स्थापन करने की सर्विस बहुत ऊंची है। विश्व विद्यालय तो भारत में बहुत गाये जाते हैं। वास्तव में वह हैं नहीं। विश्व विद्यालय तो एक ही होता है। बाप आकर सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति देते हैं। बाप जानते हैं सारी दुनिया के जो भी मनुष्य मात्र हैं, सब खत्म होने हैं। बाप को बुलाया भी इसलिए है कि छी-छी दुनिया का खात्मा और नई दुनिया की स्थापना करो। बच्चे भी समझते हैं बरोबर बाप आया हुआ है। अभी माया का पाम्प कितना है। फॉल ऑफ पाम्पिया का खेल भी दिखाते हैं। बड़े-बड़े मकान आदि बना रहे हैं - यह है पाम्प। सतयुग में इतने मंजिल के मकान बनते नहीं हैं। यहाँ बनते हैं क्योंकि रहने के लिये जमीन कम है। विनाश जब होता है तब सब बड़े-बड़े मकान भी गिर पड़ते हैं। आगे इतनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंग नहीं बनती थी। बाम्बस जब छोड़ेंगे तो ऐसे गिरेंगे जैसे ताश के पत्ते गिरते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि वही मरेंगे बाकी दूसरे रह जायेंगे। नहीं, जो जहाँ होगा चाहे समुद्र पर हो, पृथ्वी पर हो, आकाश में हो, पहाड़ों पर हो, उड़ रहा हो....... सब खत्म हो जायेंगे। यह पुरानी दुनिया है ना। जो भी 84 लाख योनियां हैं, यह सब खत्म हो जानी हैं। वहाँ नई दुनिया में यह कुछ भी होगा नहीं। न इतने मनुष्य होंगे, न मच्छर, न जीव जन्तु आदि होंगे। यहाँ तो ढेर के ढेर हैं। अब तुम बच्चे भी देवता बनते हो तो वहाँ हर चीज़ सतोप्रधान होती है। यहाँ भी बड़े आदमी के घर में जायेंगे तो बड़ी सफाई आदि रहती है। तुम तो सबसे जास्ती बड़े देवता बनते हो। बड़े आदमी भी नहीं कहेंगे। तुम बहुत ऊंच देवतायें बनते हो, यह कोई नई बात नहीं है। 5 हज़ार वर्ष पहले भी तुम यह बने थे नम्बरवार। यह इतना किचड़ा आदि वहाँ कुछ भी नहीं होगा। बच्चों को बड़ी खुशी होती है - हम बहुत ऊंच देवता बनते हैं। एक ही बाप हमको पढ़ाने वाला है जो हमको बहुत ऊंच बनाते हैं। पढ़ाई में हमेशा नम्बरवार पोजीशन वाले होते हैं। कोई कम पढ़ते हैं, कोई जास्ती पढ़ते हैं। अब बच्चे पुरूषार्थ कर रहे हैं, बड़े-बड़े सेन्टर्स खोल रहे हैं इसलिए कि बड़ों-बड़ों को मालूम पड़े। भारत का प्राचीन राजयोग भी गाया हुआ है। खास विलायत वालों को जास्ती उत्सुकता होती है - राजयोग सीखने की। भारतवासी तो तमोप्रधान बुद्धि हैं। वह फिर भी तमो बुद्धि हैं इसलिए उन्हों को शौक रहता है भारत का प्राचीन राजयोग सीखने का। भारत का प्राचीन राजयोग नामीग्रामी है, जिससे ही भारत स्वर्ग बना था। बहुत थोड़े आते हैं, जो पूरी रीति समझते हैं। स्वर्ग हेविन पास हो गया सो फिर होगा जरूर। हेविन अथवा पैराडाइज़ है सबसे वन्डर ऑफ वर्ल्ड। स्वर्ग का कितना नाम बाला है। स्वर्ग और नर्क, शिवालय और वेश्यालय। बच्चों को अब नम्बरवार याद है कि हमको अब शिवालय में जाना है। वहाँ जाने के लिए शिवबाबा को याद करना है। वही पण्डा है सबको ले जाने वाला। भक्ति को कहा जाता है रात। ज्ञान को कहा जाता है दिन। यह बेहद की बात है। नई चीज़ और पुरानी चीज़ में बहुत फर्क होता है। अब बच्चों की दिल होती है - इतनी ऊंच ते ऊंच पढ़ाई, ऊंचे ते ऊंचे मकान में हम पढ़ायें तो बड़े-बड़े लोग आयेंगे। एक-एक को बैठ समझाना पड़ता है। वास्तव में पढ़ाई वा शिक्षा के लिए एकान्त में स्थान होते हैं। ब्रह्म-ज्ञानियों के भी आश्रम शहर से दूर-दूर होते हैं और नीचे ही रहते हैं। इतने ऊपर की मंजिल पर नहीं रहते हैं। अभी तो तमोप्रधान होने से शहर में अन्दर घुस पड़े हैं। वह ताकत खत्म हो गई है। इस समय सबकी बैटरी खाली है। अब बैटरी को कैसे भरना है - यह बाप के सिवाए कोई भी बैटरी चार्ज कर न सके। बच्चों को बैटरी चार्ज करने से ही ताकत आती है। उसके लिए मुख्य है याद। उसमें ही माया के विघ्न पड़ते हैं। कोई तो सर्जन के आगे सच बतलाते हैं, कोई छिपा लेते हैं। अन्दर में जो खामियां हैं, वह तो बाप को बतलानी पड़े। इस जन्म में जो पाप किये हैं, वह अविनाशी सर्जन के आगे वर्णन करना चाहिए, नहीं तो वह दिल अन्दर खाता रहेगा। सुनाने के बाद फिर खायेगा नहीं। अन्दर रख लेना - यह भी नुकसानकारक है। जो सच्चे-सच्चे बच्चे बनते हैं, वह सब बाप को बतला देते हैं - इस जन्म में यह-यह पाप किये हैं। दिन-प्रतिदिन बाप ज़ोर देते रहते हैं, यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। तमोप्रधान से पाप तो जरूर होते होंगे ना।
बाप कहते हैं मैं बहुत जन्मों के अन्त में जो नम्बरवन पतित बना है, उनमें ही प्रवेश करता हूँ क्योंकि उनको ही फिर नम्बरवन में जाना है। बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इस जन्म में पाप हुए तो हैं ना। कइयों को पता ही नहीं पड़ता है कि हम यह क्या कर रहे हैं। सच नहीं बतलाते हैं। कोई-कोई सच बतला देते हैं। बाप ने समझाया है - बच्चे, तुम्हारी कर्मेन्द्रियां शान्त तब होती हैं, जब कर्मातीत अवस्था बनती हैं। जैसे मनुष्य बूढ़े होते हैं तो कर्मेन्द्रियां ऑटोमेटिकली शान्त हो जाती हैं। इसमें तो छोटेपन में ही सब शान्त हो जाना चाहिए। योगबल में अच्छी तरह रहे तो इन सब बातों की एन्ड हो जाए। वहाँ कोई ऐसी गन्दी बीमारी, किचड़पट्टी आदि कुछ नहीं होता है। मनुष्य बड़े साफ-शुद्ध रहते हैं। वहाँ है ही राम राज्य। यहाँ है रावण राज्य, तो अनेक प्रकार की गन्दगी की बीमारियां आदि हैं। सतयुग में यह कुछ होती नहीं। बात मत पूछो। नाम ही कितना फर्स्टक्लास है - स्वर्ग, नई दुनिया। बड़ी सफाई रहती है। बाप समझाते हैं - इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही तुम यह सब बातें सुनते हो। कल नहीं सुनते थे। कल मृत्युलोक के मालिक थे, आज अमरलोक के मालिक बनते हो। निश्चय हो जाता है कल मृत्युलोक में थे, अभी संगमयुग पर आने से अमरलोक में जाने के लिए तुम पुरूषार्थ कर रहे हो। पढ़ाने वाला भी अब मिला है। जो अच्छी रीति पढ़ते हैं तो पैसा आदि भी अच्छा कमाते हैं। बलिहारी पढ़ाई की कहेंगे। यह भी ऐसे है। इस पढ़ाई से तुम बहुत ऊंच पद पाते हो। अभी तुम रोशनी में हो। यह भी सिवाए तुम बच्चों के और कोई को मालूम नहीं है। तुम भी फिर घड़ी-घड़ी भूल जाते हो। पुरानी दुनिया में चले जाते हो। भूलना माना पुरानी दुनिया में चले जाना।
अभी तुम संगमयुगी ब्राह्मणों को मालूम है कि हम कलियुग में नहीं हैं। यह सदैव याद रखना है हम नये विश्व के मालिक बन रहे हैं। बाप हमको पढ़ाते ही हैं नई दुनिया में जाने के लिए। यह है शुद्ध अहंकार। वह है अशुद्ध अहंकार। तुम बच्चों को तो कभी अशुद्ध ख्यालात भी नहीं आने चाहिए। पुरूषार्थ करते-करते आखरीन पिछाड़ी में रिजल्ट निकलेगी। बाप समझाते हैं इस समय तक सब पुरूषार्थी हैं। इम्तहान जब होता है तो नम्बरवार पास हो फिर ट्रॉन्सफर हो जाते हैं। तुम्हारी है बेहद की पढ़ाई जिसको सिर्फ तुम ही जानते हो। तुम कितना समझाते हो। नये-नये आते रहते हैं बेहद के बाप से वर्सा पाने के लिए। भल दूर रहते हैं फिर भी सुनते-सुनते निश्चय बुद्धि हो जाते हैं - ऐसे बाबा के सम्मुख भी जाना चाहिए। जिस बाप ने बच्चों को पढ़ाया है, ऐसे बाप से सम्मुख तो जरूर मिलना चाहिए। समझकर ही यहाँ आते हैं। कोई नहीं समझे हुए हैं तो भी यहाँ आने से समझ जाते हैं। बाप कहते हैं दिल में कोई भी बात हो, समझ में नहीं आती हो तो भल पूछो। बाप तो चुम्बक है ना। जिसकी तकदीर में है वह अच्छी रीति पकड़ सकते हैं। तकदीर में नहीं है तो फिर खलास। सुना-अनसुना कर देते हैं। यहाँ कौन बैठ पढ़ाते हैं? भगवान। उनका नाम है शिव। शिवबाबा ही हमको स्वर्ग की बादशाही देते हैं। फिर कौन-सी पढ़ाई अच्छी? तुम कहेंगे हमको शिवबाबा पढ़ाते हैं जिससे 21जन्मों की बादशाही मिलती है। ऐसे-ऐसे समझाते-समझाते ले जाते हैं। कोई तो पूरा न समझने कारण इतनी सर्विस नहीं कर सकते हैं। बन्धन की जंजीरों में जकड़े रहते हैं। शुरू में तो तुम कैसे अपने को जंजीरों से छुड़ाकर आये। जैसे कोई मस्ताने होते हैं। यह भी ड्रामा में पार्ट था जो कशिश हुई। ड्रामा में भट्ठी बननी थी। जीते जी मरे फिर माया की तरफ कोई-कोई चले गये। युद्ध तो होती है ना। माया देखती है - इसने बड़ी हिम्मत दिखाई है। अब हम भी ठोक कर देखते हैं कि पक्के हैं वा नहीं? बच्चों की कितनी सम्भाल होती थी। सब कुछ सिखलाते थे। तुम बच्चे एलबम आदि देखते हो लेकिन सिर्फ चित्र देखने से भी समझ न सकें। कोई बैठ समझाये कि क्या-क्या होता था। कैसे भट्ठी में पड़े थे, फिर कोई कैसे निकले, कोई कैसे। जैसे रूपये छपते हैं तो भी कोई-कोई खराब हो पड़ते हैं। यह भी ईश्वरीय मिशनरी है। ईश्वर बैठ धर्म की स्थापना करते हैं। यह बात किसको भी पता नहीं है। बाप को बुलाते भी हैं परन्तु जैसे तवाई, समझते ही नहीं। कहते हैं यह कैसे हो सकता है। माया रावण एकदम ऐसा बना देती है। शिवबाबा की पूजा भी करते हैं फिर कह देते सर्वव्यापी। शिवबाबा कहते हो फिर सर्वव्यापी कैसे होगा। पूजा करते हैं, लिंग को शिव कहते हैं। ऐसे थोड़ेही कहते कि इसमें शिव बैठा है। अब पत्थर-ठिक्कर में भगवान को कहना.. तो क्या सब भगवान ही भगवान हैं। भगवान अनलिमिटेड तो नहीं होंगे ना। तो बाप बच्चों को समझाते हैं, कल्प पहले भी ऐसे समझाया था। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ऐसा मीठा वातावरण बनाना है जिसमें कोई भी नाराज़ न हो। बाप समान विदेही बनने का पुरूषार्थ करना है। याद के बल से अपना स्वभाव मीठा और कर्मेन्द्रियां शान्त करनी हैं।
2) सदा इसी नशे में रहना है कि अभी हम संगमयुगी हैं, कलियुगी नहीं। बाप हमें नये विश्व का मालिक बनाने के लिए पढ़ा रहे हैं। अशुद्ध ख्यालात समाप्त कर देने हैं।

वरदान:- श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति द्वारा सिद्धियां प्राप्त करने वाले सिद्धि स्वरूप भव
आप मास्टर सर्वशक्तिवान बच्चों के संकल्प में इतनी शक्ति है जो जिस समय चाहो वह कर सकते हो और करा भी सकते हो क्योंकि आपका संकल्प सदा शुभ, श्रेष्ठ और कल्याणकारी है। जो श्रेष्ठ और कल्याण का संकल्प है वह सिद्ध जरूर होता है। मन सदा एकाग्र अर्थात् एक ठिकाने पर स्थित रहता है, भटकता नहीं है। जहाँ चाहे जब चाहे मन को वहाँ स्थित कर सकते हैं। इससे सिद्धि स्वरूप स्वत: बन जाते हैं।

स्लोगन:- परिस्थितियों की हलचल के प्रभाव से बचना है तो विदेही स्थिति में रहने का अभ्यास करो।